Satrangini Harivansh Rai Bachchan

सतरंगिनी हरिवंशराय बच्चन
पहला रंग

1. सतरंगिनी

सतरंगिनी, सतरंगिनी !
काले घनों के बीच में,
काले क्षणों के बीच में
उठने गगन में, लो, लगी
यह रंग-बिरंग विहँगिनी!
सतरंगिनी, सतरंगिनी!

जग में बता वह कौन है,
कहता कि जो तू मौन है,
देखी नहीं मैंने कभी
तुझसे बड़ी मधु भाषिणी!
सतरंगिनी, सतरंगिनी!

जैसा मनोहर वेश है
वैसा मधुर सन्देश है,
दीपित दिशाएँ कर रहीं
तेरी हँसी मृदु हासिनी!
सतरंगिनी, सतरंगिनी!

भू के हृदय की हलचली,
नभ के हृदय की खलबली
ले सप्त रागों में चली
यह सप्त रंग तरंगिनी!
सतरंगिनी, सतरंगिनी!

अति क्रुद्ध मेघों की कड़क,
अति क्षुब्ध विद्युत् की तड़क
पर पा गई सहसा विजय
तेरी रंगीली रागिनी !
सतरंगिनी, सतरंगिनी!

तूफान, वर्षा, बाढ़ जब,
आगे खुला यम दाढ़ जब,
मुसकान तेरी बन गई
विश्वास, आशा दायिनी !
सतरंगिनी, सतरंगिनी!

मेरे दृगों के अश्रुकण-
को, पार करती किस नयन-
की, तेजमय तीखी किरण,
जो हो रही चित्रित हृदय
पर एक तेरी संगिनी !
सतरंगिनी, सतरंगिनी!

2. वर्षा समीर

बरसात की आती हवा।

वर्षा-धुले आकाश से,
या चन्द्रमा के पास से,
या बादलों की साँस से;
मघुसिक्त, मदमाती हवा,
बरसात की आती हवा।

यह खेलती है ढाल से,
ऊँचे शिखर के भाल से,
अस्काश से, पाताल से,
झकझोर-लहराती हवा;
बरसात की आती हवा।

यह खेलती है सर-वारि से,
नद-निर्झरों की धार से,
इस पार से, उस पार से,
झुक-झूम बल खाती हवा;
बरसात की आती हवा।

यह खेलती तरुमाल से,
यह खेलती हर डाल से,
लोनी लता के जाल से,
अठखेल-इठलाती हवा;
बरसात की आती हवा।

इसकी सहेली है पिकी,
इसकी सहेली चातकी,
संगिन शिखिन, संगी शिखी,
यह नाचती-गाती हवा;
बरसात की आती हवा।

रंगती कभी यह इन्द्रधनु,
रंगती कभी यह चन्द्रधनु,
अब पीत घन, अब रक्त घन,
रंगरेल-रंगराती हवा;
बरसात की आती हवा।

यह गुदगुदाती देह को,
शीतल बनाती गेह को,
फिर से जगाती नेह को;
उल्लास बरसाती हवा;
बरसात की आती हवा।

यह शून्य से होकर प्रकट
नव हर्ष से आगे झपट;
हर अंग से जाती लिपट,
आनन्द सरसाती हवा;
बरसात की आती हवा।

जब ग्रीष्म में यह जल चुकी
जब खा अँगार-अनल चुकी,
जब आग में यह पल चुकी,
वरदान यह पाती हवा;
बरसात की आती हवा।

तू भी विरह में दह चुका,
तू भी दुखों को सह चुका,
दुख की कहानी कह चुका,
मुझसे बता जाती हवा;
बरसात की आती हवा।

3. पपीहा

कहता पपीहा, पी कहाँ?'

युग-कल्प हैं सुनते रहे,
युग-कल्प सुनते जाएँगे,
प्यासे पपीहे के वचन
लेकिन कहाँ रुक पाएँगे,
सुनती रहेगी सरज़मीं,
सुनता रहेगा आसमाँ;
कहता पपीहा, पी कहाँ?'

विस्तृत गगन में घन घिरे,
पानी गिरा, पत्थर गिरे,
विस्तृत मही पर सर भरे,
उमही नदी, निर्झर झरे,
पर माँगती ही रह गई
दो बूँद जल इसकी ज़बाँ;
कहता पपीहा, पी कहाँ?'

दो बूँद जल से ही अगर
तृष्णा बुझाना चाहता,
दो बूँद जल से ही अगर
यह शान्ति पाना चाहता,
तो भूमि के भी बीच में
इसकी कमी होती कहाँ;
कहता पपीहा, पी कहाँ?'

यह बूँद ही कुछ और है,
यह खोज ही कुछ और है,
यह प्यास ही कुछ और है,
यह सोज़ ही कुछ और है,
जिसके लिए, जिसको लिए
जल-थल-गगन में यह भ्रमा;
कहता पपीहा, पी कहाँ?'

लघुतम विहंगम यह नहीं,
यह प्यास की आवाज़ है,
इसमें छिपा ज़िंदादिलों-
की, ज़िन्दगी का राज़ है,
यह जिस जगह उठती नहीं
है मौत का साया वहाँ;
कहता पपीहा, पी कहाँ?'

धड़कन गगन की-सी बनी
उठती जहाँ यह रात में,
मेरा हृदय कुछ ढूँढने
लगता इसी के साथ में,

यह सिद्ध करता है कि मैं
जीवित अभी, मुर्दा नहीं,
है शेष आकर्षण अभी
मेरे लिए अज्ञात में;
थमता न मैं उस ठौर भी
यह गूँजकर मिटती जहाँ!
कहता पपीहा, पी कहाँ?'

4. जुगनू

अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

उठी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चांद औ' तारे,
उठा तूफान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे,

मगर इस रात में भी लौ
लगाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

गगन में गर्व से उठउठ,
गगन में गर्व से घिरघिर,
गरज कहती घटाएँ हैं,
नहीं होगा उजाला फिर,

मगर चिर ज्योति में निष्ठा
जमाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

तिमिर के राज का ऐसा
कठिन आतंक छाया है,
उठा जो शीश सकते थे
उन्होनें सिर झुकाया है,

मगर विद्रोह की ज्वाला
जलाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

प्रलय का सब समां बांधे
प्रलय की रात है छाई,
विनाशक शक्तियों की इस
तिमिर के बीच बन आई,

मगर निर्माण में आशा
दृढ़ाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

प्रभंजन, मेघ दामिनी ने
न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा,
धरा के और नभ के बीच
कुछ साबित नहीं छोड़ा,

मगर विश्वास को अपने
बचाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

प्रलय की रात में सोचे
प्रणय की बात क्या कोई,
मगर पड़ प्रेम बंधन में
समझ किसने नहीं खोई,

किसी के पंथ में पलकें
बिछाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक
जलाए कौन बैठा है?

