Kedarnath Singh केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह (7 जुलाई 1932 – 19 मार्च 2018), हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार थे। वे अज्ञेय द्वारा सम्पादित तीसरा सप्तक के कवि रहे। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उन्हें वर्ष 2013 का 49वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था।
केदारनाथ सिंह आधुनिक हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक हैं। उनकी कविताओं में ग्रामीण जीवन, प्रकृति, भाषा, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। वे नई कविता आंदोलन के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। अकाल में सारस, बाघ और उत्तर कबीर जैसी कृतियाँ हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
मुख्य कृतियाँ: कविता संग्रह : अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहाँ से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ, तालस्ताय और साइकिल, सृष्टि पर पहरा।
प्रमुख काव्य संग्रह
- अभी बिल्कुल अभी : केदारनाथ सिंह
- ज़मीन पक रही है : केदारनाथ सिंह
- तालस्ताय और साइकिल : केदारनाथ सिंह
- तीसरा सप्तक : केदारनाथ सिंह
- अकाल में सारस : केदारनाथ सिंह
- यहाँ से देखो : केदारनाथ सिंह
- बाघ : केदारनाथ सिंह
- उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ : केदारनाथ सिंह
- सृष्टि पर पहरा : केदारनाथ सिंह
- मतदान केन्द्र पर झपकी : केदारनाथ सिंह
- कुछ प्रसिद्ध कविताएँ : केदारनाथ सिंह
- नवगीत : केदारनाथ सिंह
- निबंध और अन्य गद्य कृतियां : केदारनाथ सिंह
हिन्दी कविताएँ : केदारनाथ सिंह
- अकाल में दूब
- अकाल में सारस
- अनागत
- अड़ियल साँस
- अँगूठे का निशान
- अंधेरे पाख का चांद
- आना
- आँकुसपुर
- एक छोटा सा अनुरोध
- एक दिन हँसी-हँसी में
- एक नये दिन के साथ
- एक पारिवारिक प्रश्न
- एक मुकुट की तरह
- ओ मेरी उदास पृथ्वी
- काली मिट्टी
- कुछ और टुकड़े
- कुछ टुकड़े
- कुछ सूत्र जो एक किसान बाप ने बेटे को दिए
- खर्राटे
- खोल दूं यह आज का दिन
- गर्मी में सूखते हुए कपड़े
- घड़ी
- घुलते हुए गलते हुए
- चट्टान को तोड़ो वह सुन्दर हो जायेगी
- छोटे शहर की एक दोपहर
- जनहित का काम
- जब वर्षा शुरू होती है
- जड़ें
- जाना
- जाड़ों के शुरू में आलू
- जूते
- जे.एन.यू. में हिंदी
- झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की
- झरबेर
- टूटा हुआ ट्रक
- तलस्तोय और साइकिल
- तुम आयीं
- दृश्ययुग-1
- दृश्ययुग-2
- दाने
- दिशा
- दीपदान
- दुपहरिया
- दुश्मन
- दूसरे शहर में
- धीरे-धीरे हम
- नए कवि का दुख
- नए शहर में बरगद
- नदी
- न होने की गंध
- निराला को याद करते हुए
- नीम
- पक्षी की वापसी
- पानी में घिरे हुए लोग
- पूँजी
- पत्नी की अट्ठाइसवीं पुण्यतिथि पर
- प्रो० वरयाम सिंह
- प्रक्रिया
- फलों में स्वाद की तरह
- फ़र्क़ नहीं पड़ता
- फसल
- बंगाली बाबू
- बढ़ई और चिड़िया
- बनारस
- बसन्त
- बादल ओ!
- बुनाई का गीत
- बारिश
- महानगर में कवि
- मंच और मचान (लम्बी कविता)
- मार्च की सुबह
- मातृभाषा
- माँझी का पुल
- मुक्ति
- मेरी भाषा के लोग
- मैंने गंगा को देखा
- यह अग्निकिरीटी मस्तक
- यह पृथ्वी रहेगी
- रक्त में खिला हुआ कमल
- रात पिया पिछवारे
- रास्ता
- रोटी
- लयभंग
- लोककथा
- वह
- विद्रोह
- शब्द
- शहर में रात
- शहरबदल
- शाम बेच दी है
- शारद प्रात
- सन् ४७ को याद करते हुए
- सार्त्र की क़ब्र पर
- सुई और तागे के बीच में
- सूर्य
- सूर्यास्त के बाद एक अँधेरी बस्ती से गुजरते हुए
- सृष्टि पर पहरा (कविता)
- हक दो
- हाथ
- होंठ