सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला बादल राग घन, गर्जन से भर दो वन बादल छाये लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो फिर नभ घन घहराये मालती खिली, कृष्ण मेघ की
महादेवी वर्मा कहाँ गया वह श्यामल बादल कहाँ से आये बादल काले मैं नीर भरी दुख की बदली लाए कौन संदेश नए घन श्याम घटा
हरिवंशराय बच्चन आज मुझसे बोल, बादल वर्षा समीर यह पावस की सांझ रंगीली आज घिरे हैं बादल, साथी भीग रहा है भुवि का आँगन यह पपीहे की रटन है है पावस की रात अँधेरी पपीहा