5. नागिन

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तू प्रलय काल के मेघों का
कज्‍जल-सा कालापन लेकर,
तू नवल सृष्‍टि की ऊषा की
नव द्युति अपने अंगों में भर,

बड़वाग्नि-विलोडि़त अंबुधि की
उत्‍तुंग तरंगों से गति ले,
रथ युत रवि-शशि को बंदी कर
दृग-कोयों का रच बंदीघर,

कौंधती तड़ित को जिह्वा-सी
विष-मधुमय दाँतों में दाबे,
तू प्रकट हुई सहसा कैसे
मेरी जगती में, जीवन में?

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तू मनमोहिनी रंभा-सी,
तू रुपवती रति रानी-सी,
तू मोहमयी उर्वशी सदृश,
तू मनमयी इंद्राणी-सी,

तू दयामयी जगदंबा-सी
तू मृत्‍यु सदृश कटु, क्रुर, निठुर,
तू लयंकारी कलिका सदृश,
तू भयंकारी रूद्राणी-सी,

तू प्रीति, भीति, आसक्ति, घृणा
की एक विषम संज्ञा बनकर,
परिवर्तित होने को आई
मेरे आगे क्षण-प्रतिक्षण में।

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

प्रलयंकर शंकर के सिर पर
जो धूलि-धूसरित जटाजूट,
उसमें कल्‍पों से सोई थी
पी कालकूट का एक घूँट,

सहसा समाधि का भंग शंभु,
जब तांडव में तल्‍लीन हुए,
निद्रालसमय, तंद्रानिमग्‍न
तू धूमकेतु-सी पड़ी छूट;

अब घूम जलस्‍थल-अंबर में,
अब घूम लोक-लोकांतर में
तू किसको खोजा करती है,
तू है किसके अन्‍वीक्षण में?

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तू नागयोनि नागिनी नहीं,
तू विश्‍व विमोहक वह माया,
जिसके इंगित पर युग-युग से
यह निखिल विश्‍व नचता आया,

अपने तप के तेजोबल से
दे तुझको व्‍याली की काया,
धूर्जटि ने अपने जटिल जूट-
व्‍यूहों में तुझको भरमाया,

पर मदन-कदन कर महायतन
भी तुझे न सब दिन बाँध सके,
तू फिर स्‍वतंत्र बन फिरती है
सबके लोचन में, तन-मन में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तू फिरती चंचल फिरकी-सी
अपने फन में फुफकार लिए,
दिग्‍गज भी जिससे काँप उठे
ऐसा भीषण हुँकार लिए,

पर पल में तेरा स्‍वर बदला,
पल में तेरी मुद्रा बदली,
तेरा रुठा है कौन कि तू
अधरों पर मृदु मनुहार लिए,

अभिनंदन करती है उसका,
अभिपादन करती है उसका,
लगती है कुछ भी देर नहीं
तेरे मन के परिवर्तन में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

प्रेयसि का जग के तापों से
रक्षा करने वाला अंचल,
चंचल यौवन कल पाता है
पाकर जिसकी छाया शीतल,

जीवन का अंतिम वस्‍त्र कफ़न
जिसको नख से शीख तक तनकर
वह सोता ऐसी निद्रा में
है होता जिसके हेतु न कल,

जिसको तन तरसा करता है,
जिससे डरपा करता है,
दोनों की झलक मुझे मिलती
तेरे फन के अवगुंठन में!

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

जाग्रत जीवन का कंपन है
तेरे अंगों के कंपन में,
पागल प्राणें का स्‍पंदन है
तेरे अंगों के स्‍पंदन में,

तेरे द्रुत दोलित काया में
मतवाली घड़ियों की धड़कन,
उन्मद साँसों की सिहरन है,
तेरी काया के सिहरन में

अल्‍हड़ यौवन करवट लेता
जब तू भू पर लुंठित होती,
अलमस्‍त जवानी अँगराती
तेरे अंगों की ऐंठन में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तू उच्‍च महत्‍वाकांक्षा-सी
नीचे से उठती ऊपर को,
निज मुकुट बना लेगी जैसे
तारावलि- मंडल अंबर को,

तू विनत प्रार्थना-सी झुककर
ऊपर से नीचे को आती,
जैसे कि किसी की पद-से
ढँकने को है अपने सिर को,

तू आसा-सी आगे बढ़ती,
तू लज्‍जा-सी पीछे हटती,
जब एक जगह टिकती, लगती
दृढ़ निश्‍चय-सी निश्‍चल मन में।

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

मलयाचल में मलयानिल-सी
पल भर खाती, पल इतराती
तू जब आती, युग-युग दहाती
शीतल हो जाती है छाती,

पर जब चलती उद्वेग भरी
उत्‍तप्‍त मरूस्‍थल की लू-सी
चिर संचित, सिंचित अंतर के
नंदन में आग लग जाती;

शत हिमशिखरों की शीतलता,
श्‍त ज्‍वालामुखियों की दहकन,
दोनों आभासित होती है
मुझको तेरे आलिंगन में!

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

इस पुतली के अंदर चित्रित
जग के अतीत की करूण कथा,
गज के यौवन का संघर्षन,
जग के जीवन की दुसह व्‍यथा;

है झूम रही उस पुतली में
ऐसे सुख-सपनों की झाँकी,
जो निकली है जब आशा ने
दुर्गम भविष्‍य का गर्भ मथा;

हो क्षुब्‍ध-मुग्‍ध पल-पल क्रम से
लंगर-सा हिल-हिल वर्तमान
मुख अपना देखा करता है
तेरे नयनों के दर्पण में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तेरे आनन का एक नयन
दिनमणि-सा दिपता उस पथ पर,
जो स्‍वर्ग लोक को जाता है,
जो अति संकटमय, अति दुस्‍तर;

तेरे आनन का एक नेत्र
दीपक-सा उस मग पर जगता,
जो नरक लोक को जाता है,
जो अति सुखमायमय, अति सुखकर;

दोनों के अंदर आमंत्रण,
दोनों के अंदर आकर्षण,
खुलते-मुंदते हैं सर्व्‍ग-नरक
के देर तेरी हर चितवन में!

