रश्मिरथी : रामधारी सिंह 'दिनकर' (हिन्दी कविता)


1. प्रथम सर्ग

'जय हो' जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को, जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को। किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल, सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल। ऊँच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है, दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है। क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग, सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग। तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के, पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के। हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक, वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक। जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी, उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी। सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर, निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‌भुत वीर। तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी, जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी। ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास। अलग नगर के कोलाहल से, अलग पुरी-पुरजन से, कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से। निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर, वन्यकुसुम-सा खिला कर्ण, जग की आँखों से दूर। नहीं फूलते कुसुम मात्र राजाओं के उपवन में, अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुञ्ज-कानन में। समझे कौन रहस्य ? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल, गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल। जलद-पटल में छिपा, किन्तु रवि कब तक रह सकता है? युग की अवहेलना शूरमा कब तक सह सकता है? पाकर समय एक दिन आखिर उठी जवानी जाग, फूट पड़ी सबके समक्ष पौरुष की पहली आग। रंग-भूमि में अर्जुन था जब समाँ अनोखा बाँधे, बढ़ा भीड़-भीतर से सहसा कर्ण शरासन साधे। कहता हुआ, 'तालियों से क्या रहा गर्व में फूल? अर्जुन! तेरा सुयश अभी क्षण में होता है धूल।' 'तूने जो-जो किया, उसे मैं भी दिखला सकता हूँ, चाहे तो कुछ नयी कलाएँ भी सिखला सकता हूँ। आँख खोल कर देख, कर्ण के हाथों का व्यापार, फूले सस्ता सुयश प्राप्त कर, उस नर को धिक्कार।' इस प्रकार कह लगा दिखाने कर्ण कलाएँ रण की, सभा स्तब्ध रह गयी, गयी रह आँख टँगी जन-जन की। मन्त्र-मुग्ध-सा मौन चतुर्दिक् जन का पारावार, गूँज रही थी मात्र कर्ण की धन्वा की टंकार। फिरा कर्ण, त्यों 'साधु-साधु' कह उठे सकल नर-नारी, राजवंश के नेताओं पर पड़ी विपद् अति भारी। द्रोण, भीष्म, अर्जुन, सब फीके, सब हो रहे उदास, एक सुयोधन बढ़ा, बोलते हुए, 'वीर! शाबाश !' द्वन्द्व-युद्ध के लिए पार्थ को फिर उसने ललकारा, अर्जुन को चुप ही रहने का गुरु ने किया इशारा। कृपाचार्य ने कहा- 'सुनो हे वीर युवक अनजान' भरत-वंश-अवतंस पाण्डु की अर्जुन है संतान। 'क्षत्रिय है, यह राजपुत्र है, यों ही नहीं लड़ेगा, जिस-तिस से हाथापाई में कैसे कूद पड़ेगा? अर्जुन से लड़ना हो तो मत गहो सभा में मौन, नाम-धाम कुछ कहो, बताओ कि तुम जाति हो कौन?' 'जाति! हाय री जाति !' कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला, कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला 'जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषंड, मैं क्या जानूँ जाति ? जाति हैं ये मेरे भुजदंड। 'ऊपर सिर पर कनक-छत्र, भीतर काले-के-काले, शरमाते हैं नहीं जगत् में जाति पूछनेवाले। सूत्रपुत्र हूँ मैं, लेकिन थे पिता पार्थ के कौन? साहस हो तो कहो, ग्लानि से रह जाओ मत मौन। 'मस्तक ऊँचा किये, जाति का नाम लिये चलते हो, पर, अधर्ममय शोषण के बल से सुख में पलते हो। अधम जातियों से थर-थर काँपते तुम्हारे प्राण, छल से माँग लिया करते हो अंगूठे का दान। 'पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से' रवि-समान दीपित ललाट से और कवच-कुण्डल से, पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प़काश, मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास। 'अर्जुन बङ़ा वीर क्षत्रिय है, तो आगे वह आवे, क्षत्रियत्व का तेज जरा मुझको भी तो दिखलावे। अभी छीन इस राजपुत्र के कर से तीर-कमान, अपनी महाजाति की दूँगा मैं तुमको पहचान।' कृपाचार्य ने कहा ' वृथा तुम क्रुद्ध हुए जाते हो, साधारण-सी बात, उसे भी समझ नहीं पाते हो। राजपुत्र से लड़े बिना होता हो अगर अकाज, अर्जित करना तुम्हें चाहिये पहले कोई राज।' कर्ण हतप्रभ हुआ तनिक, मन-ही-मन कुछ भरमाया, सह न सका अन्याय, सुयोधन बढ़कर आगे आया। बोला-' बड़ा पाप है करना, इस प्रकार, अपमान, उस नर का जो दीप रहा हो सचमुच, सूर्य समान। 'मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का, धनुष छोड़ कर और गोत्र क्या होता रणधीरों का? पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर, 'जाति-जाति' का शोर मचाते केवल कायर क्रूर। 'किसने देखा नहीं, कर्ण जब निकल भीड़ से आया, अनायास आतंक एक सम्पूर्ण सभा पर छाया। कर्ण भले ही सूत्रोपुत्र हो, अथवा श्वपच, चमार, मलिन, मगर, इसके आगे हैं सारे राजकुमार। 'करना क्या अपमान ठीक है इस अनमोल रतन का, मानवता की इस विभूति का, धरती के इस धन का। बिना राज्य यदि नहीं वीरता का इसको अधिकार, तो मेरी यह खुली घोषणा सुने सकल संसार। 'अंगदेश का मुकुट कर्ण के मस्तक पर धरता हूँ। एक राज्य इस महावीर के हित अर्पित करता हूँ।' रखा कर्ण के सिर पर उसने अपना मुकुट उतार, गूँजा रंगभूमि में दुर्योधन का जय-जयकार। कर्ण चकित रह गया सुयोधन की इस परम कृपा से, फूट पड़ा मारे कृतज्ञता के भर उसे भुजा से। दुर्योधन ने हृदय लगा कर कहा-'बन्धु! हो शान्त, मेरे इस क्षुद्रोपहार से क्यों होता उद्‌भ्रान्त? 'किया कौन-सा त्याग अनोखा, दिया राज यदि तुझको! अरे, धन्य हो जायँ प्राण, तू ग्रहण करे यदि मुझको ।' कर्ण और गल गया,' हाय, मुझ पर भी इतना स्नेह! वीर बन्धु! हम हुए आज से एक प्राण, दो देह। 'भरी सभा के बीच आज तूने जो मान दिया है, पहले-पहल मुझे जीवन में जो उत्थान दिया है। उऋण भला होऊँगा उससे चुका कौन-सा दाम? कृपा करें दिनमान कि आऊँ तेरे कोई काम।' घेर खड़े हो गये कर्ण को मुदित, मुग्ध पुरवासी, होते ही हैं लोग शूरता-पूजन के अभिलाषी। चाहे जो भी कहे द्वेष, ईर्ष्या, मिथ्या अभिमान, जनता निज आराध्य वीर को, पर लेती पहचान। लगे लोग पूजने कर्ण को कुंकुम और कमल से, रंग-भूमि भर गयी चतुर्दिक् पुलकाकुल कलकल से। विनयपूर्ण प्रतिवन्दन में ज्यों झुका कर्ण सविशेष, जनता विकल पुकार उठी, 'जय महाराज अंगेश। 'महाराज अंगेश!' तीर-सा लगा हृदय में जा के, विफल क्रोध में कहा भीम ने और नहीं कुछ पा के। 'हय की झाड़े पूँछ, आज तक रहा यही तो काज, सूत-पुत्र किस तरह चला पायेगा कोई राज?' दुर्योधन ने कहा-'भीम ! झूठे बकबक करते हो, कहलाते धर्मज्ञ, द्वेष का विष मन में धरते हो। बड़े वंश से क्या होता है, खोटे हों यदि काम? नर का गुण उज्जवल चरित्र है, नहीं वंश-धन-धान। 'सचमुच ही तो कहा कर्ण ने, तुम्हीं कौन हो, बोलो, जन्मे थे किस तरह? ज्ञात हो, तो रहस्य यह खोलो? अपना अवगुण नहीं देखता, अजब जगत् का हाल, निज आँखों से नहीं सुझता, सच है अपना भाल। कृपाचार्य आ पड़े बीच में, बोले 'छिः! यह क्या है? तुम लोगों में बची नाम को भी क्या नहीं हया है? चलो, चलें घर को, देखो; होने को आयी शाम, थके हुए होगे तुम सब, चाहिए तुम्हें आराम।' रंग-भूमि से चले सभी पुरवासी मोद मनाते, कोई कर्ण, पार्थ का कोई-गुण आपस में गाते। सबसे अलग चले अर्जुन को लिए हुए गुरु द्रोण, कहते हुए -'पार्थ! पहुँचा यह राहु नया फिर कौन? 'जन्मे नहीं जगत् में अर्जुन! कोई प्रतिबल तेरा, टँगा रहा है एक इसी पर ध्यान आज तक मेरा। एकलव्य से लिया अँगूठा, कढ़ी न मुख से आह, रखा चाहता हूँ निष्कंटक बेटा! तेरी राह। 'मगर, आज जो कुछ देखा, उससे धीरज हिलता है, मुझे कर्ण में चरम वीरता का लक्षण मिलता है। बढ़ता गया अगर निष्कंटक यह उद्‌भट भट बांल, अर्जुन! तेरे लिये कभी यह हो सकता है काल! 'सोच रहा हूँ क्या उपाय, मैं इसके साथ करूँगा, इस प्रचंडतम धूमकेतु का कैसे तेज हरूँगा? शिष्य बनाऊँगा न कर्ण को, यह निश्चित है बात; रखना ध्यान विकट प्रतिभट का, पर तू भी हे तात!' रंग-भूमि से लिये कर्ण को, कौरव शंख बजाते, चले झूमते हुए खुशी में गाते, मौज मनाते। कञ्चन के युग शैल-शिखर-सम सुगठित, सुघर सुवर्ण, गलबाँही दे चले परस्पर दुर्योधन औ' कर्ण। बड़ी तृप्ति के साथ सूर्य शीतल अस्ताचल पर से, चूम रहे थे अंग पुत्र का स्निग्ध-सुकोमल कर से। आज न था प्रिय उन्हें दिवस का समय सिद्ध अवसान, विरम गया क्षण एक क्षितिज पर गति को छोड़ विमान। और हाय, रनिवास चला वापस जब राजभवन को, सबके पीछे चली एक विकला मसोसती मन को। उजड़ गये हों स्वप्न कि जैसे हार गयी हो दाँव, नहीं उठाये भी उठ पाते थे कुन्ती के पाँव।

