हिंदी कविता शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप'
Hindi Poetry Suchita Agarwal 'Suchisandeep'



1. प्रदीप छंद (यादों के झोंके)

मीठी यादों के झोंकों ने, सींचा उपवन प्रेम का। पत्थर सम हिय भाव विरह ने, रूप दिखाया हेम का।। लम्बी दूरी पल में तय कर, सुखद स्नेह आगोश में। झूला प्रियतम की बाहों में, झूली तन्मय जोश में।। पत्ता-पत्ता हरा हुआ है, कोमल कलियाँ झूमती। फूलों का मृदु आलिंगन पा, ज्यूँ तितली हों चूमती।। साँसों को है भान स्नेह का, भाव नेह विस्तार से। चित्र प्रीत से सने हुये सब, चलते चित्राहार से।। आकर मन को हल्का करती, यादें आँसूधार है। नम आँखों से निरखूँ प्रिय को, संवादों का सार है।। रिमझिम बूँदों ने झकझोरा, अधरों के रसपान से। निखरा सावन मन का मेरा, कोयल के मृदु गान से।। सींचे क्यारी को जीवन की, यादें पहले प्यार की। जीने को फिर प्रेरित करती, यह बेला अभिसार की।। पुलकित हिय का कोना-कोना, मन वीणा की तान से। निखरी आभा मुखमण्डल की, हल्की सी मुस्कान से।। ** ** ** ** प्रदीप छंद विधान- यह प्रति पद 29 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है जो 16,13 मात्राओं के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है। दो दो पद या चारों पद समतुकांत होते हैं। बेहतर समझने के लिये- पहला चरण चौपाई(16 मात्रा)+ दूसरा चरण दोहे का विषम चरण(13 मात्रिक) होता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल*2, अठकल 212 =16+13 = 29 मात्राएँ।

2. कामरूप छंद (माँ की रसोई)

माँ की रसोई, श्रेष्ठ होई, है न इसका तोड़। जो भी पकाया, खूब खाया, रोज लगती होड़।। हँसकर बनाती, वो खिलाती, प्रेम से खुश होय। था स्वाद मीठा, जो पराँठा, माँ खिलाती पोय।। खुशबू निराली, साग वाली, फैलती चहुँ ओर। मैं पास आती, बैठ जाती, भूख लगती जोर।। छोंकन चिरौंजी, आम लौंजी, माँ बनाती स्वाद। चाहे दही हो, छाछ ही हो, कुछ न था बेस्वाद।। मैं रूठ जाती, वो मनाती, भोग छप्पन्न लाय। सीरा कचौरी या पकौड़ी, सोंठ वाली चाय।। चावल पकाई, खीर लाई, तृप्त मन हो जाय। मुझको खिलाकर, बाँह भरकर, माँ रहे मुस्काय।। चुल्हा जलाती, फूँक छाती, नीर झरते नैन। लेकिन न थकती, काम करती, और पाती चैन।। स्वादिष्ट खाना, वो जमाना, याद आता आज। उस सी रसोई, है न कोई, माँ तुम्ही सरताज।। ** ** ** ** कामरूप / वैताल छंद विधान - कामरूप छंद 26 मात्राओं के चार पदों का सम पद मात्रिक छंद है वैताल छंद के नाम से भी यह छंद जानी जाती है। दो-दो या चारों पदों पर सम तुकान्तता रहती है। पदों की यति 9-7-10 पर होती है, यानी प्रत्येक पद में तीन चरण होंगे, पहला चरण 9 मात्राओं का, दूसरा चरण 7 मात्राओं का तथा तीसरा चरण 10 मात्राओं का होगा। पदांत या तीसरे या आखिरी चरण का अंत गुरु-लघु (2 1) से होता है। पदों की मात्राओं के आंतरिक विन्यास के अनुसार पहले चरण का प्रारम्भ गुरु या लघु-लघु से होना चाहिए। दूसरे चरण का प्रारम्भ गुरु-लघु से हो यानि, दूसरे चरण का पहला शब्द या शब्दांश ऐसा त्रिकल बनावे जिसका पहला अक्षर दो मात्राओं का हो। तीसरे चरण का प्रारम्भिक शब्द भी त्रिकल ही बनाना चाहिए लेकिन इस त्रिकल को लेकर कोई मात्रिक विधान नहीं है. अर्थात, प्रारम्भिक शब्द 21 या 12 हो सकते हैं। 22122,2122,2122 21 (अति उत्तम) आंतरिक यति भी समतुकांत हो तो छंद अधिक मनोहारी बन सकता है लेकिन यह आवश्यक नहीं है।

3. कुकुभ छंद (शरत्चंद्र चट्टोपाध्याय)

जब-जब दुष्ट बढ़े धरती पर, सुख कोने में रोता है। युग उन्नायक कलम हाथ में, लेकर पैदा होता है।। सन् अट्ठारह सौ छिय्यत्तर, जन्म शरद ने था पाया। मोतीलाल पिता थे उनके, भुवनमोहिनी ने जाया।। जब पीड़ा वंचित समाज की, अपने सिर को धुनती थी। मूक चीख तब नारी मन की, शरद लेखनी सुनती थी।। जाति-पाँति का भेदभाव भी, विचलित उनको करता था। सबसे ऊँची मानवता है, मन में भाव उभरता था।। घोर विरोध समाज किया जब, ग्रंथ 'चरित्र हीन' आया। बने शिकार ब्रिटिश सत्ता के, जब 'पथेर दावी' छाया।। ख्याति मिली रच 'निष्कृति', 'शुभदा', 'देवदास' अरु 'परिणीता'। 'चन्द्र नाथ', 'पल्ली समाज' रच, 'दत्ता' से जन-मन जीता।। पर उपकार किया लेखन से, लेखन पर जीवन वारा। पुनर्जागरण आंदोलन से, जन-मानस जीवन तारा।। ऐसे नायक युगों-युगों तक, प्रेरित सबको करते हैं। धन्य-धन्य ऐसे युग मानव, पर हित में जो मरते हैं।। ** ** ** ** कुकुभ छंद विधान - कुकुभ छंद सम-मात्रिक छंद है। इस चार पदों के छंद में प्रति पद 30 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पद 16 और 14 मात्रा के दो चरणों में बंटा हुआ रहता है। विषम चरण 16 मात्राओं का और सम चरण 14 मात्राओं का होता है। दो-दो पद की तुकान्तता का नियम है। 16 मात्रिक वाले चरण का विधान और मात्रा बाँट ठीक चौपाई छंद वाला है। 14 मात्रिक चरण की अंतिम 4 मात्रा सदैव 2 गुरु (SS) होती हैं तथा बची हुई 10 मात्राएँ अठकल + द्विकल होती हैं। । अठकल में दो चौकल या त्रिकल + त्रिकल + द्विकल हो सकता है। त्रिकल में 21, 12 या 111 तथा द्विकल में 11 या 2 (दीर्घ) रखा जा सकता है। चौकल और अठकल के सभी नियम लागू होंगे।

4. माधव मालती छंद (नारी शौर्य गाथा)

कष्ट सहकर नीर बनकर,आँख से वो बह रही थी। क्षुब्ध मन से पीर मन की, मूक बन वो सह रही थी। स्वावलम्बन आत्ममंथन,थे पुरुष कृत बेड़ियों में। एक युग था नारियों की,बुद्धि समझी ऐड़ियों में। आज नारी तोड़ सारे बन्धनों की हथकड़ी को, बढ़ रही है,पढ़ रही है,लक्ष्य साधें हर घड़ी वो। आज दृढ़ नैपुण्य से यह,कार्यक्षमता बढ़ रही है। क्षेत्र सारे वो खँगारे, पर्वतों पर चढ़ रही है। नभ उड़ानें विजय ठाने, देश हित में उड़ रही वो, पूर्ण करती हर चुनौती हाथ ध्वज ले बढ़ रही वो। संकटों में कंटकों से है उबरती आत्मबल से, अब न अबला पूर्ण सबला विजय उसकी शौर्यबल से। राष्ट्र सेवक मार्गदर्शक हौंसलों के पर लगाये, अड़चनों से दुश्मनों के होश देती वो उड़ाये। शान भी अभिमान भी वह देश का सम्मान नारी, आज कहता विश्व सारा है गुणों की खान नारी।। ** ** ** ** माधव मालती छंद विधान- यह मापनी आधारित मात्रिक छंद है। इसकी मापनी निम्न है- 2122 2122 2122 2122 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः गुरु वर्ण (2) को दो लघु (11) में तोड़ा जा सकता है। इसके चार चरण होते हैं, जिनमें दो-दो या चारों चरण समतुकांत होने चाहिए।

5. दोही छंद (माँ का आशीष)

तम दूर रहे घर से सदा, उजियारा हो तेज। जिस घर में बेटी जा रही, हों फूलों की सेज।। घर मात-पिता का छोड़कर, अपनाओ ससुराल। कुल मान सदा रखना बड़ा, जीवन हों खुशहाल।। सुख सहज सकल तुमको मिले, लक्ष्मी रहे विराज। हों सास-श्वसुर माँ-बाप सम, पिय हिय करना राज।। मन भाव स्वच्छ पावन रहे, मृदु वाणी अनमोल। जब क्रोध निकट आवें तभी, निज मन माँय टटोल।। घृत दधि पय की नदियाँ बहे, दान धर्म हों रीत। शुचि राम नाम धुन में रमे, जीवनमय संगीत।। ** ** ** ** दोही छंद विधान- दोही, दोहे की ही प्रजाति का एक द्विपदी छंद है। दोही अर्द्धसम मात्रिक छंद है। यह द्विपदी छंद है जिसके प्रति पद में 26 मात्रा होती है। प्रत्येक पद 15, 11 मात्रा के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) में १५-१५ मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) में ११-११ मात्राएँ होती हैं।सम चरणों का अंत गुरु लघु मात्रा से होना आवश्यक होता है।दूसरे और चौथे चरण यानी सम चरणों का समतुकान्त होना आवश्यक है। विषम चरण -- कुल 15 मात्रा (मात्रा बाँट = द्विकल + अठकल + द्विकल + लघु + द्विकल = 2 + 8 +2 +1 +2 = 15 मात्रा) सम चरण -- कुल 11 मात्रा (मात्रा बाँट = अठकल + ताल यानी गुरु+लघु) अठकल यानी 8 में दो चौकल (4+4) या 3-3-2 हो सकते हैं। (चौकल और अठकल के नियम अनुपालनीय हैं।)

6. शैलसुता छंद (जीवन पथ)

लगन लगी पथ जीवन का परिवर्तित मैं करके निखरूँ। इस पथ के सब संकट को लख जीवन में न कभी बिखरूँ।। अपयश, क्रोध, गुमान, अनादर, लालच, आलस छोड़ सकूँ। सुख रस धार जहाँ बहती उस ओर सभी पथ मोड़ सकूँ।। बदल चुका युग स्वार्थ धरा पर पाँव पसार रहा जम के। तन मन खाय रही मद की लत लक्षण ये गहरे तम के।। सब अवसादिक तत्व मिटाकर जोश उमंग भरूँ मन में। दुखित सभी अपने समझूँ रसरंग भरा अपनेपन में।। यह जन जीवन कंटक का वन मैं बन पुष्प सदा महकूँ। भ्रमित करे पथ जो उस में पड़ मैं सुध खो न कभी बहकूँ।। परहित भाव सदा सुखदायक, स्वार्थ बड़ा दुखदायक है। ग्रहण करूँ वह सार अमोलक जो सुख मार्ग सहायक है।। नर-तन है अति दुर्लभ पार करूँ इससे भवसागर को। तन अरु निश्छल भाव भरा मन सौंप सकूँ नट नागर को।। जतन करूँ मन से सुधरूँ समतामय जीवन ये कर दूँ। सकल विकार मिटा कर के मन में 'शुचि' पावनता भर दूँ।। ******* शैलसुता छंद विधान - शैलसुता छंद चार चरण का वर्णिक छंद होता है जिसमें दो- दो चरण समतुकांत होते हैं। 4 लघु + 6भगण (211) +1 गुरु = 23 वर्ण 1111 + 211*6 + 2 इसी छंद में जब 13, 10 वर्ण पर यति की बाध्यता हो तो यही - "कनक मंजरी छंद" कहलाती है।

7. तमाल छंद 'जागो हिन्दू'

कब तक सोयेगा हिन्दू तू जाग। खतरे में अस्तित्व लगी है आग।। हत्यारों पर गिर तू बन कर गाज। शौर्य भाव फिर से जगने दे आज।। रो इतिहास बताता भारत देश। देखो कितना बदल चुका परिवेश।। गाती जनता स्वार्थ, दम्भ का गान। वीरों की भू का है यह अपमान।। फूट डालना दुष्टों की है चाल। क्यूँ भारत में गलती सबकी दाल? हर हिन्दू के मन में हों अभिमान। रखकर भाषा, धर्म, रीति का मान।। राजनीति का काटो सब मिल जाल। रखो देश का ऊँचा जग में भाल।। हों भारत पर हिन्दू का अधिकार। धर्म सनातन की हों जय जयकार।। ** ** ** तमाल छंद विधान- तमाल छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं। दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- चौपाई +गुरु लघु (16+3=19) चरण के अंत में गुरु लघु अर्थात (21) होना अनिवार्य है। अन्य शब्दों में अगर चौपाई छंद में एक गुरु और एक लघु क्रम से जोड़ दिया जाय तो तमाल छंद बन जाता है। चौपाई छंद का विधान अनुपालनिय होगा, जो कि निम्न है- चौपाई छंद चौकल और अठकल के मेल से बनती है। चार चौकल, दो अठकल या एक अठकल और दो चौकल किसी भी क्रम में हो सकते हैं। समस्त संभावनाएँ निम्न हैं। 4-4-4-4, 8-8, 4-4-8, 4-8-4, 8-4-4 चौपाई में कल निर्वहन केवल चतुष्कल और अठकल से होता है। अतः एकल या त्रिकल का प्रयोग करें तो उसके तुरन्त बाद विषम कल शब्द रख समकल बना लें। जैसे 3+3 या 3+1 इत्यादि। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है। चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं।

8. कज्जल छंद “समय का हेर-फेर”