सहसा यह तेरी भृकुटि झुकी,
नभ से करूणा की वृष्टि हुई,
मृत-मूर्च्छित पृथ्‍वी के ऊपर
फिर से जीवन की सृष्टि हुई,

जग के आँगन में लपट उठी,
स्‍वप्‍नों की दुनिया नष्‍ट हुई;
स्‍वेच्‍छाचारिणी, है निष्‍कारण
सब तेरे मन का क्रोध, कृपा,

जग मिटता-बनता रहता है
तेरे भ्रू के संचालन में;
नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

अपने प्रतिकूल गुणों की सब
माया तू संग दिखाती है,
भ्रम, भय, संशय, संदेहों से
काया विजडि़त हो जाती है,

फिर एक लहर-सीआती है,
फिर होश अचानक होता है,
विश्‍वासी आशा, निष्‍ठा,
श्रद्धा पलकों पर छाती है;

तू मार अमृत से सकती है,
अमरत्‍व गरल से दे सकती,
मेरी मति सब सुध-बुध भूली
तेरे छलनामय लक्षण में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

विपरीत क्रियाएँ मेरी भी
अब होती हैं तेरे आगे,
पग तेरे पास चले आए
जब वे तेरे भय से भागे,

मायाविनि क्‍या कर देती है
सीधा उलटा हो जाता है,
जब मुक्ति चाहता था अपनी
तुझसे मैंने बंधन माँगे,

अब शांति दुसह-सी लगती है,
अब मन अशांति में रमता है,
अब जलन सुहाती है उर को,
अब सुख मिलता उत्‍पीड़न में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तूने आँखों में आँख डाल
है बाँध लिया मेरे मन को,
मैं तुझको कीलने चला मगर
कीला तूने तन को,

तेरी परछाईं-सा बन मैं
तेरे संग हिलता-डुलता हूँ,
मैं नहीं समझता अलग-अलग
अब तेरे-अपने जीवन को,

मैं तन-मन का दुर्बल प्राणी,
ज्ञानी, ध्‍यानी भी बड़े-बड़े
हो दास चुके तेरे, मुझको
क्‍या लज्‍जा आत्‍म-समर्पण में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

तुझपर न सका चल कोई भी
मेरा प्रयोग मारण-मोहन,
तेरा न फिरा मन और कहीं
फेंका भी मैंने उच्चाटन,

सब मंत्र, तंत्र, अभिचारों पर
तू हुई विजयिनी निष्‍प्रयत्‍न,
उलटा तेरे वश में आया
मेरा परिचालित वशीकरण;

कर यत्‍न थका, तू सध न सकी
मेरे गीतों से, गायन से
कर यत्‍न थका, तू बंध न सकी
मेरे छंदों के बंधन में;

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

सब साम-दाम औ' दंड-भेद
तेरे आगे बेकार हुआ,
जप, तप, व्रत, संयम, साधन का
असफल सारा व्‍यापार हुआ,

तू दूर न मुझसे भाग सकी,
मैं दूर न तुझसे भाग सका,
अनिवारिणि, करने को अंतिम
निश्‍चय, ले मैं तैयार हुआ-

अब शांति, अशांति, मरण, जीवन
या इनसे भी कुछ भिन्‍न अगर,

सब तेरे विषमय चुंबन में,
सब तेरे मधुमय दंशन में!

नर्तन कर, नर्तन कर, नागिन,
मेरे जीवन के आँगन में!

6. मयूरी

मयूरी,
नाच, मगन-मन नाच!

गगन में सावन घन छाए,
न क्‍यों सुधि साजन की आए;
मयूरी, आँगन-आँगन नाच!
मयूरी,
नाच, मगन-मन नाच!

धरणी पर छाई हरियाली,
सजी कलि-कुसुमों से डाली;
मयूरी, मधुवन-मधुवन नाच!
मयूरी,
नाच, मगन-मन नाच!

समीरण सौरभ सरसाता,
घुमड़ घन मधुकण बरसाता;
मयूरी, नाच मदिर-मन नाच!
मयूरी,
नाच, मगन-मन नाच!

निछावर इंद्रधनुष तुझ पर,
निछावर, प्रकृति-पुरुष तुझ पर,
मयूरी, उन्‍मन-उन्‍मन नाच!
मयूरी, छूम-छनाछन नाच!
मयूरी, नाच, मगन-मन नाच!

दूसरा रंग

1. अभावों की रागिनी

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

हास लहरों का सतह को
छोड़ तह में सो गया है,
गान विहगों का उतर तरु-
पल्लवों में खो गया है,

छिप गई है जा क्षितिज पर
वायु चिर चंचल दिवस की,
बन्द घर-घर में शहर का
शोर सारा हो गया है,

पहूँच नीड़ों में गए
पिछड़े हुए दिग्भ्रान्त खग भी,
किन्तु ध्वनि किसकी गगन में
अब तलक मण्डरा रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

चीर किसके कण्ठ को यह
उठ रही आवाज़ ऊपर,
दर न दीवारें जिसे हैं
रोक सकतीं, छत न छप्पर,

जो बिलमती है नहीं नभ-
चुम्बिनी अट्टालिका में,
हैं लुभा सकते न जिसको
व्योम के गुम्बद मनोहर,

जो अटकती है नहीं
आकाश-भेदी घनहरों में,
लौट बस जिसकी प्रतिध्वनि
तारकों से आ रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

बोल, ऐ आवाज़, तू किस
ओर जाना चाहती है,
दर्द तू अपना बता
किसको जताना चाहती है,

कौन तेरा खो गया है
इस अंधेरी यामिनी में,
तू जिसे फिर से निकट
अपने बुलाना चाहती है,

खोजती फिरती किसे तू
इस तरह पागल, विकल हो,
चाह किसकी है तुझे जो
इस तरह तड़पा रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

बोल, क्या तू थक गई है
विश्व को विनती सुनाते,
बोल, क्या तू थक गई है
विश्व से आशा लगाते,

क्या सही अपनी उपेक्षा
अब नहीं जाती जगत से,
बोल क्या ऊबी परीक्षा
धैर्य की अपनी कराते,

जो कि खो विश्वास पूरा
विश्व की संवेदना में,
स्वर्ग को अपनी व्यथाएँ
आज तू बतला रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

अनसुनी आबाज़ जो
संसार में होती रही है,
स्वर्ग में भी साख अपना
वह सदा खोती रही है,

स्वर्ग तो कुछ भी नहीं है
छोड़कर छाया जगत की,
स्वर्ग सपने देखती दुनिया
सदा सोती रही है,

पर किसी असहाय मन के
बीच बाकी एक आशा
एक बाकी आसरे का
गीत गाती जा रही है;

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

पर अभावों की अरी जो
रागिनी, तू कब अकेली,
तान मेरे भी हृदय की,
ले, बनी तेरी सहेली,

हो रहे, होंगे ध्वनित
कितने हदय यों साथ तेरे,
तू बुझाती, बुझती जाती
युगों से यह पहेली-

"एक ऐसा गीत गाया
जो सदा जाता अकेले,
एक ऐसा गीत जिसको
सृष्टि सारी गा रही है;"

कौन गाता है कि सोई
पीर जागी जा रही है!