2. द्वितीय सर्ग

शीतल, विरल एक कानन शोभित अधित्यका के ऊपर, कहीं उत्स-प्रस्त्रवण चमकते, झरते कहीं शुभ निर्झर। जहाँ भूमि समतल, सुन्दर है, नहीं दीखते है पाहन, हरियाली के बीच खड़ा है, विस्तृत एक उटज पावन। आस-पास कुछ कटे हुए पीले धनखेत सुहाते हैं, शशक, मूस, गिलहरी, कबूतर घूम-घूम कण खाते हैं। कुछ तन्द्रिल, अलसित बैठे हैं, कुछ करते शिशु का लेहन, कुछ खाते शाकल्य, दीखते बड़े तुष्ट सारे गोधन। हवन-अग्नि बुझ चुकी, गन्ध से वायु, अभी, पर, माती है, भीनी-भीनी महक प्राण में मादकता पहुँचती है, धूम-धूम चर्चित लगते हैं तरु के श्याम छदन कैसे? झपक रहे हों शिशु के अलसित कजरारे लोचन जैसे। बैठे हुए सुखद आतप में मृग रोमन्थन करते हैं, वन के जीव विवर से बाहर हो विश्रब्ध विचरते हैं। सूख रहे चीवर, रसाल की नन्हीं झुकी टहनियों पर, नीचे बिखरे हुए पड़े हैं इंगुद-से चिकने पत्थर। अजिन, दर्भ, पालाश, कमंडलु-एक ओर तप के साधन, एक ओर हैं टँगे धनुष, तूणीर, तीर, बरझे भीषण। चमक रहा तृण-कुटी-द्वार पर एक परशु आभाशाली, लौह-दण्ड पर जड़ित पड़ा हो, मानो, अर्ध अंशुमाली। श्रद्धा बढ़ती अजिन-दर्भ पर, परशु देख मन डरता है, युद्ध-शिविर या तपोभूमि यह, समझ नहीं कुछ पड़ता है। हवन-कुण्ड जिसका यह उसके ही क्या हैं ये धनुष-कुठार? जिस मुनि की यह स्रुवा, उसी की कैसे हो सकती तलवार? आयी है वीरता तपोवन में क्या पुण्य कमाने को? या संन्यास साधना में है दैहिक शक्ति जगाने को? मन ने तन का सिद्ध-यन्त्र अथवा शस्त्रों में पाया है? या कि वीर कोई योगी से युक्ति सीखने आया है? परशु और तप, ये दोनों वीरों के ही होते श्रृंगार, क्लीव न तो तप ही करता है, न तो उठा सकता तलवार। तप से मनुज दिव्य बनता है, षड् विकार से लड़ता है, तन की समर-भूमि में लेकिन, काम खड्ग ही करता है। किन्तु, कौन नर तपोनिष्ठ है यहाँ धनुष धरनेवाला? एक साथ यज्ञाग्नि और असि की पूजा करनेवाला? कहता है इतिहास, जगत् में हुआ एक ही नर ऐसा, रण में कुटिल काल-सम क्रोधी तप में महासूर्य-जैसा! मुख में वेद, पीठ पर तरकस, कर में कठिन कुठार विमल, शाप और शर, दोनों ही थे, जिस महान् ऋषि के सम्बल। यह कुटीर है उसी महामुनि परशुराम बलशाली का, भृगु के परम पुनीत वंशधर, व्रती, वीर, प्रणपाली का। हाँ-हाँ, वही, कर्ण की जाँघों पर अपना मस्तक धरकर, सोये हैं तरुवर के नीचे, आश्रम से किञ्चित् हटकर। पत्तों से छन-छन कर मीठी धूप माघ की आती है, पड़ती मुनि की थकी देह पर और थकान मिटाती है। कर्ण मुग्ध हो भक्ति-भाव में मग्न हुआ-सा जाता है, कभी जटा पर हाथ फेरता, पीठ कभी सहलाता है, चढें नहीं चीटियाँ बदन पर, पड़े नहीं तृण-पात कहीं, कर्ण सजग है, उचट जाय गुरुवर की कच्ची नींद नहीं। 'वृद्ध देह, तप से कृश काया, उस पर आयुध-सञ्चालन, हाथ, पड़ा श्रम-भार देव पर असमय यह मेरे कारण। किन्तु, वृद्ध होने पर भी अंगों में है क्षमता कितनी, और रात-दिन मुझ पर दिखलाने रहते ममता कितनी। 'कहते हैं, 'ओ वत्स! पुष्टिकर भोग न तू यदि खायेगा, मेरे शिक्षण की कठोरता को कैसे सह पायेगा? अनुगामी यदि बना कहीं तू खान-पान में भी मेरा, सूख जायगा लहू, बचेगा हड्डी-भर ढाँचा तेरा। 'जरा सोच, कितनी कठोरता से मैं तुझे चलाता हूँ, और नहीं तो एक पाव दिन भर में रक्त जलाता हूँ। इसकी पूर्ति कहाँ से होगी, बना अगर तू संन्यासी, इस प्रकार तो चबा जायगी तुझे भूख सत्यानाशी। 'पत्थर-सी हों मांस-पेशियाँ, लोहे-से भुज-दण्ड अभय, नस-नस में हो लहर आग की, तभी जवानी पाती जय। विप्र हुआ तो क्या, रक्खेगा रोक अभी से खाने पर? कर लेना घनघोर तपस्या वय चतुर्थ के आने पर। 'ब्राह्मण का है धर्म त्याग, पर, क्या बालक भी त्यागी हों? जन्म साथ, शिलोञ्छवृत्ति के ही क्या वे अनुरागी हों? क्या विचित्र रचना समाज की? गिरा ज्ञान ब्राह्मण-घर में, मोती बरसा वैश्य-वेश्म में, पड़ा खड्‌ग क्षत्रिय-कर में। खड्‌ग बड़ा उद्धत होता है, उद्धत होते हैं राजे, इसीलिए तो सदा बनाते रहते वे रण के बाजे। और करे ज्ञानी ब्राह्मण क्या? असि-विहीन मन डरता है, राजा देता मान, भूप का वह भी आदर करता है। 'सुनता कौन यहाँ ब्राह्मण की, करते सब अपने मन की, डुबो रही शोणित में भू को भूपों की लिप्सा रण की। औ' रण भी किसलिए? नहीं जग से दुख-दैन्य भगाने को, परशोषक, पथ-भ्रान्त मनुज को नहीं धर्म पर लाने को। 'रण केवल इसलिए कि राजे और सुखी हों, मानी हों, और प्रजाएँ मिलें उन्हें, वे और अधिक अभिमानी हों। रण केवल इसलिए कि वे कल्पित अभाव से छूट सकें, बढ़े राज्य की सीमा, जिससे अधिक जनों को लूट सकें। 'रण केवल इसलिए कि सत्ता बढ़े, नहीं पत्ता डोले, भूपों के विपरीत न कोई, कहीं, कभी, कुछ भी बोले। ज्यों-ज्यों मिलती विजय, अहं नरपति का बढ़ता जाता है, और जोर से वह समाज के सिर पर चढ़ता जाता है। 'अब तो है यह दशा कि जो कुछ है, वह राजा का बल है, ब्राह्मण खड़ा सामने केवल लिए शंख-गंगाजल है। कहाँ तेज ब्राह्मण में, अविवेकी राजा को रोक सके, धरे कुपथ पर जभी पाँव वह, तत्क्षण उसको टोक सके। 'और कहे भी तो ब्राह्मण की बात कौन सुन पाता है? यहाँ रोज राजा ब्राह्मण को अपमानित करवाता है। चलती नहीं यहाँ पंडित की, चलती नहीं तपस्वी की, जय पुकारती प्रजा रात-दिन राजा जयी यशस्वी की! 'सिर था जो सारे समाज का, वही अनादर पाता है। जो भी खिलता फूल, भुजा के ऊपर चढ़ता जाता है। चारों ओर लोभ की ज्वाला, चारों ओर भोग की जय; पाप-भार से दबी-धँसी जा रही धरा पल-पल निश्चय। 