समय-समय का हेर-फेर, आज सेर कल सवा सेर। जग में चलती एक रीत, जाय अँधेरी रात बीत। रहना छोड़ो अस्त-व्यस्त, जीवन करलो खूब मस्त। प्यारे सब में देख प्रीत, गाओ मन से प्रेम गीत। दुख का आता एक मोड़, सुख जब जाता हाथ छोड़। हँसना-रोना साथ-साथ, डोर जगत की राम हाथ। रखना मन में खूब जोश, किंतु न खोना कभी होश। छोड़ समय पर जीत-हार, सब बातों का यही सार। ** ** ** कज्जल छंद विधान- यह 14 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल+त्रिकल+गुरु और लघु=14 मात्राएँ। (अठकल दो चौकल या 3-3-2 हो सकता है, त्रिकल 21, 12, 111 हो सकता है तथा द्विकल 2 या 11 हो सकता है।)

9. चित्रपदा छंद "गुरु वंदना"

हे गुरुदेव विधाता, ज्ञान सुधा रस दाता। मात,पिता तुम भ्राता, जीवन ज्योत प्रदाता। नित्य करे पर सेवा, युग संचालक देवा। सत्य सदा वरदाता, हे गुरुदेव विधाता। सार्थक पाठ पढ़ाते, सत्पथ वो दिखलाते। बुद्धि विवेक अगाथा, हे गुरुदेव विधाता। है भगवान पधारे, रूप गुरु खुद धारे। शीश झुका जग ध्याता, हे गुरुदेव विधाता। ** ** ** चित्रपदा छंद विधान- 211 211 2 2 = भगण, भगण, गुरु, गुरु कुल 8 वर्ण की वर्णिक छंद। चार चरण, दो-दो समतुकांत या चारो समतुकांत।

10. चौपई (जयकरी) छंद, 'खेलो कूदो"

(बाल कविता) होती सबकी माता गाय। दूध पीओ मत पीना चाय।। लम्बी इसकी होती पूँछ। जितनी मुन्ने की है मूँछ।। खेलो कूदो गाओ गीत। गरमी जाती आती शीत।। मोटे कपड़ों में है धाक। वरना बहती जाती नाक।। गुड़िया रानी खेले खेल। छुक छुक करती आई रेल।। ताजा लौकी,भिंडी साग। लेकर आई पूरा बाग।। दादी माधव लेती नाम। तोता बोले सीता राम।। मुन्ने जितने प्यारे मान। सुंदर होते हैं भगवान।। ******* चौपई छंद विधान- चौपई एक मात्रिक छंद है। इस छंद में चार चरण होते हैं। चौपई छंद से मिलते-जुलते नाम वाले अत्यंत ही प्रसिद्ध सममात्रिक छंद चौपाई से भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये। चौपई के प्रत्येक चरण में 15 मात्राओं के साथ ही प्रत्येक चरण में समापन एक गुरु एवं एक लघु के संयोग से होता है। चौपाई के चरणान्त से एक लघु निकाल दिया जाय तो चरण की कुल मात्रा 15 रह जाती है और चौपाई छंद से मिलता जुलता नाम चौपई हो जाता है। इस तरह चौपई का चरणांत गुरु-लघु हो जाता है। यही इसकी मूल पहचान है। अर्थात् चौपई 15 मात्राओं के चार चरणों का सम मात्रिक छंद है,जिसके दो या चारों चरण समतुकांत होने चाहिये। इस छंद का एक और नाम जयकरी या जयकारी छंद भी है। यह चौपई छंद का विन्यास होगा- तीन चौकल + गुरु-लघु एक अठकल + एक चौकल + गुरु-लघु 22 22 22 21 चौपई छंद के सम्बन्ध में एक तथ्य यह भी सर्वमान्य है कि चौपई छंद बाल साहित्य के लिए बहुत उपयोगी है, क्योंकि इसमें गेयता अत्यंत सधी होती है।

11. त्रिलोकी छंद (शिव आराधना)

बोल-बोल बम बोल,सदा शिव को भजो, कपट,क्रोध,मद,लोभ,चाल टेढ़ी तजो। भाव भरो मन मांहि,सोम के नाम के, मृत्य जगत के कृत्य,कहो किस काम के। नील कंठ विषधार,सर्प शिव धारते, नेत्र तीसरा खोल,दुष्ट संहारते। अजर-अमर शिव नाम,जपत संकट कटे, हो पुनीत सब काज,दोष विपदा हटे। हवन कुंड यह देह,भाव समिधा जले, नयन अश्रु की धार,बहाते ही चले। सजल नयन के दीप,भक्ति से हों भरे, भाव भरी यह प्रीत,सफल जीवन करे। महादेव नटराज,दिव्य प्रभु रूप है, सृष्टि सृजन के नाथ,जगत के भूप है। वार मनुज सर्वस्व,परम शिव धाम पे, तीन लोक के नाथ,एक शिव नाम पे। ******* त्रिलोकी छंद विधान- यह प्रति पद 21 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है जो 11,10 मात्राओं के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है। दो दो पद या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + गुरु और लघु, त्रिकल + द्विकल + द्विकल + लघु और गुरु = 11, 10 = 21 मात्राएँ। (अठकल दो चौकल या 3-3-2 हो सकता है, त्रिकल 21, 12, 111 हो सकता है तथा द्विकल 2 या 11 हो सकता है।) *******

12. नरहरि छंद (जय माँ दुर्गा)

जय जग जननी जगदंबा, जय जया। नव दिन दरबार सजेगा, नित नया।। शुभ बेला नवरातों की, महकती। आ पहुँची मैया दर पर, चहकती।। झन-झन झालर झिलमिल झन, झनकती। चूड़ी माता की लगती, खनकती।। माँ सौलह श्रृंगारों से, सज गयी। घर-घर में शहनाई सी, बज गयी।। शुचि सकल सरस सुख सागर, सरसते। घृत, धूप, दीप, फल, मेवा, बरसते।। चहुँ ओर कृपा दुर्गा की, बढ़ रही। है शक्ति, भक्ति, श्रद्धा से, तर मही।। माता मन का तम सारा, तुम हरो। दुख से उबार जीवन में, सुख भरो।। मैं मूढ़ न समझी पूजा, विधि कभी। स्वीकार करो भावों को, तुम सभी।। ******* नरहरि छंद विधान- नरहरि छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं। १४, ५ मात्रा पर यति का विधान है। दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- १४ मात्रिक चरण की प्रथम दो मात्राएँ सदैव द्विकल के रूप में रहती हैं जिसमें ११ या २ दोनों रूप मान्य हैं। बची हुई १२ मात्रा में चौकल अठकल की निम्न तीन संभावनाओं में से कोई भी प्रयोग में लायी जा सकती है। तीन चौकल, चौकल + अठकल, अठकल + चौकल दूसरे चरण की ५ मात्राएँ लघु लघु लघु गुरु(S) रूप में रहती हैं। ********

13. दीप छन्द (राम-भजन)

कर मन भजन राम, रख हिय सुगम नाम, प्रभु को जप तु खोय, पुलकित हृदय होय। जगती लगन खास, लगती मधुर प्यास, दृग में करुण धार, पुनि पुनि प्रिय पुकार। कर के दृढ विचार, त्यज दें सब विकार, पायें नवल रूप, प्रभु की छवि अनूप। जो हरि भजन भाय, जीवन सुधर जाय, मिलता सरस नेह, होती सबल देह। ******* दीप छंद विधान- यह 10 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो-दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- चौकल, नगण(111) गुरु लघु (S1) = 10 मात्रायें। (चौकल 2-2, 211 ,1111 या 112 हो सकता है। चरणान्त: नगण गुरु लघु (11121) अनिवार्य है।) "चौकल नगण व्याप्त, गुरु-लघु कर समाप्त, रच लो मधुर 'दीप', लगती चपल सीप।" ********

14. पञ्चचामर छंद (हनुमान उपासना)

उपासना करें सभी,महाबली कपीश की, विराट दिव्य रूप की,दयानिधान ईश की। कराल काल जाल से, प्रभो उबार लीजिये, अपार भक्ति दान की,कृपा सदैव कीजिये। प्रदीप्त बाल सूर्य को,मुखारविंद में लिया, पराक्रमी अबोध ने,डरा सुरेन्द्र को दिया। किया प्रहार इंद्र ने,अचेत केशरी हुये, प्रकोप वायु देव का,अधीर देवता हुये। प्रसंग राम भक्त के,अतुल्य है,महान है, विशुद्ध धर्म-कर्म के,अनेक ही बखान है। अजेय शौर्य भक्ति का,प्रतीक आप ही बने, प्रबुद्ध ज्ञान आपमें,समृद्ध धाम हैं घने। मृदंग-शंखनाद ले,सुकंठ प्रार्थना करें, विभोर भव्य आरती,अखण्ड दीप को धरें। नमो नमामि वंदना,विराजमान आप हों, सुबुद्धि,ज्ञान,शक्ति दें,अखंड नाम-जाप हों। ******* पञ्चचामर छंद विधान- लघु गुरु x 8 = 16 वर्ण यानि कुल 16 वर्ण प्रत्येक चरण की वर्णिक छंद। 8-8 वर्णों पर यति निर्वहन अनिवार्य होता है। चार या दो दो चरण समतुकांत। *******

15. मालिक छंद (राधा रानी)

चंद्र चाँदनी, मुदित मोहिनी राधा। बिना तुम्हारे श्याम सदा ही आधा।। युगल रूप में तुम मोहन की छाया। एकाकार हुई लगती दो काया।। वेणु रूप में तुम जब शोभित होती। श्याम अधर रसपान अमिय में खोती।। दृश्य अलौकिक रसिक भक्त ये पीते। भाव भक्ति में सुध बुध खो वे जीते।। वृंदावन की हो तुम वृंदा रानी। जहाँ श्याम ने रहने की नित ठानी।। सुमन सेज सुखदायक नित बिछ जाती। निधिवन में जब श्याम सलोनी आती।। रमा, राधिका, रुकमिण तुम ही सीता। प्रेम भाव से हरि को हरदम जीता।। है वृषभानु सुता का वैभव न्यारा। राधा नाम तुम्हारा शुचि अति प्यारा।। ******* मालिक छंद विधान- मालिक छंद एक सम मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति चरण 20 मात्रा रहती हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + अठकल + गुरु गुरु = 8, 8, 2, 2 = 20 मात्रा। (अठकल में 4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।) चरणान्त गुरु-गुरु (SS) अनिवार्य है। दो-दो या चारों चरण समतुकांत होते हैं। ********

16. खरारी छंद (जलियाँवाला बाग)

उस माटी का, तिलक लगा, जिसमें खुश्बू, आजादी की है। जलियाँवाला, बाग जहाँ, हुंकारें अरि, बर्बादी की है।। देखी जग ने, कायरता, हत्या की थी, निर्मम गोरों ने। उत्पीड़न भय, हिंसा की, तस्वीरें तब, देखी ओरों ने।। था कायर वो, हत्यारा, डायर जिसने, यह कांड किया था। आकस्मक आ, खूनी ने, मासूमों को, झट मार दिया था।। घन-घन चलती, गोली में, कंपित चीखें, चित्कार भरी थी। बच्चे, बूढ़े, नर-नारी, भोली जनता, तब खूब मरी थी।। मत पूछो तब, भारत के, लोगों का यह, जीवन कैसा था। अंग्रेजों का, शासन ज्यूँ, अंगारों पर, चलने जैसा था। उखड़ेगी कब, अंग्रेजी, शासन की जड़, सबके मन में था। आक्रोश जोश, बदले का, भाव समाहित, हर जन जन में था।। अंग्रेजों की, सत्ता को, हिलवाने में, जो बना सहायक। जलियाँवाला, अति जघन्य, कांड बना था, तब उत्तर दायक।। ज्वाला फूटी, वीरों में, अंगारे से, आँखों में आये। आजादी के, बादल तब, भारत भू पर, लहरा कर छाये।। ******* खरारी छंद विधान - खरारी छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जिसमें क्रमशः 8, 6, 8, 10 मात्राओं पर यति आवश्यक है। चार चरणों के इस छंद में दो दो या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2 222, 222, 2222, 2 2222 पहली यति द्विकल (2,11) + छक्कल (3+3 या 4+2 या 2+4) दूसरी यति छक्कल। तीसरी यति अठकल। चौथी यति द्विकल (2,11) + अठकल में (4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।) ********

17. हंसगति छंद (भारत)

भारत मेरा देश, बड़ा मनभावन। कण-कण लगे सजीव, और अति पावन।। माँ गंगा का रूप, यहाँ जल धारा। दिव्य गुणों की खान, देश यह सारा।। गीता,वेद, पुराण, ग्रन्थ ये सारे। जीवन के हर तत्व, हमें दे न्यारे।। सन्तों का सानिध्य, यहाँ सब पाएँ। भाव भक्ति के गीत, सभी जन गाएँ।। दया, प्रेम, सद्भाव, धर्म का वैभव। पर्वों का आनंद, देश में नित नव।। विविध प्रान्त समुदाय, एक है नारा। भारत मेरा देश, जान से प्यारा।। सूरज,चंदा और, चमकते तारे। घन, गिरि, नद, वन, व्योम, पूज्य हैं सारे।। हिंदी भाषा शान, देवलिपि प्यारी। भारत की शुचि भूमि, जगत से न्यारी।। ****** हंसगति छंद विधान - हंसगति छंद बीस मात्रा प्रति पद का मात्रिक छंद है जिसमें ग्यारहवीं और नवीं मात्रा पर विराम होता है। छंद के 11 मात्रिक प्रथम चरण की मात्रा बाँट ठीक दोहे के सम चरण वाली यानी अठकल + ताल (21) है। 9 मात्रिक द्वितीय चरण की मात्रा बाँट 3 + 2 + 4 है। त्रिकल में 21, 12, 111 तीनों रूप, द्विकल के 2, 11 दोनों रूप मान्य हैं। चतुष्कल के 22, 211, 112, 1111 चारों रूप मान्य हैं तथा अठकल में 4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं। दो दो चरण समतुकांत होने चाहिए। *******

18. दिंडी छंद (सुख सार)

