अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान 'शहरयार' Akhlaq Mohammed Khan Shahryar
शहरयार की प्रमुख रचनाएँ एवं संग्रह
हिन्दी ग़ज़लें : अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान 'शहरयार'
Ghazals in Hindi : Akhlaq Mohammed Khan Shahryar
- अक्स को क़ैद कि परछाईं को ज़ंजीर करें
- अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
- आसमाँ कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए
- आहट जो सुनाई दी है हिज्र की शब की है
- आँख की ये एक हसरत थी कि बस पूरी हुई
- आँधियाँ आती थीं लेकिन कभी ऐसा न हुआ
- आँधी की ज़द में शम-ए-तमन्ना जलाई जाए
- इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं
- उम्मीद से कम चश्म-ए-ख़रीदार में आए
- उस को किसी के वास्ते बे-ताब देखते
- ऐसे हिज्र के मौसम कब कब आते हैं
- कब समाँ देखेंगे हम ज़ख़्मों के भर जाने का
- कहता नहीं हूँ लोगो मैं कर के दिखाऊँगा
- कहने को तो हर बात कही तेरे मुक़ाबिल
- कहाँ तक वक़्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें
- कारोबार-ए-शौक़ में बस फ़ाएदा इतना हुआ
- किस किस तरह से मुझ को न रुस्वा किया गया
- किस फ़िक्र किस ख़याल में खोया हुआ सा है
- खुले जो आँख कभी दीदनी ये मंज़र हैं
- गर्द को कुदूरतों की धो न पाए हम
- गुज़रे थे हुसैन इब्न-ए-अली रात इधर से
- गुलाब जिस्म का यूँही नहीं खिला होगा
- जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है
- जहाँ पे तेरी कमी भी न हो सके महसूस
- जहाँ मैं होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा
- जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है
- जुदा हुए वो लोग कि जिन को साथ में आना था
- जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने
- जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा
- ज़ख़्मों को रफ़ू कर लें दिल शाद करें फिर से
- ज़मीं से ता-ब-फ़लक धुँद की ख़ुदाई है
- ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें
- ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो' थी नहीं कुछ कम है
- तमाम ख़ल्क़-ए-ख़ुदा देख के ये हैराँ है
- तिरे क़रीब जो चुपके खड़ा हुआ था मैं
- तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ
- तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें
- तू कहाँ है तुझ से इक निस्बत थी मेरी ज़ात को
- तेरी साँसें मुझ तक आते बादल हो जाएँ
- तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा
- तेरे सिवा भी कोई मुझे याद आने वाला था
- दयार-ए-दिल न रहा बज़्म-ए-दोस्ताँ न रही
- दाम-ए-उल्फ़त से छूटती ही नहीं
- दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए
- दिल परेशाँ हो मगर आँख में हैरानी न हो
- दिल में उतरेगी तो पूछेगी जुनूँ कितना है
- दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे
- देख दरिया को कि तुग़्यानी में है
- धूप के दश्त में बे-साया शजर में हम थे
- नज़र जो कोई भी तुझ सा हसीं नहीं आता
- नशात-ए-ग़म भी मिला रंज-ए-शाद-मानी भी
- नहीं रोक सकोगे जिस्म की इन परवाजों को
- निकला है चाँद शब की पज़ीराई के लिए
- निस्बत रहे तुम से सदा हज़रत निज़ामुद्दीन-जी
- पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात
- फ़ज़ा-ए-मय-कदा बे-रंग लग रही है मुझे
- बहते दरियाओं में पानी की कमी देखना है
- बुनियाद-ए-जहाँ में कजी क्यूँ है
- बे-ताब हैं और इश्क़ का दावा नहीं हम को
- भटक गया कि मंज़िलों का वो सुराग़ पा गया
- भूली-बिसरी यादों की बारात नहीं आई
- मंज़र गुज़िश्ता शब के दामन में भर रहा है
- मा'बद-ए-ज़ीस्त में बुत की मिसाल जड़े होंगे
- मिशअल-ए-दर्द फिर एक बार जला ली जाए
- मोम के जिस्मों वाली इस मख़्लूक़ को रुस्वा मत करना
- ये इक शजर कि जिस पे न काँटा न फूल है
- ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है
- ये क्या हुआ कि तबीअ'त सँभलती जाती है
- ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता
- ये क़ाफ़िले यादों के कहीं खो गए होते
- ये जगह अहल-ए-जुनूँ अब नहीं रहने वाली
- ये जब है कि इक ख़्वाब से रिश्ता है हमारा
- लाख ख़ुर्शेद सर-ए-बाम अगर हैं तो रहें
- वो बेवफ़ा है हमेशा ही दिल दुखाता है
- शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को
- शम-ए-दिल शम-ए-तमन्ना न जला मान भी जा
- शहर-ए-जुनूँ में कल तलक जो भी था सब बदल गया
- शिकवा कोई दरिया की रवानी से नहीं है
- सभी को ग़म है समुंदर के ख़ुश्क होने का
- सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
- सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
- हज़ार बार मिटी और पाएमाल हुई है
- हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के
- हमारी आँख में नक़्शा ये किस मकान का है
- हवा का ज़ोर ही काफ़ी बहाना होता है
- हवा चले वरक़-ए-आरज़ू पलट जाए
- हर ख़्वाब के मकाँ को मिस्मार कर दिया है
- हँस रहा था मैं बहुत गो वक़्त वो रोने का था
- हुजूम-ए-दर्द मिला ज़िंदगी अज़ाब हुई
हिन्दी नज़्में : अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान 'शहरयार'
Hindi Nazmein : Akhlaq Mohammed Khan Shahryar
- अजीब काम
- अपनी याद में
- अब के बरस
- अहद-ए-हाज़िर की दिल-रुबा मख़्लूक़
- आख़िरी साँस
- आरज़ू
- इक़्तिदार से महरूम लोगों के नाम
- इंतिशार से घबरा कर
- उम्मीद ओ बीम
- एक और मौत
- एक और साल गिरह
- एक काली नज़्म
- एक ख़ुश-ख़बरी
- एक नज़्म
- एक मंज़र
- एक लम्हे से दूसरे लम्हे तक
- एक सियासी नज़्म
- एतराफ़
- कच्चे रस्तों से
- खेल का नतीजा
- ख़लीलुर्रहमान आज़मी की याद में
- ख़्वाब
- ख़्वाब का दर बंद है
- गुनाह-ए-आदम
- गुम-शुदा
- चलो तुम को....
- चुपके से इधर आ जाओ
- जिस्म की कश्ती में आ
- ज़वाल की हद
- ज़िंदा रहने का ये एहसास
- तन्हाई
- तम्बीह
- दरिया-ए-ख़ूँ
- नए अहद का नया सवाल
- 'नजमा' के लिए एक नज़्म
- नज़्म
- नफ़ी से इसबात तक
- नया अमृत
- नया उफ़क़
- नया खेल
- पहले सफ़्हे की पहली सुर्ख़ी
- पैग़ाम
- फिर सफ़र बे-सम्त बे-मंज़िल हुआ
- फ़रार
- फ़रेब-दर-फ़रेब
- फ़ैसले की घड़ी
- बाज़-पुर्स
- मुझ को मिलना है 'वहीद-अख़्तर' से
- मुनज़्ज़म मनाज़िर से आगे
- मेरी ज़मीं
- मौत
- रतजगों का ज़वाल
- रात जुदाई की रात
- ला-ज़वाल सुकूत
- ला-ज़वाल होने का
- वापसी
- वामांदगी-ए-शौक़
- वो कौन था
- वो मोड़
- साए
- सैगंधी
