पदावली : संत मीरा बाई (भाग-2)

Padavali : Sant Meera Bai (Part-2)

1. कठण थयां रे माधव मथुरां जाई

कठण थयां रे माधव मथुरां जाई। कागळ न लख्यो कटकोरे॥टेक॥
अहियाथकी हरी हवडां पधार्या। औद्धव साचे अटक्यारे॥१॥
अंगें सोबरणीया बावा पेर्या। शीर पितांबर पटकोरे॥२॥
गोकुळमां एक रास रच्यो छे। कहां न कुबड्या संग अतक्योरे॥३॥
कालीसी कुबजा ने आंगें छे कुबडी। ये शूं करी जाणे लटकोरे॥४॥
ये छे काळी ने ते छे। कुबडी रंगे रंग बाच्यो चटकोरे॥५॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। खोळामां घुंघट खटकोरे॥६॥

2. कमल दल लीचमआं थे नाथ्यां काल भुजंग

कमल दल लीचमआं थे नाथ्यां काल भुजंग।।टेक।।
कालिन्दी दह नाग नक्यो काल फण फण निर्त अंत।
कूदां जल अन्तर णां डर्यौ को एक बाहु अणन्त।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, ब्रजवणितांरो कन्त।।

(काल=मृत्यु के समान भयंकर, भुजंग=साँप,
कालिया नाग, कालिन्दी=यमुना, निर्त=नृत्य,
णाँ डर्यो=डरा नहीं, ब्रजबणितांरो=ब्रज की
बनिताओं का, कन्त=पति)

3. करम गत टाराँ णाही टराँ

करम गत टाराँ णाही टराँ।।टेक।
सतबादी हरिचन्दा राजा, डोम घर णीराँ भराँ।
पांच पांडु री राणी द्रुपता, हाड़ हिमालाँ गराँ।
जाग कियाँ बलि लेण इन्द्रासण, जाँयाँ पातला पराँ।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर, बिखरूं अम्रित कराँ।।

(करमगत=भाग्य का लेखा, टाराँ णाही टराँ=टालने
पर नहीं टलता, डोम=भंगी, णीराँ=नीर,पानी, पाँडू=
पाण्डव, द्रुपता=द्रोपदी, हिमालाँ=हिमालय पर्वत,
जाग=यज्ञ।, इन्द्रासण=स्वर्ग का राज्य, बिखरूं=
विष को, अम्रित=अमृत)

4. कृष्ण करो जजमान

कृष्ण करो जजमान॥ प्रभु तुम॥टेक॥
जाकी किरत बेद बखानत। सांखी देत पुरान॥२॥
मोर मुकुट पीतांबर सोभत। कुंडल झळकत कान॥३॥
मीराके प्रभू गिरिधर नागर। दे दरशनको दान॥४॥

5. कृष्ण मंदिरमों मिराबाई नाचे

कृष्ण मंदिरमों मिराबाई नाचे तो ताल मृदंग रंग चटकी।
पावमों घुंगरू झुमझुम वाजे। तो ताल राखो घुंगटकी॥१॥
नाथ तुम जान है सब घटका मीरा भक्ति करे पर घटकी॥टेक॥
ध्यान धरे मीरा फेर सरनकुं सेवा करे झटपटको।
सालीग्रामकूं तीलक बनायो भाल तिलक बीज टबकी॥२॥
बीख कटोरा राजाजीने भेजो तो संटसंग मीरा हटकी।
ले चरणामृत पी गईं मीरा जैसी शीशी अमृतकी॥३॥
घरमेंसे एक दारा चली शीरपर घागर और मटकी।
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। जैसी डेरी तटवरकी॥४॥

6. करुणा सुणो स्याम मेरी, मैं तो होय रही चेरी तेरी

करुणा(करणाँ) सुणो स्याम मेरी, मैं तो होय रही चेरी तेरी॥
दरसण कारण भई बावरी बिरह-बिथा तन घेरी।
तेरे कारण जोगण हूंगी, दूंगी नग्र बिच फेरी॥
कुंज बन हेरी-हेरी॥
अंग भभूत गले म्रिघछाला, यो तप भसम करूं री।
अजहुं न मिल्या राम अबिनासी बन-बन बीच फिरूं री॥
रोऊं नित टेरी-टेरी॥
जन मीरा कूं गिरधर मिलिया दुख मेटण सुख भेरी।
रूम रूम साता भइ उर में, मिट गई फेरा-फेरी॥
रहूं चरननि तर चेरी॥

