पद्मावत : मलिक मुहम्मद जायसी

Padmavat : Malik Muhammad Jayasi

46. चित्तौरगढ़-वर्णन-खंड

जेवाँ साह जो भएउ बिहाना । गढ़ देखै गवना सुलताना ॥
कवँल-सहाय सूर सँग लीन्हा । राघव चेतन आगे कीन्हा ॥
ततखन आइ बिवाँन पहूँचा । मन तें अधिक, गगन तें ऊँचा ॥
उघरी पवँरि, चला सुलतानू । जानहु चला गगन कहँ भानू ॥
पवँरी सात, सात खँड बाँके । सातौ खंड गाढ़ दुइ नाके ॥
आजु पवँरि-मुख भा निरमरा । जौ सुलतान आइ पग धरा ॥
जनहुँ उरेह काटि सब काढ़ी । चित्र क मूरति बिनवहिं ठाढ़ी ॥

लाखन बैठ पवँरिया जिन्ह तें नवहिं करोरि ।
तिन्ह सब पवँरि उघारे, ठाढ़ भए कर जोरि ॥1॥

(जेवाँ=भोजन किया, बिहान=सबेरा, मन तें अधिक=मन
से अधिक बेगवाला, पवँरि=ड्यौढ़ी, गाढ़=कठिन, नाके=
चौकियाँ, जिन्ह तें नवहिं करोरि=जिनके सामने करोड़ों
आदमी आवें तो सहम जायँ)

सातौ पँवरी कनक-केवरा । सातो पर बाजहिं गरियारा ॥
सात रंग तिन्ह सातौं पँवरी । तब तिन्ह चढ़ै फिरै नव भँवरी ॥
खँड खँड साज पलँग औ पीढ़ी । जानहुँ इंद्रलोक कै सीढ़ी ॥
चंदन बिरिछ सोह तहँ छाहाँ । अमृत-कुंड भरे तेहि माहाँ ॥
फरे खजहजा दारिउँ दाखा । जोज ओहि पंथ जाइ सो चाखा ॥
कनक-छत्र सिंघासन साजा । पैठत पँवरि मिला लेइ राजा ॥
बादशाह चढ़ि चितउर देखा । सब संसार पाँव तर लेखा ॥

देखा साह गगन-गढ़ इंद्रलोक कर साज ।
कहिय राज फुर ताकर सरग करै अस राज ॥2॥

(घरियारा=घंटे, फिरै=जब फिरै, भँवरी=चक्कर, पीढ़ी=
सिंहासन, लेखा=समझा,समझ पड़ा, फुर=सचमुच)

चड़ी गढ़ ऊपर संगत देखी । इंद्रसभा सो जानि बिसेखी ॥
ताल तलावा सरवर भरे । औ अँबराव चहूँ दिसि फरे ॥
कुआँ बावरी भाँतिहि भाँती । मठ मंडप साजे चहुँ पाँती ॥
राय रंक घर घर सुख चाऊ । कनक-मँदिर नग कीन्ह जड़ाऊ ॥
निसि दिन बाजहिं मादर तूरा । रहस कूद सब भरे सेंदूरा ॥
रतन पदारथ नग जो बखाने । घूरन्ह माँह देख छहराने ॥
मँदिर मँदिर फुलवारी बारी । बार बार बहु चित्र सेंवारी ॥

पाँसासारि कुँवर सब खेलहिं, गीतन्ह स्रवन ओनाहिं ।
चैन चाव तस देखा जनु गढ़ छेंका नाहिं ॥3॥

(सँगति=सभा, सुख चाउ=आनन्द मंगल, मादर=मर्दल,
एक प्रकार ढोल, घूरन्ह=कूड़ेखानों में, छहराने=निखरे हुए,
पाँसासारि=चौपड़, ओनाहिं=झुके या लगे)

देखत साह कीन्ह तहँ फेरा । जहँ मँदिर पदमावति केरा ॥
आस पास सरवर चहुँ पासा । माँझ मंदिर नु लाग अकासा ॥
कनक सँवारि नगन्ह सब जरा । गगन चंद जनु नखतन्ह भरा ॥
सरवर चहुँ दिसि पुरइन फूली । देखत बारि रहा मन भूली ॥
कुँवरि सहसदस बार अगोरे । दुहुँ दिसि पँवरि ठाढ़ि कर जोरे ॥
सारदूल दुहुँ दिसि गढ़ि काढ़े । गलगाजहिं जानहुँ ते ठाढ़े ॥
जावत कहिए चित्र कटाऊ । तावत पवँरिन्ह बने जड़ाऊ ॥

साह मँदिर अस देखा जनु कैलास अनूप ।
जाकर अस धौराहर सो रानी केहि रूप ॥4॥

(पुरइन=कमल, अगोरे=रखवाली या सेवा में खड़ी है,
सारदूल=सिंह, गलगाजहिं=गरजते हैं, कटाऊ=कटाव,बेलबूटे)

नाँघत पँवर गए खँड साता । सतएँ भूमि बिछावन राता ॥
आँगन साह ठाढ़ भा आई । मँदिर छाँह अति सीतल पाई ॥
चहूँ पास फुलवारी बारी । माँझ सिंहासन धरा सँवारी ॥
जनु बसंत फूला सब सोने । फल औ फूल बिगसि अति लोने ॥
जहाँ जो ठाँव दिस्टि महँ आवा । दरपन भाव दरस देखरावा ॥
तहाँ पाट राखा सुलतानी । बैठ साह, मन जहाँ सो रानी ॥
कवल सुभाय सूर सौं हँसा । सूर क मन चाँदहि पहँ बसा ॥

सो पै जानै नयन-रस हिरदय प्रेम-अँकूर ।
चंद जो बसै चकोर चित नयनहि आव न सूर ॥5॥

(राता=लाल, दरपन भाव....देकरावा=दर्पन के समान
ऐसा साफ झखाझक है कि प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है,
अकूर=अंकुर, नयनहिं न आव=नजर में नहीं जँचता है)

रानी धौराहर उपराहीं । करै दिस्टि नहिं तहाँ तराहीं ॥
सखी सरेखी साथ बईठी । तपै सूर, ससि आव न दीठी ॥
राजा सेव करै कर जोरे । आजु साह घर आवा मोरे ॥
नट नाटक, पातुरि औ बाजा । आइ अखाड़ माँह सब साजा ॥
पेम क लुबुध बहिर औ अंधा । नाच-कूद जानहुँ सब धंधा ॥
जानहुँ काठ नचावै कोइ । जो नाचत सो प्रगट न होई ॥
परगट कह राजा सौं बाता । गुपुत प्रेम पदमावति राता ॥

गीत नाद अस धंधा, दहक बिरह कै आँच ।
मन कै डोरि लाग तहँ, जहँ सो गहि गुन खाँच ॥6॥

(उपराही=ऊपर, सूर=सूर्य के समान बादशाह, ससि=चंद्रमा
के समान राजा, ससि...दीठी=सूर्य के सामने चंद्रमा (राजा)

की ओर नजर नहीं जाती है, अखाड़ा=अखाड़ा;रँगभूमि;
जानहुँ सब धंधा=मानो नाच-कूद तो संसार का काम ही
है यह समझकर उस ओर ध्यान नहीं देता है, कह=
कहता है, दहक=जिससे दहकता है, गुन=डोरी, खाँच=
खींचती है)

गोरा बादल राजा पाहाँ । रावत दुवौ दुवौ जनु बाहाँ ॥
आइ स्रवन राजा के लागे । मूसि न जाहि पुरुष जो जागे ॥
बाचा परखि तुरुक हम बूझा । परगट मेर, गुपुत छल सूझा ॥
तुम नहिं करौ तुरुक सौं मेरू । छल पै करहिं अंत कै फेरू ॥
बैरी कठिन कुटिल जस काँटा । सो मकोय रह राखै आँटा ॥
सत्रु कोट जो आइ अगोटी । मीठी खाँड जेंवाएहु रोटी ॥
हम तेहि ओछ क पावा घातू । मूल गए सँग न रहै पातू ॥

यह सो कृस्न बलिराज जस, कीन्ह चहै छर-बाँध ।
हम्ह बिचार अस आवै, मेर न दीजिय काँध ॥7॥

(रावत=सामंत, दुवौ जनु वाहाँ=मानो राजा की दोनों
भुजाएँ हैं, स्रवन लागे=कान में लगकर सलाह देने लगे,
मूसि न जाहिं=लूटे नहीं जाते हैं, बाचा परखि ...बूझा=
उस मुसलमान की मैं बात परखकर समझ गया हूँ,
मेर=मेल, कै फेरू=घुमा फिराकर, बैरी=शत्रु; भेर का
पेड़, सो मकोय रह....आँटा=उसे मकोय की तरह
(काँटे लिए हुए) रहकर ओट या दाँव में रख सकते
हैं, आँटा=दाँव, अगोटी=छेंका, ओछ=ओछे,नीच, पावा
धातू=दाँव पेच समझ गया, मूल गए ...पातू=उसने
सोचा है कि राजा को पकड़ लें तो सेना-सामंत आप
ही न रह जायँगे, कृस्न=विष्णु, वामन, छर-बाँध=
छल का आयोजन, काँध दीजिय=स्वीकार कीजिए)

सुनि राजहिं यह बात न भाई । जहाँ मेर तहँ नहिं अधमाई ॥
मंदहि भल जो करै सोई । अंतहि भला भले कर होई ॥
सत्र जो बिष देइ चाहै मारा । दीजिय लोन जानि विष-हारा ॥
बिष दीन्हें बिसहर होइ खाई । लोन दिए होइ लोन बिलाई ॥
मारे खड़ग खड़ग कर लेइ । मारे लोन नाइ सिर देई ॥
कौरव विष जो पंडवन्ह दीन्हा । अंतहि दाँव पंडवन्ह लीन्हा ॥
जो छल करै ओहि छल बाजा । जैसे सिंघ मँजूसा साजा ॥

राजै लोन सुनावा, लाग दुहुन जस लोन ।
आए कोहाइ मँदिर कहँ, सिंघ छान अब गोन ॥8॥

(बिष-हार=विष हरनेवाला, बिसहर=विषधर, साँप, होइ लोन
बिलाई=नमक की तरह गल जाता है, कर लेई=हाथ में लेता
है, मारे लोन=नमक से मारने से,नमक का एहसान ऊपर
डालने से, बाजा=ऊपर पड़ता है, लोन जस लाग=अप्रिय
लगा,बुरा लगा, कोहार=रूठकर, मधिर=अपने घर, छान=
बाँधती है, गोन=रस्सी, सिंघ....गोन=सिंह अब रस्सी से
बँधा चाहता है)

राजा कै सोरह सै दासी । तिन्ह महँ चुनि काढ़ी चौरासी ॥
बरन बरन सारी पहिराई । निकसि मँदिर तें सेवा आईं ॥
जनु निसरी सब वीरबहूटी । रायमुनी पींजर-हुत छूटी ॥
सबै परथमै जोबन सोहैं । नयन बान औ सारँग भौंहैं ॥
मारहिं धनुक फेरि सर ओही । पनिघट घाट धनुक जिति मोही ॥
काम-कटाछ हनहिं चित-हरनी । एक एक तें आगरि बरनी ॥
जानहुँ इंद्रलोक तें काढ़ी । पाँतिहि पाँति भईं सब ठाढ़ी ॥

साह पूछ राघव पहँ, ए सब अछरी आहिं ।
तुइ जो पदमिनि बरनी, कहु सो कौन इन माहि ॥9॥

(रायमुनी=मुनिया नाम की छोटी सुंदर चिड़िया
सारंग=धनुष)

दीरघ आउ, भूमिपति भारी । इन महँ नाहिं पदमिनी नारी ।
यह फुलवारि सो ओहि के दासी । कहँ केतकी भवर जहँ बासी ॥
वह तौ पदारथ, यह सब मोती । कहँ ओह दीप पतँग जेहि जोती ॥
ए सब तरई सेव कराहीं । कहँ वह ससि देखत छपि जाहीं ॥
जौ लगि सूर क दिस्टि अकासू । तौ लगि ससि न करै परगासू ॥
सुनि कै साह दिस्ट तर नावा । हम पाहुन, यह मँदिर परावा ॥
पाहुन ऊपर हेरै नाहीं । हना राहु अर्जुन परछाहीं ॥

तपै बीज जस धरती, सूख बिरह के घाम ।
कब सुदिस्टि सो बरिसै, तन तरिवर होइ जाम ॥10॥

(आउ=आयु, कहँ केतकी....बासी=वह केतकी यहाँ कहाँ है
(अर्थात् नहीं है) जिस पर भौंरे बसते हैं, पदारथ=रत्न, जौ
लगि सूर....परगासू=जब तक सूर्य ऊपर रहता है तब तक
चंद्रमा का उदय नहीं होता; अर्थात् जब तक आपकी दृष्टि
ऊपर लगी रहेगी तब तक पद्मिनी नहीं आएगी, हेरै=देखता
है, हना राहु अर्जुन परछाहीं=जैसे अर्जुन ने नीचे छाया
देखकर मत्स्य का बेध किया था वैसे ही आप को किसी
प्रकार दर्पण आदि में उसकी छाया देखकर ही उसे प्राप्त
करने का उद्योग करना होगा, सूख=सूखता है)

सेव करैं दासी चहुँ पासा । अछरी मनहुँ इंद्र कबिलासा ॥
कोउ परात कोउ लोटा लाईं । साह सभा सब हाथ धोवाई ॥
कोई आगे पनवार बिछावहिं । कोई जेंवन लेइ लेइ आवहिं ॥
माँडे कोइ जाहि धरि जूरी । कोई भात परोसहि पूरी ॥
कोई लेइ लेइ आवहिं थारा । कोइ परसहि छप्पन परकारा ॥
पहिरि जो चीर परोसै आवहिं । दूसरसि और बरन देखरावहिं ॥
बरन बरन पहिरे हर फेरा । आव झुंड जस अछरिन्ह केरा ॥

पुनि सँधान बहु आनहिं, परसहिं बूकहि बूक ।
करहिं सँवार गोसाई, जहाँ परै किछु चूक ॥11॥

(पनवार=बड़ा पत्तल, माडे=एक प्रकार की चपाती, जूरी=
गड्डी लगाकर, सँधान=अचार, बूकहि बूक=चंगुल भर
भरकर, करहिं सँवार गोसाईं=डर के मारे ईश्वर का
स्मरण करने लगती हैं)

जानहु नखत करहिं सब सेवा । बिनु ससि सूरहिं भाव न जेंवा ॥
बहु परकार फिरहिं हर फेरे । हेरा बहुत न पावा हेरे ॥
परीं असूझ सबै तरकारी । लोनी बिना लोन सब खारी ॥
मच्छ छुवै आवहिं गड़ि काटा । जहाँ कवँल तहँ हाथ न औंटा ॥
मन लागेउ तेहि कवँल के दंडी । भावै नाहिं एक कनउंडी ॥
सो जेंवन नहिं जाकर भूखा । तेहि बिन लाग जनहुँ सब सूखा ॥
अनभावत चाखै वेरागा । पंचामृत जानहुँ विष लागा ॥

बैठि सिंघासन गूंजै, सिंघ चरै नहिं घास ।
जौ लगि मिरिग न पावै, भोजन करै उपास ॥12॥

(नखत=पद्मिनी की दासियाँ, ससि=पद्मिनी, जेंवा=भोजन
करना, बहु परकार=बहुत प्रकार की स्त्रियाँ, परीं असूझ=
आँख उनपर नहीं पड़ती, लोनी=सुंदरी पद्मिनी, लोन सब
खारी=सब खारी नमक के समान कड़वी लगती हैं, आवहिं
गड़ि=गड़ जाते हैं, न आटा=नहीं पहुँचता है, कँवल के डंडी=
मृणाल रूप पद्मिनी में, कनउँडी=दासी, अनभावत=बिना
मन से, बैरागा=विरक्त, उपास=उपवास)

पानि लिए दासी चहुँ ओरा । अमृत मानहुँ भरे कचोरा ॥
पानी देहिं कपूर कै बासा । सो नहिं पियै दरसकर प्यासा ॥
दरसन-पानि देइ तौ जीऔं ।बिनु रसना नयनहिं सौं पीऔं ॥
पपिहा बूँद-सेवातिनि अघा । कौन काज जौ बरिसै मघा?॥
पुहि लोटा कोपर लेइ आई । कै निरास अब हाथ धोवाई ॥
हाथ जो धोवै बिरह करोरा । सँवरि सँवरि मन हाथ मरोरा ॥
बिधि मिलाव जासौं मन लागा । जोरहि तूरि प्रेम कर तागा ॥

हाथ धोइ जब बैठा, लीन्ह ऊबि कै साँस ।
सँवरा सोइ गोसाईं देई निरासहि आस ॥13॥

(कचोरा=कटोरा, अघा=अघाता है,तृप्त होता है, मघा=मघा
नक्षत्र, कोपर=एक प्रकार का बड़ा थाल या परात, हाथ
धोवाईं=बादशाह ने मानों पद्मिनी के दर्शन से हाथ
धोया, विरह करोरा=हाथ जो धोने के लिए मलता है
मानो बिरह खरोच रहा है, हाथ मरोरा=हाथ धोता है,
मानो पछताकर हाथ मलता है)

भइ जेवनार फिरा खँडवानी । फिरा अरगजा कुहकुह-पानी ॥
नग अमोल जो थारहि भरे । राजै सेव आनिकै धरै ॥
बिनती कीन्ह घालि गिउ पागा । ए जगसूर! सीउ मोहिं लागा ॥
ऐगुन-भरा काँप यह जीऊ । जहाँ भानु तहँ रहै न सीऊ ॥
चारिउ खंड भानु अस तपा । जेहि के दिस्टि रैनि-मसि छपा ॥
औ भानुहि अस निरमल कला । दरस जौ पावै सो निरमला ॥
कवल भानु देखे पै हँसा । औ भा तेहु चाहि परगसा ॥

रतन साम हौं रैनि मसि, ए रबि! तिमिर सँघार ।
करु सो कृपा-दिस्टि अब, दिवस देहि उजियार ॥14॥

(सेव=सेवा में, घालि गिउ पागा=गले में पगड़ी डालकर
(अधीनतासूचक) सीऊ=शीत, रैनि-मसि=रात की कालिमा,
तेहु चाहि=उससे भी बढ़कर, सँघार=नष्ट कर)