'जब तक भोगी भूप प्रजाओं के नेता कहलायेंगे, ज्ञान, त्याग, तप नहीं श्रेष्ठता का जबतक पद पायेंगे। अशन-वसन से हीन, दीनता में जीवन धरनेवाले। सहकर भी अपमान मनुजता की चिन्ता करनेवाले, 'कवि, कोविद, विज्ञान-विशारद, कलाकार, पण्डित, ज्ञानी, कनक नहीं, कल्पना, ज्ञान, उज्ज्वल चरित्र के अभिमानी, इन विभूतियों को जब तक संसार नहीं पहचानेगा, राजाओं से अधिक पूज्य जब तक न इन्हें वह मानेगा, 'तब तक पड़ी आग में धरती, इसी तरह अकुलायेगी, चाहे जो भी करे, दुखों से छूट नहीं वह पायेगी। थकी जीभ समझा कर, गहरी लगी ठेस अभिलाषा को, भूप समझता नहीं और कुछ, छोड़ खड्‌ग की भाषा को। 'रोक-टोक से नहीं सुनेगा, नृप समाज अविचारी है, ग्रीवाहर, निष्ठुर कुठार का यह मदान्ध अधिकारी है। इसीलिए तो मैं कहता हूँ, अरे ज्ञानियों! खड्‌ग धरो, हर न सका जिसको कोई भी, भू का वह तुम त्रास हरो। 'रोज कहा करते हैं गुरुवर, 'खड्‌ग महाभयकारी है, इसे उठाने का जग में हर एक नहीं अधिकारी है। वही उठा सकता है इसको, जो कठोर हो, कोमल भी, जिसमें हो धीरता, वीरता और तपस्या का बल भी। 'वीर वही है जो कि शत्रु पर जब भी खड्‌ग उठाता है, मानवता के महागुणों की सत्ता भूल न जाता है। सीमित जो रख सके खड्‌ग को, पास उसी को आने दो, विप्रजाति के सिवा किसी को मत तलवार उठाने दो। 'जब-जब मैं शर-चाप उठा कर करतब कुछ दिखलाता हूँ, सुनकर आशीर्वाद देव का, धन्य-धन्य हो जाता हूँ। 'जियो, जियो अय वत्स! तीर तुमने कैसा यह मारा है, दहक उठा वन उधर, इधर फूटी निर्झर की धारा है। 'मैं शंकित था, ब्राह्मा वीरता मेरे साथ मरेगी क्या, परशुराम की याद विप्र की जाति न जुगा धरेगी क्या? पाकर तुम्हें किन्तु, इस वन में, मेरा हृदय हुआ शीतल, तुम अवश्य ढोओगे उसको मुझमें है जो तेज, अनल। 'जियो, जियो ब्राह्मणकुमार! तुम अक्षय कीर्ति कमाओगे, एक बार तुम भी धरती को निःक्षत्रिय कर जाओगे। निश्चय, तुम ब्राह्मणकुमार हो, कवच और कुण्डल-धारी, तप कर सकते और पिता-माता किसके इतना भारी? 'किन्तु हाय! 'ब्राह्मणकुमार' सुन प्रण काँपने लगते हैं, मन उठता धिक्कार, हृदय में भाव ग्लानि के जगते हैं। गुरु का प्रेम किसी को भी क्या ऐसे कभी खला होगा? और शिष्य ने कभी किसी गुरु को इस तरह छला होगा? 'पर मेरा क्या दोष? हाय! मैं और दूसरा क्या करता, पी सारा अपमान, द्रोण के मैं कैसे पैरों पड़ता। और पाँव पड़ने से भी क्या गूढ़ ज्ञान सिखलाते वे, एकलव्य-सा नहीं अँगूठा क्या मेरा कटवाते वे? 'हाय, कर्ण, तू क्यों जन्मा था? जन्मा तो क्यों वीर हुआ? कवच और कुण्डल-भूषित भी तेरा अधम शरीर हुआ? धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान? जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान? 'नहीं पूछता है कोई तुम व्रती, वीर या दानी हो? सभी पूछते मात्र यही, तुम किस कुल के अभिमानी हो? मगर, मनुज क्या करे? जन्म लेना तो उसके हाथ नहीं, चुनना जाति और कुल अपने बस की तो है बात नहीं। 'मैं कहता हूँ, अगर विधाता नर को मुठ्ठी में भरकर, कहीं छींट दें ब्रह्मलोक से ही नीचे भूमण्डल पर, तो भी विविध जातियों में ही मनुज यहाँ आ सकता है; नीचे हैं क्यारियाँ बनीं, तो बीज कहाँ जा सकता है? 'कौन जन्म लेता किस कुल में? आकस्मिक ही है यह बात, छोटे कुल पर, किन्तु यहाँ होते तब भी कितने आघात! हाय, जाति छोटी है, तो फिर सभी हमारे गुण छोटे, जाति बड़ी, तो बड़े बनें, वे, रहें लाख चाहे खोटे।' गुरु को लिए कर्ण चिन्तन में था जब मग्न, अचल बैठा, तभी एक विषकीट कहीं से आसन के नीचे पैठा। वज्रदंष्ट्र वह लगा कर्ण के उरु को कुतर-कुतर खाने, और बनाकर छिद्र मांस में मन्द-मन्द भीतर जाने। कर्ण विकल हो उठा, दुष्ट भौरे पर हाथ धरे कैसे, बिना हिलाये अंग कीट को किसी तरह पकड़े कैसे? पर भीतर उस धँसे कीट तक हाथ नहीं जा सकता था, बिना उठाये पाँव शत्रु को कर्ण नहीं पा सकता था। किन्तु, पाँव के हिलते ही गुरुवर की नींद उचट जाती, सहम गयी यह सोच कर्ण की भक्तिपूर्ण विह्वल छाती। सोचा, उसने, अतः, कीट यह पिये रक्त, पीने दूँगा, गुरु की कच्ची नींद तोड़ने का, पर पाप नहीं लूँगा। बैठा रहा अचल आसन से कर्ण बहुत मन को मारे, आह निकाले बिना, शिला-सी सहनशीलता को धारे। किन्तु, लहू की गर्म धार जो सहसा आन लगी तन में, परशुराम जग पड़े, रक्त को देख हुए विस्मित मन में। कर्ण झपट कर उठा इंगितों में गुरु से आज्ञा लेकर, बाहर किया कीट को उसने क्षत में से उँगली देकर। परशुराम बोले- 'शिव! शिव! तूने यह की मूर्खता बड़ी, सहता रहा अचल, जाने कब से, ऐसी वेदना कड़ी।' तनिक लजाकर कहा कर्ण ने, 'नहीं अधिक पीड़ा मुझको, महाराज, क्या कर सकता है यह छोटा कीड़ा मुझको? मैंने सोचा, हिला-डुला तो वृथा आप जग जायेंगे, क्षण भर को विश्राम मिला जो नाहक उसे गँवायेंगे। 'निश्चल बैठा रहा, सोच, यह कीट स्वयं उड़ जायेगा, छोटा-सा यह जीव मुझे कितनी पीड़ा पहुँचायेगा? पर, यह तो भीतर धँसता ही गया, मुझे हैरान किया, लज्जित हूँ इसीलिए कि सब-कुछ स्वयं आपने देख लिया।' परशुराम गंभीर हो गये सोच न जाने क्या मन में, फिर सहसा क्रोधाग्नि भयानक भभक उठी उनके तन में। दाँत पीस, आँखें तरेरकर बोले- 'कौन छली है तू? ब्राह्मण है या और किसी अभिजन का पुत्र बली है तू? 'सहनशीलता को अपनाकर ब्राह्मण कभी न जीता है, किसी लक्ष्य के लिए नहीं अपमान-हलाहल पीता है। सह सकता जो कठिन वेदना, पी सकता अपमान वही, बुद्धि चलाती जिसे, तेज का कर सकता बलिदान वही। 'तेज-पुञ्ज ब्राह्मण तिल-तिल कर जले, नहीं यह हो सकता, किसी दशा में भी स्वभाव अपना वह कैसे खो सकता? कसक भोगता हुआ विप्र निश्चल कैसे रह सकता है? इस प्रकार की चुभन, वेदना क्षत्रिय ही सह सकता है। 'तू अवश्य क्षत्रिय है, पापी! बता, न तो, फल पायेगा, परशुराम के कठिन शाप से अभी भस्म हो जायेगा।' 'क्षमा, क्षमा हे देव दयामय!' गिरा कर्ण गुरु के पद पर, मुख विवर्ण हो गया, अंग काँपने लगे भय से थर-थर! 