(करणाँ,करुणा=करुण प्रार्थना, चेरी=चेली,दासी, बिथा=
व्यथा, नग्र=नगर, म्रिघछाला=मृगछाला, भेरी=पहुँचाने
वाले, रूम-रूम=रोम रोम, साता=शांति, फेराफेरी=
आवागमन, तर=तले,नीचे)

7. कहाँ कहाँ जाऊं तेरे साथ, कन्हैया

कहाँ कहाँ जाऊं तेरे साथ, कन्हैया।।टेक।।
बिन्द्रावन की कुँज गलिन में, गहे लीनो मेरो हाथ।
दध मेरो खायो मटकिया फोरी, लीनो भुज भर साथ।
लपट झपट मोरी गागर पटकी, साँवरे सलोने लोने गात।
कबहुँ न दान लियो मनमोहन, सदा गोकल आत जात।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, जनम जनम के नाथ।।

(गहे लीनो=पकड़ लिया, दध=दही, भुज भर=बाहु
पाश में बाँध लिया, लोने=सुन्दर)

8. कहां गयोरे पेलो मुरलीवाळो

कहां गयोरे पेलो मुरलीवाळो। अमने रास रमाडीरे॥टेक॥
रास रमाडवानें वनमां तेड्या मोहन मुरली सुनावीरे॥१॥
माता जसोदा शाख पुरावे केशव छांट्या धोळीरे॥२॥
हमणां वेण समारी सुती प्रेहरी कसुंबळ चोळीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर चरणकमल चित्त चोरीरे॥४॥

9. कागळ कोण लेई जायरे

कागळ कोण लेई जायरे मथुरामां वसे रेवासी मेरा प्राण पियाजी॥टेक॥
ए कागळमां झांझु शूं लखिये। थोडे थोडे हेत जणायरे॥१॥
मित्र तमारा मळवाने इच्छे। जशोमती अन्न न खाय रे॥२॥
सेजलडी तो मुने सुनी रे लागे। रडतां तो रजनी न जायरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल तारूं त्यां जायरे॥४॥

10. काना चालो मारा घेर कामछे

काना चालो मारा घेर कामछे। सुंदर तारूं नामछे॥टेक॥
मारा आंगनमों तुलसीनु झाड छे। राधा गौळण मारूं नामछे॥१॥
आगला मंदिरमा ससरा सुवेलाछे। पाछला मंदिर सामसुमछे॥२॥
मोर मुगुट पितांबर सोभे। गला मोतनकी मालछे॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल चित जायछे॥४॥

11. काना तोरी घोंगरीया पहरी

काना तोरी घोंगरीया पहरी होरी खेले किसन गिरधारी॥१॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावत खेलत राधा प्यारी॥२॥
आली कोरे जमुना बीचमों राधा प्यारी॥३॥
मोर मुगुट पीतांबर शोभे कुंडलकी छबी न्यारी॥४॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर चरनकमल बलहारी॥५॥

12. कान्हा कानरीया पेहरीरे

कान्हा कानरीया पेहरीरे॥टेक॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे। खेल खेलकी गत न्यारीरे॥१॥
खेल खेलते अकेले रहता। भक्तनकी भीड भारीरे॥२॥
बीखको प्यालो पीयो हमने। तुह्मारो बीख लहरीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरण कमल बलिहारीरे॥४॥

13. कान्हा बनसरी बजाय गिरधारी

कान्हा बनसरी बजाय गिरधारी। तोरि बनसरी लागी मोकों प्यारीं॥टेक॥
दहीं दुध बेचने जाती जमुना। कानानें घागरी फोरी॥१॥
सिरपर घट घटपर झारी। उसकूं उतार मुरारी॥२॥
सास बुरीरे ननंद हटेली। देवर देवे मोको गारी॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल बलहारी॥४॥

14. कान्हो काहेकूं मारो मोकूं कांकरी

कान्हो काहेकूं मारो मोकूं कांकरी। कांकरी कांकरी कांकरीरे॥टेक॥
गायो भेसो तेरे अवि होई है। आगे रही घर बाकरीरे॥१॥
पाट पितांबर काना अबही पेहरत है। आगे न रही कारी घाबरीरे॥२॥
मेडी मेहेलात तेरे अबी होई है। आगे न रही वर छापरीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। शरणे राखो तो करूं चाकरीरे॥४॥