सुनि बिनती बिहँसा सुलतानू । सहसौ करा दिपा जस भानू ॥
ए राजा! तुइ साँच जुड़ावा । भइ सुदिस्टि अब, सीउ छुड़ावा ॥
भानु क सेवा जो कर जीऊ । तेहि मसि कहाँ, कहाँ तेहि सीऊ?॥
खाहु देस आपन करि सेवा । और देउँ माँडौ तोहि, देवा! ॥
लीक-पखान पुरुष कर बोला । धुव सुमेरु ऊपर नहिं डोला ॥
फेरि पसाउ दीन्ह नग सूरू । लाभ देखाइ लीन्ह चह मूरू ॥
हँसि हँसि बोलै, टैके काँधा । प्रीति भुलाइ चहै छल बाँधा ॥

माया-बोल बहुत कै साह पान हँसि दीन्ह ।
पहिले रतन हाथ कै चहै पदारथ लीन्ह ॥15॥

(दिपा=चमका, मसि=कालिमा, खाहु=भोग करो, माँडौ=
माँडौगढ़, देवा=देव, राजा, लीक-पखान=पत्थर की लीक सा
(न मिटने वाला), पसाउ=प्रसाद,भेंट, मूरू=मूलधन, प्रीति=
प्रीति से, छल=छल से, रतन=राजा रत्नसेन, पदारथ=पद्मिनी)

माया-मोह-बिबस भा राजा । साह खेल सतरँज कर साजा ॥
राजा! है जौ लगि सिर घामू । हम तुम घरिक करहिं बिसरामू ॥
दरपन साह भीति तहँ लावा । देखौं जबहि झरोखे आवा ॥
खेलहिं दुऔ साह औ राजा । साह क रुख दरपन रह साजा ॥
प्रेम क लुबुध पियादे पाऊँ । ताकै सौंह चलै कर ठाऊँ ॥
घोड़ा देइ फरजीबँद लावा । जेहि मोहरा रुख चहै सो पावा ॥
राजा पील देइ शह माँगा । शह देइ चाह मरै रथ-खाँगा ॥

पीलहि पील देखावा भए दुऔ चौदात ।
राजा चहै बुर्द भा, शाह चहै शह-मात ॥16॥

(घरिक=एक घड़ी, थोड़ी देर, भीति=दीवार में, लावा=लगाया,
रह साजा=लगा रहता है, पियादे पाऊँ=पैदल,शतरंज की एक
गोटी, फरजी=शतरंज का वह मोहरा जो सीधा और टेढ़ा दोनों
चलता है, फरजीबंद=वह घात जिसमें किसी प्यादे के जोर पर
बादशाह को ऐसी शह देता है जिससे विपक्षी की हार होती है,
सह=बादशाह को रोकनेवाला घात, रथ=शतरंज का वह मोहरा
जिसे आजकल ऊंट कहते हैं, (जब चतुरंग का पुराना खेल
हिंदुस्तान से फारस-अरब की ओर गया तब वहाँ `रथ' के
स्थान पर `ऊँट' हो गया) बुर्द=खेल में वह अवस्था जिसमें
किसी पक्ष के सब मोहरे मारे जाते हैं, केवल बादशाह बच
रहता है; यह आधी हार मानी जाती है, शह-मात=पूरी हार)

सूर देख जौ तरई-दासी । जहँ ससि तहाँ जाइ परगासी ॥
सुना जो हम दिल्ली सुलतानू । देखा आजु तपै जस भानू ॥
ऊँच छत्र जाकर जग माहाँ । जग जो चाँह सब ओहि कै छाहाँ ॥
बैठि सिंघासन गरबहि गूंजा । एक छत्र चारिउ खँड भूजा ॥
निरखि न जाइ सौंह ओहि पाहीं । सबै नवहिं करि दिस्टि तराहीं ॥
मनि माथे, ओहि रूप न दूजा । सब रुपवंत करहिं ओहि पूजा ॥
हम अस कसा कसौटी आरस । तहूँ देखु कस कंचन, पारस ॥

बादसाह दिल्ली कर कित चितउर महँ आव ।
देखि लेहु पदमावति! जेहि न रहै पछिताव ॥17॥

(सूर देख...तरई दासी=दासी रूप नक्षत्रों ने जब सूर्य-रूप
बादशाह को देखा, जहँ ससि....परगासी=जहाँ चंद्र-रूप
पदमावती थी वहाँ जाकर कहा, परगासी=प्रकट किया,
कहा, भूजा=भोग करता है, आरस=आदर्श,दर्पण, कसा
कसौटी आरस=दर्पण में देखकर परीक्षा की, कित आव=
फिर कहाँ आता है,न आएगा)

बिगसे कुमुद कसे ससि ठाऊ । बिगसै कँवल सुने रबि-नाऊँ ॥
भइ निसि, ससि धौराहर चढ़ी । सोरह कला जैस बिधि गढ़ी ॥
बिहँसि झरोखे आइ सरेखी । निरखि साह दरपन महँ देखी ॥
होतहि दरस परस भा लोना । धरती सरग भएउ सब सोना ॥
रुख माँगत रुख ता सहुँ भएऊ । भा शह-मात, खेल मिटि गएऊ ॥
राजा भेद न जानै झाँपा । भा बिसँभार, पवन बिनु काँपा ॥
राघव कहा कि लागि सोपारी । लेइ पौढावहिं सेज सँवारी ॥

रैनि बीति गइ, भोर भा, उठा सूर तब जागि ।
जो देखै ससि नाहीं, रही करा चित लागि ॥18॥

(कहे ससि ठाऊँ=इस जगह चंद्रमा है, यह कहने से, सुने=सुनने
से, परस भा लोना=पारस या स्पर्शमणि का स्पर्श सा हो गया,
रुख=शतरंज का रुख, रुख=सामना, भा शहमात=शतरंज में पूरी
हार हुई; बादशाह बेसुध या मतवाला हो गया, झाँपा=छिपा, भा
बिसँभार=बादशाह बेसुध हो गया, लागि सोपारी=सुपारी के टुकड़े
निगलने में छाती मेम रुक जाने से कभी कभी एकबारगी पीड़ा
होने लगती है जिससे आदमी बैचैन हो जाता है; इसी को सुपारी
लगना कहते हैं, देखै=जो उठकर देखता है तो, करा=कला,शोभा)

भोजन-प्रेम सो जान जो जेंवा । भँवरहि रुचै बास-रस-केवा ॥
दरस देखाइ जाइ ससि छपी । उठा भानु जस जोगी तपी ॥
राघव चेति साह पहँ गयउ । सूरज देखि कवँल बिसमयऊ ॥
छत्रपती मन कीन्ह सो पहुँचा । छत्र तुम्हार जगत पर ऊँचा ॥
पाट तुम्हार देवतन्ह पीठी । सरग पतार रहै दिन दीठी ॥
छोह ते पलुहहिं उकठे रूखा । कोह तें महि सायर सब सूखा ॥
सकल जगत तुम्ह नावै माथा । सब कर जियन तुम्हारे हाथा ॥

दिनहि नयन लाएहु तुम, रैनि भएहु नहिं जाग ।
कस निचिंत अस सोएहु, काह बिलँब अस लाग?॥19॥

(भोजन-प्रेम=प्रेम का भोजन (इस प्रकार के उलटे समास
जायसी में प्रायः मिलते हैं - शायद फारसी के ढंग पर हों),
सो जान=वह जानता है, बास-रस-केवा=केवा-बास-रस अर्थात्
कमल का गंध और रस, सूरुज देखि....बिसमसऊ=(वहाँ जाकर
देखा कि) सूर्य-बादशाह कमल-पद्मिनी को देखकर स्तब्ध हो
गया है, दिन=प्रतिदिन, पलुहहिं=पनपते हैं, उकठे=सूखे, तुम्ह=
तुम्हें, दिनहिं नयन....जाग=दिन के सोये सोये आप रात होने
पर भी न जागे, निचिंत=बेखबर)

देखि एक कौतुक हौं रहा । रहा अँतरपट, पै नहिं अहा ॥
सरवर देख एक मैं सोई । रहा पानि, पै पान न होई ॥
सरग आइ धरती महँ छावा । रहा धरति, पै धरत न आवा ॥
तिन्ह महँ पुनि एक मंदिर ऊँचा । करन्ह अहा, पर कर न पहुँचा ॥
तेहि मंडप मूरति मैं देखी । बिनु तन, बिनु जिउ जाइ बिसेखी ॥
पूरन चंद होइ जनु तपी । पारस रूप दरस देइ छपी ॥
अब जहँ चतुरदसी जिउ तहाँ । भानु अमावस पावा कहाँ ।

बिगसा कँवल सरग निसि, जनहुँ लौकि गइ बीजु ।
ओहि राहु भा भानुहि, राघव मनहिं पतीजु ॥20॥

(रहा अँतरपट...अहा=परदा था भी और नहीं भी था अर्थात् परदे
के कारण मैं उस तक पहुँच नहीं सकता था, पर उसकी झलक
देखता था; यह जगत ब्रह्म और जीव के बीच परदा है पर इसमें
उसकी झलक भी दिखाई पड़ती है, रहा पानि ...न होई=उसमें
पानी था पर उस तक पहुँचकर मैं पी नहीं सकता था, सरवर=
वह दर्पण ही यहाँ सरोवर के समान दिखाई पड़ा, सरग आइ
धरती ...आवा=सरोवर में आकाश (उसका प्रतिबिंब) दिखाई
पड़ता है पर उसे कोई छू नहीं सकता, धरति=धरती पर,
धरत न आवा=पकड़ाई नहीं देता था, करन्ह अहा=हाथों में
ही था, अब जहँ चतुरदसी....कहाँ=चौदस के चंद्र के समान
जहाँ पद्मिनी है जीव तो वहाँ है, अमावस्या में सूर्य (शाह)

तो है ही नहीं, वह तो चतुर्दशी में हैं; चतुर्दशी में ही उसे
अद्भुत ग्रहण लग रहा है, लौकि गई=चमक उठी, दिखाई
पड़ गई)

अति बिचित्र देखा सो ठाढ़ी । चित कै चित्र, लीन्ह जिउ काढ़ी ॥
सिंघ-लंक, कुंभस्थल जोरू । आँकुस नाग, महाउत मोरू ॥
तेहि ऊपर भा कँवल बिगासू । फिरि अलि लीन्ह पुहुप मधु-बासू ॥
दुइ खंजन बिच बैठाउ सूआ । दुइज क चाँद धनुक लेइ ऊआ ॥
मिरिग देखाई गवन फिरि किया । ससि भा नाग, सूर भा दिया ॥
सुठि ऊँचे देखत वह उचका । दिस्टि पहुँचि, कर पहुँचि न सका ॥
पहुँच-बिहून दिस्ट कित भई?। गहि न सका, देखत वह गई ॥

राघव! हेरत जिउ गएउ, कित आछत जो असाध ।
यह तन राख पाँख कै सकै न, केहि अपराध?॥21॥

(चित कै चित्र=चित्त या हृदय में अपना चित्र पैठाकर, कुंभस्थल
जोरू=हाथी के उठे हुए मस्तकों का जोड़ा (अर्थात् दोनों कुच) आँकुस
नाग=साँपों (अर्थात् बाल की लटों) का अंकुश, मोरू=मयूर, मिरिग=
मृगनयनी पद्मावती, गवन फिरि किया=पीछे फिरकर चली गई, ससि
भा नाग=उसके पीछे फिरने से चंद्रमा के स्थान पर नाग हो गया,
मुख के स्थान पर वेणी दिखाई पड़ी, सूर भा दिया=उस नाग को
देखते ही सूर्य (बादशाह) दीपक के समान तेज हीन हो गया (ऐसा
कहा जाता है कि साँप के सामने दीपक की लौ झिलमिलाने लगती
है), पहुँच बिहूँन.....कित भई? जहाँपहुँ नहीं हो सकती वहाँ दृष्टि
क्यों जाती है? हेरत गएउ=देखते ही मेरा जीव चला गया, कित
आछत जो असाद=जो वश में नहीं था वह रहता कैसे ? यह
तन....अपराध=यह मिट्टी का शरीर पंख लगाकर क्यों नहीं जा
सकता,इसने क्या अपराध किया है?)

राघव सुनत सीस भुइ धरा । जुग जुग राज भानु कै करा ॥
उहै कला, वह रूप बिसरखी । निसचै तुम्ह पदमावति देखी ॥
केहरि लंक, कुँभस्थल हिया । गीउ मयूर, अलक बेधिया ॥
कँवल बदन औ बास सरीरू । खंजन नयन, नासिका कीरू ॥
भौंह धनुक, ससि-दुइज लिलाट्ठ । सब रानिन्ह ऊपर ओहि पाटू ॥
सोई मिरिग देखाइ जो गएऊ । वेनी नाग, दिया चित भएऊ ॥
दरपन महँ देखी परछाहीं । सो मूरति, भीतर जिउ नाहीं ॥

सबै सिंगार-बनी धनि, अब सोई मति कीज ।
अलक जो लटकै अधर पर सो गहि कै रस लीज ॥22॥

(बेधिया=बेध करनेवाला अंकुश, ओहि=उसका, दिया चित
भएऊ=वह तुम्हारा चित्र था जो नाग के सामने दीपक के
समान तेज हीन हो गया, मति कीज=ऐसी सलाह या युक्ति
कीजिए, अलक....रस लीज=साँप की तरह जो लटें हैं उन्हें
पकड़कर अधर रस लीजिए,राजा को पकड़ने का इशारा करता है)

47. रत्नसेन-बंधन-खंड

मीत भै माँगा बेगि बिवानू । चला सूर, सँवरा अस्थानू ॥
चलत पंथ राखा जौ पाऊ । कहाँ रहै थिर चलत बटाऊ ॥
पंथी कहाँ कहाँ सुसताई । पंथ चलै तब पंथ सेराई ॥
छर कीजै बर जहाँ न आँटा । लीजै फूल टारिकै काँटा ॥
बहुत मया सुनि राजा फूला । चला साथ पहुँचावै भूला ॥
साह हेतु राजा सौं बाँधा । बातन्ह लाइ लीन्ह, गहि काँधा ॥
घिउ मधु सानि दीन्ह रस सोई । जो मुँह मीठ, पेट बिष होई ॥

अमिय-बचन औ माया को न मुएउ रस-भीज?।
सत्रु मरै जौ अमृत, कित ता कहँ बिष दीज? ॥1॥

(मीत भै=मित्र से, सेराई=समाप्त होता है, छर=छल, बर=बल,
न आँटा=नहीं पूरा पड़ता है, हेतु=प्रेम, घिउ मधु, कहते हैं, घी
और शहद बराबर मिलाने से विष हो जाता है, मुँह=मुँह में,
पेट=पेट में)

चाँद घरहि जौ सूरुज आवा । होइ सो अलोप अमावस पावा ॥
पूछहिं नखत मलीन सो मोती । सोरह कला न एकौ जोती ॥
चाँद क गहन अगाह जनावा । राज भूल गहि साह चलावा ॥
पहिलौं पँवरि नाँघिजौ आवा । ठाढ़ होइ राजहि पहिरावा ॥
सौ तुषार, तेइस गज पावा । दुंदुभि औ चौघड़ा दियावा ॥
दूजी पँवरि दीन्ह असवारा । तीजि पँवरि नग दीन्ह अपारा ॥
चौथि पँवरि देइ दरब करोरी । पँचईं दुइ हीरा कै जोरी ॥

छठइँ पँवरि देइ माँडौ, सतईं दीन्ह चँदेरि ।
सात पँवरि नाँघत नृपहिं लेइगा बाँधि गरेरि ॥2॥

(चाँद=पद्मावती, सूरुज=बादशाह, नखत=अर्थात् पद्मावती की सखियाँ,
अगाह=आगे से,पहले से, राज भूलल=राजा भूला हुआ है, पहिरावा=
राजा को खिलात पहनाई, चौघड़ा=एक प्रकार का बाजा, माडौ=
माडौगढ़, चँदेरि=चँदेरी का राज्य, गरेरि=घेरकर, )

एहि जग बहुत नदी-जल जूड़ा । कोउ पार भा, कोऊ बूड़ा ॥
कोउ अंध भा आगु न देखा । कोउ भएउ डिठियार सरेखा ॥
राजा कहँ बिधाय भइ माया । तजि कबिलास धरा भुइँ पाया ॥
जेहि कारन गढ़ कीन्ह अगोठी । कित छाँडै जौ आवै मूठी?॥
सत्रुहि कोउ पाव जौ बाँधी । छोड़ि आपु कहँ करै बियाधी ॥
चारा मेलि धरा जस माछू । जल हुँत निकसि मुवै कित काछू?॥
सत्रू नाग पेटारी मूँदा । बाँधा मिरिग पैग नहिं खूँदा ॥

राजहि धरा, आनि कै तन पहिरावा लोह ।
ऐस लोह सो पहिरै चीत सामि कै दोह ॥3॥

(एहि जग...(यह संसार समुद्र है) इसमें बहुत सी नदियों का
जल इकट्ठा हुआ है,इसमें बहुत तरह के लोग हैं, आगु=आगम,
डिठियार=दृष्टिवाला, सरेखा=चतुर, तजि कबिलास....पाया=
किले से नीचे उतरा; सुख के स्थान से दुःख के स्थान में गिरा,
अगोठी=अगोठा,छेका, घेरा, जल हुँत...काछू=वही कछुवा है जो
जल से नहीं निकलता और नहीं मरता, सत्रू....मँदा=शत्रु रूपी
नाग को पेटारी में बंद कर लिया, पैग नहीं खूँदा=एक कदम
भी नहीं कूदता, चीत सामि कै दोह=जो स्वामी का द्रोह मन
में बिचारता है)

पायँन्ह गाढ़ी बेड़ी परी । साँकर गीउ, हाथ हथकरी ॥
औ धरि बाँधि मँजूषा मेला । ऐस सत्रु जिनि होइ दुहेला!॥
सुनि चितउर महँ परा बखाना । देस देस चारिउ दिसि जाना ॥
आजु नरायन फिरि जग खूँदा । आजु सो सिंघ मँजूषा मूँदा ॥
आजु खसे रावन दस माथा । आजु कान्ह कालीफन नाथा ॥
आजु परान कंस कर ढीला । आजु मीन संखासुर लीला ॥
आजु परे पंडव बदि माहाँ । आजु दुसासन उतरीं बाहाँ ॥

