Mahakavya (महाकाव्य)

संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य का सूत्रबद्ध लक्षण आचार्य भामह ने प्रस्तुत किया है, जिसका परवर्ती आचार्यों (दंडी, रुद्रट तथा विश्वनाथ) ने विस्तार किया। आचार्य विश्वनाथ (साहित्यदर्पण, परिच्छेद 6, 315-324) के अनुसार महाकाव्य के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं:

प्रमुख लक्षण: महाकाव्य सर्गों में बद्ध होता है। इसमें धीरोदात्त गुणों से युक्त देवता या सत्कुलीन क्षत्रिय नायक होता है। शृंगार, वीर अथवा शांत में से कोई एक मुख्य (अंगी) रस होता है तथा अन्य रस गौण (अंग) होते हैं। इसमें नाटक की सभी संधियाँ, ऐतिहासिक या सज्जनाश्रित कथावस्तु और चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से किसी एक फल की प्राप्ति होती है।

रचना विधान: इसके प्रारंभ में मंगलाचरण (नमस्कार, आशीर्वाद या वर्ण्यवस्तु-निर्देश) होता है। इसमें अष्टाधिक (8 से अधिक) न अत्यल्प और न अतिदीर्घ सर्ग होते हैं। सर्ग के अंत में छंद परिवर्तन तथा आगामी कथा की सूचना होती है। इसमें प्रकृति, ऋतुओं, नगर, युद्ध, यात्रा और विवाह आदि का सांगोपांग वर्णन किया जाता है।