15. कायकूं देह धरी भजन बिन कोयकु देह धरी

कायकूं देह धरी भजन बिन कोयकु देह धरी ॥
गर्भवासकी त्रास देखाई धरी वाकी पीठ बुरी॥१॥
कोल बचन करी बाहेर आयो अब तूम भुल परि॥२॥
नोबत नगारा बाजे। बघत बघाई कुंटूंब सब देख ठरी॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। जननी भार मरी॥४॥

16. कारे कारे सबसे बुरे ओधव प्यारे

कारे कारे सबसे बुरे ओधव प्यारे॥टेक॥
कारेको विश्वास न कीजे अतिसे भूल परे॥१॥
काली जात कुजात कहीजे। ताके संग उजरे॥२॥
श्याम रूप कियो भ्रमरो। फुलकी बास भरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। कारे संग बगरे॥४॥

17. कालोकी रेन बिहारी

कालोकी रेन बिहारी। महाराज कोण बिलमायो॥टेक॥
काल गया ज्यां जाहो बिहारी। अही तोही कौन बुलायो॥१॥
कोनकी दासी काजल सार्यो। कोन तने रंग रमायो॥२॥
कंसकी दासी काजल सार्यो। उन मोहि रंग रमायो॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। कपटी कपट चलायो॥४॥

18. काहू की मै बरजी नाहीं रहूँ

काहू की मै बरजी नाहीं रहूँ ।।टेक।।
जो कोई मोकूँ एक कहै मैं एक की लाख कहूँ।
सास की जाइ मेरी ननद हठीली, यह दुःख किनसे कहूँ।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, जग उपसाह सहूँ।।

(बरजी=रोकने पर भी, जाई=पुत्री, उपहास=मजाक)

19. काँई म्हारो जमण बारम्बरा

काँई म्हारो जमण बारम्बर।
पूरबला कोई पुन्न खूँट्याँ माणसा अवतार।
बढ़्या छिण छिण घट्या पल पल, जात णा कछु बार।
बिरछरां जो पात टूट्या, लाया णा फिर डार।
भो समुन्द अपार देखां अगम ओखी धार।
लाल गिरधर तरण तारण, बेग करस्यो पार।
दासी मीराँ लाल गिरधर, जीवणा दिन च्यार।।

(काँई=कोई नहीं, पूरबल=पूर्व जन्म का, खूँट्याँ=
प्रकट हुआ, माणसा=मनुष्य का, बार=देर, बिरछराँ=
वृक्ष का, भो समुन्द=भवसागर, ओखी=विकट, तरण=
तरणी,नौका, वेग=शीघ्र, दिन च्यार=चार दिन,थोड़े
दिन के लिये)

20. किण सँग खेलूँ होली

किण सँग खेलूँ होली, पिया तज गये हैं अकेली।।टेक।।
माणिक मोती सब हम छोड़े गल में पहनी सेली।
भोजन भवन भलो नहिं लागै, पिया कारण भई गेली।
मुझे दूरी क्यूं म्हेली।
अब तुम प्रीत अवरू सूं जोड़ी हमसे करी क्यूं पहेली।
बहु दिन बीते अजहु न आये, लग रही तालाबेली।
किण बिलमाये हेली।
स्याम बिना जियड़ो सुरझावे, जैसे जल बिना बेली।
मीराँ कूँ प्रभु दरसण दीज्यो, जनम जनम को चेली।
दरस बिन खड़ी दुहेली।।

(सेली=माला, गेली=पागल, म्हेली=डाल दिया है,
पहेली=पहिली, तालाबेली=बेचैनी, बिलमाये=छोड़ना,
त्यागना, बेली=बेल,लता, दुहेली=दुःखी,दुखिया)

21. किन्ने देखा कन्हया प्यारा

किन्ने देखा कन्हया प्यारा की मुरलीवाला॥टेक॥
जमुनाके नीर गंवा चरावे। खांदे कंबरिया काला॥१॥
मोर मुकुट पितांबर शोभे। कुंडल झळकत हीरा॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरन कमल बलहारा॥३॥