2. अन्धेरे का दीपक

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कम-
नीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ ने जिसमें
वितानो को तना था,

स्वप्न ने अपने करों से
था जिसे रुचि से सँवारा,
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों
से, रसों से जो सना था,

ढह गया वह तो जुटाकर
ईंट, पत्थर, कंकडों को,
एक अपनी शांति की
कुटिया बनाना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया
गया नभ-नील नीलम,
का बनाया था गया
मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,

प्रथम ऊषा की नवेली
लालिमा-सी लाल मदिरा,
थी उसी में चमचमाती
नव घनों में चंचला सम,

वह अगर टूटा हथेली
हाथ की दोनों मिला कर,
एक निर्मल स्रोत से
तृष्णा बुझाना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी
चिंता नहीं थी पास आई,
कालिमा तो दूर, छाया भी
पलक पर थी न छाई,

आँख से मस्ती झपकती,
बात से मस्ती टपकती,
थी हँसी ऐसी जिसे सुन
बादलों ने शर्म खाई,

वह गई तो ले गई
उल्लास के आधार माना,
पर अथिरता की समय पर
मुस्कुराना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके
कि जिनमें राग जागा,
वैभवों से फेर आँखें
गान का वरदान मांगा

एक अंतर से ध्वनित हों
दूसरे में जो निरन्तर,
भर दिया अंबर अवनि को
मत्तता के गीत गा-गा,

अंत उनका हो गया तो
मन बहलाने के लिये ही,
ले अधूरी पंक्ति कोई
गुनगुनाना कब मना है?

है अन्धेरी रात, पर
दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे साथी की चुम्बक-
लौह-से जो पास आए,
पास क्या आए, कि हृदय के
बीच ही गोया समाए,

दिन कटे ऐसे कि कोई
तार वीणा के मिलाकर,
एक मीठा और प्यारा
ज़िन्दगी का गीत गाए,

वे गए तो सोच कर ये
लौटने वाले नहीं वे,
खोज मन का मीत कोई
लौ लगाना कब मना है?

है अन्धेरी रात, पर
दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थी कि उजड़ा
प्यार का वह आशियाना,
कुछ न आया काम तेरा
शोर करना, गुल मचाना,

नाश की उन शक्तियों के
साथ चलता ज़ोर किसका?
किंतु ऐ निर्माण के प्रतिनिधि,
तुझे होगा बताना,

जो बसे हैं वे उजड़ते हैं
प्रकृति के जड़ नियम से
पर किसी उजड़े हुए को
फिर बसाना कब मना है?

है अन्धेरी रात पर
दीवा जलाना कब मना है?

3. यात्रा और यात्री

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता,

पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता,

शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हु‌ए है;
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर!

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था,
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था,

घास मखमल-सी जहाँ थी
मन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था,

पग परीक्षा, पग प्रलोभन
ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
इस तरफ डटना उधर
ढलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते,
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते,

शुक्रिया उनका कि वे
पथ को रहे प्रेरक बना‌ए,
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लि‌ए मजबूर करते,

और जो उत्साह का
देते कलेजा चीर, ऐसे
कंटकों का दल तुझे
दलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भी
तारिका‌ओं को जगाना,

एक झोंके ने बुझाया
हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना,

एक कोने में हृदय के
आग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझे
जलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है,
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है;

यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहया‌ई,
साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है

सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है,
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफ़िर;

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफ़िर!

4. पथ की पहचान

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले

पुस्तकों में है नहीं छापी
गई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की ज़बानी,

अनगिनत राही गए इस राह
से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी,

यह निशानी मूक होकर भी
बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी,
पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर
सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे,

किस जगह यात्रा ख़तम हो
जाएगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित कब सुमन, कब
कंटकों के शर मिलेंगे

कौन सहसा छूट जाएँगे,
मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा
तू न, ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

कौन कहता है कि स्वप्नों
को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें
अपनी उमर, अपने समय में,

और तू कर यत्न भी तो,
मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ
ध्येय नयनों के निलय में,

किन्तु जग के पंथ पर यदि,
स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,
सत्य का भी ज्ञान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

स्वप्न आता स्वर्ग का,
दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को,
ललकती उन्मुक्त छाती,

रास्ते का एक काँटा,
पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं,
एक दुनिया डूब जाती,

आँख में हो स्वर्ग लेकिन,
पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी
सीख का सम्मान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा,
व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना,

तू इसे अच्छा समझ,
यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना,

हर सफल पंथी यही विश्वास
ले इस पर बढ़ा है,
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।

5. नन्दन और बगिया

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

कहाँ गया वह मधुवन जिसकी
आभा-शोभा नित्य नई थी,
जिसके आँगन में वासन्ती
आकर जाना भूल गई थी,

जिसमें खिलती थीं इच्छा की
कलियाँ, अभिलाषा फलती थी,
साँसों में भरती मादकता
वायु जहाँ की मोदमयी थी,

यह सूखा तो आंसू से क्या,
हृदय-रक्त से हरा न होगा,
सूख-सूख फिर-फिर लहराता
वसुधा का ही अंचल धानी।

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

दिग्दिगंत में गुंजित होने-
वाला स्वर पड़ मंद गया क्यों ?
जुड़ा हुआ शब्दों-भावों से
खण्ड-खण्ड हो छन्द गया क्यों ?

गाती थीं नन्दन की परियाँ,
राग मिला तू भी गाता था,
बन्द हुए यदि उनके गायन,
गाना तेरा बन्द हुआ क्यों?