'सूत-पूत्र मैं शूद्र कर्ण हूँ, करुणा का अभिलाषी हूँ, जो भी हूँ, पर, देव, आपका अनुचर अन्तेवासी हूँ छली नहीं मैं हाय, किन्तु छल का ही तो यह काम हुआ, आया था विद्या-संचय को, किन्तु, व्यर्थ बदनाम हुआ। 'बड़ा लोभ था, बनूँ शिष्य मैं कार्त्तवीर्य के जेता का, तपोदीप्त शूरमा, विश्व के नूतन धर्म-प्रणेता का। पर, शंका थी मुझे, सत्य का अगर पता पा जायेंगे, महाराज मुझ सूत-पुत्र को कुछ भी नहीं सिखायेंगे। 'बता सका मैं नहीं इसी से प्रभो! जाति अपनी छोटी, करें देव विश्वास, भावना और न थी कोई खोटी। पर इतने से भी लज्जा में हाय, गड़ा-सा जाता हूँ, मारे बिना हृदय में अपने-आप मरा-सा जाता हूँ। 'छल से पाना मान जगत् में किल्विष है, मल ही तो है, ऊँचा बना आपके आगे, सचमुच यह छल ही तो है। पाता था सम्मान आज तक दानी, व्रती, बली होकर, अब जाऊँगा कहाँ स्वयं गुरु के सामने छली होकर? 'करें भस्म ही मुझे देव! सम्मुख है मस्तक नत मेरा, एक कसक रह गयी, नहीं पूरा जीवन का व्रत मेरा। गुरु की कृपा! शाप से जलकर अभी भस्म हो जाऊँगा, पर, मदान्ध अर्जुन का मस्तक देव! कहाँ मैं पाऊँगा? 'यह तृष्णा, यह विजय-कामना, मुझे छोड़ क्या पायेगी? प्रभु, अतृप्त वासना मरे पर भी मुझे को भरमायेगी। दुर्योधन की हार देवता! कैसे सहन करूँगा मैं? अभय देख अर्जुन को मरकर भी तो रोज मरूँगा मैं? 'परशुराम का शिष्य कर्ण, पर, जीवन-दान न माँगेगा, बड़ी शान्ति के साथ चरण को पकड़ प्राण निज त्यागेगा। प्रस्तुत हूँ, दें शाप, किन्तु अन्तिम सुख तो यह पाने दें, इन्हीं पाद-पद्‌मों के ऊपर मुझको प्राण गँवाने दें।' लिपट गया गुरु के चरणों से विकल कर्ण इतना कहकर, दो कणिकाएँ गिरीं अश्रु की गुरु की आँखों से बह कर। बोले- 'हाय, कर्ण तू ही प्रतिभट अर्जुन का नामी है? निश्चल सखा धार्तराष्ट्रों का, विश्व-विजय का कामी है? 'अब समझा, किसलिए रात-दिन तू वैसा श्रम करता था, मेरे शब्द-शब्द को मन में क्यों सीपी-सा धरता था। देखें अगणित शिष्य, द्रोण को भी करतब कुछ सिखलाया, पर तुझ-सा जिज्ञासु आज तक कभी नहीं मैंने पाया। 'तूने जीत लिया था मुझको निज पवित्रता के बल से, क्या था पता, लूटने आया है कोई मुझको छल से? किसी और पर नहीं किया, वैसा सनेह मैं करता था, सोने पर भी धनुर्वेद का, ज्ञान कान में भरता था। 'नहीं किया कार्पण्य, दिया जो कुछ था मेरे पास रतन, तुझमें निज को सौंप शान्त हो, अभी-अभी प्रमुदित था मन। पापी, बोल अभी भी मुख से, तू न सूत, रथचालक है, परशुराम का शिष्य विक्रमी, विप्रवंश का बालक है। 'सूत-वंश में मिला सूर्य-सा कैसे तेज प्रबल तुझको? किसने लाकर दिये, कहाँ से कवच और कुण्डल तुझको? सुत-सा रखा जिसे, उसको कैसे कठोर हो मारूँ मैं? जलते हुए क्रोध की ज्वाला, लेकिन कहाँ उतारूँ मैं?' पद पर बोला कर्ण, 'दिया था जिसको आँखों का पानी, करना होगा ग्रहण उसी को अनल आज हे गुरु ज्ञानी। बरसाइये अनल आँखों से, सिर पर उसे सँभालूँगा, दण्ड भोग जलकर मुनिसत्तम! छल का पाप छुड़ा लूँगा।' परशुराम ने कहा-'कर्ण! तू बेध नहीं मुझको ऐसे, तुझे पता क्या सता रहा है मुझको असमञ्जस कैसे? पर, तूने छल किया, दण्ड उसका, अवश्य ही पायेगा, परशुराम का क्रोध भयानक निष्फल कभी न जायेगा। 'मान लिया था पुत्र, इसी से, प्राण-दान तो देता हूँ, पर, अपनी विद्या का अन्तिम चरम तेज हर लेता हूँ। सिखलाया ब्रह्मास्त्र तुझे जो, काम नहीं वह आयेगा, है यह मेरा शाप, समय पर उसे भूल तू जायेगा। कर्ण विकल हो खड़ा हुआ कह, 'हाय! किया यह क्या गुरुवर? दिया शाप अत्यन्त निदारुण, लिया नहीं जीवन क्यों हर? वर्षों की साधना, साथ ही प्राण नहीं क्यों लेते हैं? अब किस सुख के लिए मुझे धरती पर जीने देते हैं?' परशुराम ने कहा- 'कर्ण! यह शाप अटल है, सहन करो, जो कुछ मैंने कहा, उसे सिर पर ले सादर वहन करो। इस महेन्द्र-गिरि पर तुमने कुछ थोड़ा नहीं कमाया है, मेरा संचित निखिल ज्ञान तूने मझसे ही पाया है। 'रहा नहीं ब्रह्मास्त्र एक, इससे क्या आता-जाता है? एक शस्त्र-बल से न वीर, कोई सब दिन कहलाता है। नयी कला, नूतन रचनाएँ, नयी सूझ नूतन साधन, नये भाव, नूतन उमंग से, वीर बने रहते नूतन। 'तुम तो स्वयं दीप्त पौरुष हो, कवच और कुण्डल-धारी, इनके रहते तुम्हें जीत पायेगा कौन सुभट भारी। अच्छा लो वर भी कि विश्व में तुम महान् कहलाओगे, भारत का इतिहास कीर्ति से और धवल कर जाओगे। 'अब जाओ, लो विदा वत्स, कुछ कड़ा करो अपने मन को, रहने देते नहीं यहाँ पर हम अभिशप्त किसी जन को। हाय छीनना पड़ा मुझी को, दिया हुआ अपना ही धन, सोच-सोच यह बहुत विकल हो रहा, नहीं जानें क्यों मन? 'व्रत का, पर निर्वाह कभी ऐसे भी करना होता है। इस कर से जो दिया उसे उस कर से हरना होता है। अब जाओ तुम कर्ण! कृपा करके मुझको निःसंग करो। देखो मत यों सजल दृष्टि से, व्रत मेरा मत भंग करो। 'आह, बुद्धि कहती कि ठीक था, जो कुछ किया, परन्तु हृदय, मुझसे कर विद्रोह तुम्हारी मना रहा, जाने क्यों, जय? अनायास गुण-शील तुम्हारे, मन में उगते आते हैं, भीतर किसी अश्रु-गंगा में मुझे बोर नहलाते हैं। जाओ, जाओ कर्ण! मुझे बिलकुल असंग हो जाने दो बैठ किसी एकान्त कुंज में मन को स्वस्थ बनाने दो। भय है, तुम्हें निराश देखकर छाती कहीं न फट जाये, फिरा न लूँ अभिशाप, पिघलकर वाणी नहीं उलट जाये।' इस प्रकार कह परशुराम ने फिरा लिया आनन अपना, जहाँ मिला था, वहीं कर्ण का बिखर गया प्यारा सपना। छूकर उनका चरण कर्ण ने अर्घ्य अश्रु का दान किया, और उन्हें जी-भर निहार कर मंद-मंद प्रस्थान किया। परशुधर के चरण की धूलि लेकर, उन्हें, अपने हृदय की भक्ति देकर, निराशा सेविकल, टूटा हुआ-सा, किसी गिरि-श्रृंगा से छूटा हुआ-सा, चला खोया हुआ-सा कर्ण मन में, कि जैसे चाँद चलता हो गगन में।