22. कीत गयो जादु करके नो पीया

कीत गयो जादु करके नो पीया॥टेक॥
नंदनंदन पीया कपट जो कीनो। नीकल गयो छल करके॥१॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे। कबु ना मीले आंग भरके॥२॥
मीरा दासी शरण जो आई। चरणकमल चित्त धरके॥३॥

23. कीसनजी नहीं कंसन घर जावो

कीसनजी नहीं कंसन घर जावो। राणाजी मारो नही॥टेक॥
तुम नारी अहल्या तारी। कुंटण कीर उद्धारो॥१॥
कुबेरके द्वार बालद लायो। नरसिंगको काज सुदारो॥२॥
तुम आये पति मारो दहीको। तिनोपार तनमन वारो॥३॥
जब मीरा शरण गिरधरकी। जीवन प्राण हमारो॥४॥

24. कुण बांचे पाती

कुण बांचे पाती, बिना प्रभु कुण बांचे पाती।
कागद ले ऊधोजी आयो, कहां रह्या साथी।
आवत जावत पांव घिस्या रे (वाला) अंखिया भई राती॥
कागद ले राधा वांचण बैठी, (वाला) भर आई छाती।
नैण नीरज में अम्ब बहे रे (बाला) गंगा बहि जाती॥
पाना ज्यूं पीली पड़ी रे (वाला) धान नहीं खाती।
हरि बिन जिवणो यूं जलै रे (वाला) ज्यूं दीपक संग बाती॥
मने भरोसो रामको रे (वाला) डूब तिर्‌यो हाथी।
दासि मीरा लाल गिरधर, सांकडारो साथी॥

पाठांतर
कुण बाँचै पाती, बिना प्रभु कुण बाँचे पाती।
कागद ले ऊधौ आयो कहाँ रह्या साथी।
आवत जावत पाँव घिस्यारे(बाला) अँखियाँ भई राती।
कागद दे राधा बाँचण बैठी, भर आई छाती।
नैण नीरज में अब बहे रे (बाला), गंगा बहि जाती।
पाना ज्यूँ पीली पड़ी रे, (बाला), अन्न् नहिं खाती।
हरि बिन जिवड़ो यूँ जलै रे(बाला), ज्यूँ दीपक सँग बाती।
म्हने भरोसो राम को रे (बाला), डूबि तर्यो हाथी।
दास मीराँ लाल गिरधर, सांकड़ारो साथी ।।

(कुण=कौन, पाती=पत्र, साथी=कृष्ण, घिस्यारे=घिश
गये, बाला=प्रियतम, राती=लाल, भर आई छाती=
हृदय भर आया, नीरज=कमल, अम्ब=पानी, पाना=
पत्ता, जिवड़ो=हृदय, डूबी तर्यो हाथी=डूबते हुए
हाथी को उबारा, साँकड़ारो=संकट में, साथी=सहायक)

25. कुबजा ने जादु डारा

कुबजा ने जादु डारा।
मोहे लीयो शाम हमारारे॥
दिन नहीं चैन रैन नहीं निद्रा।
तलपतरे जीव हमरारे॥ १॥
निरमल नीर जमुनाजीको छांड्यो।
जाय पिवे जल खारारे॥ २॥
इत गोकुल उत मथुरा नगरी।
छोड्यायो पिहु प्यारा॥ ३॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे।
जीवन प्रान हमारा॥ ४॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर।
बिरह समुदर सारा॥
कुबजा ने जादू डारारे॥५॥

पाठांतर
कुबज्या ने जादू डारा री, जिन मोहै स्याम हमारा ।।टेक।।
झरमर झरमर मेहा बरसे, झुक आये बादल कारा।
निरमल जल जमुना को छाँड़ो, जाय पिया जल खारा।
सीतल छाँय कदम की छोड़ी धूप सहा अति भारा।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, वाही प्राण पियारा।।

(मोहै=मोहित करना)

26. कुंजबनमों गोपाल राधे

कुंजबनमों गोपाल राधे॥टेक॥
मोर मुकुट पीतांबर शोभे। नीरखत शाम तमाल॥१॥
ग्वालबाल रुचित चारु मंडला। वाजत बनसी रसाळ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनपर मन चिरकाल॥३॥

27. कैसी जादू डारी

कैसी जादू डारी। अब तूने कैशी जादु॥टेक॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडलकी छबि न्यारी॥१॥
वृंदाबन कुंजगलीनमों। लुटी गवालन सारी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलहारी॥३॥