आजु धरा बलि राजा, मेला बाँधि पतार ।
आजु सूर दिन अथवा, भा चितउर अँधियार ॥4॥

(ऐसे शत्र दुहेला=शत्रु भी ऐसे दुख में न पड़े, बखाना=चर्चा,
जग खूँदा=संसार में आकर कूदे, मूँदा=बंद किया, मीन=मत्स्य
अवतार, पंडव=पांडव)

देव सुलैमा के बँदि परा । जह लगि देव सबै सत-हरा ॥
साहि लीन्ह गहि कीन्ह पयाना । जो जहँ सत्रु सो तहाँ बिलाना ॥
खुरासान औ डरा हरेऊ । काँपा बिदर, धरा अस देऊ!॥
बाँधौं, देवगिरि, धौलागिरी । काँपी सिस्टि, दोहाई फिरी ॥
उबा सूर, भइ सामुँह करा । पाला फूट, पानि होइ ढरा ॥
दुंदुहि डाड दीन्ह, जहँ ताईं । आइ दंडवत कीन्ह सबाईं ॥
दुंद डाँड सब सरगहि गई । भूमि जो डोली अहथिर भई ॥

बादशाह दिल्ली महँ, आइ बैठ सुख-पाट ॥
जेइ जेइ सीस उठावा धरती धरा लिलाट ॥5॥

(देव=राजा,दैत्य, सुलेमाँ=यहूदियों के बादशाह सुलेमान ने
देवों और परियों को वश में किया था, बँदि परा=कैद में
पड़ा, सत-हरा=सत्य छोड़े हुए; धरा अस देउ=कि ऐसे बड़े
राजा को पकड़ लिया, दुंदुहि=दुंदुभी या नगाड़े पर, डाँड
दीन्ह=डंडा या चोट मारी)

हबसी बँदवाना जिउ-बधा । तेहि सौंपा राजा अगिदधा ॥
पानि पवन कहँ आस करेई । सो जिउ बधिक साँस भर देई ॥
माँगत पानि आगि लेइ धावा । मुँगरी एक आनि सिर लावा ॥
पानि पवन तुइ पिया सो पिया । अब को आनि देइ पानीया?॥
तब चितउर जिउ रहा न तोरे । बादसाह है सिर पर मोरे ॥
जबहि हँकारे है उठि चलना । सकती करै होइ कर मलना ॥
करै सो मीत गाँढ वँदि जहाँ । पान फूल पहुँचावै तहाँ ॥

जब अंजल मुँह, सोवा; समुद न सँवरा जागि ।
अब धरि काढ़ि मच्छ जिमि, पानी माँगति आगि ॥6॥

(बँदवाना=बन्दीगृह का रक्षक,दरोगा, जिउ-बधा=बधिक,जल्लाद,
अगिदधा=आग से जले हुए, साँस भर=साँस भर रहने के लिये,
पानीया=पानी, जिउ रहा=जी में यह बात नहीं रही, सकती=
बल, जब अंजल मुँह सोवा=जब तक अन्न-जल मुँह में पड़ता
रहा तब तक तो सोया किया)

पुनि चलि दुइ जन पूछै आए । ओउ सुठि दगध आइ देखराए ॥
तुइँ मरमुरी न कबहुँ देखी । हाड जो बिथुरै देखि न लेखी ॥
जाना नहिं कि होब अस महूँ । खौजे खौज न पाउब कहूँ ॥
अब हम्ह उतर देहु, रे देवा । कौने गरब न मानेसि सेवा ॥
तोहि अस बुत गाड़ि खनि मूँदे । बहुरि न निकसि बार होइ खूँदे ॥
जो जस हँसा तो तैसे रोवा । खेलत हँसत अभय भुइँ सोवा ॥
जस अपने मुह काढे धूवाँ । मेलेसि आनि नरक के कूआँ ॥

जरसि मरसि अब बाँधा तैस लाग तोहि दोख ।
अबहुँ माँगु पदमिनी, जौ चाहसि भा मोख ॥7॥

पूछहिं बहुत, न बोला राजा । लीन्हेसि जोउ मीचु कर साजा ॥
खनि गड़वा चरनन्ह देइ राखा । नित उठि दगध होहिं नौ लाखा ॥
ठाँव सो साँकर औ अँधियारा । दूसर करवट लेइ न पारा ॥
बीछी साँप आनि तहँ मेला । बाँका आइ छुआवहिं हेला ॥
धरहिं सँडासन्ह, छूटै नारी । राति-दिवस दुख पहुँचै भारी ॥
जो दुख कठिन न सहै पहारू । सो अँगवा मानुष-सिर भारू ॥
जो सिर परै आइ सो सहै । किछु न बसाइ, काह सौं कहै?॥

दुख जारै, दुख भूँजै, दुख खोवै सब लाज ।
गाजहु चाहि अधिक दुख दुखी जान जेहि बाज ॥8॥

(मरपुरी=यमपुरी, हाड जो....लेखी=बिखरी हुई हड्डियों को
देखकर भी तुझे उसका चेत न हुआ, महूँ=मैं भी, खोज=पता,
बार होइ खूँदे=अपने द्वार पर पैर न रखा, धूवाँ=गर्व या
क्रोध की बातत, तस=ऐसा, माँग=बुला भेज, गढावा=गड्ढा,
चरनन्ह देइ राखा=पैरों को गड्ढे में गाड़ दिया, बाँका=
धरकारों का टेढ़ा औजार जिससे वे बाँस छीलते हैं, हेला=
डोम, सँडास=संसी, जिससे पकड़कर गरम बटलोई उतारते
हैं, गाजहु चाहि=ब्रज से भी बड़कर, बाज=पड़ता है)

48. पद्मावती-नागमती-बिलाप-खंड

पदमावति बिनु कंत दुहेली । बिनु जल कँवल सूखी जस बेसी ॥
गाढ़ी प्रीति सो मोसौं लाए । दिल्ली कंत निचिंत होइ छाए
सो दिल्ली अस निबहुर देसू । कोइ न बहुरा कहै सँदेसू ॥
जो गवनै सो तहाँ कर होई । जो आवै किछु जान न सोई ॥
अगम पंथ पिय तहाँ सिधावा । जो रे गएउ सो बहुरि न आवा ॥
कुवाँ धार जल जैस बिछौवा । डोल भरे नैनन्ह धनि रोवा ॥
लेजुरि भई नाह बिनु तोहीं । कुवाँ परी, धरि काढसि मोहीं ॥

नैन डोल भरि ढार, हिये न आगि बुझाइ ।
घरी घरी जिउ आवै, घरी घरी जिउ जाइ ॥1॥

(निबहुर=जहाँ से कोई न लौटे, लेजुरि=रस्सी,डोरी)

नीर गँभीर कहाँ, हो पिया । तुम्ह बिनु फाटै सरवर-हीया ॥
गएहु हेराइ, परेहु केहि हाथा?। चलत सरोवर लीन्ह न साथा ॥
चरत जो पंखि केलि कै नीरा । नीर घटे कोई-आव न तीरा ॥
कँवल सूख, पखुरी बेहरानी । गलि गलि कै मिलि छार हेरानी ॥
बिरह-रेत कंचन तन लावा । चून चून कै खेह मेरावा ॥
कनक जो कन कन होइ बेहराई । पिय कहँ?छार समेटै आई ॥
बिरह पवन वह छार सरीरू । छारहि आनि मेरावहु नीरू ॥

अबहुँ जियावहु कै मया, बिंथुरी छार समेट ।
नइ काया, अवतार नव होइ तुम्हारे भेंट ॥2॥

(बह=बहता है,उड़ा उड़ा फिरता है, छारहि....नीरू=
तुम जल होकर धूल के कणों को मिलाकर शरीर दो)

नैन-सीप मोती भरि आँसू । टुटि टुटि परहिं करहिं तन नासू ॥
पदिक पदारथ पदमिनि नारी । पिय बिनु भइ कौड़ी बर बारी ॥
सँग लेइ गएउ रतन सब जोती । कंचन-कया काँच कै पोती ॥
बूड़ति हौं दुख-दगध गँभीरा । तुम बिनु, कंत!लाव को तीरा?॥
हिये बिरह होइ चढ़ा पहारू । चल जोबन सहि सकै न भारू ॥
जल महँ अगिनि सो जान बिछूना । पाहन जरहिं, होहिं सब चूना ॥
कौनै जतन, कंत! तुम्ह पावौं । आजु आगि हौं जरत बुझावौं ॥

कौन खंड हौं हेरौं, कहाँ बँधे हौं, नाह ।
हेरे कतहुँ न पावौं, बसै तु हिरदय माहँ ॥3॥

(पोती=गुरिया, चल=चंचल, अस्थिर, बीछुना=बिछोह,
जल महँ....बिछूना=वियोग को जल में की आग समझो,
जिससे पत्थर के टुकड़े पिघल कर चूना हो जाते हैं,
चूने के कड़े टुकड़ों पर पानी पड़ते ही वे गरम होकर
गल जाते हैं)

नागमतिहि `पिय पिय' रट लागी । निसि दिन तपै मच्छ जिमि आगी ॥
भँवर, भुजंग कहाँ, हो पिया । हम ठेघा तुम कान न किया ॥
भूलि न जाहि कवल के पाहाँ । बाँधत बिलँब न लागै नाहा ॥
कहाँ सो सूर पास हौं जाऊँ । बाँधा भँवर छोरि कै लाऊँ ॥
कहाँ जाउ को कहै सँदेसा? ।जाउँ सो तहँ जोगिनि के भेसा ॥
फारि पटोरहि पहिरौं कंथा । जौ मोहिं कोउ देखावै पंथा ॥
वह पंथ पलकन्ह जाइ बोहारौं । सीस चरन कै तहाँ सिधारौं ॥

को गुरु अगुवा होइ, सखि! मोहि लावै पथ माँह ।
तम मन धन बलि बलि करौं जो रे मिलावै नाह ॥4॥

(आगी=आग में, ठेघा=सहारा या आश्रय लिया, सूर=भौंरे का
प्रतिद्वंद्वी सूर्य, बोहारों=झाड़ू लगाऊँ, सीस चरन कै=सिर को
पैर बनाकर अर्थात् सिर के बल चलकर)

कै कै कारन रोवै बाला । जनु टूटहिं मोतिन्ह कि माला ॥
रोवति भई, न साँस सँभारा । नैन चुवहिं जस ओरति-धारा ॥
जाकर रतन परै पर हाथा । सो अनाथ किमि जीवै, नाथा! ॥
पाँच रतन ओहि रतनहि लागे । बेगि आउ, पिय रतन सभागे! ॥
रही न जोति नैन भए खीने । स्रवन न सुनौ, बैन तुम लीने ॥
रसनहिं रस नहिं एकौ भावा । नासिक और बास नहिं आवा ॥
तचि तचि तुम्ह बिनु अँग मोहि लागे । पाँचौ दगधि बिरह अब जागे ॥

बिरह सो जारि भसम कै चहै, चहै उड़ावा खेह ।
आइ जो धनि पिय मेरवै, करि सो देइ नइ देह ॥5॥

(कारण=कारुण्य,करुणा,विलाप ओरति=ओलती, पाँच रतन=
पाँचों इंद्रियाँ, ओहि रतनहि लागे=उस रत्नसेन की ओर लगे
हैं, तचि तचि=जल जलकर, तपते से, पाँचौ=पाँचौ इंद्रियाँ)

पिय बिनु व्याकुल बिलपै नागा । बिरहा-तपनि साम भए कागा ॥
पवन पानि कहँ सीतल पीऊ? । जेहि देखे पलुहै तन जीऊ ॥
कहँ सो बास मलयगिरि नाहा । जेहि कल परति देत गल बाहाँ॥
पदमिनि ठगिनि भई कित साथा । जेहिं तें रतन परा पर-हाथा ॥
होइ बसंत आवहु पिय केसरि । देखे फिर फूलै नागेसरि ॥
तुम्ह बिनु, नाह! रहै हिय तचा । अब नहिं बिरह-गरुड़ सौ बचा ॥
अब अँधियार परा, मसि लागी । तुम्ह बिनु कौन बुझावै आगी?॥

नैन,स्रवन, रस रसना सबै खीन भए, नाह ।
कौन सो दिन जेहि भेंटि कै, आइ करै सुख-छाँह ॥6॥

(नागा=नागमती, गरुड़=गरूड़ जो नाग का शत्रु है)

49. देवपाल-दूती-खंड

कुंभलनेर-राय देवपालू । राजा केर सत्रु हिय -सालू ॥
वह पै सुना कि राजा बाँधा । पाछिल बैर सँवरि छर साधा ॥
सत्रु-साल तब नेवरै सोई । जौ घर आब सत्रु कै जोई ॥
दूती एक बिरिध तेहि ठाऊँ । बाम्हन जाति, कुमोदिनि नाऊँ ॥
ओहि हँकारि कै बीरा दीन्हा । तोरे बर मैं बर जिउ कीन्हा ॥
तुइ जो कुमोदिनि कँवल के नियरे । सरग जो चाँद बसै तोहि हियरे ॥
चितउर महँ जो पदमिनि रानी । कर बर छर सौं दे मोहिं आनी ॥

रूप जगत-मन-मोहन औ पदमावति नावँ ।
कोटि दरब तिहि देइहौं, आनि करसि एहि ठावँ ॥1॥

(राजा केर=राजा रत्नसेन का, हिय सालू=हृदय में कसकने
वाला, पै=निश्चय, छर=छल, सत्रु-साल तब नेवरै=शत्रु के मन
की कसर तब पूरी पूरी निकलती है, नेवरै=पूरी होती है,
जोइ=जोय,स्त्री)

कुमुदिनि कहा `देखु, हौं सो हौं । मानुष काह, देवता मोहौं ॥
जस काँवरु चमारिनि लोना । को नहिं छर पाढ़त कै टोना ॥
बिसहर नाचहिं पाढ़त मारे । औ धरि मूँदहि घालि पेटारे ॥
बिरिछ चलै पाढ़त कै बोला । नदी उलटि बह, परबत डोला ॥
पढ़त हरै पंडित मन गहिरे । और को अंध, गूँग औ बहिरै ॥
पाढ़त ऐस देवतन्ह लागा । मानुष कहँ पाढ़त सौं भागा?॥
चढ़ि अकास कै काढत पानी । कहाँ जाइ पदमावति रानी' ॥

दूती बहुत पैज कै बोली पाढ़त बोल ।
जाकर सत्त सुमेरू है, लागे जगत न डोल ॥2॥

(का नहिं छर=कौन नहीं छला गया? पाढ़त कै=पढ़ते हुए,
पाढ़त=पढ़ंत,मंत्र जो पढ़ा जाता है, टोना, मंत्र, जादू, भागा=
बचकर जा सकता है, पैज=प्रतिज्ञा)

दूती बहुत पकावन साधे । मोतिलाडू औ खरौरा बाँधे ॥
माठ, पिराकैं, फैनी, पापर । पहिरे बूझि दूत के कापर ॥
लेइ पूरी भरि डाल अछूती । चितउर चली पैज कै दूती ॥
बिरिध बेस जौ बाँधे पाऊ । कहाँ सो जोबन, कित बेवसाऊ?॥
तन बूढ़ा, मन बूढ़ न होई । बल न रहा, पै लालच सोई ।
कहाँ सो रूप जगत सब राता । कहाँ सो हस्ति जस माता ॥
कहाँ सो तीख नयन, तन ठाढा । सबै मारि जोबन-पन काढा ॥

मुहमद बिरधि जो नइ चलै, काह चलै भुइँ टोह ।
जोबन-रतन हेरान है, मकु धरती महँ होइ ॥3॥

(पकावन=पकवान, साधे=बनवाए, खरौरा=खँडौरा,खाँड या
मिस्री के लड्डू, बूझि=खूब सोच समझकर, कापर कपड़े,
डाल=डला या बड़ा थाल, जौ बाँधे पाऊँ=पैर बाँध दिए,
बेबस कर दिया, बेवसाऊ=व्यवसाय, तन ठाढा=तनी हुई देह)

आइ कुमोदिनी चितउर चढ़ी । जोहन-मोहन पाढ़त पढ़ी ॥
पूछि लीन्ह रनिवास बरोठा । पैठी पँवरी भीतर कोठा ॥
जहाँ पदमिनी ससि उजियारी । लेइ दूती पकवान उतारी ॥
हाथ पसारि धाइ कै भेंटी । "चीन्हा नहिं, राजा कै बेटी?॥
हौं बाम्हनि जेहि कुमुदिनि नाऊँ । हम तुम उपने एकै ठाऊँ ॥
नावँ पिता कर दूबे बेनी । सोइ पुरोहित गँधरबसेनी ॥
तुम बारी तब सिंघलदीपा । लीन्हे दूध पियाइउँ सीपा ॥

ठाँव कीन्ह मैं दूसर कुँभलनेरै आइ ।
सुनि तुम्ह कहँ चितउर महँ, कहिउँ कि भेटौं जाइ ॥4॥

(जोहन-मोहन=देखते ही मोहनेवाला, बरोठा=बैठकखाना,
चीन्हा नहिं=क्या नहीं पहचाना? जेहि=जिसका, उपने=
उत्पन्न हुए, लीन्हे=गोद में लिए, सीपा=सीप में रखकर;
शुक्ति में)

सुनि निसचै नैहर कै कोई । गरे लागि पदमावति रोई ॥
नैन-गगन रबि अँधियारे । ससि-मुख आँसु टूट जनु तारे ॥
जग अँधियार गहन धनि परा । कब लगि सखी नखतन्ह निसि भरा ॥
माय बाप कित जनमी बारी । गीउ तूरि कित जनम न मारी?॥
कित बियाहि दुख दीन्ह दुहेला । चितउर पंथ कंत बँदि मेला ॥
अब एहि जियन चाहि भल मरना । भएउ पहार जन्म दुख भरना ॥
निकसि न जाइ निलज यह जीऊ । देखौं मँदिर सून बिनु पीऊ ॥

कुहुकि जो रोई ससि नखत नैन हैं रात चकोर ।
अबहूँ बोलैं तेहि कुहुक कोकिल, चातक, मोर ॥5॥