प्रश्न सदियों से, मन में है आता। कहाँ असली सुख, मानव है पाता।। लक्ष्य सबका ही, सुख को है पाना। जतन जीवन भर, करते सब नाना।। नियति लेने की, सबकी ही होती। यहीं खुशियाँ सब, सत्ता हैं खोती।। स्वयं कारण हम, सुख-दुख का होते। वही पाते हैं, जो हम हैं बोते।। लोभ, छल, ममता, मन में है भारी। सदा मानवता, इनसे ही हारी।। सहज, दृढ होकर, सद्विचार धारें। प्रेम भावों से, कटुता को मारें।। सर्वदा सुखमय, जीवन वो पाते। खुशी देकर जो, खुशियाँ ले आते।। प्रेरणा पाकर, हम सब निखरेंगे। नहीं जीवन में, फिर हम बिखरेंगे। ******* दिंडी छंद विधान- दिंडी छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं जो ९ और १० मात्रा के दो यति खंडों में विभाजित रहती हैं। दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। दोनों चरणों की मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है। त्रिकल, द्विकल, चतुष्कल = ३ २ ४ = ९ मात्रा। छक्कल, दो गुरु वर्ण (SS) = १० मात्रा। छक्कल में ३ ३, या ४ २ हो सकते हैं। ३ के १११, १२, २१ तीनों रूप मान्य। *******

19. पद्मावती छंद (दीपोत्सव)

दीपोत्सव बीता, पर्व पुनीता, जो खुशियाँ लेकर आया। आनंदित मन का, अपनेपन का, उजियारा जग में छाया।। शुभ मंगलदायक, अति सुखदायक, त्योंहारों के रस न्यारे। उत्सव ये सारे, बने हमारे, जीवन के गहने प्यारे।। मन का तम हरती, रोशन करती, रौनक जीवन में लाती। जगमग दीवाली, दे खुशहाली, धरती को अति सरसाती।। लक्ष्मी घर आती, चाव चढ़ाती, नव जीवन फिर मिलता है। आनंद कोष का, नवल जोश का, शुचि प्रसून सा खिलता है।। मानव चित चंचल, प्रेम दृगंचल, उत्सवधर्मी होता है। सुख नव नित चाहे, मन लहराये, बीज खुशी के बोता है।। पल आते रहते, जाते रहते, अद्भुत जग की माया है। जब दुख जाता है, सुख आता है, धूप बाद ही छाया है।। दीपक से सीखा, त्याग सरीखा, जीवन पर सुखदायी हो। सब अंधकार की, दुराचार की, मन से सदा विदायी हो।। रख हरदम आशा, छोड़ निराशा, पर्वों से हमने जाना। सुखमय दीवाली, फिर खुशहाली, आएगी हमने माना।। ******* पद्मावती छंद विधान- पद्मावती छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जिसमें क्रमशः 10, 8, 14 मात्रा पर यति आवश्यक है। प्रथम दो अंतर्यतियों में समतुकांतता आवश्यक है। चार चरणों के इस छंद में दो दो या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- द्विकल + अठकल, अठकल, अठकल + चौकल + दीर्घ वर्ण (S) 2 2222, 2222, 2222 22 S = 10+ 8+ 14 = 32 मात्रा। ********

20. पुनीत छंद (भाई मेरा मान)

भाई बहना का त्योंहार, राखी दोनों का है प्यार। जीये भाई सौ-सौ साल, धागा मेरा तेरी ढाल। कुमकुम टीका माथे सोय, यश भाई का जग में होय। रखना मुँह में मीठे बोल, इसी मिठाई का है मोल। पूनम के चंदा सा रूप, शीत सुहानी तुम हो धूप। सावन की मृदु हो बौछार, बरसो फिर भी आता प्यार। जनम-जनम का अपना साथ, बाँधूं राखी तेरे हाथ। भाई मेरा,मेरा मान, करती तेरा हूँ सम्मान। ****** पुनीत छंद विधान- यह 15 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- चौक्कल+छक्कल +SS1(गुरु गुरु लघु) = 15 मात्रायें। (चौकल 2-2,211,1111 या 112 हो सकता है, छक्कल 2 2 2, 2 4, 4 2, 3 3 हो सकता है।) *******

21. दिंडी छंद (सुख सार)

प्रश्न सदियों से, मन में है आता। कहाँ असली सुख, मानव है पाता।। लक्ष्य सबका ही, सुख को है पाना। जतन जीवन भर, करते सब नाना।। नियति लेने की, सबकी ही होती। यहीं खुशियाँ सब, सत्ता हैं खोती।। स्वयं कारण हम, सुख-दुख का होते। वही पाते हैं, जो हम हैं बोते।। लोभ, छल, ममता, मन में है भारी। सदा मानवता, इनसे ही हारी।। सहज, दृढ होकर, सद्विचार धारें। प्रेम भावों से, कटुता को मारें।। सर्वदा सुखमय, जीवन वो पाते। खुशी देकर जो, खुशियाँ ले आते।। प्रेरणा पाकर, हम सब निखरेंगे। नहीं जीवन में, फिर हम बिखरेंगे। ******* दिंडी छंद विधान- दिंडी छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं जो ९ और १० मात्रा के दो यति खंडों में विभाजित रहती हैं। दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। दोनों चरणों की मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है। त्रिकल, द्विकल, चतुष्कल = ३ २ ४ = ९ मात्रा। छक्कल, दो गुरु वर्ण (SS) = १० मात्रा। छक्कल में ३ ३, या ४ २ हो सकते हैं। ३ के १११, १२, २१ तीनों रूप मान्य। *******

22. शास्त्र छंद (सदाचार)

सदा मन में यही रख लें सभी धार। न जीवन में कभी त्यज दें सदाचार।। रहे आधार जीवन का सदा नेक। रखें बस भावना हरदम यही एक।। चलें अध्यात्म के पथ पर यही चाह। अहिंसा की सदा चुननी हमें राह।। भलाई के लिये हरदम बढ़े हाथ। जरूरतमंद का देना हमें साथ।। बुरी आदत न मदिरा पान की डाल जहाँ दिखती बुराई हों उसे टाल।। जड़ें छल क्रोध की काटें यही ठान। करें सत्कर्म के हरदम अनुष्ठान।। बड़ों का मान रख उनकी सुनें बात। सदा आशीष लें उनसे न कर घात।। बहाएं प्रेम की शुचिता सभी ओर। रखें सद् आचरण पर हम सदा जोर।। ******* शास्त्र छंद विधान - शास्त्र छंद 1222 1222 1221 मापनी पर आधारित 20 मात्रा प्रति चरण का मात्रिक छंद है। चूंकि यह एक मात्रिक छंद है अतः गुरु (2) वर्ण को दो लघु (11) में तोड़ने की छूट है। इस छंद में 1,8,15,20 वीं मात्राएँ सदैव लघु होती हैं lदो दो चरण समतुकांत होने चाहिए। *********

23. सुमेरु छंद (माँ)

परम जिस धाम में, हो तुम गयी माँ। सुमन अर्पण तुम्हें, ममतामयी माँ।। पुकारा यूँ लगा, तुमने कहीं से। लगी फिर रोशनी, आती वहीं से।। नहीं दिखती मगर, सूरत तुम्हारी। सजल आँखें तुम्हें, ढूँढ़े हमारी।। हृदय की चोट वो, अब तक हरी है। व्यथित मन हो रहा, आँखें भरी है।। उजाले हैं बहुत, लेकिन डरा हूँ। उदासी है घनी, तम से भरा हूँ।। तुम्हें हर बात की, चिंता सताती। कहाँ कब क्या करूँ, कहकर बताती।। वृहद जंजाल सा, जग एक मेला। कहाँ तुम बिन रहा, मैं हूँ अकेला।। पकड़ आँचल सदा, तेरा चला हूँ। सदा सानिध्य में, तेरी पला हूँ।। सहारा था मुझे, बस एक तेरा। कहो तुम बिन यहाँ, अब कौन मेरा? सभी कुछ है मगर, तेरी कमी है। छिपी मुस्कान में, मेरी नमी है।। सभी खुशियाँ मिले, तुमको जहाँ हो। न व्याकुलता तुम्हें, पलभर वहाँ हो।। अगर खुश तुम रहो, खुश मैं रहूँगा। विरह की वेदना, हँसकर सहूँगा।। ******* सुमेरु छंद विधान- सुमेरु छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं। दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। सुमेरु छंद में 12,7 अथवा 10,9 पर दो तरह से यति निर्वाह किया जा सकता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 1222 1222 122 *******

24. लीला छंद (शराब लत)

मच जाता नित बवाल। पत्नी पूछे सवाल।। क्यूँ पीते तुम शराब? लत पाली क्यों खराब? रिश्ते सब तारतार। चौपट है कारबार।। रख डाला सब उजाड़। जीवन मेरा बिगाड़।। समझो तुम क्यों न बात? लत ये है आत्मघात।। लगता है डर अपार। आदत लो तुम सुधार।। मद की यह घोर प्यास। रोके आत्मिक विकास।। बात न मेरी नकार। कुछ तो करलो विचार।। ******* लीला छंद विधान - लीला छंद बारह मात्रा प्रति पद का मात्रिक छंद है जिसका चरणान्त जगण (121) से होना अनिवार्य होता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + जगण(121) =12 मात्राएँ अठकल में 4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं। दो दो चरण समतुकांत होने चाहिए। ********

25. लावणी छंद (जयदयालजी गोयन्दका)

देवपुरुष जीवन गाथा से,प्रेरित जग को करना है, संतों की अमृत वाणी को,अंतर्मन में भरना है। है सौभाग्य मेरा कुछ लिखकर,कार्य करूँ जन हितकारी, शत-शत नमन आपको मेरा,राह दिखायी सुखकारी।१। संत सनातन पूज्य सेठजी,जयदयालजी गोयन्दका, मानव जीवन के हितकारी,एक अलौकिक सा मनका। रूप चतुर्भुज प्रभु विष्णु का,राम आचरण अपनाये, उपदेशों को श्री माधव के,जन-जन तक वो पहुँचाये।२। संवत शत उन्नीस बयालिस, ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी पावन, चूरू राजस्थान प्रान्त में,जन्मे ये भू सरसावन।। माता जिनकी श्यो बाई थी,पिता खूबचँद गोयन्दका, संत अवतरण सुख की बेला,धरती पर दिन खुशियों का।३। दिव्य रूप बालक का सुंदर,मुखमण्डल तेजस्वी था, पाँव दिखे पलना में सुत के,लगता वो ओजस्वी था।। आध्यात्मिक भावों का बालक,दया,प्रेम,सद्भाव लिये, जयदयालजी ने आजीवन,जन मानस कल्याण किये।४। पहले करनी फिर कथनी ही,मूलमंत्र जीवन का था, सत्य,अहिंसा,दूरदर्शिता,समता भाव समाहित था। गीता,रामायण,पुराण सब,बचपन में पढ़ डाले थे, राह पकड़कर गीता की तब,गूढ़ सभी खंगाले थे।५। कार्यक्षेत्र बाँकुड़ कलकत्ता,वैश्य वर्ण निष्कामी थे, तन,मन,धन पर सेवा खातिर,श्री माधव अनुगामी थे। धोती,चादर और चौबन्दी, केशरिया पगड़ी पहने, परम प्रचारक प्रभु वाणी के,गीतामय धारे गहने।६। दिव्य प्रेम का अनुभव करके,तत्व आपने जो जाना, जनम-मरण के दुख हरने का,साधन उसको ही माना। सहज मार्ग भगवत्प्राप्ति का,ढूँढन की मन में धारी, चाहे कोई भी हो अवस्था,है हर मानव अधिकारी।७। *गीता प्रचार का मार्ग* दृष्टि टिकी गीता के इन दो,प्रेरित करते श्लोकों पर, भगवत आज्ञा पालन हेतु, हुये अग्रसर वो तत्पर, "निसन्देह मेरा वो होगा,गीता गूढ़ प्रचार करे, अतिशय प्रिय वो भक्त मुझे जो,गीता का संज्ञान धरे।"।८। जन मानस उद्धार हेतु जब,मार्ग मिला उनको शाश्वत, स्वयं चले फिर सबको चलाया,हुये पूर्ण तब ही आश्वश्त। युगदृष्टा ने अटल सत्य की,राह सुलभ बनवायी थी, घर-घर गीता,जन-जन गीता,यही सोच अपनायी थी।९। *गीताप्रेस स्थापना* तत्व ज्ञान गीता का पाकर,हुआ सुवासित जीवन था, जन-मन में कण विकसित करना,भाव प्रबल उनका धन था, गहन सीप में बसती मानो,गीता पुस्तक मोती थी, उत्कंठा भक्तों को गीता,पढ़ने की नित होती थी।१०। थी दूभर गीता की प्रतियाँ, प्रसरण में भी रोड़ा था, निष्ठावान भक्त ने लेकिन, बाधाओं को तोड़ा था। सुलभ मुल्य अरु स्वच्छ कलेवर,टंकण त्रुटियों रहित रहे, सहज प्राप्त हो पाठक गण को,सही अर्थ के सहित रहे।११। भक्तों के स्वाध्याय हेतु ही,निश्चित साधन ढूँढ़ लिया, था उन्नीस सौ तेईस सन् जब,दुविधा का उपचार किया। गोरखपुर में हुई स्थापना,गीता प्रेस नाम ठाना, जीवन उद्धारक वचनामृत,घर-घर में था पहुँचाना।१२। दिव्य दृश्टि हम कार्यप्रणाली,बुरी चला नहि पायेंगे, अगर कार्य अच्छे हैं अपने,तो भगवान चलायेंगे। कार्यक्षेत्र में हाथ बँटाने, स्वयं प्रभु ने रूप धरे, विविध कार्य कर कमलों से कर,धर्म ग्रँथ भंडार भरे।१३। सत् साहित्य तथा सद्भावों,धर्म हेतु विस्तार किया, उनके करकमलों ने जग को,पुस्तक का भंडार दिया। भाईजी मौसेरे भाई,सहज समर्पित थे आगे, प्रभु सेवक निःस्वार्थ भाव से,योगदान करने लागे।१४। धर्म सनातन गौरव संस्कृति,तत्व गूढ़ प्रेरित करते, मुख्य द्वार है हस्तकला की,विविध शैलियों को भरते। दीवारों पर संगमरमर की,पूरी गीता खुदवायी, दोहे,चौपाई, प्रभु लीला,भक्तों के हिय को भायी।१५। षोडसमन्त्र नाम जप करने,कल्याण पत्र प्रारम्भ हुआ। दैवी गुण को ग्रहण कराने,साधक संघ आरम्भ हुआ। कल्याणी "कल्याण" मासिका,विविध पुस्तकें छपती हैं, सर्वाधिक ही धर्म पुस्तकें,अब तक वहीं पनपती हैं।१६। *गीता भवन ऋषिकेश स्थापना* माँ गंगा की निर्मल धारा,कल-कल नित जहँ बहती हों, शुचितामय पावन मिट्टी भी,हरि गाथा बस कहती हों।। कोलाहल से दूर कहीं बस,राम नाम को सुनना था, ऐसी पावन पुण्य भूमि को,सत्संग हेतु चुनना था।१७। उत्तराखण्ड पवित्र धरा पर,अद्भुत यह संयोग मिला, ऋषिकेश स्वर्गाश्रम में तब,भाव भक्ति का पुष्प खिला। सघन वनों से घिरा हुआ पथ,साधन जीवन के थोड़े, प्रबल इरादों से भक्तों ने,बाधाओं से मन जोड़े।१८। गंगा तट वटवृक्ष अलौकिक,परम् शांतिप्रिय स्थान लगा, पूज्य सेठजी के मन में तब,प्रभु का ही संदेश जगा।। गीता भवन नींव रख डाली,पुण्य काज उनके न्यारे। भगवत्चिंतन हिय में धारे,भक्त लगे आने सारे।१९। भक्तों की सुख सुविधा के हित,साधन जुटते गये सभी, उसी नींव पर खड़े हुए हैं,सातों गीता भवन अभी। दुर्लभ मानव जीवन सद्गति,सत्संगत से होती है, अंधकार को दूर भगाये, सत्संग ऐसी ज्योति है।२०। "प्रेरक प्रसंग" (१) एक बार हरिजन बस्ती में,आग लगी थी जोरों से, हृदय फटा सुन बच्चों की तब,क्रंदन हाहाकारों से, बस्ती नव-निर्माण कराया,खुशियाँ दामन में भर दी, लेकिन हरिजन किस्मत ने भी,बार-बार हद ही कर दी।२१। समझाया लोगों ने प्रभु भी,नहीं चाहते घर बनना, था जवाब कर्तव्य निभायें,अहम कर्म पर दुख हरना। तीन बार आवास जले थे,फिर निर्माण कराया था, दुखियों को सहयोग दिया था,घर हर बार बसाया था।२२। (२) एक पड़ौसी रक्त पिपासु,अनबन उनसे रखता था, लेकिन देवपुरुष निश्छल मन,सदा शान्त ही रहता था, मंडा ब्याह कन्या का उसकी,बाराती आ पहुँचे थे, घर वृद्धा परलोकगमन से,संकट बादल छाये थे।२३। भूल गये सब बाराती को,दाह-क्रिया में लगे सभी, सुनी सेठजी ने जब घटना,भागे स्टेशन तुरन्त तभी, समुचित,सुंदर,सौम्य व्यवस्था,बाराती की करवाई, उत्तर "क्या उपकार किया है,मेरी इज्जत थी भाई"।२४। (3) एक बार फल विक्रेता ने,छल से फल तौले थोड़े, थी फटकार लगाई उसको,बातों के मारे कोड़े, "बात नहीं कम फल हैं तौले,नरक सुनिश्चित लगता है, देख अहित सकती नहि आँखें,अतिशय हृदय सुलगता है"।२५। *उपंसहार* बिन माँगे प्रभु सब देते हैं,माँग तुच्छता होती है, भक्त सजग निष्काम भाव के,दिव्य प्रेम की ज्योति है। प्रेरक जीवन के प्रसंग को,पढ़कर लाभ उठाना है, मानव सद्गति एकमात्र बस,धारण करके पाना है।२६। विज्ञ,तपस्वी,व्याख्याता वे,वक्ता थे सद्भावों के, दृढ़ प्रतिज्ञ स्वयं रहते थे,अपने सभी सुझावों के। गीता तत्व विवेचनी में सब,गीताजी के सार दिये, रची गजल गीता भी उन ने,गीता अति लघु रूप लिये।२७। खुद की मान बड़ाई से उठ,चले वही सच्चा साधक, फोटो, स्मारक आदि बनाना,प्रभु पूजा में है बाधक। गायत्री,गोविंदा,गंगा,गीता,गौ सेवा करना, प्राण बसे थे इन पाँचों में,भाव,कर्म का यह झरना।२८। कर्मक्षेत्र को धर्मक्षेत्र में,परिवर्तित जो करते हैं, ऐसे दुर्लभ संत धरा पर,सदियों बाद विचरते हैं। अमृत उपदेशों को उनके,जन-जन तक पहुँचाना है, आत्मसात कर जीवन में भी,कर चरितार्थ दिखाना है।२९। लगता है वो एक मिशन पर,प्रभु सेवक बन आये थे, मानव जीवन उद्देश्यों को,कर धारण बतलाये थे। "हंस अकेला उड़ जाएगा",रे मानव उद्धार करो, सहज सुगम सद्गति पथ बढ़ना,लक्ष्य एक चित मांय धरो।३०। अब भी विद्यमान कण-कण में,रहते थे वो कब तन में, हृदय बसी गीता का मधुरस,बाँट रहे वो जन-जन में। भौतिक तन से ऊपर उठकर,जिसने जग को तारा है, हे संतों के संत आपको,शत-शत नमन हमारा है।३१।