28. कैसे जिऊँ री माई, हरि बिन कैसे जिऊ री

कैसे जिऊँ री माई, हरि बिन कैसे जिऊँ री ।।टेक।।
उदक दादुर पीनवत है, जल से ही उपजाई।
पल एक जल कूँ मीन बिसरे, तलफत मर जाई।
पिया बिन पीली भई रे, ज्यों काठ घुन खाय।
औषध मूल न संचरै, रे बाला बैद फिरि जाय।
उदासी होय बन बन फिरूँ, रे बिथा तन छाई।
दासी मीराँ लाल गिरधर, मिल्या है सुखदाई।।

(उदक=पानी, मीन=मछली, तलफत=तड़प कर,
बाला=वल्लभ,प्रियतम)

29. कोई कछु कहो रे रंग लाग्यो

कोई कछु कहो रे रंग लाग्यो, रंग लाग्यो भ्रम भाग्यो ।।टेक।।
लोक कहैं मीराँ भई बाबरी भ्रम दूनी ने खाग्यो।
कोई कहै रंग लाग्यो।
मीराँ साधाँ में यूँ रम बैठी, ज्यूँ गुदड़ी में तागो।
सोने में सुहागो।
मीराँ लूती अपने भवन में, सतगुरू आप जगाग्यो।
ज्ञानी गुरू आप जगाग्यो।।

(रंग=प्रेम, भ्रम=अज्ञान, दूनी=दुनिया, सूती=सोती थी)

30. कोई कहियौ रे प्रभु आवन की

कोई कहियौ रे प्रभु आवन की,
आवनकी मनभावन की।

आप न आवै लिख नहिं भेजै ,
बाण पड़ी ललचावन की।

ए दोउ नैण कह्यो नहिं मानै,
नदियां बहै जैसे सावन की।

कहा करूं कछु नहिं बस मेरो,
पांख नहीं उड़ जावनकी।

मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे,
चेरी भै हूँ तेरे दांवन की।

31. कोईकी भोरी वोलो म‍इंडो मेरो लूंटे

कोईकी भोरी वोलो म‍इंडो मेरो लूंटे॥टेक॥
छोड कनैया ओढणी हमारी। माट महिकी काना मेरी फुटे॥१॥
छोड कनैया मैयां हमारी। लड मानूकी काना मेरी तूटे॥२॥
छोडदे कनैया चीर हमारो। कोर जरीकी काना मेरी छुटे॥३॥
मीरा कहे प्रभू गिरिधर नागर। लागी लगन काना मेरी नव छूटे॥४॥

32. कोई दिन याद करो रमता राम अतीत

कोई दिन याद करो रमता राम अतीत।।टेक।।
आसण माड़ अडिग होय बैठा याही भजन की रीति।
मैं तो जाणूं संग चलेगा; छाँड़ि गया अधबीच।
आत न दीसे जात न दीसे, जोगी किसका मीत।
मीराँ कहे प्रभु गिरधरनागर, चरणन आवे चीत।।

(कोई दिन=किसी दिन,कभी न कभी, रमता=
घूमने-फिरने वाला, अतीत=निर्लिप्त,विरक्त,
आसण माड़=आसन लगाकर, अडिग=अचल,
चीत=चित)

33. कोई देखोरे मैया

कोई देखोरे मैया। शामसुंदर मुरलीवाला॥टेक॥
जमुनाके तीर धेनु चरावत। दधी घट चोर चुरैया॥१॥
ब्रिंदाजीबनके कुंजगलीनमों। हमकू देत झुकैया॥२॥
ईत गोकुल उत मथुरा नगरी। पकरत मोरी भय्या॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बजैया॥४॥

34. कोई स्याम मनोहर ल्योरी

कोई स्याम मनोहर ल्योरी, सिर धरे मटकिया डोले।।टेक।।
दधि को नाँव बिसर गई ग्वालन, हरिल्यो हरिल्यो बोलै।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, चेरी भई बिन मोलै।
कृष्ण रूप छकी है ग्वालिन, औरहि औरै बोलै।।

(नाँव=नाम, बिसर गई=भूल गई। हरिल्यौ=कृष्ण
ले लो, चेरी=दासी, मोलै=मोल,मूल्य, छकी=पूर्ण)