(नैहर=मायका;पीहर, नैन-गगन=गगन-नयन, नेत्र-रूपी
आकाश, जनमी=जनी,पैदा की, बारी=लड़की, थुरि=तोड़कर,
मरोड़कर, जनम=जन्मकाल में ही, कंत बँदि=पति की
कैद में, जियन चाहि=जीने की अपेक्षा, कुहुकि=कूक कर,
तहि कुहुक=उसी कूक से,उसी कूक को लेकर)

कुमुदिनि कंठ लागि सुठी रोई । पुनि लेइ रूप-डार मुख धोई ॥
तुइ ससि-रूप जगत उजियारी । मुख न झाँपु निसि होइ अँधियारी ॥
सुनि चकौर-कोकिल-दुख दुखी । घुँघची भई नैन करमुखी ॥
केतौ धाइ मरै कोइ बाटा । सोइ पाव जो लिखा लिलाटा ॥
जो बिधि लिखा आन नहिं होई । कित धावै, कित रौवै कोई ॥
कित कोउ हींछ करै ओ पूजा । जो बिधि लिखा होइ नहिं दूजा ॥
जेतिक कुमुदिनि बैन करेई । तस पदमावति स्रवन न देई ॥

सेंदुर चीर मैल तस, सूखि रही जस फूल ।
जेहि सिंगार पिय तजिगा जनम न पहिरै भूल ॥6॥

(सुठि=खूब, रूप-डार=चाँदी का थाल या परात, केतौ=
कितना ही, हींछ=इच्छा, बैन करेई=बकवाद करती है,
भूल=भूल, भूलकर भी)

तब पकवान उघारा दूती । पदमावति नहिं छुवै अछूती ॥
मोहि अपने पिय केर खमारू । पान फूल कस होइ अहारू?॥
मोकहँ फूल भए सब काँटै । बाँटि देहु जौ चाहहु बाँटै ॥
रतन छुवा जिन्ह हाथन्ह सेंती । और न छुवौं सो हाथ सँकेती ॥
ओहि के रँग भा हाथ मँजीठी । मुकता लेउँ तौ घुँघची दीठी ॥
नैन करमुहें, राती काया । मोति होहिं घुँघची जेहि छाया ॥
अस कै ओछ नैन हत्यारे । देखत गा पिउ, गहै न पारे ॥

का तोर छुवौं पकवान, गुड़ करुवा, घिउ रूख ।
जेहि मिलि होत सवाद रस, लेइ सो गएउ पिउ भूख ॥7॥

(उघारा=खोला, खभारू=खभार,शोक, हाथन्ह सेंति=हाथों से,
हाँथ सँकेती=हाथ से बटोरकर, मुकुता लेउँ....दीठी=हाथ में
मोती लेते ही हाथों की ललाई से वह लाल हो जाता है;
राती=लाल, छाया लाल और काली छाया से)

कुमुदिनि रही कँवल के पासा । बैरी सूर, चाँद कै आसा ॥
दिन कुँभिलानि रही, भइ चूरू । बिगसि रैनि बातन्ह कर भूरू ॥
कस तुइ बारि! रहसि कुँभलानी । सूखि बेलि जस पाव न पानी ॥
अबही कँवल करी तुइँ बारी । कोवँरि बैस, उठत पौनारी ॥
बेनी तोरि मैलि औ रूखी । सरवर माहँ रहसि कस सूखी?॥
पान-बेलि बिधि कया जमाई । सींचत रहै तबहि पलुहाई ॥
करु सिंगार सुख फूल तमोरा । बैठु सिघासन, झूलु हिडोरा ॥

हार चीर निति पहिरहु, सिर कर करहु सँभार ।
भोग मानि लेहु दिन दस, जोबन जात न बार ॥8॥

(कँवल=पद्मावती, बैरी सूर....आसा=कुमुदिनी का बैरी सूर्य है
और वह कुमुदिनी चंद्र की आशा में है अर्थात् उस दूती का
रत्नसेन शत्रु है और वह दूती पद्मावती को प्राप्त करने की
आशा में है, बिगसि रैनि....भूरू=रत्नसेन के अभावरूपी रात
में विकसित या प्रसन्न होकर बातों से भुलाया चाहती है,
रहसि=तू रहती है, कोवँरि=कोमल, पौनारि=मृणाल, बार=देर)

बिहँसि जो जोबन कुमुदिनि कहा । कँवल न बिबगसा, संपुट रहा ॥
ए कुमुदिनि! जोबन तेहि माहा । जो आछै पिउ के सुख-छाहाँ ॥
जाकर छत्र सो बाहर छावा । सो उजार घर कौन बसावा?॥
अहा न राजा रतन अँजोरा । केहिक सिंघासन, केहिक पटोरा? ॥
को पालक पौढ़ै, को माढ़ी? सोवनहार परा बँदि गाढ़ी ॥
चहुँ दिसि यह घर भा अँधियारा । सब सिंगार लेइ साथ सिधारा ॥
कया बेलि तब जानौं जामी । सींचनहार आव घर स्वामी ॥

तौ लहि रहौं झुरानी जौ लहि आव सो कंत ।
एहि फूल, एहि सें र नव होइ उठै बसंत ॥9॥

(अँजोरा=प्रकाशवाला, माढ़ी=मंच,मचिया, बँदि=बंदी में,
एहि फूल=इसी फूल से)

जिनि तुइ, बारि! करसि अस जीऊ । जौ लहि जोबन तौ लहि पीऊ ॥
पुरुष संग आपन केहि केरा । एक कोहाँइ, दुसर सहुँ हेरा ॥
जोबन-जल दिन दिन जस घटा । भँवर छपान, हंस परगटा ॥
सुभर सरोवर जौ लहि नीरा । बहु आदर, पंखी बहु तीरा ॥
नीर घटे पुनि पूछ न कोई । बिरसि जो लीज हाथ रह सोई ॥
जौ लगि कालिंदी, होहि बिरासी । पुनि सुरसरि होइ समुद परासी ॥
जोबन भवँर, फूल तन तोरा । बिरिध पहुँचि जस हाथ मरोरा ॥

कृस्न जो जोबन कारनै गोपितन्ह कै साथ ।
छरि कै जाइहि बानपै, धनुक रहै तोरे हाथ ॥10॥

(कोहाँइ=रूठती है, सहुँ =सामने, भँवर=पानी का भँवर;भौंरे के
समान काले केश, भँवर छपान....परगटा=पानी का भँवर गया
और हंस आया अर्थात् काले केश न रह गए,सफेद बाल हुए,
बिरसि जो लीज=जो बिलस लीजिए,जो बिलास कर लीजिए,
जौ लगि कालिंदि....परासी=जब तक कालिंदी या जमुना है
विलास कर ले फिर तो गंगा में मिलकर, समुद्र में दौड़कर
जाना ही पड़ेगा, अर्थात् जब तक काले बालों का यौवनव है
तब तक विलास कर ले फिर तो सफेद बालोंवाला बुढ़ापा
आवेगा और मृत्यु की ओर झपट ले जायगा, बिरासी,
परासी=तू भागती है अर्थात भागेगी, जोबन भँवर....तोरा=
इस समय जोबनरूपी भौंरा (काले केश) है और फूल सा
तेरा शरीर है, बिरिध=वृद्धावस्था, हाथ मरोरा=इस फूल
को हाथ से मल देगा, बान=तीर वर्ण,कांति, धनुक=
टेढ़ी कमर)

जौ पिउ रतनसेन मोर राजा । बिनु पिउ जोबन कौने काजा ॥
जौ पै जिउ तौ जोबन कहे । बिनु जिउ जोबन काह सो अहे?॥
जौ जिउ तौ यह जोबन भला । आपन जैस करै निरमला ॥
कुल कर पुरुष-सिंघ जेहि खेरा । तेहि थर कैस-सियार बसेरा?॥
हिया फार कूकुर तेहि केरा । सिंघहिं तजि सियार-मुख हेरा ॥
जोबन -नीर घटे का घटा?। सत्त के बर जौ नहिं हिय फटा ॥
सघन मेघ होइ साम बरीसहिं । जोबन नव तरिवर होइ दीसहि ॥

रावन पाप जो जिउ धरा दुवौ जगतमुँह कार ।
राम सत्त जो मन धरा. ताहि छरै को पार? ॥11॥

(आपन जैस=अपने ऐसा, खेरा=घर,बस्ती, थर=स्थल,जगह,)
फार=फाड़े, सत्य के...फटा=यदि सत्त के बल से हृदय न फटे
अर्थात् प्रीति में अंतर न पड़े (पानी घटने से ताल की जमीन
में दरारें पड़ जाती हैं), छरै को पार=कौन छल सकता है))

कित पावसि पुनि जोबन राता । मैँमँत, चढ़ा साम सिर छाता ॥
जोबन बिना बिरिध होइ नाऊँ । बिनु जोबन थाकै सब ठाऊँ ॥
जोबन हेरत मिलै न हेरा । सो जौ जाइ, करै नहिं फेरा ॥
हैं जो केस नग भँवर जो बसा । पुनि बग होहिं, जगत सब हँसा ॥
सेंवर सेव न चित्त करु सूआ । पुनि पछिताहि अंत जब भूआ ।
रूप तोर जग ऊपर लोना । यह जोबन पाहुन चल होना ॥
भोग बिलास केरि यह बेरा । मानि लेहु, पुनि को केहि केरा? ॥

उठत कोंप जस तरिवर तस जोबन तोहि रात ।
तौ लगि रंग लेहु रचि, पुनि सो पियर होइ पात ॥12॥

(राता=ललित, साम सिर छाता=अर्थात् काले केश, थाके=
थक जाता है, बग=बगलों के समान श्वेत, चल होना=चल
देनेवाला है, कोंप=कोंपल,कल्ला, रँग लेहु रचि=रंग लो,भोग-
विलास कर लो)

कुमुदिनि-बैन सुनत हिय जरी । पदमिनि-उरहि आगि जनु परी ॥
रंग ताकर हौं जारौं काँचा । आपन तजि जो पराएहि राँचा ।
दूसर करै जाइ दुइ बाटा । राजा दुइ न होहिं एक पाटा ॥
जेहि के जीउ प्रीति दिढ़ होई । मुख सोहाग सौं बैठे सोई ॥
जोबन जाउ, जाउ सो भँवरा । पिय कै प्रीति न जाइ, जो सँवरा ॥
एहि जग जौ पिउ करहिं न फेरा । ओहि जग मिलहिं जौ दिनदिनहेरा ॥
जोबन मोर रतन जहँ पीऊ । बलि तेहि पिउ पर जोबन जीऊ ॥

भरथरि बिछुरि पिंगला आहि करत जिउ दीन्ह ।
हौं पापिनि जो जियत हौं, इहै दोष हम कीन्ह ॥13॥

(काँचा=कच्चा, राँचा=अनुरक्त हुआ, जाइ दुइ बाटा=दुर्गति को
प्राप्त होता है, जाउ=चाहे चला जाय, भँवरा=काले केश, जो
सँवरा=जिसका स्मरण किया करती हूँ, जौ दिन दिन हेरा=
यदि लगातार ढूँढती रहूँगी)

पदमावति! सो कौन रसौई । जेहि परकार न दूसर होई ॥
रस दूसर जेहि जीभ बईठा । सो जानै रस खाटा मीठा ॥
भँवर बास बहु फूलन्ह लेई । फूल बास बहु भँवरन्ह देई ॥
दूसर पुरुष न रस तुइ पावा । तिन्ह जाना जिन्ह लीन्ह परावा ॥
एक चुल्लू रस भरै न हीया । जौ लहि नहिं फिर दूसर पीया ॥
तोर जोबन जस समुद हिलोरा । देखि देखि जिउ बूड़ै मोरा ॥
रंग और नहिं पाइय बैसे । जरे मरे बिनु पाउब कैसे?॥

देखि धनुक तोर नैना, मोहिं लाग बिष-बान ।
बिहँसि कँवल जो मानै, भँवर मिलावौं आन ॥14॥

(कौनि रसोई=किस काम की रसोई है? जेहि परकार....होई=
जिसमे दूसरा प्रकार न हो,जो एक ही प्रकार की हो, दूसर
पुरुष=दूसरे पुरुष का, बैसे=बैठे रहने से, उद्योग न करने
से, आन=दूसरा)

कुमुदिनि! तुइ बैरिनि, नहिं धाई । तुइ मसि बोलि चढ़ावसि आई ॥
निरमल जगत नीर कर नामा । जौ मसि परै होइ सो सामा ॥
जहँवा धरम पाप नहिं दीसा । कनक सोहाग माँझ जस सीसा ॥
जो मसि परे होइ ससि कारी । सो मसि लाइ देसि मोहिं गोरी ॥
कापर महँ न छूट मसि-अंकू । सो मसि लेइ मोहिं देसि कलंकू ॥
साम भँवर मोर सूरुज करा । और जो भँवर साम मसि-भरा ॥
कँवल भवरि-रबि देखै आँखी । चंदन-बास न बैठै माखी ॥

साम समुद मोर निरमल रतनसेन जगसेन ।
दूसर सरि जो कहावै सो बिलाइ जस फेन ॥15॥

(धाई=धाय,धात्री, मसि चढ़ावसि=मेरे ऊपर तू स्याही पोतती है,
जस सीसा=जैसे सीसा नहीं दिखाई पड़ता है, लाइ लगाकर,
कापर=कपड़ा, सरि=बराबरी का;नदी)

पदमिनि! पुनि मसि बोल न बैना । सो मसि देखु दुहुँ तोरे नना ॥
मसि सिंगार, काजर सब बोला । मसि क बुंद तिल सोह कपोला ॥
लोना सोइ जहाँ मसि-रेखा । मसि पुतरिन्ह तिन्ह सौं जग देखा ॥
जो मसि घालि नयन दुहुँ लीन्ही । सो मसि फेरि जाइ नहिं कीन्हीं ॥
मसि-मुद्रा दुइ कुच उपराहीं । मसि भँवरा जे कवल भँवाहीं ॥
मसि केसहिं, मसि भौंह उरेही । मसि बिनु दसन सोह नहिं देहीं ।
सो कस सेत जहाँ मसि नाही?। सो कस पिंड न जेहि परछाहीं?॥

अस देवपाल राय मसि, छत्र धरा सिर फेर ।
चितउर राज बिसरिगा गएउ जो कुंभलनेर ॥16॥

(घालि लीन्ही=डाल रखी है, मुद्रा=मुहर, उपराहीं=ऊपर,
भँवाहीं=घूमते हैं, कँवल=कमल को, सो कस.....नाहीं=ऐसी
सफेदी कहाँ जहाँ स्याही नहीं, अर्थात् स्याही के भाव के
विना सफेदी की भावना हो ही नहीं सकती, पिंड=साकार
वस्तु या शरीर, जेहि=जिसमें)

सुनि देवपाल जो कुंभलनेरी । पंकजनैन भौंह-धनु फेरी ॥
सत्रु मोरे पिउ कर देवपालू । सो कित पूज सिंघ सरि भालू?॥
दुःख-भरा तन जेत न केसा । तेहि का सँदेस सुनावसि, बेसा?॥
सोन नदी अस मोर पिउ गरुवा । पाहन होइ परै जौ हरुवा ।
जेहि ऊपर अस गरुवा पीऊ । सो कस डोलाए डोलै जीऊ?॥
फेरत नैन चेरि सौ छूटी । भइ कूटन कुटनी तस कूटीं ॥
नाक-कान काटेन्हि, मसि लाई । मूँड मूँडि कै गदह चढ़ाई ॥

मुहमद बिधि जेहि गरु गढा का कोई तेहि फूँक ।
जेहि के भार जग थिर रहा, उड़ै न पवन के झूँक ॥17॥

(भौंह=धनु, फेरी=क्रोध से टेढ़ी भौं की, सरि पूज=बराबरी
को पहुँच सकता है, दुःख भरा तन....केसा=शरीर में जितने
रोयें या बाल नहीं उतने दुःख भरे हैं, सोन नदी....गरुवा=
महाभारत में शिला नाम एक ऐसी नदी का उल्लेख है
जिसमें कोई हलकी चीज डाल दी जाय तो भी डूब जाती
है और पत्थर हो जाती है (मेगस्थिनीज ने भी ऐसा ही
लिखा है। गढ़वाल के कुछ सोतों के पानी में इतना रेत
और चूना रहता है कि पढ़ी हुई लकड़ी पर जमकर उसे
पत्थर के रूप में कर देता है) पाहन होइ....हरुवा=हलकी
वस्तु भी हो तो उसमें पड़ने पर पत्थर हो जाती है,
चेरि=दासियाँ, छूटीं=दौड़ीं, कूटन=कुटाई, प्रहार, कुटनी=
कुट्टिनी,दूती, झूँक=झोंका)

50. बादशाह-दूती-खंड

रानी धरमसार पुनि साजा । बंदि मोख जेहि पावहिं राजा ॥
जावत परदेसी चलि आवहिं । अन्नदान औ पानी पावहिं ॥
जोगि जती आवहिं जत कंथी । पूछै पियहि, जान कोइ पंथी ॥
दान जो देत बाहँ भइ ऊँची । जाइ साह पहँ बात पहूँची ॥
पातुरि एक हुति जोगि-सवाँगी । साह अखारे हुँत ओहि माँगी ॥
जोगिनि-भेस बियोगिनि कीन्हा । सींगी-सबद मूल तँत लीन्हा ॥
पदमिनि पहँ पठई करि जोगिनि । बेगि आनु करि बिरह-बियोगिनि ॥

चतुर कला मन मोहन, परकाया-परवेस ।
आइ चढ़ी चितउरगढ़ होइ जोगिनि के भेस ॥1॥

(धरमसार=धर्मशाला,सदाबर्त,खैरातखाना, मोख पावहिं=
छूटें, जत=जितने, हुति=थी, जोगि-सवाँगी=जोगिन का
स्वाँग बनाने वाली, अखारे हुँत=रंगशाला से,नाचघर से,
माँगा=बुला भेजा, तँत=तत्त्व, कला मनमोहन=मन
मोहने की कला में)

माँगत राजबार चलि आई । भीतर चेरिन्ह बात जनाई ॥
जोगिनि एक बार है कोई । माँगै जैसि बियोगिनि सोई ॥
अबहीं नव जोबन तप लीन्हा । फारि पटोरहि कंथा कीन्हा ॥
बिरह-भभूत, जटा बैरागी । छाला काँध, जाप कँठलागी ॥
मुद्रा स्रवन, नाहिं थिर जीऊ । तन तिरसूल, अधारी पीऊ ॥
छात न छाहँ, धूप जनु मरई । पावँ न पँवरी, भूभुर जरई ॥
सिंगी सबद, धँधारी करा । जरै सो ठाँव पावँ जहँ धरा ॥