26. सिंह विलोकित छन्द (नारी जिसने सदा दिया)

छवि साँझ दीप सी सदा रही, मैं तिल-तिल जलकर कष्ट सही। तम हरकर रोशन सदन किया, हूँ नारी जिसने सदा दिया। सरि बनकर पर हित सदा बही, जग करे प्रदूषित,मौन रही। गति को बाँधों में जकड़ दिया, तब रूप वृहत को सिमित किया। नर के शासन के नियम कड़े, बन क्रोधित घन से गरज पड़े। मैं नीर बहाती मेह दुखी, फिर भी सुख देकर हुई सुखी। मैं विस्मित भू बन मनन करूँ, नित अपमानों के घूँट भरूँ। माँ ने मेरी भी सहन किया, चुप रहकर सहना सिखा दिया। ******* सिंह विलोकित छंद विधान– सिंह विलोकित सोलह मात्राओं की सममात्रिक छन्द है। इसमें चार चरण,क्रमशः दो-दो समतुकांत रहते हैं। चरणान्त लघु-गुरु(१२) अनिवार्य है। द्विकल + अठकल + त्रिकल तथा लघु-गुरु या 2 2222 3 1S= 16 मात्रायें। मात्रा सोलह ही रखें,चरण चार तुकबंद। दुक्कल अठकल अरु त्रिकल,लघु-गुरु रखलो अंत।। सम मात्रिक यह छन्द है,बस इतना लो जान। सिंह विलोकित छन्द का,रट लो आप विधान।। *******

27. कलहंस छंद (तुलसी चरित)

तिथि सावन शुक्ल सप्तमी पावन। जन्मे तुलसी धरती सरसावन।। रचने को राम चरित मनभावन। भू के जन जन का मन हर्षावन।। थे आत्माराम पिता तुलसी के। वे दीप्तिमान सुत माँ हुलसी के।। कवि गण में वे थे परम श्रेष्ठ कवि। अंकित मन में प्रभु सगुण रूप छवि।। थे दास्य भक्ति के परम उपासक। श्री रामचन्द्र प्रभु मन के शासक।। बस राम एक भवसागर खेवक। तुलसी अति दीन हीन लघु सेवक।। वे वेद,शास्त्र,ज्योतिष के ज्ञाता। बहु धर्म सनातन ग्रंथ प्रदाता।। रच राम चरित मानस अनमोला। रस राम नाम जन मन में घोला।। ********* कलहंस छंद विधान - यह 18 मात्राओं का मात्रिक छंद है। दो-दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- द्विकल+चौपाई (16 मात्रा)= 18मात्राएँ। (द्विकल 2 या 11 हो सकता है। चौपाई छंद चौकल और अठकल के मेल से बनती है। चार चौकल, दो अठकल या एक अठकल और दो चौकल किसी भी क्रम में हो सकते हैं। समस्त संभावनाएँ निम्न हैं। 4-4-4-4, 8-8, 4-4-8, 4-8-4, 8-4-4 *******

28. बिहारी छंद (प्रेम भाव)

मैं प्रेम भरे गीत सजन, आज सुनाऊँ। उद्गार सभी झूम रहे, शब्द सजाऊँ।। मैं चाह रही प्रीत भरा, कोश लुटाना। संसार लगे आज मुझे, सौम्य सुहाना।। रमणीक लगे बाग हरे, खेत लहकते। घन घूम रहे मस्त हुए, फूल महकते।। हर ओर प्रकृति झूम करे, नृत्य निराला। सब अंध हुआ दूर गया, फैल उजाला। जब आस भरे नैन विकल, रुदन करेंगे। सिंदूर लिये हाथ सजन, माँग भरेंगे।। मैं प्रेम भरे रंग भरूँ, विरह अगन में। इठलाय रही नाच रही, आज लगन में।। उम्मीद भरे भाव सुमन, खूब खिले हैं। संकल्प तथा लक्ष्य भरे, पंख मिले हैं।। उल्लास भरी राग मधुर, खास बजाऊँ। अरमान भरी सेज सजन, नित्य सजाऊँ।। ******* बिहारी छंद विधान – यह (2211 2211 2, 21 122) मापनी पर आधारित 22 मात्रा का मात्रिक छंद है। चूंकि यह एक मात्रिक छंद है अतः गुरु (2) वर्ण को दो लघु (11) में तोड़ने की छूट है। दो दो चरण समतुकांत होने चाहिए। ********

29. प्रदोष छंद (कविता ऐसे जन्मी है)

मन एकाग्रित कर लिया, चयन विषय का फिर किया। समिधा भावों की जली, तब ऐसे कविता पली। नौ रस की धारा बहे, अनुभव अपना सब कहे। लेकिन जो हिय छू रहा, कविमन उस रस में बहा। सुमधुर सरगम ताल पर, समुचित लय मन ठान कर। शब्द सजाये परख के, गा-गा देखा हरख के। अलंकार श्रृंगार से, काव्य तत्व की धार से। पा नव जीवन खिल गयी, पूर्ण हुई कविता नयी। ****** प्रदोष छंद विधान- यह 13 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो-दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल+त्रिकल+द्विकल =13 मात्रायें अठकल यानी 8 में दो चौकल (4+4) या 3-3-2 हो सकते हैं। (चौकल और अठकल के नियम अनुपालनीय हैं।) त्रिकल 21, 12, 111 हो सकता है तथा द्विकल 2 या 11 हो सकता है। *******

30. मधुर ध्वनि छंद (वर्षा)

बजत मधुर ध्वनि,चंचल चितवनि,अति सुखकारी, मानो खिलखिल,सहज अकुंठिल,शिशु किलकारी। दामिनि दमकी,बूँदें चमकी,बरसा पानी, जन-जन गाये,अति हरषाये,रुत मस्तानी। कल-कल नदियाँ,मृदु पंखुड़ियाँ,खग भी चहके, जग यह सारा,गा मल्हारा,धुन पर बहके। नन्ही बूँदें,आँखें मूँदे, खूब इतरती, कभी इधर तो,कभी उधर वो,नाच बरसती। उमड़-घुमड़ घन,बाजे झन-झन,खुशियाँ छाई, मुदित मोहिनी,है सुगंधिनी, सी पुरवाई। सौंधी-सौंधी, शुद्ध सुगन्धी,मिट्टी भायी, जगत सहेली,छैल छबीली,वर्षा आयी। हरित चूनरी,देह केशरी,धवल घाघरा, छटा चहकती,नाच बहकती,बाँध घूघरा। महके उपवन,लहके सब वन,निखरा आँगन, निरखे घन मन,धरती दुल्हन,रूप सुहागन। ******* मधुर ध्वनि छन्द विधान- यह 24 मात्राओं का मात्रिक छन्द है। क्रमशः 8,8,8 पर यति आवश्यक है। चार चरणों के इस छन्द में दो या चारों चरण समतुकांत होने चाहिए। अन्तर्यति तुकांतता से छंद का माधुर्य बढ़ जाता है, वैसे यह आवश्यक नहीं है। इसी छंद के चार पदों के प्रारंभ में एक दोहा जोड़ देने से प्रसिद्ध कुण्डलिया छंद की तर्ज का एक नया छंद बन जाता है जो "अमृत ध्वनि" के नाम से प्रसिद्ध है। "अमृत ध्वनि" में भी दोहा जिन शब्दों से शुरू होता है उन्हीं पर छंद समाप्त होता है। जैसे- "रूप सुहागन सा सजा, रिमझिम बरसै मेह। थिरकै धरणी मग्न हो, हरित चूनरी देह।। हरित चूनरी,देह केशरी,धवल घाघरा, छटा चहकती,नाच बहकती,बाँध घूघरा। महके उपवन,लहके सब वन,निखरा आँगन, निरखे घन मन,धरती दुल्हन,रूप सुहागन।"

31. 'चुलियाला छंद' "मृदु वाणी"

शब्दों के व्यवहार का, जिसने सीखा ज्ञान सुखी वह। वाणी कटुता से भरी, जो बोले है घोर दुखी वह।। होता यदि अन्याय हो, कायर बनकर कष्ट सहो मत। हँसकर कहना सीखिये, कटु वाणी के शब्द कहो मत।। औषध करती है भला, होते कड़वे घूँट सहायक। अंतर्मन निर्मल करे, निंदक होते ज्ञान प्रदायक।। मृदुवाणी अनमोल है, संचित जो यह कोष करे नर। सुख ओरों को भी मिले, अनुपम धन से खूब भरे घर।। कर्कश भाषा क्रोध की, सर्व विनाशक बाण चला मत। हृदय बेन्ध पर मन करे, पल भर में ही पूर्ण हताहत।। ****** चुलियाला छंद विधान - चुलियाला छंद एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है जिसके प्रति पद में 29 मात्रा होती है। प्रत्येक पद 13, 16 मात्रा के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है। चुलियाला छंद के दो भेद मिलते हैं। चुलियाला छंद दोहा छंद से विनर्मित होता है। प्रथम भेद दोहे के जैसा ही एक द्वि पदी छंद होता है। यह दोहे के अंत में 1211 ये पाँच मात्राएँ जुड़ने से बनता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है - 2222 212, 2222 21 1211 = (चुलियाला) = 13, 8-21-1211 = 29 मात्रा। दूसरा भेद चतुष पदी छंद होता है। यह दोहे के अंत में 1SS (यगण) ये पाँच मात्राएं जुड़ने से बनता है। इसके पदांत में सदैव दो दीर्घ वर्ण आते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है - 2222 212, 2222 21 1SS = (चुलियाला) = 13, 8-21 1+गुरु+गुरु = 29 मात्रा। उदाहरण- "मूक पुकारे कोख में, कहती माँ से मोहि बचाओ। हत्या मेरी रोकलो, लीला माँ तुम आज रचाओ।। तुम मेरी भगवान हो, जीवन का हो एक सहारा। हत्यारों के हाथ पर, करो वार तुम एक करारा।।" *******

