रामधारी सिंह 'दिनकर' (1908–1974)
हिन्दी साहित्य के कालजयी हस्ताक्षर और राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म २३ सितंबर १९०८ को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण में उनकी मातृभूमि की मिट्टी का गहरा प्रभाव रहा। उच्च शिक्षा के अंतर्गत उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डिग्री प्राप्त की। उन्होंने अपनी मेधा से केवल हिन्दी ही नहीं, बल्कि संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू साहित्य का भी गहन अध्ययन किया था, जिसका प्रतिबिंब उनकी रचनाओं की व्यापकता में स्पष्ट दिखाई देता है।
'दिनकर' जी केवल एक लेखक या कवि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना के ओजस्वी स्वर थे। उनकी काव्य-यात्रा में जहाँ एक ओर 'रेणुका', 'हुंकार' और 'कुरुक्षेत्र' जैसे ग्रंथों के माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की धधकती ज्वाला और वीर रस का अनूठा सामर्थ्य झलकता है, वहीं दूसरी ओर 'उर्वशी' और 'रसवंती' जैसी कृतियों में मानवीय संवेदनाओं, दर्शन और श्रृंगार का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण भी मिलता है। उनकी लेखनी ने अन्याय के विरुद्ध जन-आंदोलन को नई दिशा दी, जिसके कारण उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से नवाजा गया।
साहित्यिक अवदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। उनकी कालजयी कृति 'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया, वहीं विश्व प्रसिद्ध महाकाव्य 'उर्वशी' के लिए उन्हें साहित्य के सर्वोच्च सम्मान भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, कला और साहित्य के प्रति उनकी असाधारण सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।