3. तृतीय सर्ग

1 हो गया पूर्ण अज्ञात वास, पाडंव लौटे वन से सहास, पावक में कनक-सदृश तप कर, वीरत्व लिए कुछ और प्रखर, नस-नस में तेज-प्रवाह लिये, कुछ और नया उत्साह लिये। सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, शूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते, विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं। मुख से न कभी उफ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं, जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग-निरत नित रहते हैं, शूलों का मूल नसाने को, बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को। है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़। मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है। गुण बड़े एक से एक प्रखर, हैं छिपे मानवों के भीतर, मेंहदी में जैसे लाली हो, वर्तिका-बीच उजियाली हो। बत्ती जो नहीं जलाता है रोशनी नहीं वह पाता है। पीसा जाता जब इक्षु-दण्ड, झरती रस की धारा अखण्ड, मेंहदी जब सहती है प्रहार, बनती ललनाओं का सिंगार। जब फूल पिरोये जाते हैं, हम उनको गले लगाते हैं। वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ? अतुलित यश क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ? जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया। जब विघ्न सामने आते हैं, सोते से हमें जगाते हैं, मन को मरोड़ते हैं पल-पल, तन को झँझोरते हैं पल-पल। सत्पथ की ओर लगाकर ही, जाते हैं हमें जगाकर ही। वाटिका और वन एक नहीं, आराम और रण एक नहीं। वर्षा, अंधड़, आतप अखंड, पौरुष के हैं साधन प्रचण्ड। वन में प्रसून तो खिलते हैं, बागों में शाल न मिलते हैं। कङ्करियाँ जिनकी सेज सुघर, छाया देता केवल अम्बर, विपदाएँ दूध पिलाती हैं, लोरी आँधियाँ सुनाती हैं। जो लाक्षा-गृह में जलते हैं, वे ही शूरमा निकलते हैं। बढ़कर विपत्तियों पर छा जा, मेरे किशोर! मेरे ताजा! जीवन का रस छन जाने दे, तन को पत्थर बन जाने दे। तू स्वयं तेज भयकारी है, क्या कर सकती चिनगारी है? वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। 'दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशिष समाज की ले न सका, उलटे, हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य, साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले- 'जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे। यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। 'उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर, सब हैं मेरे मुख के अन्दर। 'दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख, चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर। शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र। 'शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश, शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल। जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें, हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें। 'भूलोक, अतल, पाताल देख, गत और अनागत काल देख, यह देख जगत का आदि-सृजन, यह देख, महाभारत का रण, मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान, कहाँ इसमें तू है। 'अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख, मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख। सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं। 'जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन, साँसों में पाता जन्म पवन, पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर! मैं जभी मूँदता हूँ लोचन, छा जाता चारों ओर मरण। 'बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन। सूने को साध न सकता है, वह मुझे बाँध कब सकता है? 'हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ। याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा। 'टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर, फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा। दुर्योधन! रण ऐसा होगा। फिर कभी नहीं जैसा होगा। 'भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे, वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे। आखिर तू भूशायी होगा, हिंसा का पर, दायी होगा।' थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े। केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे। कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय, दोनों पुकारते थे 'जय-जय'! 2 भगवान सभा को छोड़ चले, करके रण गर्जन घोर चले सामने कर्ण सकुचाया सा, आ मिला चकित भरमाया सा हरि बड़े प्रेम से कर धर कर, ले चढ़े उसे अपने रथ पर। रथ चला परस्पर बात चली, शम-दम की टेढी घात चली, शीतल हो हरि ने कहा, "हाय, अब शेष नही कोई उपाय हो विवश हमें धनु धरना है, क्षत्रिय समूह को मरना है। "मैंने कितना कुछ कहा नहीं? विष-व्यंग कहाँ तक सहा नहीं? पर, दुर्योधन मतवाला है, कुछ नहीं समझने वाला है चाहिए उसे बस रण केवल, सारी धरती कि मरण केवल "हे वीर ! तुम्हीं बोलो अकाम, क्या वस्तु बड़ी थी पाँच ग्राम? वह भी कौरव को भारी है, मति गई मूढ़ की मरी है दुर्योधन को बोधूं कैसे? इस रण को अवरोधूं कैसे? "सोचो क्या दृश्य विकट होगा, रण में जब काल प्रकट होगा? बाहर शोणित की तप्त धार, भीतर विधवाओं की पुकार निरशन, विषण्ण बिल्लायेंगे, बच्चे अनाथ चिल्लायेंगे। "चिंता