32. तोमर छंद "सुशिक्षा"

अपनायें नवल जोश। रखना है हमें होश।। आडम्बर बुरी बात। सदियों तक करे घात।। कठपुतली बने लोग। भूल जीवन उपयोग।। अंधों की दौड़ छोड़। लो अपनी राह मोड़।। ज्ञान की आंखें खोल। सत्य का समझो मोल।। कौन सच झूठा कौन। बैठ मत अब तू मौन।। जीवन में सदाचार। मानव तुम रखो धार।। सत्कर्म करना धर्म। लो समझ सीधा मर्म।। ******** तोमर छंद विधान – तोमर छंद 12 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। इसकी मात्रा विन्यास निम्न है- द्विकल-सप्तकल-3 (केवल 21) (द्विकल में 2 या 11 मान्य तथा सप्तकल का 1222, 2122, 2212,2221 में से कोई भी रूप हो सकता है।) अंत ताल (21) से आवश्यक होता है। चार चरण। दो दो समतुकांत। *********

33. विद्या छंद 'मीत संवाद'

सुना मीत प्रेम का गीत, आ महका दें मधुशाला। खुले आज हृदय के द्वार, ले हाथों में मधु प्याला।। बढ़ो मीत चूम लो फूल, बन मधुकर तुम मतवाला। करो नृत्य झूम कर आज, रख होठों पर फिर हाला।। चलो साथ पकड़ लो हाथ, कह दो मन की सब बातें। बजे आज सुखद सब साज, हो खुशियों की बरसातें। बहे प्रेम गंग की धार, हम गोता एक लगायें। कटी जाय उम्र की डोर, मन में नव जोश जगायें।। लगी होड़ रहा जग दौड़, गिर उठकर ही सब सीखा।। लगे स्वाद कभी बेस्वाद, है जीवन मृदु कुछ तीखा। कभी छाँव कभी है धूप, सुख-दुख सारे कहने हैं। मधुर स्वप्न नयन में धार, फिर मधु झरने बहने हैं। रहे डोल जगत के लोग, जग मधु का रूप नशीला। पथिक आय चला फिर जाय, है अद्भुत सी यह लीला।। रहे शेष दिवस कुछ यार, जग छोड़ हमें चल जाना। करें नृत्य हँसें हम साथ, गा कर मनभावन गाना।। ******* विद्या छंद विधान- विद्या छंद 28 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 122 (यगण)+ लघु + त्रिकल + चौकल + लघु , गुरु + छक्कल + लघु + लघु + गुरु + गुरु 1221 3 221, 2 2221 1SS चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं। छक्कल (3+3 या 4+2 या 2+4) हो सकते हैं। अंत में दो गुरु (22) अनिवार्य होता है। ********

34. शंकर छंद 'नश्वर काया'

माटी में मिल जाना सबको, मनुज मत तू भूल। काया का अभिमान बुरा है, बनेगी यह धूल।। चले गये कितने ही जग से, नित्य जाते लोग। बारी अपनी भी है आनी, अटल यह संयोग।। हाड़-माँस का पुतला काया, बनेगा जब राख। ममता, माया काम न आये, साधन व्यर्थ लाख।। नश्वर जग से अपनेपन का, जोड़ मत संबंध। जितनी सकते उतनी फैला, सद्गुण सरस सुगंध।। मिथ्या आडम्बर के पीछे, भागना तू छोड़। जिस पथ पूँजी राम नाम की, पग भी उधर मोड़।। सत्य भान ही दिव्य ज्ञान है, चिंतन अमृत जान। स्वयं स्वयं में देख झाँककर, सच स्वयं पहचान।। भाड़े का घर तन को समझो, मालिकाना त्याग। सत् चित अरु आनंद रूप से, हृदय में हो राग।। आत्मबोध से भवसागर को, बावरे कर पार। तन-मन अपना निर्मल रखकर, शुचिता रूप धार।। ******* शंकर छंद विधान- शंकर छंद 26 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + अठकल, सतकल + गुरु + लघु शंकर- 8 +8, 7 + 2 + 1 (16+10) अठकल में (4+4 या 3+3+2 )दोनों रूप मान्य है। सतकल में (1222, 2122, 2212, 2221) चारों रूप मान्य है। अंत में गुरु-लघु (21) आवश्यक है। ********

35. लीलावती छंद 'मारवाड़ की नार'

हूँ मारवाड़ की एक नार, मैं अति बलशाली धीर वीर। पी सकती अपना अहम घूँट, दुख पीड़ा मन की सकल पीर।। पर सेवा मेरा परम धर्म, मन मानवता की गंग धार। जब तक जीवन की साँस साथ, मैं नहीं मानती कभी हार।। मैं सहज शांति प्रिय रूपवान, है सीधी मेरी चाल-ढाल। निज कर्तव्यों की करूँ बात, सब अधिकारों को भूल-भाल।। हूँ स्नेह सिंधु की एक बूँद, चित चंचलता की तेज धार। अति भावुक मेरा हृदय जान, जो समझे केवल प्रेम सार।। मैं लज्जा जेवर रखूँ धार, हूँ सहनशक्ति का मूर्त रूप। रिश्तों पर जीवन सकल वार, तम हरकर हरदम रखूँ धूप।। मैं छैल छबीली लता एक, घर मेरा जैसे कृष्ण कुंज। हर संकट में मैं बनूँ ढाल, हूँ छोटा सा बस शक्ति पुंज।। लेकर परिजन का पूर्ण भार, घर साम रखूँ यह लक्ष्य एक। है धर्म-कर्म का प्रबल जोश, मन को निष्ठा से प्रीत नेक।। यम से भी पति के प्राण छीन, ला सकती पतिव्रत नियम मान। 'शुचि' मारवाड़ की सुता वीर, अरि का मुझको बस प्रलय जान।। ******* लीलावती छंद विधान- लीलावती छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- द्विकल+ अठकल+ त्रिकल+ ताल (21), द्विकल+ अठकल+ त्रिकल+ ताल (21) द्विकल में 2 और 11 दोनों मान्य है। अठकल में 4+4, 3+3+2 दोनों मान्य है। त्रिकल में 2+1, 1+2, 111 तीनों रूप मान्य है। 2 2222 3 21, 2 2222 3 21 ********

36. सुमंत छंद "बरसो मेघा"

धरती सारी बाट, देखती हारी। गर्मी से बेहाल, हुई है भारी।। उमड़े घन को देख, सभी हरषाये। ऐसा बरसो चैन, धरा पा जाये।। वन उपवन भी शुष्क, हुये हैं आओ। उमड़-घुमड़ कर मेघ, व्योम पर छाओ।। नदियों का जल वाष्प, बना है सारा। तुम सूरज का आज, उतारो पारा।। खलिहानों का सूख, गया है पानी। खेतों में फिर रंग, चढ़ा दो धानी।। हरित दुशाला ओढ़, धरा सज जाये। फूटे अंकुर मेघ, अगर तू आये।। हे श्यामल घन नीर, धार बरसाओ। जीवन में उल्लास, नवल भर जाओ।। व्याकुल वसुधा तृप्त, होय इठलाये। मधुर सलोने प्रेम, गीत फिर गाये।। ******* सुमंत छंद विधान- सुमंत छंद बीस मात्रा प्रति पद का मात्रिक छंद है। छंद के 11 मात्रिक प्रथम चरण की मात्रा बाँट ठीक दोहे के सम चरण वाली यानी अठकल + ताल (21) है। अठकल में 4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं। 9 मात्रिक द्वितीय चरण की मात्रा बाँट 3 + 2 + गुरु गुरु (S S)है। त्रिकल में 21, 12, 111 तीनों रूप, द्विकल के 2, 11 दोनों रूप मान्य हैं। पदांत में दो गुरु का होना अनिवार्य है। दो दो पद समतुकांत होने चाहिए। मात्रा विन्यास- 2222 21, 3 2SS = (सुमंत) = 11+9 = 20 मात्रा। ********

37. मदनाग छंद, 'साइकिल'

सवारी जो प्रथम हमको मिली, सबसे प्यारी। गुणों की खान ये है साइकिल, लगती न्यारी।। बना कर संतुलन अपना सही, इस पर बैठें। बड़े छोटे चलाते सब इसे, खुद में ऐठें।। सुलभ व्यायाम करवाती चले, आलस हरती। न फैलाती प्रदूषण साइकिल, फुर्ती भरती।। खुला आकाश, ठंडी सी हवा, पैडल मारो। गिरो भी तो उठो आगे बढो, कुछ ना धारो।। भगाती दूर रोगों को कई, दुख हर लेती। बढ़ाकर रक्त के संचार को, सेहत देती।। इसी से आत्मनिर्भरता बढ़े, बढ़ते जाओ। नवल सोपान पर उन्मुक्त हो, चढ़ते जाओ।। बजा घंटी हटाओ भीड़ को, राह बनाओ। बना कर लक्ष्य जीवन में बढो, सीख सिखाओ।। न घबरा कर कभी भी भीड़ से, थमो न राही। सवारी साइकिल की कर बनो, 'शुचि' उत्साही।। ********* मदनाग छंद विधान- मदनाग छंद 25 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 17-8 मात्राओं के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 1222 1222 12, 222S = (मदनाग) = 17+8 = 25 मात्रायें। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है। अंत में गुरु (2) अनिवार्य है। ********

38. शुद्ध गीता छंद- "गंगा घाट"

घाट गंगा का निहारूँ, देखकर मैं आर पार। पुण्य सलिला, श्वेतवर्णा, जगमगाती स्वच्छ धार।। चमचमाती रेणुका का, रूप सतरंगी पुनीत। रत्न सारे ही जड़ित हों, हो रहा ऐसा प्रतीत।। मार्ग में पाषाण गहरे, है पड़े देखे हजार। लाख बाधाएँ हटाती, उफ न करती एक बार।। लक्ष्य साधे बढ़ रही वो, हर चुनौती नित्य तोड़। ले रही गन्तव्य अपना, पार कर रोड़े करोड़।। वो न रुकती वो न थकती, बढ़ रही पथ चूम-चूम। जल तरंगे एक ही धुन, गा रही है झूम-झूम।। शब्द गहरे गंग ध्वनि के, सुन रही मैं बार-बार। "बढ़ चलो अब बढ़ चलो तुम", कह रही अविराम धार।। आ रहे हैं भक्त लेकर, आरती अरु पुष्प थाल। पा रहे सानिध्य माँ का, हो रहे सारे निहाल।। स्नान तन मन का निराला, है सँवरती कर्म रेख। हो रहा पुलकित हृदय अति, भाव शुचिता देख-देख।। ******** शुद्ध गीता छंद विधान- शुद्ध गीता 27 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2122 2122, 2122 2121 (14+13) चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है। **********

39. गीता छंद, "गीता पढ़ने के लाभ"

गीता पढ़ें गीता सुनें, गीता करे कल्याण। पुस्तक इसे समझें नहीं, भगवान के हैं प्राण।। है दिव्य वाणी कृष्ण की, उद्गार अपरम्पार। सब सार जीवन का भरा, हर धर्म का आधार।। उपदेश समता भाव का, निष्कामता का ज्ञान। सिद्धान्त रत्नों से जड़ित, मन से करें सम्मान।। यह भेद तोड़े जाति के, कल्याण करना धर्म। यदि चाहते पथ हो सुगम, समझें इसे ही कर्म।। पढ़ते रहें धारण करें,नित अर्थ निकले गूढ। विकसित करे बल, बुद्धि को, रहता न कोई मूढ़।। है ज्ञान का रवि रूप यह, निष्काम सेवा भाव। भव पार निश्चित जो करे, है श्रेष्ठ यह वो नाव।। संशय हरे चिंता मिटे, दुख शोक होते नष्ट। अध्यन करे नित तो कटे, सब मूल से ही कष्ट।। यह क्रोध, ममता, दुष्टता, भय मौत का दे तोड़। सम्बन्ध गीता से मनुज, अविलम्ब ले तू जोड़।। गीता छंद विधान - गीता छंद 26 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है जो 14 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2212 2212, 2212 221 (14+12) चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु अंत में ताल (21) आवश्यक है। ********

40. शुभगीता छंद 'जीवन संगिनी'

सदा तुम्हारे साथ है जो, मैं वही आभास हूँ। अधीर होता जो नहीं है, वो अटल विश्वास हूँ।। कभी तुम्हारा प्रेम सागर, मैं कभी हूँ प्यास भी। दिया तुम्हे सर्वस्व लेकिन, मैं तुम्हारी आस भी।। निवेदिता हूँ संगिनी हूँ, मैं बनी अर्धांगिनी। प्रभात को सुखमय बनाती, हूँ मधुर मैं यामिनी।। खुशी तुम्हारी चैन भी मैं, हूँ समर्पण भाव भी। चली तुम्हारे साथ गति बन, हूँ कभी ठहराव भी।। रहूँ सहज या हूँ विवश भी, स्वामिनी मैं दासिनी। चुभे उपेक्षा शूल तुमसे, पर रही हिय वासिनी।। चले विकट जब तेज आँधी, ढाल हाथों में धरूँ। सुवास पथ पाषाण पर भी, नेह पुष्पों की करूँ। भुला दिये अधिकार मैंने, याद रख कर्तव्य को। बनी सुगमता मार्ग की मैं, पा सको गन्तव्य को।। दिया तुम्हे सम्पूर्ण नर का, मान अरु अभिमान भी। चले तुम्हारा कुल मुझी से, गर्व हूँ पहचान भी।। अटूट बन्धन ये हमारा, प्रेम ही आधार है। बँधा रहे यह स्नेह धागा, यह सुखी संसार है।। सुखी रहे दाम्पत्य अपना, भावना यह मूल है। मिले हमेशा प्रेम पति का, तो कहाँ फिर शूल है।। ******** शुभगीता छंद विधान- शुभ गीता 27 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 1 2122 2122, 2122 212(S1S) (15+12) चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है किंतु अंत में 212 आना अनिवार्य है। ** ** ** **

41. कमंद छंद (परिवार)