किंगरी गहे बियोग बजावै, बारहि बार सुनाव ।
नयन चक्र चारिउ दिसि (हेरहिं) दहुँ दरसन कब पाव ॥2॥

(राजबार=राजद्वार, बार=द्वार, तन तिरसूल....पीऊ=सारा
शरीर ही त्रिशूलमय हो गया है और अधारी के स्थान पर
प्रिय ही है अर्थात् उसी का सहारा है, पवँरी=चट्टी या खड़ाऊँ,
भूभुर=धूप से तपी धूल या बालू, धँधारी=गोरखधंधा)

सुनि पदमावति मँदिर बोलाई । पूछा "कौन देस तें आई?॥
तरुन बैस तोहि छाज न जोगू । केहि कारन अस कीन्ह बियोगू" ॥
कहेसि बिरह-दुख जान न कोई । बिरहनि जान बिरह जेहि होई ॥
कंत हमार गएउ परदेसा । तेहि कारन हम जोगिनि भेसा ॥
काकर जिउ, जोबन औ देहा । जौ पिउ गएउ, भएउ सब खेहा ॥
फारि पटोर कीन्ह मैं कंथा । जहँ पिउ मिलहिं लेउँ सो पंथा ॥
फिरौं, करौं चहुँ चक्र पुकारा । जटा परीं, का सीस सँभारा?॥

हिरदय भीतर पिउ बसै, मिलै न पूछौं काहि?॥
सून जगत सब लागै, ओहि बिनु किछु नहिं आहि ॥3॥

(छाज न=नहीं सोहता, खेहा=धूल, मिट्टी, चहुँ चक्र=पृथ्वी
के चारों खूँट में, आहि=है)

स्रवन छेद महँ मुद्रा मेला । सबद ओनाउँ कहाँ पिउ खेला ॥
तेहि बियोग सिंगी निति पूरौं । बार बार किंगरी लेइ झूरौं ॥
को मोहिं लेइ पिउ कंठ लगावै । परम अधारी बात जनावै ॥
पाँवरि टूटि चलत, पर छाला । मन न भरै, तन जोबन बाला ॥
गइउँ पयाग, मिला नहिं पीऊ । करवत लीन्ह, दीन्ह बलि जीऊँ ॥
जाइ बनारस जारिउँ कया । पारिउँ पिंड नहाइउँ गया ॥
जगन्नाथ जगरन कै आई । पुनि दुवारिका जाइ नहाई ॥

जाइ केदार दाग तन, तहँ न मिला तिन्ह आँक ।
ढूँढि अजोध्या आइउँ सरग दुवारी झाँक ॥4॥

(ओनाउँ=झुकती हूँ, सबद ओनाउँ...खेला=आहट लेने के
लिए कान लगाए रहती हूँ कि प्रिय कहाँ गया, झूरों=
सूखती हूँ, अधारी=सहारा देनेवाली, पर=पड़ता है, बाला=
नवीन,जागरण, दाग=दागा,तप्त मुद्रा ली, तिन्ह=उस
प्रिय का, आँक=चिन्ह,पता, सरगदुवारी=अयोध्या में
एक स्थान)

गउमुख हरिद्वार फिर कीन्हिउँ । नगरकोट कटि रसना दीन्हिउँ ॥
ढूँढिउँ बालनाथ कर टीला । मथुरा मथिउँ, नसो पिउ मीला ॥
सुरुजकुंड महँ जारिउँ देहा । बद्री मिला न जासौं नेहा ॥
रामकुंड, गोमति, गुरुद्वारू । दाहिनवरत कीन्ह कै बारू ॥
सेतुबंध, कैलास, सुमेरू । गइउँ अलकपुर जहाँ कुबेरू ॥
बरम्हावरत ब्रह्मावति परसी । बेनी-संगम सीझिउँ करसी ॥
नीमषार मिसरिख कुरुछेता । गोरखनाथ अस्थान समेता ॥

पटना पुरुब सो घर घर हाँडि फिरिउँ संसार ।
हेरत कहूँ न पिउ मिला, ना कोइ मिलवनहार ॥5॥

(गउमुख=गोमुख तीर्थ, गंगोत्तरी का वह स्थान जहाँ से
गंगा निकलती है, नागरकोट=जहाँ देवी का स्थान है, कटि
रसना दीन्हिउँ=जीभ काटकर चढ़ाई, बालनाथ कर टीला=
पंजाब में सिंध और झेलम के बीच पड़नेवाले नमक के
पहाड़ों की एक चोटी, मीला=मिला, सुरुजकुंड=अयोध्या,
हरिद्वार आदि कई तीर्थों में इस नाम के कुंड हैं, बद्री=
बदरिकाश्रम में, कै बारू=कई बार, अलकपुर=अलकापुरी,
ब्रह्मावति=कोई नदी, करसी=करीषाग्नि में; उपलों की
आग में, हाँडि फिरिउँ=छान डाला,ढूँढ डाला,टटोल डाला)

बन बन सब हेरेउँ नव खंडा । जल जल नदी अठारह गंडा ॥
चौसठ तीरथ के सब ठाऊँ । लेत फिरिउँ ओहि पिउ कर नाऊँ ॥
दिल्ली सब देखिउँ तुरकानू । औ सुलतान केर बंदिखानू ॥
रतनसेन देखिउँ बँदि माहाँ । जरै धूप, खन पाव न छाहाँ ॥
सब राजहि बाँधे औ दागे । जोगनि जान राज पग लागे ॥
का सो भोग जेहि अंत न केऊ । यह दुख लेइ सो गएउ सुखदेऊ ॥
दिल्ली नावँ न जानहु ढीली । सुठि बँदि गाढ़ि,निकस नहीं कीली ॥

देखि दगध दुख ताकर अबहुँ कया नहिं जीउ ।
सो धन कैसे दहुँ जियै जाकर बँदि अस पीउ? ॥6॥

(राज पगलागे=राजा ने प्रणाम किया, न केऊ=पास में
कोई न रह जाय, लेइ गएउ=लेने या भोगने गया,
सुखदेऊ=सुख देनेवाला तुम्हारा प्रिय, दिल्ली नावँ=
दिल्ली या ढिल्ली इस नाम से, सुठि=खूब, कीली=
कारागार के द्वार का अर्गल, अबहुँ कया नहिं जीउ=
अब भी मेरे होश ठिकाने नहीं)

पदमावति जौ सुना बँदि पीऊ । परा अगिनि महँ मानहुँ घीऊ ।
दौरि पायँ जोगिनि के परी । उठी आगि अस जोगिनि जरी ॥
पायँ देहि, दुइ नैनन्ह लाऊँ । लेइ चलु तहाँ कंत जेहि ठाऊँ ॥
जिन्ह नैनन्ह तुइ देखा पीऊ । मोहिं देखाउ, देहुँ बलि जीऊ ॥
सत औ धरम देहुँ सब तोहीं । पिउ कै बात कहै जौ मोहीं ॥
तुइ मोर गुरू, तोरि हौं चेली । भूली फिरत पंथ जेहि मेली ॥
दंड एक माया करु मोरे । जोगिनि होउँ, चलौं सँग तोरे ॥

सखिन्ह कहा, सुनु रानी करहु न परगट भेस ।
जोगी जोगवै गुपुत मन लेइ गुरु कर उपदेस ॥7॥

(माया=मया,दया)

भीख लेहु, जोगिनि! फिरि माँगू । कंत न पाइय किए सवाँगू ॥
यह बड़ जोग बियोग जो सहना । जेहुँ पीउ राखै तेहुँ रहना ॥
घर ही महँ रहु भई उदासा । अँजुरी खप्पर, सिंगी साँसा ॥
रहै प्रेम मन अरुझा गटा । बिरह धँधारि, अलक सिर जटा ॥
नैन चक्र हेरे पिउ-कंथा । कया जो कापर सोई कंथा ॥
छाला भूमि, गगन सिर छाता । रंग करत रह हिरदय राता ॥
मन -माला फेरै तँत ओही । पाँचौ भूत भसम तन होहीं ॥

कुंडल सोइ सुनु पिउ-कथा, पँवरि पाँव पर रेहु ।
दंडक गोरा बादलहि जाइ अधारी लेहु ॥8॥

(फिरि माँगू=जाओ,और जगह घूम कर माँगो, सवाँग=स्वाँग,
नकल, आडंबर, यह बड़....सहना=वियोग का जो सहना है यही
बड़ा भारी योग है, जेहुँ=जैसे,ज्यों, तेहुँ=त्यों,उस प्रकार, सिंगी
साँसा=लंबी साँस लेने को ही सिंगी फूँकना समझो, गटा=
गटरमाला, रहै प्रेम....गटा=जिसमें उलझा हुआ मन है उसी
प्रेम को गटरमाला समझो, छाला=मृगछाला, तँत=तत्त्व या
मंत्र, पाँचों भूत...होहीं=शरीर के पंचभूतों को ही रमी हुई
भभूत या भस्म समझो, पँवरि पाँच पर रेहु=पाँव पर जो
धूल लगे उसी को खड़ाऊँ समझ, अधारी=अड्डे के आकार
की लकड़ी जिसे सहारे के लिये साधु रखते हैं, अधारी
लेहु=सहारा लो)

51. पद्मावति-गोरा-बादल-संवाद-खंड

सखिन्ह बुझाई दगध अपारा । गइ गोरा बादल के बारा ॥
चरन-कँवल भुइँ जनम न धरे । जात तहाँ लगि छाला परे ॥
निसरि आए छत्री सुनि दोऊ । तस काँपे जस काँप न कोऊ ॥
केस छोरि चरनन्ह-रज झारा । कहाँ पावँ पदमावति धारा?॥
राखा आनि पाट सोनवानी । बिरह-बियोगिनि बैठी रानी ॥
दोउ ठाढ़ होइ चँवर डोलावहिं । "माथे छात, रजायसु पावहिं ॥
उलटि बहा गंगा कर पानी । सेवक-बार आइ जो रानी ॥

का अस कस्ट कीन्ह तुम्ह, जो तुम्ह करत न छाज ।
अज्ञा होइ बेगि सो, जीउ तुम्हारे काज " ॥1॥

(बारा=द्वार पर, काँपे=चौंक पड़े, सोनवानी=सुनहरी, माथे
छात=आपके माथे पर सदा छत्र बना रहे! बार=द्वार, का=
क्या, तुम्ह न छाज=तुम्हें नहीं सोहता)

कहो रोइ पदमावति बाता । नैनन्ह रकत दीख जग राता ॥
उथल समुद जस मानिक-भरे । रोइसि रुहिर-आँसु तस ढरे ॥
रतन के रंग नैन पै वारौं । रती रती कै लोहू ढारौं ॥
भँवरा ऊपर कँवल भवावौं । लेइ चलु तहाँ सूर जहँ पावौं ॥
हिय कै हरदि, बदन कै लोहू । जिउ बलि देउँ सो सँवरि बिछोहू ॥
परहिं आँसु जस सावन-नीरू । हरियरि भूमि, कुसुंभी चीरू ॥
चढ़ी भुअँगिनि लट लट केसा । भइ रोवति जोगिनि के भेसा ॥

बीर बहूटी भइ चलीं, तबहुँ रहहिं नहिं आँसु ।
नैनहिं पंथ न सूझै, लागेउ भादौं मासु ॥2॥

(दीख=दिखाई पड़ा, राता=लाल, उलथ=उमड़ता है, रंग=
रंग पर, पै=अवश्य;निश्चय, भँवरा=रत्नसेन, कँवल=नेत्र
(पद्मिनी के), हरदि=कमल के भीतर छाते का रंग पीला
होता है, बदन कै लोहू=कमल के दल का रंग रक्त होता है)

तुम गोरा बादल खँभ दोऊ । जस रन पारथ और न कोऊ ॥
ढुख बरखा अब रहै न राखा । मूल पतार, सरग भइ साखा ॥
छाया रही सकल महि पूरी । बिरह-बेलि भइ बाढि खजूरी ।
तेहि दुख लेत बिरिछ बन बाढे । सीस उघारे रोवहिं ठाढे ॥
पुहुमि पूरि, सायर दुःख पाटा । कौड़ी केर बेहरि हिय फाटा ॥
बेहरा हिये खजूर क बिया । बेहर नाहिं मोर पाहन-हिया ॥
पिय जेहि बँदि जोगिनि होइ धावौं । हौं बँदि लेउँ, पियहि मुकरावौं ।

सूरुज गहन-गरासा, कँवल न बैठे पाट ।
महूँ पंथ तेहि गवनब, कंत गए जेहि बाट ॥3॥

(खंभ=खंभे,राज्य के आधार-स्वरूप, पारथ=पार्थ,अर्जुन,
बरखा=बर्षा में, तेहि दुख लेत ...बाढे=उसी दुःख की बाढ
को लेकर जंगल के पेड़ बढ़कर इतने ऊँचे हुए हैं, बेहरि=
विदीर्ण होकर, जेहि बँदि=जिस बंदीगृह में, मुकरावौं=
मुक्त कराऊँ,छुड़ाऊँ)

गोरा बादल दोउ पसीजे । रोवत रुहिर बूड़ि तन भीजे ॥
हम राजा सौं इहै कोहाँने । तुम न मिलौ, धरिहैं तुरकाने ।
जो मति सुनि हम गये कोहाँई । सो निआन हम्ह माथे आई ॥
जौ लगि जिउ, नहिं भागहिं दोऊ । स्वामि जियत कित जोगिनि होऊ ॥
उए अगस्त हस्ति जब गाजा । नीर घटे घर आइहि राजा ॥
बरषा गए, अगस्त जौ दीठिहि । परिहि पलानि तुरंगम पीठिहि ॥
बेधों राहु, छोड़ावहुँ सूरू । रहै न दुख कर मूल अँकूरू॥

सोइ सुर, तुम ससहर, आनि मिलावौं सोइ ।
तस दुख महँ सुख उपजै, रैनि माहँ दिनि होइ ॥4॥

(तुरकान=मुसलमान लोग, उए अगस्त=के उदय होने पर,
शरत् आने पर, हस्ति जब गाजा=हाथी चढ़ाई पर गरजेंगे;
या हस्त नक्षत्र गरजेगा, आइहि=आवेगा, दीठिहि=दिखाई
देखा, परिहि पलानि...पीठिहि=घोड़ों की पीठ पर जीन
पड़ेगी चढ़ाई के लिये घोड़े कसे जायँगे, अँकुर, ससहर=
शशधर,चंद्रमा)

लीन्ह पान बादल औ गोरा । "केहि लेइ देउँ उपम तुम्ह जोरा?॥
तुम सावंत, न सरवरि कोऊ । तुम्ह हनुवंत अंगद सम दोऊ ॥
तुम अरजुन औ भीम भुवारा । तुम बल रन-दल-मंडनहारा ॥
तुम टारन भारन्ह जग जाने । तुम सुपुरुष जस करन बखाने ॥
तुम बलबीर जैस जगदेऊ । तुम संकर औ मालकदेऊ ॥
तुम अस मोरे बादल गोरा । काकर मुख हेरौं, बँदिछोरा? ॥
जस हनुवँत राघव बँदि छोरी । तस तुम छोरि मेरावहु जोरी ॥

जैसे जरत लखाघर, साहस कीन्हा भीउँ ।
जरत खंभ तस काढहु, कै पुरुषारथ जीउ ॥5॥

(लीन्ह पान=बीड़ा लिया,प्रतिज्ञा की, केहि...जोरा=यहाँ से
पद्मावती के वचन हैं, सावंत=सामंत, भुवारा=भूपाल, टारन
भारन्ह=भार हटानेवाले, करन=कर्ण, मालकदेऊ=मालदेव,
बँदिछोर=बंधन छुड़ानेवाले, लखाघर=लाक्षागृह, खंभ=
राज्य का स्तंभ,रत्नसेन)

रामलखन तुम दैत-सँघारा । तुमहीं घर बलभद्र भुवारा ॥
तुमही द्रोन और गंगेउ । तुम्ह लेखौं जैसे सहदेऊ ॥
तुमही युधिष्ठिर औ दुरजोधन । तुमहिं नील नल दोउ संबोधन ॥
परसुराम राघव तुम जोधा । तुम्ह परतिज्ञा तें हिय बोधा ॥
तुमहिं सत्रुहन भरत कुमारा । तुमहिं कृस्न चानूर सँघारा ॥
तुम परदुम्न औ अनिरुध दोऊ । तुम अभिमन्यु बोल सब कोऊ ॥
तुम्ह सरि पूज न विक्रम साके । तुम हमीर हरिचँद सत आँके ॥

जस अति संकट पंडवन्ह भएउ भीवँ बँदि छोर ।
तस परबस पिउ काडहु, राखि लेहु भ्रम मोर "॥6॥

(दैत सँभारा=दैत्यों का संहार करनेवाले, गंगेऊ=गाँगेय,
भीष्म-पितामह, तुम्ह लेखौं=तुमको समझती हूँ, संबोधन=
ढाढस देनेवाले, तुम्ह परतिज्ञा=तुम्हारी प्रतिज्ञा से, बोधा=
प्रबोध,तसल्ली, सत आँके=सत्य की रेखा खींची है, भ्रम=
प्रतिष्ठा,सम्मान)

गोरा बादल बीरा लीन्हा । जस हनुवंत अंगद बर कीन्हा ॥
सजहु सिंघासन, तानहु छातू । तुम्ह माथे जुग जुग अहिबातू ॥
कँवल-चरन भुइँ धरि दुख पावहु । चढ़ि सिंघासन मँदिर सिघावहु ॥
सुनतहिं सूर कँवल हिय जागा । केसरि-बरन फूल हिय लागा ॥
जनु निसि महँ दिन दीन्ह देखाई । भा उदोत, मसि गई बिलाई ॥
चढ़ी सिंघासन झमकति चली । जानहुँ चाँद दुइज निरमली ॥
औ सँग सखी कुमोद तराईं । ढारत चँवर मँदिर लेइ आईं ॥