है, मैं क्या और करूं? शान्ति को छिपा किस ओट धरूँ? सब राह बंद मेरे जाने, हाँ एक बात यदि तू माने, तो शान्ति नहीं जल सकती है, समराग्नि अभी तल सकती है। "पा तुझे धन्य है दुर्योधन, तू एकमात्र उसका जीवन तेरे बल की है आस उसे, तुझसे जय का विश्वास उसे तू संग न उसका छोडेगा, वह क्यों रण से मुख मोड़ेगा? "क्या अघटनीय घटना कराल? तू पृथा-कुक्षी का प्रथम लाल, बन सूत अनादर सहता है, कौरव के दल में रहता है, शर-चाप उठाये आठ प्रहार, पांडव से लड़ने हो तत्पर। "माँ का सनेह पाया न कभी, सामने सत्य आया न कभी, किस्मत के फेरे में पड़ कर, पा प्रेम बसा दुश्मन के घर निज बंधू मानता है पर को, कहता है शत्रु सहोदर को। "पर कौन दोष इसमें तेरा? अब कहा मान इतना मेरा चल होकर संग अभी मेरे, है जहाँ पाँच भ्राता तेरे बिछुड़े भाई मिल जायेंगे, हम मिलकर मोद मनाएंगे। "कुन्ती का तू ही तनय ज्येष्ठ, बल बुद्धि, शील में परम श्रेष्ठ मस्तक पर मुकुट धरेंगे हम, तेरा अभिषेक करेंगे हम आरती समोद उतारेंगे, सब मिलकर पाँव पखारेंगे। "पद-त्राण भीम पहनायेगा, धर्माचिप चंवर डुलायेगा पहरे पर पार्थ प्रवर होंगे, सहदेव-नकुल अनुचर होंगे भोजन उत्तरा बनायेगी, पांचाली पान खिलायेगी "आहा ! क्या दृश्य सुभग होगा ! आनंद-चमत्कृत जग होगा सब लोग तुझे पहचानेंगे, असली स्वरूप में जानेंगे खोयी मणि को जब पायेगी, कुन्ती फूली न समायेगी। "रण अनायास रुक जायेगा, कुरुराज स्वयं झुक जायेगा संसार बड़े सुख में होगा, कोई न कहीं दुःख में होगा सब गीत खुशी के गायेंगे, तेरा सौभाग्य मनाएंगे। "कुरुराज्य समर्पण करता हूँ, साम्राज्य समर्पण करता हूँ यश मुकुट मान सिंहासन ले, बस एक भीख मुझको दे दे कौरव को तज रण रोक सखे, भू का हर भावी शोक सखे सुन-सुन कर कर्ण अधीर हुआ, क्षण एक तनिक गंभीर हुआ, फिर कहा "बड़ी यह माया है, जो कुछ आपने बताया है दिनमणि से सुनकर वही कथा मैं भोग चुका हूँ ग्लानि व्यथा "जब ध्यान जन्म का धरता हूँ, उन्मन यह सोचा करता हूँ, कैसी होगी वह माँ कराल, निज तन से जो शिशु को निकाल धाराओं में धर आती है, अथवा जीवित दफनाती है? "सेवती मास दस तक जिसको, पालती उदर में रख जिसको, जीवन का अंश खिलाती है, अन्तर का रुधिर पिलाती है आती फिर उसको फ़ेंक कहीं, नागिन होगी वह नारि नहीं। "हे कृष्ण आप चुप ही रहिये, इस पर न अधिक कुछ भी कहिये सुनना न चाहते तनिक श्रवण, जिस माँ ने मेरा किया जनन वह नहीं नारि कुल्पाली थी, सर्पिणी परम विकराली थी "पत्थर समान उसका हिय था, सुत से समाज बढ़ कर प्रिय था गोदी में आग लगा कर के, मेरा कुल-वंश छिपा कर के दुश्मन का उसने काम किया, माताओं को बदनाम किया "माँ का पय भी न पीया मैंने, उलटे अभिशाप लिया मैंने वह तो यशस्विनी बनी रही, सबकी भौ मुझ पर तनी रही कन्या वह रही अपरिणीता, जो कुछ बीता, मुझ पर बीता "मैं जाती गोत्र से दीन, हीन, राजाओं के सम्मुख मलीन, जब रोज अनादर पाता था, कह 'शूद्र' पुकारा जाता था पत्थर की छाती फटी नही, कुन्ती तब भी तो कटी नहीं "मैं सूत-वंश में पलता था, अपमान अनल में जलता था, सब देख रही थी दृश्य पृथा, माँ की ममता पर हुई वृथा छिप कर भी तो सुधि ले न सकी छाया अंचल की दे न सकी "पा पाँच तनय फूली-फूली, दिन-रात बड़े सुख में भूली कुन्ती गौरव में चूर रही, मुझ पतित पुत्र से दूर रही क्या हुआ की अब अकुलाती है? किस कारण मुझे बुलाती है? "क्या पाँच पुत्र हो जाने पर, सुत के धन धाम गंवाने पर या महानाश के छाने पर, अथवा मन के घबराने पर नारियाँ सदय हो जाती हैं बिछुडोँ को गले लगाती है? "कुन्ती जिस भय से भरी रही, तज मुझे दूर हट खड़ी रही वह पाप अभी भी है मुझमें, वह शाप अभी भी है मुझमें क्या हुआ की वह डर जायेगा? कुन्ती को काट न खायेगा? "सहसा क्या हाल विचित्र हुआ, मैं कैसे पुण्य-चरित्र हुआ? कुन्ती का क्या चाहता ह्रदय, मेरा सुख या पांडव की जय? यह अभिनन्दन नूतन क्या है? केशव! यह परिवर्तन क्या है? "मैं हुआ धनुर्धर जब नामी, सब लोग हुए हित के कामी पर ऐसा भी था एक समय, जब यह समाज निष्ठुर निर्दय किंचित न स्नेह दर्शाता था, विष-व्यंग सदा बरसाता था "उस समय सुअंक लगा कर के, अंचल के तले छिपा कर के चुम्बन से कौन मुझे भर कर, ताड़ना-ताप लेती थी हर? राधा को छोड़ भजूं किसको, जननी है वही, तजूं किसको? "हे कृष्ण ! ज़रा यह भी सुनिए, सच है की झूठ मन में गुनिये धूलों में मैं था पडा हुआ, किसका सनेह पा बड़ा हुआ? किसने मुझको सम्मान दिया, नृपता दे महिमावान किया? "अपना विकास अवरुद्ध देख, सारे समाज को क्रुद्ध देख भीतर जब टूट चुका था मन, आ गया अचानक दुर्योधन निश्छल पवित्र अनुराग लिए, मेरा समस्त सौभाग्य लिए "कुन्ती ने केवल जन्म दिया, राधा ने माँ का कर्म किया पर कहते जिसे असल जीवन, देने आया वह दुर्योधन वह नहीं भिन्न माता से है बढ़ कर सोदर भ्राता से है "राजा रंक से बना कर के, यश, मान, मुकुट पहना कर के बांहों में मुझे उठा कर के, सामने जगत के ला करके करतब क्या क्या न किया उसने मुझको नव-जन्म दिया उसने "है ऋणी कर्ण का रोम-रोम, जानते सत्य यह सूर्य-सोम तन मन धन दुर्योधन का है, यह जीवन दुर्योधन का है सुर पुर से भी मुख मोडूँगा, केशव ! मैं उसे न छोडूंगा "सच है मेरी है आस उसे, मुझ पर अटूट विश्वास उसे हाँ सच है मेरे ही बल पर, ठाना है उसने महासमर पर मैं कैसा पापी हूँगा? दुर्योधन को धोखा दूँगा? "रह साथ सदा खेला खाया, सौभाग्य-सुयश उससे पाया अब जब विपत्ति आने को है, घनघोर प्रलय छाने को है तज उसे भाग यदि जाऊंगा कायर, कृतघ्न कहलाऊँगा "मैं भी कुन्ती का एक तनय, जिसको होगा इसका प्रत्यय