सबसे प्यारा है परिवार, जहाँ है खुशियाँ जग की सारी। रहते मिलजुल हम सब साथ, यही है जीवन की फुलवारी।। है जीवन का यह आधार, इसी ने रीति-नीति सिखलाई। जीने की सब राहें नेक, इसी ने हमको है दिखलाई।। आशाओं का उज्वल व्योम, उड़ानें लक्ष्यों की हम लेते। अगर किसी में कम सामर्थ्य, सहारा मिलकर परिजन देते।। विपदाओं की आये बाढ, हमारे काम स्वजन ही आते। बीच भँवर में अटकी नाव, सहायक बनते रिश्ते नाते।। माँ की ममता ठंडी छाँव, बिछौना आँचल का कर डाले। संतानों पर सब कुछ वार, पिता दुख सहकर भी घर पाले।। दादा दादी ने संस्कार, सिखाये अनुभव कर के सारे। भाई हो जब अपने साथ, अनेकों दुश्मन हमसे हारे।। ये रिश्ते हैं प्रभु की देन, सँजोकर रखना धर्म हमारा। इन्हें निभाना पहला कर्म, लुटादें तन, मन, धन हम सारा।। आपस में मृदु हो व्यवहार, यही धन जीवन भर का होता। आदर, ममता, करुणा, त्याग, न हो तो घर भी गरिमा खोता।। ******** कमंद छंद विधान- कमंद छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + छक्कल + लघु, यगण(122) +अठकल + गुरु गुरु (SS) 2222 2221, 122 2222 22 (SS) छक्कल (3+3 या 4+2 या 2+4) हो सकते हैं। अठकल में (4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।) अंत में दो गुरु का होना अनिवार्य है। ********

42. दिगपाल छंद (पिता)

हारा नहीं कभी जो, रुकना न सीख पाया। संतान को सदा ही, बन वह पिता सजाया।। वो बीज सृष्टि का है, संसार रचयिता है। रिश्ते अनेक जग में, लेकिन पिता पिता है।। अँगुली पकड़ चलाया, काँधे कभी बिठाया। चलते जिधर गये हम, पाया सदैव साया।। तकिया बनी भुजाएँ, छाती नरम बिछौना। घोड़ा कभी बना वो, हँसकर नया खिलौना।। वो साँझ की प्रतीक्षा, वो ही खिला सवेरा। उसके बिना न संभव, खुशियों भरा बसेरा।। उम्मीद पूर्ण दीपक, विश्वास का कवच है। संबल मिला उसी से, वो स्वप्न एक सच है।। परिवार की प्रतिष्ठा, तम का करे उजारा। मोती अलग-अलग हम, धागा पिता हमारा।। वो नील नभ वही भू, वो सख्त भी नरम है। संसार के सुखों का, होता पिता चरम है।। वो है पिता हमें जो, निज लक्ष्य से मिलाता।। है संविधान घर का, सच राह पर चलाता। वो शब्द है न कविता, हर ग्रंथ से बड़ा है । दुनिया शुरू वहीं से, जिस पथ पिता खड़ा है।। ****** दिगपाल छंद / मृदुगति छंद विधान दिगपाल छंद जो कि मृदुगति छंद के नाम से भी जाना जाता है, 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है। यह 12 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2212 122, 2212 122 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है। ********

43. रुचिरा छंद (भाभी)

स्नेह सलिल से सींचे घर, पर घर को अपना लेती है। अपने सुख की कम सोचे, सुख औरों को वो देती है।। प्रेम समर्पण की मूरत, छवि माँ से जिसकी मिलती है। वो प्यारी सी भाभी है, जो खुशियाँ देकर खिलती है।। सहज निभाती रिश्तों को, सुख-दुख की साथी होती है। तन,मन,धन से कर प्रयास, वो बीज खुशी के बोती है।। सास-श्वसुर माँ-बाप लगे, सब देवर ननदें हमजोली। भाभी रस का झरना है, जो मिश्री से भरती झोली। जब बेटी ब्याही जाती, घर आँगन सूना हो जाता। उस पतझड़ में भाभी से, फिर से सावन लहरा आता।। कली रूप बेटी का यदि, तो भाभी फूलों की डाली। बगिया महका कर रखती, वो ही होती इसकी माली।। मात-पिता के बाद वही, तम आजीवन घर का हरती। पीहर की गरिमा उससे, कुल का दीपक रोशन करती।। द्वार खड़ी दिखती भाभी, तब माँ भूली पड़ जाती है। उसके हाथों में खुश्बू, वो माँ वाली ही आती है।। ******* रुचिरा छंद विधान- रुचिरा छंद 30 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में चारों या दो दो पद समतुकांत होते हैं। प्रत्येक पद 14,16 मात्राओं के दो यति खंडों में विभाजित रहता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + छक्कल, गुरु + अठकल + छक्कल 2222 222, 2 2222 222(S) 8+6, 2+8+6 = 30 मात्रा। अठकल में (4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।) छक्कल में (3+3 या 4+2 या 2+4) हो सकते हैं चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं। अंत में एक गुरु का होना अनिवार्य है। ********

44. शोकहर छंद (बेटी)

लहके तन मन, जैसे उपवन, खुशियाँ रोशन, हो जाती। बेटी प्यारी, राजदुलारी, जिस घर पैदा, हो आती।। गुल सी खिलकर, खिल-खिल हँसकर, प्रतिपल घर को, महकाती। जब वह बोले, मधुरस घोले, आँगन हरदम, चहकाती।। जिस घर खेली, यह अलबेली, गूँजी बनकर, शहनाई। लक्ष्मी रूपा, शक्ति स्वरूपा, रौनक घर में, ले आई।। नेहल मोती, सदा पिरोती, डोर प्रीत की, कहलाई। हृदय लुभाती, सकल सुहाती, होती बेटी, सुखदाई।। माँ की बातें, सब सौगातें, धारण मन में, करती है। अपनेपन से, अन्तर्मन से, दो कुल को वो, वरती है।। छोड़े नेहर, जाये पर घर, मुश्किल सबकी, हरती है। छुपकर रोती, धैर्य न खोती, खुशियों से घर, भरती है।। शौर्य वीरता, मातृ धीरता, उसने मन में, जब ठानी। लक्ष्मी बाई, पन्नाधाई, बनी पद्मिनी, अभिमानी।। सौम्य स्वभावी, वृहद प्रभावी, छवि जग ने भी, पहचानी। बेटी सबला, रही न अबला, विविध रूप की, वो रानी।। ******* शोकहर / सुभंगी छंद विधान- शोकहर छंद 30 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में चारों पद समतुकांत होते हैं। परन्तु जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के ग्रंथ "छंन्द प्रभाकर" में दिये गये उदाहरण में समतुकांत दो दो पद में निभाया गया है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + अठकल + अठकल + छक्कल 2222, 2222, 2222, 222 (S) 8+8+8+6 = 30 मात्रा। अठकल में (4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।) चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं। प्रथम दो आंतरिक यति की समतुकांतता आवश्यक है। अंत में एक गुरु का होना अनिवार्य है। शोकहर छंद को सुभंगी छंद के नाम से भी जाना जाता है। ********

45. तंत्री छंद (दुल्हन)

नई नवेली, हूँ अलबेली, खिली-खिली, मैं दुल्हन प्यारी। छैल-छबीली, आँखें नीली, मतवाली, नव दिखती न्यारी।। नित्य सँवरता, रूप उभरता, देख जिसे, हूँ रहती खोई। अल्हड़ यौवन, अंग सुघड़पन, उपासना, कवि की हूँ कोई।। मन सतरंगा, निर्मल गंगा, पुनि-पुनि नव, रस धार बहाये। पायल की ध्वनि, पिक सी चितवनि, मधुर गीत, सुर में ज्यूँ गाये।। बदन सुवासित, मन उल्लासित, हृदय मेघ, झर झर कर बरसे। आतुर नैना, खोवे चैना, पिय की छवि, अब देखन तरसे।। मन अति व्याकुल, होवे आकुल, परिणय की, शुभ सुखद घड़ी है। खुशियाँ वारे, परिजन सारे, गीतों की, मृदु प्रेम झड़ी है।। छेड़े सखियाँ, पिय की बतियाँ, कर कर के, वे हूक जगाएँ। मधुर मिलन की, प्रीत सजन की, मनवा में, वे खूब बढाएँ।। माँ की ममता, बचपन रमता, छोड़ चली, कुल नया बसाने। इक पर घर पर, अपने वर पर, दुनिया की, हर खुशी लुटाने।। है अभिलाषा, मन में आशा, अपना घर, मैं महका लूँगी। हाथ हाथ में, पिया साथ में, घर आँगन, मैं चहका दूँगी।। ******** तंत्री छंद विधान- तंत्री छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। प्रत्येक पद क्रमशः 8, 8, 6, 10 मात्राओं के चार यति खंडों में विभाजित रहता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + अठकल + छक्कल + द्विकल + अठकल 2222, 2222, 222, 2 2222 8+8+6+10 = 32 मात्रायें। द्विकल में (2 या 11 )दोनों रूप मान्य है। छक्कल में (3+3 या 4+2 या 2+4) तीनों रूप मान्य है। अठकल में (4+4 या 3+3+2 )दोनों मान्य है। ** ** ** **

46. मरहठा माधवी छंद "होली"

रंग-बिरंगे रंग, लुभाते संग, सजी है टोलियाँ।। होली का हुड़दंग, बाजते चंग, गूँजती बोलियाँ। लाल, गुलाबी, हरा, रंग से भरा, गगन मदहोश है। घन भू को छू जाय, रंग बरसाय, प्रीत का जोश है।। भीगी-भीगी देह, हृदय में नेह, हाथ पिचकारियाँ। कर सोलह श्रृंगार, नयन से वार, करे सब नारियाँ।। पिय गुलाल मल जाय, रहे इतराय, गुलाबी गाल पे।। झूमे मन अनुराग, उड़े जब फाग, ढोल की ताल पे। भाँग, पेय मृदु शीत, पिलाकर मीत, करे अठखेलियाँ। मधुर प्रणय के गीत, बजे संगीत, मने रँगरेलियाँ।। मन से मन का मेल, रंग का खेल, मिटाये दूरियाँ। मटके तिरछे नैन, चुराते चैन, चला कर छूरियाँ।। पर्व अनूठा एक, सीख दे नेक, बुराई छोड़ दें। हिलमिल रहना साथ, पकड़ कर हाथ, प्रेम से जोड़ दें।। खुशियों का त्योहार, करे बौछार, प्रेम के रंग की। हृदय हिलोरे खाय, बहकता जाय, टेर सुन चंग की।। ******* मरहठा माधवी छंद विधान- मरहठा माधवी छंद 29 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + त्रिकल, त्रिकल + गुरु + त्रिकल, त्रिकल + गुरु + गुरु + लघु + गुरु(S) 8 3, 3 2 3, 3 2 2 1 2 (S) (11+8+10) प्रथम दो अन्तर्यति तुकांतता आवश्यक है। अठकल में (4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं। त्रिकल 21, 12, 111 हो सकता है तथा द्विकल 2 या 11 हो सकता है। अंत में एक गुरु का होना अनिवार्य है। ** ** ** **

47. दंडकला छंद 'मधुमास'

है नव परिवर्तन, सब कुछ नूतन, नवल छटाएँ छाय रही। सब सुमन सुवासित, भू उल्लासित, शीतल मंद बयार बही।। खग सारे चहके, उपवन महके, कोयल अगुवाई करती। मधुरिम तानों से, मृदु गानों से, कुहक-कुहक कर नभ भरती।। खिलती अमराई, ले अंगड़ाई, पवन हिलोरे ले बहके। सरसों की क्यारी, दिखती प्यारी, पीत चुनरिया सी लहके।। देखी रंगरलियाँ, अलि जब कलियाँ, प्रणय गीत गा चूम रहे। मादक निपुणाई, यह तरुणाई, देख पुष्प सब झूम रहे।। ऋतुराज सुहाये, कवि मन भाये, काव्य धार कवि आनन में। है काव्य सँवरता, झर-झर झरता, झरना शब्दों का मन में।। किसलय का आना, पतझड़ जाना, है नवजीवन गीत यही। जो खुशियाँ भरदे, दुख सब हरदे, होता सच्चा मीत वही।। मधुमास सुहाता, हृदय लुभाता, मन अनुरागी नृत्य करे। बेला अभिसारी, है सुखकारी, अंग-अंग में प्रेम भरे।। महकाये जल,थल, कोटि सुमन दल, सेज सजाये चाव करे। शुचि प्रेम परागा, रस अनुरागा, युगल सलोने भाव भरे।। ******** दंडकला छंद विधान- दंडकला छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में चारों या दो दो पद समतुकांत होते हैं। प्रत्येक पद 10,8,14 मात्राओं के तीन यति खंडों में विभाजित रहता है। प्रथम दो आंतरिक यति की समतुकांतता आवश्यक है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- गुरु + अठकल, अठकल, अठकल + गुरु + लघु + लघु + गुरु 2 2222, 2222, 2222 2112(S) = 10+ 8+14 = 32 मात्रायें अठकल 4 4 या 3 3 2 हो सकता है। अठकल के नियम जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त न होना, 1 से 4 तथा 5 से 8 मात्रा में पूरित जगण का न होना अनुमान्य हैं। पदांत सदैव दीर्घ वर्ण (S) से होना आवश्यक है। ** ** ** **

48. कर्ण छंद 'नववर्ष उल्लास'

नव वर्ष मनाओ झूम, बहादो आज सुखों की नैया। मन हल्का करके मीत, करो हँस मिलकर ताता-थैया।। है जीवन के दिन चार, खुशी के पल न गवाँओ भैया। हो हाथों में बस हाथ, बजाओ फिर 'चल छैया-छैया'।। कुछ कहदो मन की बात, सुनादूँ मैं कुछ तुमको बातें। आ वक्त बितायें साथ, बड़ी सबसे यह है सौगातें।। मिल जाये सारे यार, कटेगी धूम मचाकर रातें। जो करना चाहो नृत्य, चला उल्टी अरु सीधी लातें।। हो नशा प्रेम का आज, लड़ाई आपस की हम छोड़ें। कुछ भूले बिसरे यार, उन्हें हम जीवन में फिर जोड़ें।। आ लगो गले से आज, मिटादें आपस की ये दूरी। मन से मन का हो मेल, दिलों की चाहत करलें पूरी।। कल नया साल आरंभ, पुराना आज बिदाई लेगा। दुख साथ लिये वो जाय, खुशी के नव अवसर यह देगा।। शुभ स्वागत नवल प्रभात, बधाई गीत सभी मिल गायें। सब हँसलें मिलकर साथ, करें कोशिश सबको हरषायें।। ******* कर्ण छंद विधान - कर्ण छंद 30 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में चारों या दो दो पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2 2222 21, 12221 122 22 (SS) 13+17 = 30 मात्रा। अठकल में (4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं।) चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं। अंत में दो गुरु का होना अनिवार्य है। ** ** ** **