देखि दुइज सिंघासन संकर धरा लिलाट ।
कँवल-चरन पदमावती लेइ बैठारी पाट ॥7॥

(बर=बल, अहिबातू=सौभाग्य सोहाग, उदोत=प्रकाश,
देखि दुइज...लिलाट=दूज के चंद्रमा को देख उसे बैठने
के लिये शिवजी ने अपना ललाट-रूपी सिंहासन रखा
अर्थात् अपने मस्तक पर रखा)

52. गोरा-बादल-युद्ध-यात्रा-खंड

बादल केरि जसौवै माया । आइ गहेसि बादल कर पाया॥
बादल राय! मोर तुइ बारा । का जानसि कस होइ जुझारा॥
बादसाह पुहुमीपति राजा । सनमुख होइ न हमीरहि छाजा॥
छत्तिास लाख तुरय दर साजहिं । बीस सहस हस्ती रन गाजहिं॥
जबहीं आइ चढ़ै दल ठटा । दीखत जैसि गगन घन घटा॥
चमकहिं खड़ग जो बीजु समाना । घुमरहिं गलगाजहिं नीसाना॥
बरिसहिं सेल बान घनघोरा । धारज धार न बाँधिाहि तोरा॥
जहाँ दलपती दलि मरहिं, तहाँ तोर का काज।
आजु गवन तोर आवै, बैठि मानु सुख राज॥1॥

(जसौवै=यह 'यशोदा' शब्द का प्राकृत या अप्रभंश रूप है,
पाया=पैर, जुझारा=युध्द, ठटा=समूह बाँधाकर)

मातु! न जानसि बालक आदी । हौं बादला सिंह रनबादी॥
सुनि गजजूह अधिाक जिउ तपा । सिंघ क जाति रहै किमिछपा?॥
तौ लगि गाज न गाज सिंघेला । सौंह साह सौं जुरौं अकेला॥
को मोहिं सौंह होइ मैमंता । फारौं सूँड, उखारौं दंता॥
जुरौं स्वामि सँकरे जस ढारा । पेलौं जस दुरजोधान भारा॥
अंगद कोपि पाँव जस राखा । टेकौं कटक छतीसौ लाखा॥
हनुवँत सरिस जंघ बर जोरौं । दहौं समुद्र, स्वामि बँदि छोरौं॥
सो तुम, मातु जसौवै। मोंहि न जानहु बार।
जहँ राजा बलि बाँधा छोरौं पैठि पतार॥2॥

(आदी=नितांत,बिलकुल, सिंघेला=सिंह का बच्चा, मैमंता=
मस्त हाथी, स्वामि सँकरे=स्वामी के संकट के समय में, जस
ढारा=ढाल के समान होकर, पेलौं=जोर से चलाऊँ,भारा=भाला,
टेकौं=रोक लूँ, जंघ बर जोरौं=जाँघों में बल लाऊँ,बार=बालक)

बादल गवन जूझ कर साजा । तैसेहि गवन आइ घर बाजा॥
का बरनौं गवने कर चारू । चंद्रबदनि रुचि कीन्ह सिंगारू॥
माँग मोति भरि सेंदुर पूरा । बैठ मयूर, बाँक तस जूरा॥
भौंहैं धानुक टकोरि परीखे । काजर नैन, मार सर तीखे॥
घालि कचपची टीका सजा । तिलक जो देख ठाँव जिउ तजा॥
मनि कुंडल डोलैं दुइवना । सीस धुनहिं सुनि सुनि पिउ गवना॥
नागिनि अलक, झलक उर हारू । भयउ सिंगार कंत बिनु भारू॥
गवन जो आवा पँवरि महँ, पिउ गवने परदेस।
सखी बुझावहिं किमि अनल, बुझै सो केहि उपदेस?॥3॥

(जूझ=युध्द, गवन=वधू का प्रथम प्रवेश, चारू=रीति-व्यवहार,
बाँक=बाँका, सुंदर, जूरा=बँधी हुई चोटी का गुच्छा, टकोरि=
टंकार देकर, परीखे=परीक्षा की, आजमाया, घालि=डालकर,
लगाकर, कचपची=कृत्तिाका नक्षत्रा;चमकी)

मानि गवन सो घूँघुट काढी । बिनवै आइ बार भइ ठाढी॥
तीखे हेरि चीर गहि ओढा । कंत न हेर, कीन्हि जिउ पोढा॥
तब धानि बिहँसि कीन्ह सहुँ दीठी । बादल ओहि दीन्हि फिरिपीठी॥
मुख फिराइ मन अपने रीसा । चलत न तिरिया कर मुख दीसा॥
भा मिन मेष नारि के लेखे । कस पिउ पीठि दीन्हि मोहिं देखे॥
मकु पिउ दिस्टि समानेउसालू । हुलसी पीठि कढावौं फालू॥
कुच तूँबी अब पीठि गड़ोवौं । गहै जो हूकि, गाढ रस धोवौं॥
रहौं लजाइ त पिउ चलै, गहौं त कह मोहिं ढीठ।
ठाढि तेवानि कि का करौं, दूभर दुऔ बईठ॥4॥

(बार=द्वार, हेर=ताकता है, पोढा=कड़ा, मिन मेष=आगा पीछा,
सोच-विचार, मकु...सालू=शायद मेरी तीखी दृष्टि का साल उसके
हृदय में पैठ गया, हुलसी...फालू=वह साल पीठ की ओर हुलसकर
जा निकला है इससे मैं वह गड़ा हुआ तीर का फल निकलवा
दूँ, कूच तूँबी...गड़ोवौं=जैसे धाँसे हुए काँटे आदि को तूँबी लगाकर
निकालते हैं वैसे ही अपनी कुचरूपी तुंबी जरा पीठ से लगाऊँ,
गहै जौ...धोवौं=पीड़ा से चौंककर जब वह मुझे पकड़े तब मैं
गाढ़े रस से उसे धो डालूँ अर्थात् रसमग्न कर दूँ, तेवानि=
चिंता में पड़ी हुई, दुऔ=दोनों बातें)

लाज किए जौ पिउ नहिं पाबौं । तजौं लाज कर जोरि मनावौं॥
करि हठ कंत जाइ जेहि लाजा । घूँघुट लाज आवा केहि काजा॥
तब धानि बिहँसि कहा गहि फेंटा । नारि जो बिनबै कंत न मेटा॥
आजु गवन हौं आई नाहाँ । तुम न, कंत! गवनहु रन माहाँ॥
गवन आव धानि मिलै के ताईं । कौन गवन जौ बिछुरै साईं॥
धानि न नैन भरि देखा पीऊ । पिउ न मिला धानि सौं भरि जीऊ॥
जहँ अस आस भरा है केवा । भँवर न तजै बास रसलेवा॥
पायँन्ह धारा लिलाट धानि, बिनय सुनहु, हो राय!।
अलकपरी फँदवार होइ, कैसेहु तजै न पाय॥5॥

(मिलै के ताईं=मिलने के लिए, फँदवार=फंदा)

छाँडघ फेंट धानि! बादल कहा । पुरुष गवन धानि फेंट न गहा॥
जो तुइ गवन आइ, गजगामी । गवन मोर जहँवा मोर स्वामी॥
जौ लगि राजा छूटि न आवा । भावै बीर, सिंगार न भावा॥
तिरिया भूमि खड़ग कै चेरी । जीत जो खड़ग होइ तेहि केरी॥
जेहि घर खड़ग मोंछ तेहिं गाढ़ी । जहाँ न खड़ग मोंछ नहिं दाढ़ी॥
तब मुँह मोछ, जीउ पर खेलौं । स्वामि काज इंद्रासन पेलौं॥
पुरुष बोलि कै टरै न पाछू । दसन गयंद, गीउ नहिं काछू॥
तुइ अबला धानि! कुबुधिा बुधिा, जानै काह जुझार।
जेहि पुरुषहि हिय बीररस, भावै तेहि न सिंगार॥6॥

(पुरुष गवन=पुरुष के चलते समय, बीर=वीर रस, मोंछ=मूँछें,
दसन गयंद...काछू=वह हाथी के दाँत के समान है, जो
निकलकर पीछे नहीं जाते, कछुए की गर्दन के समान नहीं,
जो जरा सी आहट पाकर पीछे घुस जाता है)

जौ तुम चहहु जूझि, पिउ! बाजा । कीन्ह सिंगार जूझ मैं साजा॥
जोबन आइ सौंह होइ रोपा । बिखरा बिरह, काम दल कोपा॥
बहेउ बीररस सेंदुर माँगा । राता रुहिर खड़ग जस नाँगा॥
भौंहैं धानुक नैन सर साधो । काजर पनच, बरुनि बिष बाँधो॥
जनु कटाछ स्यों सान सँवारे । नखसिख बान सेल अनियारे॥
अलक फाँस गिउ मेल असूझा । अधार अधार सौं चाहहिं जूझा॥
कुंभस्थल कुच दोउ मैमंता । पेलौं सौंह, सँभारहु, कंता?॥
कोप सिंगार, बिरह दल, टूटि होइ दुइ आधा।
पहिले मोहिं संग्राम कै, करहु जूझ कै साधा॥7॥

(बाजा चहहु=लड़ना चाहते हो, पनच=धानुष की डोरी,
अनियारे=नुकीले,तीखे, कोप=कोपा है, मोहिं=मुझसे)

एकौ बिनति न मानै नाहाँ । आगि परी चित उर धानि माहाँ॥
उठा जो धूम नैन करवाने । लागे परै ऑंसु झहराने॥
भीजै हार, चीर हिय चोली । रही अछूत कंत नहिं खोली॥
भीजी अलक छुए कटि मंडन । भीजे कँवल भँवर सिर फुंदन॥
चुइ चुइ काजर ऑंचर भीजा । तबहुँ न पिउ कर रोवँ पसीजा॥
जौ तुम कंत! जूझ जिउ कांधा । तुम किय साहस, मैं सत बाँधा॥
रन संग्राम जूझि जिति आवहु । लाज होइ जौ पीठि देखावहु॥
तुम्ह पिउ साहस बाँधा, मैं दिय माँग सेंदूर।
दोउ सँभारे होइ सँग, बाजै मादर तूर॥8॥

(चित उर=(क) मन और हृदय में, (ख) चित्तौर, आगि परी माहाँ=
इस पंक्ति चित्तौर की स्त्रिायों के सती होने का संकेत है, करुवाने=
कड़वे धुएँ से दुखने लगे, कटिमंडन=करधानी, फुंदन=चोटी का
फुलरा, कई प्रतियों में यह पाठ है-
छाँडि चला, हिरदय देइ दाहू । निठुर नाह आपन नहिं काहू॥
सबै सिंगार भीजिभुइँ चूवा । छार मिलाइ कंत नहि छूवा॥
रोए कंत न बहुरै, तेहि रोए का काज?
कंत धारा मन जूझ रन, धानि साजा सर साज॥)

53. गोरा-बादल-युद्ध-खंड

मतैं बैठि बादल औ गोरा । सो मत कीज परै नहिं भोरा ॥
पुरुष न करहिं नारि-मति काँची । जस नौशाबा कीन्ह न बाँची ॥
परा हाथ इसकंदर बैरी । सो कित छोड़ि कै भई बँदेरी?॥
सुबुधि सो ससा सिंघ कहँ मारा । कुबुधि सिंघ कूआँ परि हारा ॥
देवहिं छरा आइ अस आँटी । सज्जन कंचन, दुर्जन माटी ॥
कंचन जुरै भए दस खंडा । फूटि न मिलै काँच कर भंडा ॥
जस तुरकन्ह राजा छर साजा । तस हम साजि छोड़ावहिं राजा ॥

पुरुष तहाँ पै करै छर जहँ बर किए न आँट ।
जहाँ फूल तहँ फूल है, जहाँ काँट तहँ काँट ॥1॥

(मतैं=सलाह करते हैं, कीज=कीजिए, नौशाबा=सिकंदरनामा
के अनुसार एक रानी जिसके यहाँ सिकंदर पहले दूत बन
कर गया था, उसने सिकंदर को पहचान कर भी छोड़ दिया,
पीछे सिकंदर ने उसे अपना अधीन मित्र बनाया और उसने
बड़ी धूमधाम से सिकंदर की दावत की, देवहि छरा=राजा
को उसने (अलाउद्दीन ने) छला, आइ अस आँठी=इस
प्रकार अमठी पर चढ़कर अर्थात् कब्जे में आकर भी,
भंडा=भाँडा,बरतन, न आँट=नहीं पार पा सकते)

सोरह सै चंडोल सँवारे । कुँवर सजोइल कै बैठारे ॥
पदमावति कर सजा बिवानू । बैठ लोहार न जानै भानू ॥
रचि बिवान सो साजि सँवारा । चहुँ दिसि चँवर करहिं सब ढारा ॥
साजि सबै चंडोल चलाए । सुरँग ओहार, मोति बहु लाए ॥
भए सँग गोरा बादल बली । कहत चले पदमावति चली ॥
हीरा रतन पदारथ झूलहिं । देखि बिवान देवता भूलहिं ॥
सोरह सै संग चलीं सहेली । कँवल न रहा, और को बेली?॥

राजहि चलीं छोड़ावै तहँ रानी होइ ओल ।
तीस सहस तुरि खिंची सँग, सोरह सै चंडोल ॥2॥

(चंडोला=पालकी, कुँवर=राजपूत सरदार, सजोइल=
हथियारों से तैयार, बैठ लोहार...भानू=पद्मावती के
लिये जो पालकी बनीं थी उसके भीतर एक लुहार
बैठा, इस बात का सूर्य को भी पता न लगा,
ओहार=पालकी ढाँकने का परदा, कँवल...जब
पद्मावतीही नहीं रही तब और सखियों का क्या?
ओल होइ=ओल होकर, इस शर्त पर बादशाह के
यहाँ रहने जाकर कि राजा छोड़ दिए जायँ कोई
व्यक्ति जमानत के तौर पर यदि रख लिया
जाता है तो उसे ओल कहते हैं), तुरि=घोड़ियाँ)

राजा बँदि जेहि के सौंपना । गा गोरा तेहि पहँ अगमना ॥
टका लाख दस दीन्ह अँकोरा । बिनती कीन्हि पायँ गहि गोरा ॥
विनवा बादसाह सौं जाई । अब रानी पदमावति आई ॥
बिनती करै आइ हौं दिल्ली । चितउर कै मोहि स्यो है किल्ली ॥
बिनती करै, जहाँ है पूजी । सब भँडार कै मोहि स्यो कूँजी ॥
एक घरी जौ अज्ञा पावौं । राजहि सौंपि मँदिर महँ आवौं ॥
तब रखवार गए सुलतानी । देखि अँकोर भए जस पानी ॥

लीन्ह अँकोर हाथ जेहि, जीउ दीन्ह तेहि हाथ ।
जहाँ चलावै तहँ चलै, फेरे फिरै न माथ ॥3॥

(सौंपना=देखरेख में, अगमना=आगे,पहले, अँकोर=भेंट,
रिश्वत, स्यो=साथ, किल्ली=कुंजी, पानी भए=नरम हो
गए, हाथ जेहि=जिसके हाथ से)

लोभ पाप कै नदी अँकोरा । सत्त न रहै हाथ जौ बोरा ॥
जहँ अँकोर तहँ नीक न राजू । ठाकुर केर बिनासै काजू ॥
भा जिउ घिउ रखवारन्ह केरा । दरब-लोभ चंडोल न हेरा ॥
जाइ साह आगे सिर नावा । ए जगसूर! चाँद चलि आवा ॥
जावत हैं सब नखत तराईं । सोरह सै चँडौल सो आईं ॥
चितउर जेति राज कै पूँजी । लेइ सो आइ पदमावति कूँजी ॥
बिनती करै जोरि कर खरी । लेइ सौंपौं राजा एक घरी ॥

इहाँ उहाँ कर स्वामी! दुऔ जगत मोहिं आस ॥
पहिले दरस देखावहु तौ पठवहु कबिलास ॥4॥

(घिउ भा=पिघलकर नरम हो गया, न हेरा=तलाशी नहीं ली,
जाँच नहीं की, इहाँ उहाँ कर स्वामी=मेरा पति राजा,
कबिलास=स्वर्ग,शाही महल)

आज्ञा भई, जाइ एक घरी । छूँछि जो घरी फेरि बिधि भरी ॥
चलि बिवान राजा पहँ आवा । सँग चंडोल जगत सब छावा ॥
पदमावति के भेस लोहारू । निकसि काटि बँदि कीन्ह जोहारू ॥
उठा कोपि जस छूटा राजा । चढ़ा तुरंग, सिंघ अस गाजा ॥
गोरा बादल खाँडै काढे । निकसि कुँवर चढ़ि चढ़ि भए ठाढे ॥
तीख तुरंग गगन सिर लागा ।केहुँ जुगुति करि टेकी बागा ॥
जो जिउ ऊपर खड़ग सँभारा । मरनहार सो सहसन्ह मारा ॥

भई पुकार साह सौं,ससि औ नखत सो नाहिं ।
छरकै गहन गरासा, गहन गरासे जाहिं ॥5॥

(छूँछि...भरी=जो घड़ा खाली था ईश्वर ने फिर भरा,अच्छी
घड़ी फिर पलटी, जस=जैसे ही, जिउ ऊपर=प्राण रक्षा के
लिये, छर कै गहन....जाहिं=जिनपर छल से ग्रहण लगाया
था वे ग्रहण लगाकर जाते हैं)

लेइ राजा चितउर कहँ चले । छूटेउ सिंघ, मिरिग खलभले ॥
चढ़ा साहि चढ़ि लागि गोहारी । कटक असूझ परी जग कारी ॥
फिरि गोरा बादल सौं कहा । गहन छूटि पुनि चाहै गहा ॥
चहुँ दिसि आवै लोपत भानू । अब इहै गोइ, इहै मैदानू ॥
तुइ अब राजहि लेइ चलु गोरा । हौं अब उलटि जुरौं भा जोरा ॥
वह चौगान तुरुक कस खेला । होइ खेलार रन जुरौं अकेला ॥
तौ पावौं बादल अस नाऊँ । जौ मैदान गोइ लेइ जाऊँ ॥

आजु खड़ग चौगान गहि करौं सीस-रिपु गोइ ।
खेलौं सौंह साह सौं, हाल जगत महँ होइ ॥6॥

(कारी कालिमा,अंधकार, फिरि=लौटकर,पीछे ताककर, गोइ=
गोय,गेंद, जोरा=खेल का जोड़ा या प्रतिद्वंद्वी, गोइ लेइ
जाऊँ=बल्ले से गेंद निकाल ले जाऊँ, सीस रिपु=शत्रु के
सिर पर, चौगान=गेंद मारने का डंडा, हाल=कंप,हलचल)