प्रेरित होने वाले मन की
प्रेरक शक्ति अकेली कब थी,
मूक पड़े गंधर्वों के सुर,
कूक रही कोयल मस्तानी;

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

उस मधुवन का स्वप्न भला क्या
जहाँ नहीं पतझड़ आता है,
जहाँ सुमन अपने जोबन पर
आकर नहीं बिखर पाता है,

जहाँ ढुलकते नहीं कली की
आँखों से मोती के आँसू,
जहाँ नहीं कोकिल का व्याकुल
क्रन्दन गायन बन जाता है

मर्त्य अमर्त्यों के सपने से
धोका देता है अपने को,
अमरों के अमरण जीवन से
मादक मेरी क्षणिक जवानी;

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

धन्यवाद दे, नन्दन के मिटने
से तूने धरती देखी,
जड़ दुनिया के बदले तूने
दुनिया जीती-मरती देखी,

वह मन की मूरत थी, उसमें
प्राण कहाँ थे, ओ दीवाने,
यह दुनिया तूने साँसों पर
दबती और उभरती देखी,

स्वप्न हृदय मथकर मिलते हैं,
मूल्य बड़ा उनका, तिसपर भी,
एक सत्य के ऊपर होती
सो-सौ सपनों की कुर्बानी;

सोच न कर सूखे नन्दन का,
देता जा बगिया में पानी !

6. जो बीत गई

जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में एक सितारा था,
माना, वह बेहद प्‍यारा था,
वह डूब गया तो डूब गया;
अंबर के आनन को देखे,
कितने इसके तारे टूटे,
कितने छूट गए कहाँ मिले;
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है!
जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में वह था एक कुसुम,
थे उस पर नित्‍य निछावर तुम,
वह सूख गया तो सूख गया;
मधुवन की छाती को देखो,
सूखी कितनी इसकी कलियाँ,
मुरझाई कितनी वल्‍लरियाँ,
जो मुरझाई फिर कहाँ खिलीं;
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है;
जो बीत गई सो बात गई!

जीवन में मधु का प्‍याला था,
तुमने तन-मन दे डाला था,
वह टूट गया तो टूट गया;
मदिरालय का आँगन देखो,
कितने प्‍याले हिल जाते हैं,
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं,
जो गिरते हैं कब उठते हैं;
पर बोलो टूटे प्‍याले पर
कब मदिरालय पछताता है!
जो बीत गई सो बात गई!

मृदु मिट्टी के हैं बने हुए,
मधुघट फूटा ही करते हैं,
लघु जीवन लेकर आए हैं,
प्‍याले टूटा ही करते हैं,
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट हैं, मधुप्‍याले हैं,
जो मादकता के मारे हैं,
वे मधु लूटा ही करते हैं;
वह कच्‍चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट-प्‍यालों पर,
जो सच्‍चे मधु से जला हुआ
कब रोता है, चिल्‍लाता है!
जो बीत गई सो बात गई!

7. कामना

संक्रामक शिशिर समीरण छू
जब मधुवन पीला पड़ जाता,
जब कुसुम-कुसुम, जब कली-कली
गिर जाती, पत्ता झड़ जाता,

तब पतझड़ का उजड़ा आँगन
करुणा-ममतामय स्वर वाली
जो कोकिल मुखरित रखती है
तेरे मन को भी बहलाए!

जब ताप भरा, जब दाप भरा
दुख-दीर्घ दिवस ढल चुकता है,
जब अंग-अंग, जब रोम-रोम
वसुधातल का जल चुकता है,

तब शीतल, कोमल, स्नेह भरी
जो शशि किरणें चुपके-चुपके
पृथ्वी पर छाती सहलातीं,
तेरे छाले भी सहलाएँ?

जब प्यास-प्यास कर धरती का
पौधा-पौधा मुर्झाता है,
जब बूँदबूँद को तरस-तरस
तिनका-तिनका मर जाता है,

तब नव जलधर की जो बूंदें
बरसातीं भू पर हरियाली,
तेरे मानस के अन्दर भी
अशा के अंकुर उकसाएँ !

प्रलयांधकार से घिर-घिर कर
युग-युग निश्चल सोने पर भी
युग-युग चेतनता के सारे
लक्षण-लक्षण खोने पर भी

जो सहसा पड़ती जाग राग,
रस, रंगों की प्रतिमा बनकर
वह तुझे मृत्यु की गोदी में
जीवन के सपने दिखलाए!

तीसरा रंग

1. प्रतिकूल

बहती है वासन्ती बयार,

पर एक पेड़ शाखावशेष
कर सांध्य गगन को पृष्ठभूमि
है खड़ा हुआ अविचल उदास,
कोकिल के स्वर से उदासीन;

है सोच रहा मन में मानो
उन मरकत पत्रों की बातें,
जो ऋतु-ऋतु मरमर ध्वनि करते
उसकी डाली-डाली झूले,
उन कलियों की, उन कुसुमों की,
जो उसकी गोद में फूले,
जो पड़ पीले, सूखे ढीले
गिर गए, झड़े, औ' फिर न उठे !

जब उसे उचित, हो परिस्फुटित
शत-शत अंकुर में मृदुल-मृदुल !
पड़ती है पावस की फुहार,

पर वसुन्धरा का एक भाग
है लुटा हुआ जिसका सुहाग,
खल्वाटों-सा जिसका ललाट,
है पड़ा चटानों-सा अचेत,

है सोच रहा मन में मानो
उन कोमल-कोमल हरे-हरे
लघु-लघु तृण-पौधों की बातें,
जिनकी मखमल-सी शैया पर
मलयानिल करवट लेता था,
आशीष-दुआएँ देता था,
जो ग्रीष्पातप में जल जलकर
ऐसे सूखे फिर उग न सके!

जब उसे उचित, हो नव सज्जित
हरियाली से मंजुल-मंजुल !
आती है जीवन की पुकार,

पर मानवता का एक सजग
प्रतिनिधि सुधियों के खंडहर में
है बैठा चिंता में निमग्न
कर अपने दोनों कान बंद;

है सोच रहा मन में मानो
उन मादक स्वप्नों की बातें,
जिनमें इच्छाएँ मूर्तिमान
हो सहसा अंतर्धान हुईं,
उन मधुर सूरतों की बातें,
जो मन-मंदिर में विहँस-खेल
औ' पल भर चहल-पहल करके
हो लुप्त गई औ’ फिर न मिलीं !
जब उसे उचित, हो प्रतिध्वनित
उसके प्रति स्वर पर पुलकाकूल ।

2. सम्मानित

पथ में भरी गई कठिनाई,
मंज़िल तेरे पास न आई,
(नहीं शत्रुता थी यह तुझसे)
क्योंकि चला था तू ले करके
कभी नहीं रुकने की आन ।

रवि ने तुमको पथ न दिखाया,
झंझा ने कर-दीप बुझाया,
(नहीं उपेक्षा थी यह तेरी)
क्योंकि जगत में एक तुझे था,
अपनी ज्वाला का अभिमान ।

ऊँचा तूने हाथ उठाया,
लेकिन अपना लक्ष्य न पाया,
(यह तेरा उपहास नहीं था)
क्योंकि तुझे थी केवल अपने
मनुजोचित कद की पहचान !