35. को विरहिणी को दुःख जाणै हो

को विरहिणी को दुःख जाणै हो ।।टेक।।
जा घट बिरहा सोई लख है, कै कोई हरि जन मानै हो।
रोगी अन्तर वैद बसत है, वैद ही ओखद जाणै हो।
विरह कद उरि अन्दर माँहि, हरि बिन सुख कानै हो।
दुग्धा आरत फिरै दुखारि, सुरत बसी सुत मानै हो।
चात्ग स्वाँति बूंद मन माँहि, पिव-पिव उकातणै हो।
सब जग कूडो कंटक दुनिया, दरध न कोई पिछाणै हो।
मीराँ के पति आप रमैया, दूजा नहिं कोई छाणै हो।।

पाठांतर
को विरहिनी को दुश जाँणे हो।।टेक।।
जा घट बिरहा सोइ लिखहै, कै कोइ हरिजन मानै हो।
रोगी अंतर बैद बसत है, बैद ही ओखद जाँणै हो।
बिरह दरद उरि अंतरि माँहि, हरि बिनि सब सुख कौनै हो।
दुगधा कारण फिरै दुखारी, सुरत बसी सुत मानै हो।
चात्रग स्वाति बूँद मन माँही, पीव पीव उकलाँणै ही।
सब जग कूड़ो कटंक दुनिया, दरध न कोई पिछाँणै ही।
मीराँ के प्रति आप रमैया, दूजो नहिं कोई छानै हो।।

(घट=ह्दय, हरिजन=हरि-भक्त, वैद=वैद्य, औखद=
औषधि, करद=क्टार, उर अन्तर आँहि=ह्दय में,
दुग्ध=दग्धा पीड़िता, आरत=आरत,दुःख, चातग=
चातक, उकलाणै=व्याकुल होना, दरध=दर्द,पीड़ा,
छाण=रक्षा करना, उर=हृदय, दुगधा=दूध देने वाली,
ब्याई हुई, सुरत=स्मृति, सुत मांनै=पुत्र में बछड़े,
चात्रक=चातक, उकलांणै हो=व्याकुल होता है, दुःख
झेलता, कंटक=काँटा,दुःख देने वाली)

36. कौन भरे जल जमुना

कौन भरे जल जमुना। सखी कौन भरे जल जमुना॥टेक॥
बन्सी बजावे मोहे लीनी। हरीसंग चली मन मोहना॥१॥
शाम हटेले बडे कवटाले। हर लाई सब ग्वालना॥२॥
कहे मीरा तुम रूप निहारो। तीन लोक प्रतिपालना॥३॥

37. क्या करूं मैं बनमें गई घर होती

क्या करूं मैं बनमें गई घर होती। तो शामकू मनाई लेती॥टेक॥
गोरी गोरी ब‍ईया हरी हरी चुडियां। झाला देके बुलालेती॥१॥
अपने शाम संग चौपट रमती। पासा डालके जीता लेती॥२॥
बडी बडी अखिया झीणा झीणा सुरमा। जोतसे जोत मिला लेती॥३॥
मीराबाई कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल लपटा लेती॥४॥

38. खबर मोरी लेजारे बंदा

खबर मोरी लेजारे बंदा जावत हो तुम उनदेस॥
हो नंदके नंदजीसु यूं जाई कहीयो। एकबार दरसन दे जारे॥१॥
आप बिहारे दरसन तिहारे। कृपादृष्टि करी जारे॥२॥
नंदवन छांड सिंधु तब वसीयो। एक हाम पैन सहजीरे।
जो दिन ते सखी मधुबन छांडो। ले गयो काळ कलेजारे॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। सबही बोल सजारे॥४॥

39. गली तो चारों बंद हुई, मैं हरिसे मिलूं कैसे जाय

गली तो चारों बंद हुई, मैं हरि से मिलूं कैसे जाय।
ऊंची नीची राह लपटीली, पांव नहीं ठहराय।
सोच सोच पग धरूं जतनसे, बार बार डिग जाय॥
ऊंचा नीचा महल पियाका म्हांसूं चढ़्‌यो न जाय।
पिया दूर पंथ म्हारो झीणो, सुरत झकोला खाय॥
कोस कोस पर पहरा बैठ्या, पैंड़ पैंड़ बटमार।
है बिधना, कैसी रच दीनी दूर बसायो म्हांरो गांव॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर सतगुरु दई बताय।
जुगन जुगन से बिछड़ी मीरा घर में लीनी लाय॥