49. गगनांगना छंद 'आखा तीज'

शुक्ल पक्ष बैसाख मास तिथि, तीज सुहावनी। नूतन शुभ आरंभ कार्य की, है फल दायनी आखा तीज नाम से जग में, ये विख्यात है। स्वयं सिद्ध इसके मुहूर्त को, हर जन ध्यात है।। त्रेता का आरंभ इसी दिन, हरि युग धर्म का। अक्षय पात्र मिला पांडव को, था धन कर्म का।। परशुराम का जन्म हुआ वह, पावन रात थी। शुरू महाभारत की रचना, शुभ सौगात थी।। वृंदावन पट श्री विग्रह के, दर्शन को खुले। कभी सुदामा भी इस दिन ही, हरि से आ मिले।। भू सरसावन माँ गंगा ने, तिथि थी ये चुनी। विविध कथाएँ दान-पुण्य के, फल की भी सुनी।। होते ग्रह अनुकूल सभी ही, हरती आपदा। धन की वर्षा करती तिथि यह, होता फायदा।। फल प्रदायिनी मंगलदायक, हिन्दू मान्यता। मनवांछित शुभ फल है देती, दे आरोग्यता।। ******* गगनांगना छंद विधान- गगनांगना छंद 25 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है जो 16 और 9 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2222 2222, 2 2212 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु अंत में रगण (212) आवश्यक है। ** ** ** **

50. निश्चल छंद, 'ऋतु शीत'

श्वेत अश्व पर चढ़कर आई, फिर ऋतु शीत। स्वागत करने नवल भोर का, आये मीत।। गिरि शिखरों पर धवल ओढ़नी, दृश्य पुनीत। पवन प्रवाहित होकर गाये, मधुरिम गीत।। शिशिर आगमन पर रिमझिम सी, है बरसात। अगुवाई कर स्वच्छ करे ज्यूँ, वसुधा गात।। प्रेम प्रदर्शित करती मिहिका, किसलय चूम।। पुष्प नवेले ऋतु अभिवादन, करते झूम। रजत वृष्टि सम हिम कण बरसे, है सुखसार। ग्रीष्म विदाई करके नाचे, सब नर-नार।। दिखे काँच सम ताल सरोवर, अनुपम रूप। उस पर हीरक की छवि देती, उजली धूप।। होता है आतिथ्य चार दिन, फिर है रोष। शरद सुंदरी में दिखते हैं, अगणित दोष।। घिरा कोहरा अविरत ठिठुरन, कम्पित देह। छूमंतर हो जाता पल में, यह ऋतु नेह।। ******** निश्चल छंद विधान- निश्चल छंद 23 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है। यह 16 और 7 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहती है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2222 2222, 22S1 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु अंत गुरु लघु अनिवार्य है। *******

51. तोटक छंद, 'उठ भोर हुई'

उठ भोर हुई बगिया महके। चिड़िया मदमस्त हुई चहके।। झट आलस त्याग करो अपना। तब ही सच हो सबका सपना।। रथ स्वर्णिम सूरज का चमके। सतरंग धरा पर आ दमके।। बल, यौवन, स्वस्थ हवा मिलती। घर-आँगन में खुशियाँ खिलती।। धरती, गिरि, अम्बर झूम रहे। बदरा लहरा कर घूम रहे।। हर दृश्य लगे अति पावन है। यह भोर बड़ी मनभावन है। पट मंदिर-मस्जिद के खुलते। मृदु कोयल के स्वर हैं घुलते।। तम भाग गया किरणें बिखरी। नवजीवन पा धरती निखरी।। ******* तोटक छंद विधान- तोटक छंद 12 वर्णों की वर्णिक छंद है। इसमें चार सगण होते हैं। 112 112 112 112 = 12 वर्ण। चार चरण होते है। दो- दो या चारों चरण समतुकान्त। ********

52. सुगीतिका छंद, 'मेरे लाल'

लिये खड़ी शुभकामना का, मैं सजाकर थाल। घड़ी-घड़ी आशीष दूँ यह, तू जिये सौ साल।। निहाल हूँ पाकर तुम्हे मैं, इस जनम में लाल। न आँच तुम पर आ सकेगी, हूँ तुम्हारी ढाल।। तुम्हे बधाई जन्मदिन की, स्वप्न हो साकार। मिले तुम्हें ऐश्वर्य, खुशियाँ, प्रेम का उपहार।। नवीन ऊर्जा, स्वस्थ काया, सूर्य सा हो तेज। सदैव फूलों सी महकती, हो तुम्हारी सेज।। जड़ें प्रतिष्ठा की बढ़े पर, हो नियत अति नेक। हृदय सुसेवा, शौर्य जागे, सुप्त हो अविवेक।। उमंग नित परमार्थ की हो, प्रेरणा हो पास। भरा रखो हर क्षेत्र में तुम, कार्य का उल्लास।। रहे बरसती प्रभु कृपा नित, शुद्ध हो आचार। भरा रहे भंडार धन का, लक्ष्य हो उपकार।। हँसो हँसाओ प्रेम बाँटो, उच्च यह व्यवहार। सदा पनपते ही रहे 'शुचि', श्रेष्ठ अति सुविचार।। ******** सुगीतिका छंद विधान- सुगीतिका छंद 25 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 15-10 मात्राओं के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 1 2122*2, 2122 21 = (सुगीतिका) = 15+10 = 25 मात्रा। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है। *********

53. सुमित्र छंद "मेरा भाई"

बडी खुशी मुझ को, मिला भाइयों का दुलार। दिखे अलग सबसे, मेरे भाई शानदार।। लिये खड़ी बहना, जब राखी का नेह थाल। निहारते अपलक, बहना को हो कर निहाल।। सुहावना बचपन, स्मर स्मर अब हों लोटपोट। किये पढाई हम, साथ पाठ सब घोट घोट।। हँसे हँसाये तो, मौसम आता है बसन्त। थमे न ये खुशियाँ, पल हो जाये ये अनन्त।। बड़ा न वो छोटा, मन से हरदम मालदार। बढ़े वही आगे, सुनकर बहना की पुकार।। उसे न देखूँ तो, मन हो जाता है उदास। वही चमक मेरी, मेरे मन का है उजास।। खुले गगन जैसा, मन भाई का है विशाल। बने वही ताकत, वो होता है एक ढाल।। सभी लगे प्यारे, यूँ तो रिश्ते हैं अनेक। लगे न घर घर सा, जिस घर भाई हो न एक।। ******** सुमित्र छंद विधान- सुमित्र छंद 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है। यह 10 और 14 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है। इसका चरणादि एवं चरणान्त जगण (121) से होना अनिवार्य है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 121 222, 2222 (अठकल) 2121 10+14=24 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है। सुमित्र छंद का अन्य नाम रसाल छंद भी है। *********

54. शोभन छंद, 'मंगलास्तुति'

सर्व मंगल दायिनी माँ, ज्ञान का अवतार। शब्द सुमनों का चढ़ाऊँ, नित्य मैं नव हार।। अवतरण तव शुक्ल पंचम, माघ का शुभ मास। हे शुभा शुभ शारदे माँ, हिय करो नित वास।। हस्त सजती पुस्तिका शुभ, पद्म आसन श्वेत। देवता, ऋषि, मुनि रिझाते, गान कर समवेत।। कर जोड़ तुझको ध्यावते, मग्न हो नर नार। वागीश्वरी नित हम करें, जयति जय जयकार।। आशीष तेरा जब मिले, पनपते सुविचार। दास चरणों की बनाकर, माँ करो उपकार।। कलुष हरकर माँ मुझे दो, ज्ञान का वरदान। भाव वाणी से करूँ मैं, काव्य का रस पान।। काव्य जीवन में बहे ज्यों, गंग की मृदु धार। खे रही है नाव इसमें, लेखनी पतवार।। भाव परहित का रखूं मैं, नित रहे यह भान। साधना की शक्ति दो माँ, छंद का शुचि ज्ञान।। ********* शोभन छंद विधान- शोभन छंद जो कि सिंहिका छंद के नाम से भी जाना जाता है, 24 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है। यह 14 और 10 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहता है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 5 2 5 2, 212 1121 पँचकल की संभावित संभावनाएं - 122, 212, 221 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है किंतु इस छंद में 11 को 2 मानने की छूट नहीं है। अंत में जगण (121) अनिवार्य है। ********

55. संपदा छंद 'श्री गणेशाय नमः

हे वरगणपति देव, शिव-गौरी सुत सुजान। श्री कार्तिकेय भ्रात, जगत करे गुण बखान।। गज मुख दुर्लभ रूप, है काया अति विशाल। शशि मष्तक पर सोय, अति सुंदर दिव्य भाल।। तिथि भाद्र शुक्ल चौथ, जन्मे प्रभु श्री गणेश। है आह्लादित मात, नाचे छम छम महेश।। तन पीताम्बर सोय, तुण्ड बड़ी है विशाल। गल मणि माला दिव्य, आकर्षक सौम्य चाल।। हो प्रथम पूज्य आप, करें सफल सकल काज। दुख हरते प्रभु शीघ्र, रखते तुम भक्त लाज।। हे भूपति विघ्नेश, सब देवों के नरेश। तन मन धन से भक्त, ध्याते प्रतिपल गणेश।। हे मेरे आराध्य, नमन करूँ नित विनीत।। सद्ग्रन्थों को राच, कार्य करूँ मैं पुनीत। कर लेखन गति तेज, भर दो हिय में उजास। 'शुचि' आँगन में आप, करना प्रभु नित्य वास।। ******* संपदा छंद विधान- संपदा छंद 23 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है। यह 11 और 12 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहती है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2 22221, 2222 121 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु आदि द्विकल एवं अंत 121 (जगण) अनिवार्य है। अठकल के नियम अनुपालनिय है। *******

56. योग छंद "विजयादशमी"

अच्छाई जब जीती, हरा बुराई। जग ने विजया दशमी, तभी मनाई।। जयकारा गूँजा था, राम लला का। हुआ अंत धरती से, दुष्ट बला का।। शक्ति उपासक रावण, महाबली था। ग्रसित दम्भ से लेकिन, बहुत छली था। कूटनीति अपनाकर, सिया चुराई। हर कृत्यों में उसके, छिपी बुराई।। नहीं धराशायी हो, कभी सुपंथी। सर्व नाश को पाये, सदा कुपंथी। चरम फूट पापों का, सदा रहेगा। कब तक जग रावण के, कलुष सहेगा।। मानवता की खातिर, शक्ति दिखाएँ। जग को सत्कर्मों की, भक्ति सिखाएँ।। राम चरित से जीवन, सफल बनाएँ। धूम धाम से हम सब, पर्व मनाएँ।। ******* योग छंद विधान- योग छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद 20 मात्रा रहती हैं। पद 12 और 8 मात्रा के दो यति खंडों में विभाजित रहता है। 12 मात्रिक प्रथम चरण में चौकल अठकल का कोई भी संभावित क्रम लिया जा सकता है। इसकी तीन संभावनाएँ हैं जो तीन चौकल, चौकल + अठकल और अठकल + चौकल के रूप में है। 8 मात्रिक दूसरे चरण का विन्यास निम्न है - त्रिकल, लघु, तथा दो दीर्घ वर्ण (SS) = 3+1+4 = 8 त्रिकल के तीनों (12, 21, 111) रूप मान्य है। दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। *******

57. महाश्रृंगार छंद "चुनावी हल्ला"

चुनावों का है हाहाकार, मचाते नेता खुलकर शोर। हाथ सब जोड़े बारम्बार, इकठ्ठा भीड़ करे चहुँ ओर।। प्रलोभन विविध भाँति के बाँट, माँगते जनता से हँस वोट। रहे कमियाँ सब अपनी छाँट, लुटाकर हरे गुलाबी नोट।। प्रभावी भाषण है दमदार, नये आश्वासन की है होड़। श्रेष्ठ अपनी कहते सरकार, प्रबल दावेदारों की दोड़।। मगर सक्षम का जो दे साथ, वोट का वो असली हकदार। बेचना मत अपना ईमान, देश का मत करना व्यापार।। याद मतदाताओं की खींच, लिए आई नेता को गाँव। मलाई सत्ता की सौगात, बदौलत जिनके सारे ठाँव।। दिखाते साथी बनकर खास, खिंचाते फोटो चिपकर साथ। नयन में भर घड़ियाली नीर, मिलाते दीन दुखी से हाथ।। बने नेता सब तारणहार, भलाई की करते सब बात। भले दिन मतदाता के चार, अँधेरी आएगी फिर रात।। चुनावी हल्ले होंगे शान्त, नींद में सोयेंगे फिर लोग। वर्ष बीतेंगे फिर से पाँच, भोगने दो नेता को भोग।। ******** महाश्रृंगार छंद विधान- महाश्रृंगार छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 16 16 मात्रा के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है। 16 मात्रा के यति खण्ड की मात्रा बाँट ठीक श्रृंगार छंद वाली है, जो 3 - 2 - 8 - 21(ताल) है। इस प्रकार महाश्रृंगार छंद की मात्रा बाँट प्रति पद :- 3 2 2222 21, 3 2 2222 21 = 16+16 = 32 मात्रा सिद्ध होती है। चार पदों के इस छंद में दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। कोई चाहे तो रोचकता बढाने के लिए प्रथम यति के अंतर्पदों की तुकांतता भी आपस में मिला सकता है। प्रारंभ के त्रिकल के तीनों रूप 111, 12, 21 मान्य है तथा द्विकल 11 या 2 हो सकता है। अठकल 4 4 या 3 3 2 हो सकता है। अठकल के नियम जैसे प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द का समाप्त न होना, 1 से 4 तथा 5 से 8 मात्रा में पूरित जगण का न होना अनुमान्य हैं। 16 मात्रिक चरण का अंत सदैव ताल (21) से होता है। महाश्रृंगार छंद का 16 मात्रा का रूप श्रृंगार छंद कहलाता है *********

58. धारा छंद 'तिरंगा'