अमर वेदनाओं से अन्तर
मथा गया तेरा निशि-वासर,
(यह तुझपर अन्याय नहीं था)
क्योंकि यही था सबसे बढ़कर
तेरी छाती का सम्मान !

3. अजेय

अजेय तू अभी बना!

न मंजिलें मिलीं कभी,
न मुश्किलें हिलीं कभीं,
मगर क़दम थमें नहीं,
क़रार-क़ौल जो ठना।
अजेय तू अभी बना।

सफल न एक चाह भी,
सुनी न एक आह भी,
मगर नयन भुला सके
कभी न स्‍वप्‍न देखना।
अजेय तू अभी बना!

अतीत याद है तुझे,
कठिन विषाद है तुझे,
मगर भविष्‍य से रूका
न अँखमुदौल खेलना।
अजेय तू अभी बना!

सुरा समाप्‍त हो चुकी,
सुपात्र-माल खो चुकी,
मगर मिटी, हटी, दबी
कभी न प्‍यास-वासना।
अजेय तू अभी बना!

पहाड़ टूटकर गिरा,
प्रलय पयोद भी घिरा,
मनुष्‍य है कि देव है
कि मेरुदंड है तना!
अजेय तू अभी बना!

4. अधिकारी

तू तिमिर में धँस चुका है,
तू तिमिर में बस चुका है,
इसलिए तेरे नयन को
ज्योति का जादू समझने
का मिला अधिकार ।

तू उपेक्षा सह चुका है,
तू घृणा में दह चुका है,
इसलिए तेरा हृदय ही
जान सकता है कभी
वरदान क्या है प्यार !

प्रतिध्वनित करता रहा है
शून्य जो तूने कहा है,
इसलिए तुझको प्रणय की
एक दिन देगी सुनाई
दुर्निवार पुकार ।

कपट के कटु पाश में फंस
तू लुटा था, इसलिए बस
तू बताएगा कि कैसे
स्नेह-बंधन खोलते हैं
मुक्ति का नव द्वार ।

5. प्रत्याशा

किया गया मधुवन को विह्वल,
टूटा तरुओँ का दल, प्रतिदल,
फाड़ा गया कुसुम का दामन,
चीरा गया कली का अंचल,
क्योंकि कोकिला की वाणी में
थी वह शक्ति कि जिसके द्वारा
मृत मधुवन को दे सकती थी
फिर से वह जीवन का दान ।

मिला सूर्य को देश-निकाला,
हरा गया जग का उजियाला,
बहुरंगी दुनिया के ऊपर
फैला तम का परदा काला,
क्योंकि उषा के नवल हास में
थी वह शक्ति कि जिसके द्वारा
तिपिरावृत जग पर वह फिर से
ला सकती थी स्वर्ण विहान ।

दुनिया गई जलाई तेरी,
दुनिया गई मिटाई तेरी,
सोने का संसार जहाँ था,
वहाँ लगी मिट्टी की ढेरी,
क्योंकि हृदय के अन्दर तेरे
थी यह शक्ति कि जिसके द्वारा
महानाश की छाती पर तू
कर सकता था नव निर्माण ।

6. चेतावनी

मानी, देख न का नादानी!

मातम का तम छाया, माना,
अन्तिम सत्य इसे यदि जाना,
तो तूने जीवन की अब तक आधी- सुनी कहानी!
मानी, देख न कर नादानी!

सुन यदि तूने आशा छोड़ी,
तो अपनी परिभाषा छोड़ी,
तुझे मिली थी यह अमरों की केवल एक निशानी ।
मानी, देख न कर नादानी!

ध्वंसों में यदि सिर न उठाया,
सर्जन का यदि गीत न गाया,
स्वर्ग लोक की आशाओं पर फिर जाएगा पानी ।
मानी, देख न कर नादानी!

7. निर्माण (नीड़ का निर्माण)

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में,
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों नें
भूमि को भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्‍पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहनी मुसकान फिर-फिर,

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलों पर क्‍या न बीती,
डगमगाए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्‍थर के महल-घर;

बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;

एक चिड़िया चोंच में तिनका
लिए जो गा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्‍तब्‍धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्वान फिर-फिर!

चौथा रंग

1. दो नयन

दो नयन जिससे कि फिर मैं
विश्‍व का श्रृंगार देखूँ।

स्‍वप्‍न की जलती हुई नगरी
धुआँ जिसमें गई भर,
ज्‍योति जिनकी जा चुकी है
आँसुओं के साथ झर-झर,

मैं उन्‍हीं से किस तरह फिर
ज्‍योति का संसार देखूँ,
दो नयन जिससे कि फिर मैं
विश्‍व का श्रृंगार देखूँ।

देखते युग-युग रहे जो
विश्‍व का वह रुप अल्‍पक,
जो उपेक्षा, छल घृणा में
मग्‍न था नख से शिखा तक,

मैं उन्‍हीं से किस तरह फिर
प्‍यार का संसार देखूँ,
दो नयन जिससे कि फिर मैं
विश्‍व का श्रृंगार देखूँ।

संकुचित दृग की परिधि थी
बात यह मैं मान लूँगा,
विश्‍व का इससे जुदा जब
रुप भी मैं जान लूँगा,

दो नयन जिससे कि मैं
संसार का विस्‍तार देखूँ;
दो नयन जिससे कि फिर मैं
विश्‍व का श्रृंगार देखूँ।

2. प्यार और संघर्ष

प्यार को संघर्ष मत, सुन्दरि, बनाओ!

अँखमिचौनी खेलती हो खूब खेलो,
खोज लूँगा, तुम कहीं भी आड़ ले लो,
खेल कब होगा ख़तम, यह तो बताओ,
प्यार को संघर्ष मत, सुन्दरि, बनाओ!

खेल कल का हो गया संग्राम, देखो
कुछ नहीं खोया, अगर परिणाम देखो,
जीत जाओगी अगर तुम हार जाओ,
प्यार को संघर्ष मत, सुन्दरि, बनाओ!