संसार मुझे धिक्कारेगा, मन में वह यही विचारेगा फिर गया तुरत जब राज्य मिला, यह कर्ण बड़ा पापी निकला "मैं ही न सहूंगा विषम डंक, अर्जुन पर भी होगा कलंक सब लोग कहेंगे डर कर ही, अर्जुन ने अद्भुत नीति गही चल चाल कर्ण को फोड़ लिया सम्बन्ध अनोखा जोड़ लिया "कोई भी कहीं न चूकेगा, सारा जग मुझ पर थूकेगा तप त्याग शील, जप योग दान, मेरे होंगे मिट्टी समान लोभी लालची कहाऊँगा किसको क्या मुख दिखलाऊँगा? "जो आज आप कह रहे आर्य, कुन्ती के मुख से कृपाचार्य सुन वही हुए लज्जित होते, हम क्यों रण को सज्जित होते मिलता न कर्ण दुर्योधन को, पांडव न कभी जाते वन को "लेकिन नौका तट छोड़ चली, कुछ पता नहीं किस ओर चली यह बीच नदी की धारा है, सूझता न कूल-किनारा है ले लील भले यह धार मुझे, लौटना नहीं स्वीकार मुझे "धर्माधिराज का ज्येष्ठ बनूँ, भारत में सबसे श्रेष्ठ बनूँ? कुल की पोशाक पहन कर के, सिर उठा चलूँ कुछ तन कर के? इस झूठ-मूठ में रस क्या है? केशव ! यह सुयश - सुयश क्या है? "सिर पर कुलीनता का टीका, भीतर जीवन का रस फीका अपना न नाम जो ले सकते, परिचय न तेज से दे सकते ऐसे भी कुछ नर होते हैं कुल को खाते औ' खोते हैं "विक्रमी पुरुष लेकिन सिर पर, चलता ना छत्र पुरखों का धर। अपना बल-तेज जगाता है, सम्मान जगत से पाता है। सब देख उसे ललचाते हैं, कर विविध यत्न अपनाते हैं "कुल-जाति नही साधन मेरा, पुरुषार्थ एक बस धन मेरा। कुल ने तो मुझको फेंक दिया, मैने हिम्मत से काम लिया अब वंश चकित भरमाया है, खुद मुझे ढूँडने आया है। "लेकिन मैं लौट चलूँगा क्या? अपने प्रण से विचरूँगा क्या? रण मे कुरूपति का विजय वरण, या पार्थ हाथ कर्ण का मरण, हे कृष्ण यही मति मेरी है, तीसरी नही गति मेरी है। "मैत्री की बड़ी सुखद छाया, शीतल हो जाती है काया, धिक्कार-योग्य होगा वह नर, जो पाकर भी ऐसा तरुवर, हो अलग खड़ा कटवाता है खुद आप नहीं कट जाता है। "जिस नर की बाह गही मैने, जिस तरु की छाँह गहि मैने, उस पर न वार चलने दूँगा, कैसे कुठार चलने दूँगा, जीते जी उसे बचाऊँगा, या आप स्वयं कट जाऊँगा, "मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब उसे तोल सकता है धन? धरती की तो है क्या बिसात? आ जाय अगर बैकुंठ हाथ। उसको भी न्योछावर कर दूँ, कुरूपति के चरणों में धर दूँ। "सिर लिए स्कंध पर चलता हूँ, उस दिन के लिए मचलता हूँ, यदि चले वज्र दुर्योधन पर, ले लूँ बढ़कर अपने ऊपर। कटवा दूँ उसके लिए गला, चाहिए मुझे क्या और भला? "सम्राट बनेंगे धर्मराज, या पाएगा कुरूरज ताज, लड़ना भर मेरा कम रहा, दुर्योधन का संग्राम रहा, मुझको न कहीं कुछ पाना है, केवल ऋण मात्र चुकाना है। "कुरूराज्य चाहता मैं कब हूँ? साम्राज्य चाहता मैं कब हूँ? क्या नहीं आपने भी जाना? मुझको न आज तक पहचाना? जीवन का मूल्य समझता हूँ, धन को मैं धूल समझता हूँ। "धनराशि जोगना लक्ष्य नहीं, साम्राज्य भोगना लक्ष्य नहीं। भुजबल से कर संसार विजय, अगणित समृद्धियों का सन्चय, दे दिया मित्र दुर्योधन को, तृष्णा छू भी ना सकी मन को। "वैभव विलास की चाह नहीं, अपनी कोई परवाह नहीं, बस यही चाहता हूँ केवल, दान की देव सरिता निर्मल, करतल से झरती रहे सदा, निर्धन को भरती रहे सदा। "तुच्छ है, राज्य क्या है केशव? पाता क्या नर कर प्राप्त विभव? चिंता प्रभूत, अत्यल्प हास, कुछ चाकचिक्य, कुछ पल विलास, पर वह भी यहीं गवाना है, कुछ साथ नही ले जाना है। "मुझसे मनुष्य जो होते हैं, कंचन का भार न ढोते हैं, पाते हैं धन बिखराने को, लाते हैं रतन लुटाने को, जग से न कभी कुछ लेते हैं, दान ही हृदय का देते हैं। "प्रासादों के कनकाभ शिखर, होते कबूतरों के ही घर, महलों में गरुड़ ना होता है, कंचन पर कभी न सोता है। रहता वह कहीं पहाड़ों में, शैलों की फटी दरारों में। "होकर सुख-समृद्धि के अधीन, मानव होता निज तप क्षीण, सत्ता किरीट मणिमय आसन, करते मनुष्य का तेज हरण। नर विभव हेतु लालचाता है, पर वही मनुज को खाता है। "चाँदनी पुष्प-छाया मे पल, नर भले बने सुमधुर कोमल, पर अमृत क्लेश का पिए बिना, आताप अंधड़ में जिए बिना, वह पुरुष नही कहला सकता, विघ्नों को नही हिला सकता। "उड़ते जो झंझावतों में, पीते सो वारी प्रपातो में, सारा आकाश अयन जिनका, विषधर भुजंग भोजन जिनका, वे ही फानिबंध छुड़ाते हैं, धरती का हृदय जुड़ाते हैं। "मैं गरुड़ कृष्ण मै पक्षिराज, सिर पर ना चाहिए मुझे ताज। दुर्योधन पर है विपद घोर, सकता न किसी विधि उसे छोड़, रण-खेत पाटना है मुझको, अहिपाश काटना है मुझको। "संग्राम सिंधु लहराता है, सामने प्रलय घहराता है, रह रह कर भुजा फड़कती है, बिजली-सी नसें कड़कतीं हैं, चाहता तुरत मैं कूद पडू, जीतूं की समर मे डूब मरूं। "अब देर नही कीजै केशव, अवसेर नही कीजै केशव। धनु की डोरी तन जाने दें, संग्राम तुरत ठन जाने दें, तांडवी तेज लहराएगा, संसार ज्योति कुछ पाएगा। "पर, एक विनय है मधुसूदन, मेरी यह जन्मकथा गोपन, मत कभी युधिष्ठिर से कहिए, जैसे हो इसे छिपा रहिए, वे इसे जान यदि पाएँगे, सिंहासन को ठुकराएँगे। "साम्राज्य न कभी स्वयं लेंगे, सारी संपत्ति मुझे देंगे। मैं भी ना उसे रख पाऊँगा, दुर्योधन को दे जाऊँगा। पांडव वंचित रह जाएँगे, दुख से न छूट वे पाएँगे। "अच्छा अब चला प्रणाम आर्य, हो सिद्ध समर के शीघ्र कार्य। रण मे ही अब दर्शन होंगे, शार से चरण:स्पर्शन होंगे। जय हो दिनेश नभ में विहरें, भूतल मे दिव्य प्रकाश भरें।" रथ से राधेय उतार आया, हरि के मन मे विस्मय छाया, बोले कि "वीर शत बार धन्य, तुझसा न मित्र कोई अनन्य, तू कुरूपति का ही नही प्राण, नरता का है भूषण महान।"