तब अगमन होइ गोरा मिला । तुइ राजहि लेइ चलु, बादला!॥
पिता मरै जो सँकरे साथा । मीचु न देइ पूत के माथा ॥
मैं अब आउ भरी औ भूँजी । का पछिताव आउ जौ पूजी?॥
बहुतन्ह मारि मरौं जौ जूझी । तुम जिनि रोएहु तौ मन बूझी ॥
कुँवर सहस सँग गोरा लीन्हे । और बीर बादल सँग कीन्हे ॥
गोरहि समदि मेघ अस गाजा । चला लिए आगे करि राजा ॥
गोरा उलटि खेत भा ठाढा । पूरुष देखि चाव मन बाढा ॥

आव कटक सुलतानी, गगन छपा मसि माँझ ।
परति आव जग कारी, होत आव दिन साँझ ॥7॥

(अगमन=आगे, सँकरे साथ=संकट की स्थिति में,
समदि=बिदा लेकर, पुरुष=योद्धा, मसि=अंधकार)

होइ मैदान परी अब गोई । खेल हार दहुँ काकरि होई ॥
जोबन-तुरी चढ़ी जो रानी । चली जीति यह खेल सयानी ॥
कटि चौगान, गोइ कुच साजी । हिय मैदान चली लेइ बाजी ॥
हाल सो करै गोइ लेइ बाढा । कूरी दुवौ पैज कै काढा ॥
भइँ पहार वै दूनौ कूरी । दिस्टि नियर, पहुँचत सुठि दूरी ॥
ठाढ बान अस जानहु दोऊ । सालै हिये न काढै कोऊ ॥
सालहिं हिय, न जाहिं सहि ठाढे । सालहिं मरै चहै अनकाढे ॥

मुहमद खेल प्रेम कर गहिर कठिन चौगान ।
सीस न दीजै गोइ जिमि, हाल न होइ मैदान ॥8॥

(गोई=गेंद, खेल=खेल में, काकरि=किसकी, हाल करै=
हलचल मचावै,मैदान मारे, कूरी=धुस या टीला जिसे
गेंद को लँघाना पड़ता है, पैज=प्रतिज्ञा, अनकाढे=
बिना निकाले)

फिरि आगे गोरा तब हाँका । खेलौं, करौं आजु रन-साका ॥
हौं कहिए धौलागिरि गोरा । टरौं न टारे, अंग न मोरा ॥
सोहिल जैस गगन उपराहीं । मेघ-घटा मोहि देखि बिलाहीं ॥
सहसौ सीस सेस सम लेखौं । सहसौ नैन इंद्र सम देखौं ॥
चारिउ भुजा चतुरभुज आजू । कंस न रहा और को साजू?
हौं होइ भीम आजु रन गाजा । पाछे घालि डूँगवै राजा ॥
होइ हनुवँत जमकातर ढाहौं । आजु स्वामि साँकरे निबाहौं ॥

होइ नल नील आजु हौं देहुँ समुद महँ मेंड ।
कटक साह कर टेकौं होइ सुमेरु रन बेंड ॥9॥

(हाँका=ललकारा, गोरा=गोरा सामंत;श्वेत, सोहिल=सुहैल,अगस्त्य तारा,
डूँगवै=टीला या धुस्स, पीछे घालि..राजा=रत्नसेन को पहाड़ या धुस्स
के पीछे रखकर, साँकरे=संकट में, निबाहों=निस्तार करूँ, बेंड=बेंड़ा,आडा)

ओनई घटा चहूँ दिसि आई । छूटहिं बान मेघ-झरि लाई ॥
डोलै नाहिं देव अस आदी । पहुँचे आइ तुरुक सब बादी ॥
हाथन्ह गहे खड़ग हरद्वानी । चमकहिं सेल बीजु कै बानी ॥
सोझ बान जस आवहिं गाजा । बासुकि डरै सीस जनु वाजा ॥
नेजा उठे डरै मन इंदू । आइ न बाज जानि कै हिंदू ॥
गोरै साथ लीन्ह सब साथी । जस मैमंत सूँड बिनु हाथी ॥
सब मिलि पहिलि उठौनी कीन्ही । आवत आइ हाँक रन दीन्ही ॥

रुंड मुंड अब टूटहि स्यो बखतर औ कूँड ।
तुरय होहिं बिनु काँधे, हस्ति होहिं बिनु सूँड ॥10॥

(देव=दैत्य, आदी=बिलकुल,पूरा, बादी=शत्रु, हरद्वानी=हरद्वान की
तलवार प्रसिद्ध थी, बानी=कांति,चमक, गाजा=वज्र, इंदू=इंद्र, आइ न
बाज...हिंदू=कहीं हिंदू जानकर मुझ पर न पड़े, गोरै=गोरा ने, उठौनी=
पहला धावा, स्यो=साथ, कुँड=लोहे की टोपी जो लड़ाई में पहनी जाती है)

ओनवत आइ सेन सुलतानी । जानहुँ परलय आव तुलानी ॥
लोहे सेन सूझ सब कारी । तिल एक कहूँ न सूझ उघारी ॥
खड़ग फोलाद तुरुक सब काढे । दरे बीजु अस चमकहिं ठाढे ॥
पीलवान गज पेले बाँके । जानहुँ काल करहिं दुइ फाँके ॥
जनु जमकात करसिं सब भवाँ । जिउ लेइ चहहिं सरग अपसवाँ ।
सेल सरप जनु चाहहिं डसा । लेहिं काढि जिउ मुख बिष-बसा ॥
तिन्ह सामुहँ गोरा रन कोपा । अंगद सरिस पावँ भुइँ रोपा ॥

सुपुरुष भागि न जानै, भुइँ जौ फिरि लेइ ।
सूर गहे दोऊ कर स्वामि -काज जिउ देइ ॥11॥

(ओनवत=झुकती और उमड़ती हुई, लोहे=लोहे से, सूझ=दिखाई
पड़ती है, फोलाद=फौलाद, करहिं दुइ फाँके=चीरना चाहते हैं,टुकड़े,
जककात=यम का खाँडा,एक प्रकार का खाँडा, भवाँ करहिं=घूमते
हैं, अपसवाँ चहहिं=चल देना चाहते हैं, सेल=बरछे, सरप=साँप,
भुइँ लेइ=गिर पड़े, सूर=शूल भाला)

भइ बगमेल, सेल घनघोरा । औ गज-पेल; अकेल सो गोरा ॥
सहस कुँवर सहसौ सत बाँधा । भार-पहार जूझ कर काँधा ॥
लगे मरै गोरा के आगे । बाग न मोर घाव मुख लागे ॥
जैस पतंग आगि दँसि लेई । एक मुवै, दूसर जिउ देई ॥
टूटहिं सीस, अधर धर मारै । लोटहिं कंधहि कंध निरारै ॥
कोई परहिं रुहिर होइ राते । कोई घायल घूमहिं माते ॥
कोइ खुरखेह गए भरि भोगी । भसम चढ़ाइ परे होइ जोगी ॥

घरी एक भारत भा, भा असवारन्ह मेल ।
जूझि कुँवर सब निबरे, गोरा रहा अकेल ॥12॥

(बगमेल=घोड़ो का बाग से बाग मिलाकर चलना, सवारों
की पंक्ति का धावा, अधर धर मारै=धड़ या कबंध अधर में
वार करता है, कंध=धड़, निरारै=बिल्कुल,यहाँ से वहाँ तक,
भोगी=भोग-विलास करनेवाले सरदार थे, भारत=घोर युद्ध,
कुँवर=गोरा के साथी राजपूत, निबरे=समाप्त हुए)

गोरै देख साथि सब जूझा । आपन काल नियर भा, बूझा ॥
कोपि सिंघ सामुहँ रन मेला । लाखन्ह सौं नहिं मरै अकेला ॥
लेइ हाँकि हस्तिन्ह कै ठटा । जैसे पवन बिदारै घटा ॥
जेहि सिर देइ कोपि करवारू । स्यो घोड़े टूटै असवारू ॥
लोटहिं सीस कबंध निनारे । माठ मजीठ जनहुँ रन ढारे ॥
खेलि फाग सेंदुर छिरकावा । चाचरि खेलि आगि जनु लावा ॥
हस्ती घोड़ धाइ जो धूका । ताहि कीन्ह सो रुहिर भभूका ॥

भइ अज्ञा सुलतानी, "बेगि करहु एहि हाथ ।
रतन जात है आगे लिए पदारथ साथ " ॥13॥

(गोरै=गोरा ने, करवारू=करवाल,तलवार, स्यो=साथ, टूटै=
कट जाता है, निनारे=अलग, धूका=झुका, रुहिर=रुधिर से,
भभूका=अंगारे सा लाल, एहि हाथ करहु=इसे पकड़ो)

सबै कटक मिलि गोरहि छेका । गूँजत सिंघ जाइ नहिं टेका ॥
जेहि दिसि उठै सोइ जनु खावा । पलटि सिंघ तेहि ठावँ न आवा ॥
तुरुक बोलावहिं, बोलै बाहाँ । गोरै मीचु धरी जिउ माहाँ ॥
मुए पुनि जूझि जाज, जगदेऊ । जियत न रहा जगत महँ केऊ ॥
जिनि जानहु गोरा सो अकेला । सिंघ के मोंछ हाथ को मेला?
सिंघ जियत नहिं आपु धरावा । मुए पाछ कोई घिसियावा ॥
करै सिंघ मुख -सौहहिं दीठी । जौ लगि जियै देइ नहिं पीठी ॥

रतनसेन जो बाँधा, मसि गोरा के गात ।
जौ लगि रुधिर न धोवौं तौ लगि होइ न रात ॥14॥

(गूँजत=गरजता हुआ, टेका=पकड़ा, पलटि सिंह...आवा=जहाँ से
आगे बढ़ता है वहाँ पीछे हटकर नहीं आता, बोलै बाहाँ (वह मुँह
से नहीं बोलता है) उसकी बाहें खड़कती हैं, गोरै=गोरा ने, जाज,
जगदेऊ=जाजा और जगदेव कोई ऐतिहासिक वीर जान पड़ते हैं,
घिसियावा=घसीटे,घिसियावे, रतनसेन जो....गात=रत्नसेन जो
बाँधे गए इसका कलंक गोरा के शरीर पर लगा हुआ है, रुहिर=
रुहिर से, रात=लाल, अर्थात् कलंक रहित)

सरजा बीर सिंघ चढ़ि गाजा । आइ सौंह गोरा सौ बाजा ॥
पहलवान सो बखाना बली । मदद मीर हमजा औ अली ॥
लँधउर धरा देव जस आदी । और को बर बाँधै, को बादी?
मदद अयूब सीस चढ़ि कोपे । महामाल जेइ नावँ अलोपे ॥
औ ताया सालार सो आए । जेइ कौरव पंडव पिंड पाए ॥
पहुँचा आइ सिंघ असवारू । जहाँ सिंघ गोरा बरियारू ॥
मारेसि साँग पेट महँ धँसी । काढेसि हुमुकि आँति भुइँ खसी ॥

भाँट कहा, धनि गोरा! तू भा रावन राव ।
आँति समेटि बाँधि कै तुरय देत है पाव ॥15॥

(मीर हमजा=मीर हमजा मुहम्मद साहब के चचा थे जिनकी
बीरता की बहुत सी कल्पित कहानियाँ पीछे से जोड़ी गईं,
लँधउर=लंधौरदेव नामक एक कल्पित हिंदू राजा जिसे मीर
हमजा ने जीत कर अपना मित्र बनाया था; मीर हमजा के
दास्तान में यह बड़े डील-डौल का बड़ा भारी वीर कहा गया
है, मदद अली=मानो इन सब वीरों की छाया उसके ऊपर
थी, बर बाँधे=हठ या प्रतिज्ञा करके सामने आए, वादी=शत्रु,
महामाल=कोई क्षत्रिय राजा या वीर, जेइ=जिसने, सालार=
शायद सालार मसऊद गाजी (गाजी मियाँ), बरियारू=बलवान,
हुमुकि=जोर से, काढेसि हुमुकि=सरजा ने जब भाला जोर से
खींचा, खसी=गिरी)

कहेसि अंत अब भा भुइँ परना । अंत त खसे खेह सिर भरना ॥
कहि कै गरजि सिंघ अस धावा । सरजा सारदूल पहँ आवा ॥
सरजै लीन्ह साँग पर घाऊ । परा खड़ग जनु परा निहाऊ ॥
बज्र क साँग, बज्र कै डाँडा । उठा आगि तस बाजा खाँडा ॥
जानहु बज्र बज्र सौं बाजा । सब ही कहा परी अब गाजा ॥
दूसर खड़ग कंध पर दीन्हा । सरजे ओहि ओड़न पर लीन्हा ॥
तीसर खड़ग कूँड पर लावा । काँध गुरुज हुत, घाव न आवा ॥

तस मारा हठि गोरे, उठी बज्र के आगि ।
कोइ नियरे नहिं आवै सिंघ सदूरहि लागि ॥16॥

(सरजै=सरजा ने, जनु परा निहाऊ=मानो निहाई पर पड़ा
(अर्थात् साँग को न काट सका) डाँडा=दंडा या खंग, ओडन=
ढाल, कूँड=लोहे का टोप, गुरुज=गुर्ज, गदा, काँध गुरुज
हुत=कंधे पर गुर्ज था, लागि=मुठ भेड़ या युद्ध में)

तब सरजा कोपा बरिबंडा । जनहु सदूर केर भुजदंडा ॥
कोपि गरजि मारेसि तस बाजा । जानहु परी टूटि सिर गाजा ।
ठाँठर टूट, फूट सिर तासू । स्यो सुमेरू जनु टूट अकासू ॥
धमकि उठा सब सरग पतारू । फिरि गइ दीठि, फिरा संसारू ॥
भइ परलय अस सबही जाना । काढा कढ़ग सरग नियराना ॥
तस मारेसि स्यो घोड़ै काटा । घरती फाटि, सेस-फन फाटा ॥
जौ अति सिंह बरी होइ आई । सारदूल सौं कौनि बड़ाई?॥

गोरा परा खेत महँ, सुर पहुँचावा पान ।
बादल लेइगा राजा, लेइ चितउर नियरान ॥17॥

(बरिवंडा=बलवान, सदूर=शार्दूल, तस बाजा=ऐसा आघात पड़ा,
ठाँठर=ठठरी, फिरा संसारू=आँखों के सामने संसार न रह गया,
स्यो=सहित, सुर पहुँचाया पान=देवताओं ने पान का बीड़ा,
अर्थात् स्वर्ग का निमंत्रण दिया)

54. बंधन-मोक्ष; पद्मावती-मिलन-खंड

पदमावति मन रही जो झूरी। सुनत सरोवर-हिय गा पूरी ॥
अद्रा महि-हुलास जिमि होई । सुख सोहाग आदर भा सोई ॥
नलिन नीक दल कीन्ह अँकूरू । बिगसा कँवल उवा जब सूरू ॥
पुरइनि पूर सँवारे पाता । औ सिर आनि धरा बिधि छाता ॥
लागेउ उदय होइ जस भोरा । रैनि गई, दिन कीन्ह अँजोरा ॥
अस्ति अस्ति कै पाई कला । आगे बली कटक सब चला ॥
देखि चाँद पदमिनि रानी । सखी कुमोद सबै बिगसानी ॥

गहन छूट दिनिअर कर, ससि सौं भएउ मेराव ।
मँदिर सिंघासन साजा, बाजा नगर बधाव ॥1॥

(झूरी रही=सूख रही थी, अस्ति अस्ति=वाहवाह, दिनिअर=
दिनकर,सूर्य)

बिहँसि चाँद देइ माँग सेंदूरू । आरति करै चली जहँ सूरू ॥
औ गोहन ससि नखत तराईं । चितउर कै रानी जहँ ताईं ॥
जनु बसंत ऋतु पलुही छूटीं । की सावन महँ भीर बहूटी ॥
भा अनंद, बाजा घन तूरू । जगत रात होइ चला सेंदूरू ॥
डफ मृदंग मंदिर बहु बाजे । इंद्र सबद सुनि सबै सो लाजै ॥
राजा जहाँ सूर परगासा । पदमावति मुख-कँवल बिगासा ॥
कवँल पाँय सूरुज के परा । सूरुज कवँल आनि सिर धरा ॥

सेंदुर फूल तमोल सौं, सखी सहेली साथ ।
धनि पूजे पिउ पायँ दुइ, पिउ पूजा धनि माथ ॥2॥

पूजा कौनि देउँ तुम्ह राजा? । सबै तुम्हार; आव मोहि लाजा ॥
तन मन जोबन आरति करऊँ । जीव काढ़ि नेवछावरि धरऊँ ॥
पंथ पूरि कै दिस्टि बिछावौं । तुम पग धरहु, सीस मैं लावौं ॥
पायँ निहारत पलक न मारौं । बरुनी सेंति चरन-रज झारौं ॥
हिय सो मंदिर तुम्हरै, नाहा । नैन-पंथ पैठहु तेहि माहाँ ॥
बैठहु पाट छत्र नव फेरी । तुम्हरे गरब गरुइ मैं चेरी ॥
तुम जिउ, मैं तन जौ लहि मया । कहै जो जीव करै सौ कया ॥

जौ सूरज सिर ऊपर, तौ रे कँवल सिर छात ।
नाहिं त भरे सरोवर, सूखे पुरइन-पात ॥3॥

(आरति=आरती, पूरि कै=भरकर, सेंति=से, तुम्हरै=तुम्हारा ही,
गरुइ=गरुई, गौरवमयी, छात=छत्र,कमल के बीच छत्ता होता
भी है)

परसि पाय राजा के रानी । पुनि आरति बादल कहँ आनी ॥
पूजे बादल के भुजदंडा । तुरय के पायँ दाब कर-खंडा ॥
यह गजगवन गरब जो मोरा । तुम राखा, बादल औ गोरा ॥
सेंदुर-तिलक जो आँकुस अहा । तुम राखा, माथे तौ रहा ॥
काछ काछि तुम जिउ पर खेला । तुम जिउ आनि मँजूषा मेला ॥
राखा छात, चँवर औधारा । राखा छुत्रघंट-झनकारा ॥
तुम हनुवत होइ धुजा पईठे । तब चितउर पिय आय बईठे ॥