40. गांजा पीनेवाला जन्मको लहरीरे

गांजा पीनेवाला जन्मको लहरीरे॥टेक॥
स्मशानावासी भूषणें भयंकर। पागट जटा शीरीरे॥१॥
व्याघ्रकडासन आसन जयाचें। भस्म दीगांबरधारीरे॥२॥
त्रितिय नेत्रीं अग्नि दुर्धर। विष हें प्राशन करीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभू ध्यानी निरंतर। चरण कमलकी प्यारीरे॥४॥

41. गिरधर रूसणुं जी कौन गुनाह

गिरधर रूसणुं जी कौन गुनाह।।टेक।।
कछु इक ओगुण काढ़ो म्हाँ छै, म्हैं भी कानाँ सुणा।
मैं दासी थारी जनम जनम की, थे साहिब सुगणाँ।
कांई बात सूं करवौ रूसणऊं, क्यां दुख पावौ छो मना।
किरपा करि मोहि दरसण दीज्यो, बीते दिवस घणाँ।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, थाँरो हो नाँव गणाँ।।

पाठांतर
गिरधर रीसाणा कौन गुणाँ।।टेक।।
कछुक औगुण हम मैं काढ़ो, मैं भी कान सुणाँ।
मैं तो दासी थाराँ जनम जनम की, थें साहब सुगणा।
मीराँ कहे प्रभु गिरधरनागर, थारोई नाम भणा।।

(गुनाह=अपराध, ओगुण=दोष, म्हैं भी कानाँ सुणाँ=
मैं भी अपने कानों से सुनुं, सुगणाँ=गुण वाले, घणाँ=
ज्यादा, नाँव=नाम, गणां=रटाँ, रीसाणा=अप्रसन्न होना,
कौन गुणाँ=किस कारण, काढ़ो=निकालो, थारोई=
तुम्हारा, भणां=जपा करती हूँ)

42. गिरधारी शरणां थारी आयाँ

गिरधारी शरणां थारी आयाँ, राख्याँ किर्पानिधान।।टेक।।
अजामील अपराधी तार्यां तार्या नीच सदाण।
डूबतां गजराज राख्याँ गणिका चढ़्या बिमाण।
अवर अधम बहुत थें तार्या, भाख्याँ सणत सुजाण।
भीलण कुबजा तार्यां गिरधर, जाण्याँ सकल जहाण।
बिरद बखाणाँ गणतां जा जाणा, थाकाँ वेद पुराण।
मीराँ प्रभु री शरण रावली, बिणता दीस्यो काण।।

(किर्पानिधान=कृपासागर, अजामिल=एक व्यक्ति
का नाम, सदाण=सदना,एक व्यक्ति का नाम, चढ़ा
बिमाण=विमान पर चढ़ाकर, अवर अधम=और दूसरे
पापी, सणत=सन्त, भीलण कुवजा=कुब्जा भीलिनी,
जहाण=जहान,संसार, विरद=यश, बखाणाँ=बखान
करना, विणता=विनती, काण=कान)

43. गोकला के बासी भले ही आए, गोकुला के बासी

गोकला के बासी भले ही आए, गोकुला के बासी।।टेक।।
गोकल की नारि देखत, आनंद सुखरासी।
एक गावत के नांचत, एक करत हाँसी।
पीताम्बर फेटा बाँधे, अरगजा सुबासी।
गिरधर से सुनवल ठाकुर, मीराँ सी दासी।।

(गोकुल के बासी=गोकुल-निवासी श्रीकृष्ण,
भले ही=बहुत अच्छा हुआ, सुखरासी=सुखों
का ढेर, अरगजा=एक प्रकार का सुगन्धित
पदार्थ, सुबासी=सुगन्धित, सुनवल=सुन्दर,
ठाकुर=स्वामि)

44. गोपाल राधे कृष्ण गोविंद

गोपाल राधे कृष्ण गोविंद॥ गोविंद॥टेक॥
बाजत झांजरी और मृंदग। और बाजे करताल॥१॥
मोर मुकुट पीतांबर शोभे। गलां बैजयंती माल॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। भक्तनके प्रतिपाल॥३॥

45. गोबिन्द कबहुं मिलै पिया मेरा

गोबिन्द कबहुं मिलै पिया मेरा॥
चरण कंवल को हंस हंस देखूं, राखूं नैणां नेरा।
निरखणकूं मोहि चाव घणेरो, कब देखूं मुख तेरा॥
व्याकुल प्राण धरत नहिं धीरज, मिल तूं मीत सबेरा।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर ताप तपन बहुतेरा॥