रश्मिरथी : सर्गवार (सर्ग-वार) संक्षिप्त सार

रश्मिरथी रश्मिरथी के रचयिता रामधारी सिंह दिनकर हैं। यह महाकाव्य मुख्यतः कर्ण के जीवन, संघर्ष, दानशीलता, वीरता और त्रासदी को केंद्र में रखकर लिखा गया है। इसमें कुल सात सर्ग हैं।

प्रथम सर्ग : रंगभूमि में कर्ण का आगमन

हस्तिनापुर में राजकुमारों की शस्त्र-कला का प्रदर्शन हो रहा है। अर्जुन अपनी अद्भुत धनुर्विद्या से सभी को प्रभावित करता है। तभी एक अज्ञात योद्धा (कर्ण) रंगभूमि में प्रवेश करता है और अर्जुन को चुनौती देता है।

कृपाचार्य उससे उसका कुल और वंश पूछते हैं। सूतपुत्र समझकर उसका अपमान किया जाता है। तब दुर्योधन कर्ण की प्रतिभा पहचानकर उसे अंगदेश का राजा घोषित कर देता है। कर्ण और दुर्योधन की मित्रता यहीं से प्रारंभ होती है।

मुख्य भाव: प्रतिभा और जन्म के बीच संघर्ष, सामाजिक भेदभाव।

द्वितीय सर्ग : परशुराम और कर्ण

कर्ण महान धनुर्धर बनने की इच्छा से गुरु परशुराम के पास जाता है। वह स्वयं को ब्राह्मण बताकर उनसे शिक्षा प्राप्त करता है।

एक दिन परशुराम उसकी गोद में सिर रखकर सो जाते हैं। तभी एक विषैला कीड़ा कर्ण की जांघ में घुस जाता है। गुरु की नींद न टूटे, इसलिए कर्ण दर्द सहता रहता है। परशुराम जागकर समझ जाते हैं कि इतना कष्ट कोई ब्राह्मण नहीं सह सकता। सत्य जानकर वे कर्ण को शाप देते हैं कि आवश्यकता के समय वह अपनी विद्या भूल जाएगा।

मुख्य भाव: तप, त्याग, गुरु-शाप और नियति।

तृतीय सर्ग : कर्ण और कृष्ण संवाद

महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण कर्ण से मिलने आते हैं। वे उसे बताते हैं कि वह वास्तव में कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र है और पाण्डवों का बड़ा भाई है।

कृष्ण उसे पाण्डव पक्ष में आने का प्रस्ताव देते हैं तथा राज्य का आश्वासन भी देते हैं। किन्तु कर्ण दुर्योधन के उपकार को सर्वोपरि मानता है। वह कहता है कि जिसने अपमानित अवस्था में उसका सम्मान किया, उसे वह नहीं छोड़ सकता।

मुख्य भाव: कर्तव्य, मित्रता, कृतज्ञता और नैतिक द्वंद्व।

चतुर्थ सर्ग : कुन्ती और कर्ण संवाद

कुन्ती युद्ध से पूर्व कर्ण के पास जाती हैं और उसे अपने पुत्र होने का सत्य बताती हैं। वे चाहती हैं कि कर्ण पाण्डवों का साथ दे।

कर्ण अपनी माँ के प्रति सम्मान प्रकट करता है, परन्तु दुर्योधन का साथ छोड़ने से इनकार कर देता है। वह वचन देता है कि अर्जुन को छोड़कर किसी अन्य पाण्डव का वध नहीं करेगा। इस प्रकार कुन्ती के पाँच पुत्र जीवित रहेंगे—या तो अर्जुन रहेगा या कर्ण।

मुख्य भाव: मातृत्व, त्याग, करुणा और धर्मसंकट।

पंचम सर्ग : इन्द्र का कवच-कुण्डल प्राप्त करना

कर्ण जन्मजात कवच और कुण्डल धारण किए हुए था, जिससे वह लगभग अजेय था। अर्जुन की रक्षा के लिए इन्द्र ब्राह्मण का वेश धारण कर उससे दान माँगने आते हैं।

कर्ण पहचान लेने पर भी अपने कवच-कुण्डल दान कर देता है। उसकी अनुपम दानवीरता से प्रसन्न होकर इन्द्र उसे एक अमोघ शक्ति प्रदान करते हैं।

मुख्य भाव: दान, त्याग, आत्मबलिदान और उदारता।

षष्ठ सर्ग : युद्ध और कर्ण

महाभारत युद्ध में कर्ण कौरव सेना का प्रधान योद्धा बनता है। वह अद्भुत पराक्रम दिखाता है। अनेक महारथियों से युद्ध करता है और पाण्डव सेना को भारी क्षति पहुँचाता है।

युद्ध के दौरान उसे परशुराम का शाप और अन्य अभिशाप याद आते हैं। भाग्य उसके विरुद्ध दिखाई देता है, फिर भी वह वीरतापूर्वक युद्ध करता रहता है।

मुख्य भाव: वीरता, संघर्ष और नियति का कठोर खेल।

सप्तम सर्ग : कर्ण का वध

अर्जुन और कर्ण के बीच निर्णायक युद्ध होता है। युद्ध के दौरान कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँस जाता है। वह उसे निकालने का प्रयास करता है और युद्ध-विराम की बात करता है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि कौरवों ने भी धर्म का पालन नहीं किया था। अर्जुन अवसर पाकर बाण चलाता है और कर्ण वीरगति को प्राप्त होता है।

कर्ण की मृत्यु के बाद उसकी महानता और त्याग का वास्तविक मूल्य सामने आता है। वह एक ऐसे नायक के रूप में स्थापित होता है जिसे समाज ने जीवन भर नहीं पहचाना।

मुख्य भाव: त्रासदी, नियति, वीरगति और मानवीय महानता।

समग्र निष्कर्ष

रश्मिरथी कर्ण के जीवन का महाकाव्य है। इसमें एक ऐसे नायक की कथा है जो जन्म से नहीं, बल्कि अपने पराक्रम, चरित्र, मित्रता, कृतज्ञता और दानशीलता से महान बनता है। कर्ण का संघर्ष सामाजिक भेदभाव, नियति और नैतिक दुविधाओं के विरुद्ध मानव की जिजीविषा का प्रतीक है।

  • संपूर्ण काव्य रचनाएँ : रामधारी सिंह दिनकर
  • कहानियाँ और अन्य गद्य कृतियाँ : रामधारी सिंह दिनकर
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