लहर-लहर लहराता जाय, झंडा भारत का प्यारा। अद्भुत लगती इसकी शान, फहराता दिखता न्यारा।। शौर्य वीरता की पहचान, आजादी का द्योतक है। भारत माँ का है यह भाल, दुश्मन का अवरोधक है।। तीन रंग में वर्णित गूढ़, ध्वज परिभाषित करता है। भारत की गरिमा का सार, यह रंगों में भरता है।। केशरिया वीरों के गीत, उल्लासित होकर गाता। शौर्य, शक्ति, साहस, उत्सर्ग, जन अंतस में भर जाता।। श्वेत वर्ण सिखलाता प्रेम, सत्य, अहिंसा, मानवता। देता जग को यह संदेश, छोड़ो मन की दानवता।। हरा रंग खुशहाली रूप, भारत का दिखलाता है। रिद्धि-सिद्धि के प्रेरक मंत्र, लहरा कर सिखलाता है।। नीला चक्र सुशासन, न्याय, कर्म शक्ति की शुचि छाया। नव विकास को है गतिशील, ध्वज पर रवि बन लहराया।। निज गौरव, परिचय, अभिमान, मिला तिरंगे से हमको। शीश झुकाकर करें प्रणाम, सब भारतवासी तुमको।। ******** धारा छंद विधान- धारा छंद 29 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल + छक्कल + लघु, अठकल + छक्कल(S) 2222 2221, 2222 222 (S) अठकल में (4+4 या 3+3+2 दोनों हो सकते हैं। छक्कल (3+3 या 4+2 या 2+4) हो सकते हैं। अंत में एक गुरु का होना अनिवार्य है। ********

59. 59. अवतार छंद 'गोरैया'

फुर फुर गोरैया उड़े, मदमस्त सी लगे। चीं चीं चीं का शोर कर, नित भोर वो जगे।। मृदु गीत सुनाती लहे, वो पवन सी बहे। तुम दे दो दाना मुझे, वो चहकती कहे।। चितकबरा तन, पर घने, लघु फुदक सोहती। अनुपम पतली चोंच से, जन हृदय मोहती।। छत, नभ, मुँडेर नापती, नव जोश से भरी। है धैर्य, शौर्य से गढ़ी, बेजोड़ सुंदरी।। ले आती तृण, कुश उठा, हो निडर भीड़ में। है कार्यकुशलता भरी, निर्माण नीड़ में।। मिलजुल कर रहती सदा, व्यवहार की धनी। घर-आँगन चहका रही, मृदु भाव से सनी।। सुन मेरी प्यारी सखी, तुम सुखद भोर हो। निज आँगन समझो इसे, घर यही ठोर हो।। मैं दाना दूँगी तुम्हें, जल नित्य ही भरूँ। मत जाना दर से कभी, 'शुचि' विनय नित करूँ।। ******* अवतार छंद विधान- अवतार छंद 23 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है। यह 13 और 10 मात्रा के दो यति खंड में विभक्त रहती है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2 2222 12, 2 3 212 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु आदि द्विकल एवं अंत 212 (रगण) अनिवार्य है। अठकल के नियम अनुपालनिय है। *******

60. आल्हा छंद "सैनिक"

मैं सैनिक निज कर्तव्यों से, कैसे सकता हूँ मुँह मोड़। प्रबल भुजाओं की ताकत से, रिपु दल का दूँगा मुँह तोड़।। मातृभूमि की रक्षा करने, खड़ा रहूँ बन्दूकें तान। कहता है फौलादी सीना, मैं सैनिक हूँ अति बलवान।। डटा रहूँगा सीमा पर मैं, खुद भागेंगे अरि रण छोड़। प्रबल भुजाओं की ताकत से, रिपु दल का दूँगा मुँह तोड़।। अरि शोणित का हूँ मैं प्यासा, करूँ पान का अथक प्रयास। थर्र थर्र थर्रा दूँ रिपुदल, रग-रग को इसका अभ्यास। साथ खड़ी है मेरे तनकर, भारत की सेना बेजोड़। प्रबल भुजाओं की ताकत से, रिपु दल का दूँगा मुँह तोड़।। मेरे भारतवासी सुनलो, मैं घाटी से रहा पुकार। अर्थव्यवस्था अरि की तोड़ो, एकजूट हो करो प्रहार।। किसमें कितनी देशभक्ति है, यही लगालो अब सब होड़। प्रबल भुजाओं की ताकत से, रिपु दल का दूँगा मुँह तोड़।। ******** आल्हा छंद विधान- आल्हा छंद 31 मात्रा प्रति पद का सम पद मात्रिक छंद है। यह चार पदों में रचा जाता है। इसे मात्रिक सवैया भी कहते हैं। इसमें यति 16 और 15 मात्रा पर नियत होती है। दो दो या चारों पद समतुकांत होने चाहिए। 16 मात्रा वाले चरण का विधान और मात्रा बाँट ठीक चौपाई छंद वाली है। 15 मात्रिक चरण का अंत ताल यानि गुरु लघु से होना आवश्यक है। तथा बची हुई 12 मात्राएँ तीन चौकल के रूप में हो सकती हैं या फिर एक अठकल और एक चौकल हो सकती हैं। चौकल और अठकल के सभी नियम लागू होंगे। आल्हा छंद का अन्य नाम वीर छंद भी प्रसिद्ध है, यह छंद वीर रस के लिए भी उपयुक्त समझी जाती है । देश भक्ति की ओजपूर्ण रचनाएं इस छंद में लोकप्रिय है लेकिन अन्य रस के भाव लेना मनाही नहीं है।

61. त्रिभंगी छंद, 'ससुराल'

ससुराल सजीला, लगे रसीला, छैल-छबीला, यौवन सा। अति हृदय लुभाता, सहज सुहाता, मन हर्षाता, उपवन सा।। कोमल भावों का, मृदु छाँवों का, उच्छावों का, डेरा है। सूरज की गरमी, शीतल नरमी, उत्सवधर्मी, घेरा है।। मन श्वसुर भाँपते, हृदय झाँकते, घर सँवारते, बड़पन से। दुख सास मिटाती, हरि गुण गाती, दीप जलाती, शुचि मन से।। नखराला देवर, मीठा घेवर, तीखा तेवर, दिखलाये। ननदल हमजोली, हँसी-ठिठोली, मीठी बोली, सिखलाये।। पिय का घर आना, मन खिल जाना, कुछ उकसाना, सरसाना। तन रिमझिम सावन, अति मनभावन, मन वृंदावन, बरसाना।। प्रिय की मृदु बातें, मीठी रातें, सुख सौगातें, व्याकुलता। नेहर बिसराये, नव घर पाये, सपन सजाये, चंचलता।। ससुराल प्रेम भी, ठोस-हेम भी, कुशल-क्षेम भी, प्यारा है। हर भूल भुलाता, गले लगाता, हर्ष जगाता, न्यारा है।। नित पाठ पढ़ाता, गर्व बढ़ाता, चाव चढाता, घर अपना। हम इसे सजायें, हिल-मिल जायें, मंगल गायें, हो सपना।। ******** त्रिभंगी छंद विधान- त्रिभंगी प्रति पद 32 मात्राओं का सम पद मात्रिक छंद है। प्रत्येक पद में 10, 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। यह 4 पद का छंद है। प्रथम व द्वितीय यति समतुकांत होनी आवश्यक है। परन्तु तीनों यति निभाई जाय तो सर्वश्रेष्ठ है। दो दो चरण समतुकांत होते हैं। इसकी मात्रा बाँट निम्न प्रकार से है:- प्रथम यति- 2+4+4 द्वितीय यति- 4+4 तृतीय यति- 4+4 पदान्त यति- 4+2 चौकल में पूरित जगण वर्जित रहता है तथा चौकल की प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता। पदान्त में एक दीर्घ (S) आवश्यक है लेकिन दो दीर्घ हों तो सौन्दर्य और बढ़ जाता है ********

62. शार्दूलविक्रीडित छंद 'माँ लक्ष्मी वंदना'

सारी सृष्टि सदा सुवासित करे, देती तुम्ही भव्यता। लक्ष्मी हे कमलासना जगत में, तेरी बड़ी दिव्यता।। पाते वो धन सम्पदा सहज ही, ध्यावे तुम्हे जो सदा। आकांक्षा मन की सभी फलित हो, जो भक्त पूजे यदा।। तेरा ही वरदान प्राप्त करके, सम्पन्न होते सभी। झोली तू भरती सदैव धन से, खाली न होती कभी।। भक्तों को रखती सदा शरण में, ऐश्वर्य से पालती। देती वैभव, मान और क्षमता, संताप को टालती।। हीरे का अति दिव्य ताज सर पे, आभा बड़ी सोहनी। चाँदी की चुनड़ी चमाक चमके, माँ तू लगे मोहनी।। सोने की तगड़ी सजी कमर पे, मोती जड़े केश है। माता तू धनवान एक जग में, मोहे सदा वेश है।। हे लक्ष्मी हरिवल्लभी नमन है, तेरी करूँ आरती। तेरा ही गुणगान नित्य करती, मातेश्वरी भारती।। सेवा, त्याग, परोपकार वर दो, संसार से तार माँ। श्रद्धा से शुचि भक्ति नित्य करती, नैया करो पार माँ।। ******** शार्दूलविक्रीडित छंद विधान- शार्दूलविक्रीडित छंद चार पदों की वर्णिक छंद है। प्रत्येक पद में 19 वर्ण होते हैं। 12 और 7 वर्णों के बाद यति होती है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 222 112 121 112/ 221 221 2 बहुत ही मनोहारी श्लोक जैसे- आदौ राम तपो, या कुन्देन्दु तुषार हार, कस्तूरी तिलकम आदि की रचना इसी छंद में की गई है। ********

63. चांद्रायण छंद, 'सुमिरन'

हरि के नाम अनेक, जपा नित कीजिये। आठों याम सचेत, सुधा रस पीजिये।। महिमा बड़ी विराट, नित स्मरण में रखें। मन से नाम पुकार, कृपा प्रभु की लखें।। पढ़लें ग्रन्थ अनेक, सुधिजन सभी कहें। स्थायी ये न शरीर, मकानों से ढहें।। खाली हाथ पसार, जगत सब छोड़ते माया, मोह, विलास, त्याग पथ मोड़ते।। सुमिरन सहज उपाय, मनुज करले अभी। कल पर कभी न टाल, न कल आता कभी।। कर अविलम्ब पुकार, नाथ हे नाथ हे। तेरा नाम सुहाय, सदा प्रभु साथ दे।। सुख-दुख एक समान, हृदय में धारलें। कर उपकार सदैव, स्वयं को तारलें।। जग यह कीच समान, कमल बन के खिलो। सुमिरन का रख ध्येय, नहीं पथ से हिलो।। ******** चांद्रायण छंद विधान- यह प्रति पद 21 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है जो 11,10 मात्राओं के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है। दो दो पद या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- सतकल + जगण (1S1) , पँचकल + रगण (S1S)= 11, 10 = 21 मात्राएँ। 7 121, 5 S1S = 21 मात्राएँ। सतकल की संभावित संभावनाएं- 1222, 2122, 2212, 2221 चारों रूप मान्य है। पंचकल की निम्न संभावनाएँ हैं :- 122 212 221 चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ सकते हैं, पर अंत सदैव रगण (S1S) से होना चाहिए। ********

64. सुखदा छंद 'गंगाजल'

गंगाजल की महिमा, दुनिया गाती है। गंगा सारे जग की, माँ कहलाती है।। पापमोचनी गंगा, पाप सभी धोती। मोक्षदायिनी सरिता, मुक्तिद्वार होती।। जीवनमय औषध वन, पग-पग लहराये। जिस पथ से भागीरथ, गंगा को लाये।। स्वस्थ निरोगी काया, प्रखर बुद्धि बाँटे। पावन जल का सेवन, सकल दोष छाँटे।। बिन गंगाजल पूजा, व्यर्थ कही जाती। स्नान-दान से ऊर्जा, अद्भुत है आती।। नित प्रसाद जो पाते, भवसागर तरते। दुखद सपन से मानव, नहीं कभी डरते।। शीतल अभिसिंचन कर, सगर पुत्र तारे। सुधा तुल्य जल से सब, रोग कष्ट हारे।। शुचि दुर्गंध रहित जल, वर्षो तक रहता। चरणामृत सम भू पर, सदियों से बहता।। ******** सुखदा छंद विधान- सुखदा छंद 22 मात्रा प्रति पद की सम मात्रिक छंद है। दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- 2222 22, 2222S 12 +10 = 22 मात्राएँ चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है, किंतु अंत में गुरु वर्ण अनिवार्य है। अठकल के नियम अनुपालनिय है। ********

65. सरसी छंद, "मुन्ना मेरा सोय"

ओ मेघा चुप हो जा मेघा, मुन्ना मेरा सोय। खिल-खिल हँसता कभी मुलकता, मधुर स्वप्न में खोय।। घड़-घड़ भड़-भड़ जोर-जोर से, शोर मचाना छोड़। आँख लगी मुन्ने की अब तो, ओ निर्मम मत तोड़।। डर कर होंठ निकाले जब-तब, रही पलक भी काँप। ओ विराट नभ के बिगड़े सुत, मन मुन्ने का भाँप।। उसका तन कोमल मन भोला, छोटा सा आकार। ये कैसा बड़पन है तेरा, ये कैसा प्रतिकार।। कृषक झूमकर तुझे बुलाये, नाचे देखो मोर। पूरा है आकाश तुम्हारा, धरती का हर छोर।। प्यासे की तुम प्यास बुझाओ, करलो तुम उपकार। बिना बुलाये आगन्तुक का, होता कम सत्कार।। नन्ही सी गोरैया चिड़िया, बचा रही निज नीड़। वो है मुन्ने की सखि प्यारी, समझो उसकी पीड़।। संग खेलने मेघा आना, साथ लगाना दौड़। लेकिन कच्ची नींद न तोड़ो, विनय करूँ कर जोड़।। ******** सरसी छंद / कबीर छंद विधान – सरसी छंद चार पदों का सम-पद मात्रिक छंद है। इस में प्रति पद 27 मात्रा होती है। यति 16 और 11 मात्रा पर है अर्थात प्रथम चरण 16 मात्रा का तथा द्वितीय चरण 11 मात्रा का होता है। दो दो पद समतुकान्त होते हैं। 16 मात्रिक चरण ठीक चौपाई छंद वाला चरण और 11 मात्रा वाला ठीक दोहा छंद का सम चरण मात्रा बांट के हिसाब से होता है।। छंद के 11 मात्रिक खण्ड की मात्रा बाँट अठकल+त्रिकल (ताल यानी 21) होती है। सरसी छंद को हरिपद, कबीर तथा सुमंदर छंद के नाम से भी जाना जाता है। ********

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