46. गोविन्द गाढ़ा छौजी, दीलरा मिंत

गोविन्द गाढ़ा छौजी, दीलरा मिंत।।टेक।।
वार निहारूँ पथ बुहारूँ, ज्यूँ सुष पावै चित।
मेरे मन की तुमही जानौ, मेरो ही जीव नीचिन्त।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, पूरब जनम को कंत।।

(गाढ़ा=संकट, छौजी=हितैषी, हीलरा=सहृदयत,
मिंत=मित्र, वार=द्वार, नीचिन्त=चिन्ता रहित)

47. गोविन्द सूँ प्रीत करत तब ही क्यूँ न हटकी

गोविन्द सूँ प्रीत करत तब ही क्यूँ न हटकी।।टेक।।
अब तो बात फैल गई, जैसे बीज बट की।
बीच को बिचार नाहीं, छाँय परी तट की।
अब चूकौ तो और नाहीं, जैसे कला नट की।।
जल के बुरी गाँठ परी, रसना गुन रटकी।
अब तो छुड़ाय हारी, बहुत बार झटकी।।
घर-घर में घोल मठोल, बानी घट-घट की।
सब ही कर सीस धरी लोक-लाज पटकी।।
मद की हस्ती समान, फिरत प्रेम लटकी।
दासी मीरा भक्ति बूँद, हिरदय बिच गटकी।।

48. गोहनें गुपाल फिरूँ, ऐसी आवत मन में

गोहनें गुपाल फिरूँ, ऐसी आवत मन में।
अवलोकन बारिज बदन बिबस भई तन में।
मुरली कर लकुट लेऊं पीत बसन वारूँ।
काछी गोप भेष मुकट गोधन सँग चारूँ।
हम भई गुलफाम लता, बृन्दावन रैनाँ।
पशु पंछी मरकट मुनी, श्रवन सुनत बैनाँ।
गुरूजन कठिन कानि कासौं री कहिए।
मीराँ प्रभु गिरधर मिलि ऐसे ही रहिए।।

(गोहनें=साथ साथ, अवलोकत=देखकर,
बारिजबदन=कमल मुख, लकुट=छड़ी,
बसन=वस्त्र, काछी=धारण कर, चारूँ=
विचरण करूँ, गुलफाम=सुन्दर, रैनाँ=धूल,
मरकट=मर्कट,बन्दर, कानि=मर्यादा)

49. घर आवो जी सजन मिठ बोला

घर आवो जी सजन मिठ बोला।
तेरे खातर सब कुछ छोड्या, काजर, तेल तमोला॥
जो नहिं आवै रैन बिहावै, छिन माशा छिन तोला।
'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, कर धर रही कपोला॥

50. घर आंगण न सुहावै

घर आंगण न सुहावै, पिया बिन मोहि न भावै॥
दीपक जोय कहा करूं सजनी, पिय परदेस रहावै।
सूनी सेज जहर ज्यूं लागे, सिसक-सिसक जिय जावै॥
नैण निंदरा नहीं आवै॥
कदकी उभी मैं मग जोऊं, निस-दिन बिरह सतावै।
कहा कहूं कछु कहत न आवै, हिवड़ो अति उकलावै॥
हरि कब दरस दिखावै॥
ऐसो है कोई परम सनेही, तुरत सनेसो लावै।
वा बिरियां कद होसी मुझको, हरि हंस कंठ लगावै॥
मीरा मिलि होरी गावै॥

51. घड़ी चेण णा आवड़ां, थें दरसण बिण मोय

घड़ी चेण णा आवड़ां, थें दरसण बिण मोय।
घाम न भावाँ नींद न आवाँ, बिरह सतावाँ मोय।
घायल री घूम फिरां म्हारो दरद ण जाण्या कोय।
प्राण गमायाँ झूरतां रे, नैण गुमायां रोय।
पंथ निहारां डगर मझारा, ऊभी मारग जोय।
मीरां रे प्रभु कब रे मिलोगां, थें मिल्यां सुख होय।।

(घड़ी चेण न आवड़ाँ=एक पल के लिये भी चैन
नहीं मिलता, झूरतां=शोकावेग में ही)

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