पुनि जगमत्त चढ़ावा, नेत बिछाई खाट ।
बाजत गाजत राजा,आइ बैठ सुखपाट ॥4॥

(तुरयके....कर खंडा=बादल के घोड़े के पैर भी दाबे अपने हाथ से,
सेंदुर तिलक ...अहा=सींदूर की रेखा जो मुझ गजगामिनी के सिर
पर अंकुश के समान है अर्थात् मुझ पर दाब रखनेवाले मेरे स्वामी
का (अर्थात् सौभाग्य का) सूचक है, तुम जिउ...मेला=तुमने मेरे
शरीर में प्राण डाले, औधारा=ढारा, छुद्रघंट=घुँघरूदार करधनी
नेत=रेशमी चादर)

निसि राजै रानी कंठ लाई । पिउ मरि जिया, नारि जनु पाई ॥
रति रति राजै दुख उगसारा । जियत जीउ नहिं होउँ निनारा ॥
कठिन बंदि तुरुकन्ह लेइ गहा । जौ सँवरा जिउ पेट न रहा ॥
घालि निगड़ ओबरी लेइ मेला । साँकरि औ अँधियार दुहेला ॥
खन खन करहिं सडासन्ह आँका । औ निति डोम छुआवहिं बाँका ॥
पाछे साँप रहहि चहुँ पासा । भोजन सोइ, रहै भर साँसा ॥
राँध न तहँवा दूसर कोई । न जनों पवन पानि कस होई ॥

आस तुम्हारि मिलन कै, तब सो रहा जिउ पेट ।
नाहिं त होत निरास जौ,कित जीवन, कित भेंट? ॥5॥

(रति रति=रत्ती रत्ती,थोड़ा थोड़ा करके सब, उगसारा=निकाला,
खोला,प्रकट किया, निगड़=बेड़ी, ओबरी=तंग कोठरी, आँका करहि=
दागा करते थे, बाँका=हँसिए की तरह झुका हुआ टेढ़ा औजार
जिससे घरकार बाँस छीलते हैं, भोजन सोइ...साँसा=भोजन इतना
ही मिलता था जितने से साँस या प्राण बना रहे, राँध=पास)

तुम्ह पिउ! आइ-परी असि बेरा । अब दुख सुनहु कँवल-धनि केरा ॥
छोड़ि गएउ सरवर महँ मोहीं । सरवर सूखि गएउ बिनु तोहीं ॥
केलि जो करत हंस उड़ि गयऊ । दिनिअर निपट सो बैरी भयऊ ॥
गईं तजि लहरैं पुरइनि-पाता । मुइउँ धूप, सिर रहेउ न छाता ॥
भइउँ मीन,तन तलफै लागा । बिरह आइ बैठा होइ कागा ॥
काग चोंच, तस सालै, नाहा । जब बंदि तोरि साल हिय माहाँ ॥
कहों`काग! अब तहँ लेइ जाही । जहँवा पिउ देखै मोहिं खाही' ॥

काग औ गिद्ध न खंडहिं, का मारहं, बहु मंदि?।
एहि पछितावै सुठि मुइउँ, गइउँ न पिउ सँग बंदि ॥6॥

(तुम्ह पिउ...बेरा=तुम पर तो ऐसा समय पड़ा, न खंडहिं=
नहीं खाते थे,नहीं चबाते थे, का मारहिं, बहु मंदि=वे मुझे
क्या मारते,मैं बहुत क्षीण हो रही थी)

तेहि ऊपर का कहौं जो मारी । बिषम पहार परा दुख भारी ॥
दूती एक देवपाल पठाई । बाह्मनि-भेस छरै मोहिं आई ॥
कहै तोरि हौं आहुँ सहेली । चलि लेइ जाउँ भँवर जहँ, बेली!॥
तब मैं ज्ञान कीन्ह, सत बाँधा । ओहि कर बोल लाग बिष-साँधा ॥
कहूँ कँवल नहिं करत अहेरा । चाहै भँवर करै सै फेरा ॥
पाँच भूत आतमा नेवारिउँ । बारहिं बार फिरत मन मारिउँ ॥
रोइ बुझाइउँ आपन हियरा । कंत न दूर, अहै सुठि नियरा ॥

फूल बास, घिउ छीर जेउँ नियर मिले एक ठाइँ ।
तस कंता घट-घर कै जिइउँ अगिनि कहँ खाइँ ॥7॥

(मारी=मार,चोट, साँधा=सना,मिला, कहूँ कँवल...सै फेरा=चाहै
भौंरा (पुरुष) सौ जगह फेरे लगाए पर कमल (स्त्री) दूसरों को
फँसाने नहीं जाता, पाँच भूत...मारिउँ=फिर योगिनी बनकर उस
योगिनी के साथ जाने की इच्छा हुई पर अपने शरीर और
आत्मा को घर बैठे ही वश किया और योगिनी होकर द्वार-
द्वार फिरने की इच्छा को रोका, जेउँ=ज्यों, जिस प्रकार,
फुल बास...खाइ=जैसे फल में महँक और दुध में घी मिला
रहता है वैसे ही अपने शरीर में तुम्हें मिला समझकर इतना
संताप सहकर मैं जीती रही)

55. रत्नसेन-देवपाल-युद्ध-खंड

सुनि देवपाल राय कर चालू । राजहि कठिन परा हिय सालू ॥
दादुर कतहुँ कँवल कहँ पेखा । गादुर मुख न सूर कर देखा ॥
अपने रँग जस नाच मयूरू । तेहि सरि साध करै तमचूरू ॥
जों लगि आइ तुरुक गढ़ बाजा । तौ लगि धरि आनौं तौ राजा ॥
नींद न लीन्ह, रैनि सब जागा । होत बिहान जाइ गढ़ लागा ॥
कुंभलनेर अगम गड़ बाँका । बिषम पंथ चढ़ि जाइ न झाँका ॥
राजहि तहाँ गएउ लेइ कालू । होइ सामुहँ रोपा देवपालू ॥

दुवौ अनी सनमुख भइँ, लोहा भएउ असूझ ।
सत्र जूझि तब नेवरै, एक दुवौ महँ जूझ ॥1॥

(पेखा=देखता है, गादुर=चमगादर, सूर=सूर्य, सरि=बराबरी,
लोहा भएउ=युद्ध हुआ, नेवरे=समाप्त हो, निबटे)

जौ देवपाल राव रन गाजा । मोहि तोहि जूझ एकौझा, राजा!॥
मेलेसि साँग आइ बिष-भरी । मेटि न जाइ काल कै घरी ॥
आइ नाभि पर साँग बईठी । नाभि बेधि निकसी सो पीठी ॥
चला मारि,तब राजै मारा । टूट कंध, धड़ भएउ निनारा ॥
सीस काटि कै बैरी बाँधा । पावा दाँव बैर जस साधा ॥
जियत फिरा आएउ बल-भरा । माँझ बाट होइ लोहै धरा ॥
कारी घाव जाइ नहिं डोला । रही जीभ जम गही, को बोला?॥

सुधि बुधि तौ सब बिसरी, भार परा मझ बाट ।
हस्ति घोर को काकर? घर आनी गइ खाट ॥2॥

(एकौझा=अकेले,द्वंद्वयुद्ध, चला मारि...मारा=वह भाला मारकर
चला जाता था तब राजा रत्नसेन ने फिरकर उसपर भी वार किया,
बैरी=शत्रु देवपाल को माँझ बाट...धरा=आधे रास्ते पहुँचकर हथियार
छोड़ दिया, कारी=गहरा, भारी, भार परा मँझ बाट=बोझ की तरह
राजा रत्नसेन बीच रास्ते में गिर पड़े)

56. राजा-रत्न-सेन-वैकुंठवास-खंड

तौ लही साँस पेट महँ अही । जौ लहि दसा जीउ कै रही ॥
काल आइ देखराई साँटी । उठी जिउ चला छोड़िं कै माटी ॥
काकर लोग, कुटुँब, घर बारू । काकर अरथ दरब संसारू ॥
ओही घरी सब भएउ परावा । आपन सोइ जो परसा, खावा ॥
अहे जे हितू साथ के नेगी । सबै लाग काढै तेहि बेगी ॥
हाथ झारि जस चलै जुवारी । तजा राज, होइ चला भिखारी ॥
जब हुत जीउ, रतन सब कहा । भा बिनु जीउ, न कौडी लहा ॥

गढ़ सौंपा बादल कहँ गए टिकठि बसि देव ।
छोड़ी राम अजोध्या, जो भावै सो लेव ॥1॥

(साँटी=छड़ी, आपन सोइ...खावा=अपना वही हुआ जो खाया
और दूसरे को खिलाया, नेगी=पानेवाले, हुत=था, टिकठि=टिकठी,
अरथी जिसपर मुरदा ले जाते हैं, देव=राजा, जो भावै सो लेव=
जो चाहे सो ले)

57. पद्मावती-नागमती-सती-खंड

पदमावति पुनि पहिरि पटोरी । चली साथ पिउ के होइ जोरी ॥
सूरुज छपा, रैनि होइ गई । पूनो-ससि सो अमावस भई ॥
छोरे केस, मोति लर छूटीं । जानहुँ रैनि नखत सब टूटीं ॥
सेंदुर परा जो सीस अघारा । आगि लागि चह जग अँधियारा ॥
यही दिवस हौं चाहति, नाहा । चलौं साथ, पिउ! देइ गलबाहाँ ॥
सारस पंखि न जियै निनारे । हौं तुम्ह बिनु का जिऔं, पियारे ॥
नेवछावरि कै तन छहरावौं । छार होउँ सँग, बहुरि न आवौं ॥

दीपक प्रीति पतँग जेउँ जनम निबाह करेउँ ।
नेवछावरि चहुँ पास होइ कंठ लागि जिउ देउँ ॥1॥

(आगि लागि ...अँधियार=काले बालों के बीच लाल सिंदूर
मानो यह सूचित करता था कि अँधेरे संसार में आग लगा
चाहती है, छहराऊँ=छितराऊँ)

नागमती पदमावति रानी । दुवौ महा सत सती बखानी ॥
दुवौ सवति चढ़ि खाट बईठीं । औ सिवलोक परा तिन्ह दीठी ॥
बैठौ कोइ राज औ पाटा । अंत सबै बैठे पुनि खाटा ॥
चंदन अगर काठ सर साजा । औ गति देइ चले लेइ राजा ॥
बाजन बाजहिं होइ अगूता । दुवौ कंत लेइ चाहहिं सूता ॥
एक जो बाजा भएउ बियाहू । अब दुसरे होइ ओर-निबाहू ॥
जियत जो जरै कंत के आसा । मुएँ रहसि बैठे एक पासा ॥

आजु सूर दिन अथवा, आजु रेनि ससि बूड़ ।
आजु नाचि जिउ दीजिय, आजु आगि हम्ह जूड़ ॥2॥

(महासत=सत्य में तिन्ह दीठि परा=उन्हें दिखाई पड़ा,
बैठी चाहे बैठे, खाटा=अर्थी, टिकठी, अगूता होइ=आगे
होकर, सूता चहहिं=सोना चाहती हैं, बाजा=बाजे से, ओर
निबाहू=अंत का निर्वाह, रहसि=प्रसन्न होकर, बूड़=डूबा,
हम्ह=हमें हमारे लिये, जूड़=ठंढी)

सर रचि दान पुन्नि बहु कीन्हा । सात बार फिरि भाँवरि लीन्हा ॥
एक जो भाँवरि भईं बियाही । अब दुसरे होइ गोहन जाहीं ॥
जियत, कंत! तुम हम्ह गर लाई । मुए कंठ नहिं छोडंहिं,साईं!
औ जो गाँठि, कंत! तुम्ह जोरी । आदि अंत लहि जाइ न छोरी ।
यह जग काह जो अछहि न आथी । हम तुम, नाह! दुहुँ जग साथी ॥
लेइ सर ऊपर खाट बिछाई । पौंढ़ी दुवौ कंत गर लाई ॥
लागीं कंठ आगि देइ होरी । छार भईं जरि, अंग न मोरी ॥

रातीं पिउ के नेह गइँ, सरग भएउ रतनार ।
जो रे उवा, सो अथवा; रहा न कोइ संसार ॥3॥

(सर=चिता, गोहन=साथ, हम्ह गर लाई=हमें गले लगाया,
अंत लहि=अंत तक, अछहि=है, आथी=सार;पूँजी,अस्तित्व,
अछहि न आथी,जो स्थिर या सारवान् नहीं, रतनार=लाल,
प्रेममय या आभापूर्ण)

वै सहगवन भईं जब जाई । बादसाह गड़ छेंका आई ॥
तौ लगि सो अवसर होइ बीता । भए अलोप राम औ सीता ॥
आइ साह जो सुना अखारा । होइगा राति दिवस उजियारा ॥
छार उठाइ लीन्ह एक मूठी । दीन्ह उड़ाइ, पिरथिमी झूठी ॥
सगरिउ कटक उठाई माटी । पुल बाँधा जहँ जहँ गढ़-घाटी ॥
जौ लहि ऊपर छार न परै । तौ लहि यह तिस्ना नहिं मरै ॥
भा धावा, भइ जूझ असूझा । बादल आइ पँवरि पर जूझा ॥

जौहर भइ सब इस्तरी, पुरुष भए संग्राम ।
बादसाह गढ़ चूरा, चितउर भा इसलाम ॥4॥

(सहगवन भईं=पति के साथ सहगमन किया,सती हुई, तौ
लगि...बीता=तब तक तो वहाँ सब कुछ हो चुका था, अखारा=
अखाड़े, या सभा में,दरबार में, गढ़ घाटी=गढ़ की खाईं, पुल
बाँधा...घाटी=सती स्त्रियों एक मुट्ठी राख इतनी हो गई कि
उसने जगह जगह खाईं पट गई और पुल सा बँध गया,
जौ लहि=जबतक, तिस्ना=तृष्णा, जौहर भइँ=राजपूत प्रथा
के अनुसार जल मरीं, संग्राम भए=खेत रहे, लड़कर मरे,
चितउर भा इसलाम=चित्तौरगढ़ में भी मुसलमानी
अमलदारी हो गई)

58. उपसंहार

मैं एहि अरथ पंडितन्ह बूझा । कहा कि हम्ह किछु और न सूझा ॥
चौदह भुवन जो तर उपराहीं । ते सब मानुष के घट माहीं ॥
तन चितउर, मन राजा कीन्हा । हिय सिंघल, बुधि पदमिनि चीन्हा ॥
गुरू सुआ जेइ पंथ देखावा । बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा?॥
नागमती यह दुनिया-धंधा । बाँचा सोइ न एहि चित बंधा ॥
राघव दूत सोई सैतानू । माया अलाउदीं सुलतानू ॥
प्रेम-कथा एहि भाँति बिचारहु । बूझि लेहु जौ बूझै पारहु ॥

तुरकी, अरबी, हिंदुई, भाषा जती आहिं ।
जेहि महँ मारग प्रेम कर सबै सराहैं ताहि ॥1॥

(एहि=इसका, पंडितन्ह=पंडितों से, कहा...सूझा=उन्होंने कहा,
हमे तो सिवा इसके और कुछ नहीं सूझता है कि, ऊपराहीं=
ऊपर, निरगुन=ब्रह्म,ईश्वर)

मुहमद कबि यह जोरि सुनावा । सुना सो पीर प्रेम कर पावा ॥
जोरी लाइ रकत कै लेई । गाढ़ि प्रीति नयनन्ह जल भेई ॥
औ मैं जानि गीत अस कीन्हा । मकु यह रहै जगत महँ चीन्हा ॥
कहाँ सो रतनसेन अब राजा?। कहाँ सुआ अस बुधि उपराजा?॥
कहाँ अलाउदीन सुलतानू?। कहँ राघव जेइ कीन्ह बखानू?॥
कहँ सुरूप पदमावति रानी?। कोइ न रहा, जग रही कहानी ॥
धनि सोई जस कीरति जासू । फूल मरै, पै मरै न बासू ॥

केइ न जगत बेंचा, कइ न लीन्ह जस मोल?
जो यह पढ़ै कहानी हम्ह सँवरै दुइ बोल ॥2॥

(जोरी लाइ .....भेई=इस कविता को मैंने रक्त की लेई लगा
कर जोड़ा है और गाढ़ी प्रीति को आँसुओं से भिगो-भिगोकर
गीला किया है, चीन्हा=चिह्न, निशान, उपराजा=उत्पन्न
किया, अब बुधि उपराजा=जिसने राजा रत्नसेन के मन
में ऐसी बुद्धि उत्पन्न की, केइ न जगत जस बेचा=किसने
इस संसार में थोड़े के लिये अपना यश नहीं खोया? अर्थात्
ऐसे बहुत से लोग ऐसे हैं, हम्ह सँवरे=हमें याद करेगा,
दुइ बोल=दो शब्दों में)

मुहमद बिरिध बैस जो भई । जोबन हुत, सो अवस्था गई ॥
बल जो गएउ कै खीन सरीरू । दीस्टि गई नैनहिं देइ नीरू ॥
दसन गए कै पचा कपोला । बैन गए अनरुच देइ बोला ॥
बुधि जो गई देई हिय बोराई । गरब गएउ तरहुँत सिर नाई ॥
सरवन गए ऊँच जो सुना । स्याही गई, सीस भा धुना ॥
भवँर गए केसहि देइ भूवा । जोबन गएउ जीति लेइ जूवा ॥
जौ लहि जीवन जोबन-साथा । पुनि सो मीचु पराए हाथा ॥

बिरिध जो सीस डोलावै, सीस धुनै तेहि रीस ।
बूढ़ी आऊ होहु तुम्ह, केइ यह दीन्ह असीस? ॥3॥

(पचा=पिचका हुआ, अनरुच=अरुचिकर, बोराई=बावलापन,
तरहुँत=नीचे की ओर, धुना=धुनी रूई, भुवा=काँस के फूल,
जौ लहि हाथा=कवि कहता है कि जब तक जिंदगी रहे
जवानी के साथ रहे, फिर जब दूसरे का आश्रित होना
पड़े तब तो मरना ही अच्छा है, रीस=रिस या क्रोध से,
केइ.....असीस किसने व्यर्थ ऐसा आशीर्वाद दिया?)

  • पद्मावत भाग (5) मलिक मुहम्मद जायसी
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