प्रीति पुर में हैं हुए बंदी विजित कब,
बन्धनों में बाँध लो, कर लो विजय तब,
यह न मानो, एक मानी को गंवाओ,
प्यार को संघर्ष मत, सुन्दरि, बनाओ!

प्रेरणा पर्याप्त थी मुझको हृदय की,
तुम समझती हो नहीं भाषा प्रणय की,
यह समय का व्यँग था-तुम दूर जाओ,
प्यार को संघर्ष मत, सुन्दरि, बनाओ!

जिस तरह शिशिरान्त में कंकाल तरु पर
फैलती पत्रावली सहसा विहँसकर,
वृक्ष-जीवन में अगर तुम इस तरह से
आ नहीं सकतीं सहज ही तो न आओ
प्यार को संघर्ष मत, सुन्दरि, बनाओ!

3. नई झनकार

छू गया है कौन मन के तार,
वीणा बोलती है!
मौन तम के पार से यह कौन
तेरे पास आया,
मौत में सोए हुए संसार
को किसने जगाया,
कर गया है कौन फिर भिनसार,
वीणा बोलती है;
छू गया है कौन मन के तार,
वीणा बोलती है!

रश्मियों ने रंग पहन ली आज
किसने लाल सारी,
फूल-कलियों से प्रकृति की माँग
है किसकी सँवारी,
कर रहा है कौन फिर श्रृंगार,
वीणा बोलती है;
छू गया है कौन मन के तार,
वीणा बोलती है!
लोक के भय ने भले ही रात
का हो भय मिटाया,
किस लगन में रात दिन का भेद
ही मन से हटाया,
कौन करता है खुले अभिसार,
वीणा बोलती है;
छू गया है कौन मन के तार,
वीणा बोलती है!

तू जिसे लेने चला था भूल-
कर अस्तित्‍व अपना,
तू जिसे लेने चला था बेच-
कर अपनत्‍व अपना,
दे गया है कौन वह उपहार
वीणा बोलती है;
छू गया है कौन मन के तार,
वीणा बोलती है!

जो करुण विनती मधुर मनुहार
से न कभी पिघलते,
टूटते कर, फूट जाते शीश
तिल भर भी न हिलते,
खुल कभी जाते स्‍वयं वे द्वार,
वीणा बोलती है;
छू गया है कौन मन के तार,
वीणा बोलती है!

भूल तू जा अब पुराना गीत
औ' गाथा पुरानी,
भूल जा तू अब दुखों का राग
दुर्दिन की कहानी,
ले नया जीवन, नई झनकार,
वीणा बोलती है;
छू गया है कौन मन के तार,
वीणा बोलती है!

पाँचवां रंग-सातवां रंग

1. मुझे पुकार लो

इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो!

ज़मीन है न बोलती,
न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे
नहीं ज़बान खोलता,
नहीं जगह कहीं जहाँ
न अजनबी गिना गया,
कहाँ-कहाँ न फिर चुका
दिमाग-दिल टटोलता;
कहाँ मनुष्‍य है कि जो
उमीद छोड़कर जिया,
इसीलिए अड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो;
इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो;

तिमिर-समुद्र कर सकी
न पार नेत्र की तरी,
वि‍नष्‍ट स्‍वप्‍न से लदी,
विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला,
न कोर भेर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी
विरह-घिरी विभावरी;
कहाँ मनुष्‍य है जिसे
कमी खली न प्‍यार की,
इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे दुलार लो!
इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो!

उजाड़ से लगा चुका
उमीद मैं बाहर की,
निदाघ से उमीद की,
वसंत से बयार की,
मरुस्‍थली मरीचिका
सुधामयी मुझे लगी,
अँगार से लगा चुका
उमीद मैं तुषार की;
कहाँ मनुष्‍य है जिसे
न भूल शूल-सी गड़ी,
इसीलिए खड़ा रहा
कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खड़ा रहा
कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार कर दुलार लो,
दुलार कर सुधार लो!

2. कौन तुम हो?

ले प्रलय की नींद सोया
जिन दृगों में था अँधेरा,
आज उनमें ज्‍योति बनकर
ला रही हो तुम सवेरा,
सृष्टि की पहली उषा की
यदि नहीं मुसकान तुम हो,
कौन तुम हो?

आज परिचय की मधुर
मुसकान दुनिया दे रही है,
आज सौ-सौ बात के
संकेत मुझसे ले रही है
विश्‍व से मेरी अकेली
यदि नहीं पहचान तुम हो,
कौन तुम हो?

हाय किसकी थी कि मिट्टी
मैं मिला संसार मेरा,
हास किसका है कि फूलों-
सा खिला संसार मेरा,
नाश को देती चुनौती
यदी नहीं निर्माण तुम हो,
कौन तुम हो?

मैं पुरानी यादगारों
से विदा भी ले न पाया
था कि तुमने ला नए ही
लोक में मुझको बसाया,
यदि नहीं तूफ़ान तुम हो,
जो नहीं उठकर ठहरता
कौन तुम हो?

तुम किसी बुझती चिता की
जो लुकाठी खींच लाती
हो, उसी से ब्‍याह-मंडप
के तले दीपक जलाती,
मृत्‍यु पर फिर-फिर विजय की
यदि नहीं दृढ़ आन तुम हो,
कौन तुम हो?

यह इशारे हैं कि जिन पर
काल ने भी चाल छोड़ी,
लौट मैं आया अगर तो
कौन-सी सौगंध तोड़ी,
सुन जिसे रुकना असंभव
यदि नहीं आह्वान तुम हो,
कौन तुम हो?

कर परिश्रम कौन तुमको
आज तक अपना सका है,
खोजकर कोई तुम्‍हारा
कब पता भी पा सका है,
देवताओं का अनिश्चित
यदि नहीं वरदान तुम हो,
कौन तुम हो?

3. तुम गा दो

तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!
मेरे वर्ण-वर्ण विश्रृंखल,
चरण-चरण भरमाए,
गूँज-गूँजकर मिटने वाले
मैंने गीत बनाए;
कूक हो गई हूक गगन की
कोकिल के कंठों पर,
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!

जब-जब जग ने कर फैलाए,
मैंने कोष लुटाया,
रंक हुआ मैं निज निधि खोकर
जगती ने क्‍या पाया!
भेंट न जिसमें मैं कुछ खोऊँ
पर तुम सब कुछ पाओ,
तुम ले लो, मेरा दान अमर हो जाए!
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!

सुंदर और असुंदर जग में
मैंने क्‍या न सराहा,
इतनी ममतामय दुनिया में
मैं केवल अनचाहा;
देखूँ अब किसकी रुकती है
आ मुझपर अभिलाषा,
तुम रख लो, मेरा मान अमर हो जाए!
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!

दुख से जिवन बीता फिर भी
शेष अभी कुछ रहता,
जीवन की अंतिम घड़ियों में
भी तुमसे यह कहता,
सुख की एक साँस पर होता
है अमरत्‍व निछावर,
तुम छू दो, मेरा प्राण अमर हो जाए!
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!

4. नया वर्ष

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।

नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

5. नव दर्शन

दर्श नवल,
स्पर्श नवल,
जीवन- आकर्ष नवल,
जीवन- आदर्श नवल,
वर्ण नवल
वेश नवल,
जीवन उन्मेष नवल
जीवन-सन्देश नवल ।
प्राण नवल,
हृदय नवल,
जीवन की प्रणति नवल,
जीवन में प्रणय नवल ।

6. एक दाह

दाह एक
आह एक
जीवन की त्राहि एक ।
प्यास एक,
त्रास एक,
जीवन इतिहास एक ।
आग एक,
राग एक,
जीवन का भाग एक ।
तीर एक,
पीर एक,
नयनों में नीर एक,
जीवन-ज़ंजीर एक ।

7. एक स्नेह

एक पलक
एक झलक,
दो मन में एक ललक ।
एक पास,
एक पहर,
दो मन में एक लहर ।
एक रात,
एक साथ,
दो मन में एक बात ।
एक गेह,
एक देह,
दो मन में एक स्नेह ।

8. नवल प्रात

नवल हास,
नवल बास,
जीवन की नवल साँस ।
नवल अंग,
नवल रंग,
जीवन का नवल संग ।
नवल साज,
नवल सेज,
जीवन में नवल तेज ।
नवल नींद,
नवल प्रात,
जीवन का नव प्रभात,
कमल नवल किरण-स्नात ।

9. प्रेम

भूल नहीं,
शूल नहीं,
चिन्ता की मूल नहीं।
चाल नहीं,
जाल नहीं,
दुर्दिन की माल नहीं ।
पाप नहीं,
शाप नहीं,
संकट-संताप नहीं ।
प्रेम अजर, प्रेम अमर
जो कुछ भी सुंदरतर
जगती में, जीवन में
लाता है मंथन कर,
मंथन से सिहर-सिहर
उठते हैं नारी-नर !

10. काल

कल्प-कल्पान्तर मदांध समान,
काल, तुम चलते रहे अनजान,
आ गया जो भी तुम्हारे पास,
कर दिया तुमने उसे बस नाश ।

मिटा क्या-क्या छू तुम्हारा हाथ,
यह किसी को भी नहीं है ज्ञात,
किन्तु अब तो मानवों की आँख
सजग प्रतिपल, घड़ी, वासर, पाख,

उल्लिखित प्रति पग तुम्हारी चाल,
उल्लिखित हर एक पल का हाल,
अब नहीं तुम प्रलय के जड़ दास,
अब तुम्हारा नाम है इतिहास !

ध्वंस की अब हो न शक्ति प्रचण्ड,
सभ्यता के वृद्धि-मापक दण्ड !
नाश के अब हो न गर्त महान,
प्रगतिमय संसार के सोपान !

तुम नहीं करते कभी कुछ नष्ट
जन्मती जिससे नहीं नव सृष्टि,
किन्तु यदि करते कभी बर्बाद
कुछ कि जो सुन्दर, सुमधुर, अनूप,

मानवों की चमत्कारी याद
है बनाती एक उसका रूप
और सुन्दर और मधुमय, पूत,
जानता है जो भविष्य न भूत,
सब समय रह वर्तमान समान
विश्व का करता सतत कल्याण !

11. कर्तव्‍य

देवि, गया है जोड़ा यह जो
मेरा और तुम्‍हारा नाता,
नहीं तुम्‍हारा मेरा केवल,
जग-जीवन से मेल कराता।

दुनिया अपनी, जीवन अपना,
सत्‍य, नहीं केवल मन-सपना;
मन-सपने-सा इसे बनाने
का, आओ, हम तुम प्रण ठानें।

जैसी हमने पाई दुनिया,
आओ, उससे बेहतर छोड़ें,
शुचि-सुंदरतर इसे बनाने
से मुँह अपना कभी न मोड़ें।

क्‍योंकि नहीं बस इससे नाता
जब तक जीवन-काल हमारा,
खेल, कूद, पढ़, बढ़ इसमें ही
रहने को है लाल हमारा।

12. विश्‍वास

पंथ जीवन का चुनौती
दे रहा है हर कदम पर,
आखिरी मंजिल नहीं होती
कहीं भी दृष्टिगोचर,

धूलि में लद, स्‍वेद में सिंच
हो गई है देह भारी,
कौन-सा विश्‍वास मुझको
खींचता जाता निरंतर?-

पंथ क्‍या, पंथ की थकान क्‍या,
स्‍वेद कण क्‍या,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं।

एक भी संदेश आशा
का नहीं देते सितारे,
प्रकृति ने मंगल शकुन पथ
में नहीं मेरे सँवारे,

विश्‍व का उत्‍साहव र्धक
शब्‍द भी मैंने सुना कब,
किंतु बढ़ता जा रहा हूँ
लक्ष्‍य पर किसके सहारे?-

विश्‍व की अवहेलना क्‍या,
अपशकुन क्‍या,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं।

चल रहा है पर पहुँचना
लक्ष्‍य पर इसका अनिश्चित,
कर्म कर भी कर्म फल से
यदि रहा यह पांथ वंचित,

विश्‍व तो उस पर हँसेगा
खूब भूला, खूब भटका!
किंतु गा यह पंक्तियाँ दो
वह करेगा धैर्य संचित-

व्‍यर्थ जीवन, व्‍यर्थ जीवन की
लगन क्‍या,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं!

अब नहीं उस पार का भी
भय मुझे कुछ भी सताता,
उस तरफ़ के लोक से भी
जुड़ चुका है एक नाता,

मैं उसे भूला नहीं तो
वह नहीं भूली मुझे भी,
मृत्‍यु-पथ पर भी बढ़ूँगा
मोद से यह गुनगुनाता-

अंत यौवन, अंत जीवन का,
मरण क्‍या,
दो नयन मेरी प्रतीक्षा में खड़े हैं!

 
 
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