प्रवाह (चौदह अभिव्यक्तियाँ) : राजगोपाल

Pravah : Rajagopal


धार

उन मधु दिनों की स्मृतियाँ धूल पर लिखे नाम सी खोयीं दामिनी कौंधी आँखों मे कहीं बह गयी आशा अंजन सी सोयी बीते काल-काल के घन मे मन के उछ्रंखल स्पंदन मे मूक जीवन देख रहा दर्पण मे मिट्टी हुआ सुमन कैसे क्षण मे इंद्रधनुष क्षितिज पर धुंधलाया उड़ता उन्माद शून्य मे समाया नीरव प्रणय गिरा धरा पर ढाया हार यहाँ वह किस के मन भाया कितने मोड़ों से कितनी बार सलिला सा बहता पार-पार सहते पत्थरों का उर पर वार बहा जीवन न जाने किस धार आशा थी लौटेगा मधु प्रभात बैठेगी श्यामला कल डाल-पात प्रणया के आँचल मे होगी रात आँख खुली, बीत गयी यह बात

स्मित

रजकणों मे भी तुम ही अभिराम उस पर भी लिखा तुम्हारा नाम काल चले पर मन को नहीं विराम तुम से ही बने जीवन के परिणाम तुम्हारी स्मित से जीवित है प्राण रखना उसे काल से परे अम्लान अवसान तक रोक लेना विहान कर देना प्रणय का नव-निर्माण प्रथम प्रणय सहसा क्यों हुआ दीन उल्का सा यह कहाँ हुआ विलीन कहीं दिखी थी एक किरण महीन तोड़ संबंध उसे ले गयी झंझा छीन निष्ठुर ने क्यों फैलाया ऐसा जाल नहीं संभलता अब जीवन का पाल घिर गयी निशा कर क्षितिज को लाल छोड़ मुझे सारी जगती हुई गुलाल कितने पल बीत गये असार ज्ञात नहीं अश्रु-आह का भार दे देना स्मित अधरों का प्यार जुड़ जाएँगे उर से बिसुरे टूटे तार

गमन

अतृप्त प्याले मे मधु घोल छलकाया स्वप्नों का स्नेह अनमोल कहाँ गयी वह द्युति देहरी खोल आज मन सुनता है अपने ही बोल बरस निगले उस रूप का उल्लास प्रणय नहीं दिलाता उसका आभास स्वप्न भी नहीं आते लोचन के पास तरल हुआ जीवन का उच्छवास इन्दु बिना अकेली रोती रात ढूंढती है नभ मे छिपी प्रात छूटा दृगों से अंजन का साथ सह रहा मौन प्रणय का आघात छलकते नयन अश्रु कैसे संभाले स्मृतियों के कैसे दीवार उठा लें कौन यहाँ पीड़ा का गर्त मापने वाले इस पंक मे ही तू अब मन लगा ले यह काल-चक्र का प्रणय है श्वास अलग, अलग हृदय है सम्बन्धो मे यह निहित भय है जगती मे प्रणय केवल अभिनय है

पश्चाताप

मूक मन मे जागा नव प्राण मौन उर मे हुआ स्वर्णविहान बेध कर रोदन गायन का बाण जीवन दे काल हो गया अंतर्ध्यान रात रश्मि बन आई तुम चुपचाप छोड़ गयी पग-पग प्रणय छाप मन भागा पीछे सहता श्रम-संताप मृग क्या जाने मरीचिका का परिमाप हाथ लिया था तुम्हें मधु सा सुकुमार मन परसा जीवन भर सकल दुलार धीरे उर चढ़ा प्रणय ऋण का भार उपकृत कैसे करता तुम्हारा मनुहार ईप्सा के दृगों मे वह नित दिखती रात स्वप्न बन दामिनी सी चमकती वह लगती थी मेरी ही छोटी जगती पास है या नहीं, रहती है नित रिसती सकल स्नेह था सत्य सघन आँखों मे जलते थे स्वप्न गहन नयनों मे ही बीत गये अनकहे क्षण शेष रहा गया साथ मेरा यह क्रंदन

बुलबुला

जब दौड़ रहे थे अथक दिन-रात तिमिर प्रकाश दोनों थे अज्ञात मन मे झूलते थे केवल प्रणय पात समय बदला पर न बीती वह बात उल्लासित मन मे न था कोई विकार बसी थी वह लोचन मे साकार एक दिशा मे पथ के अनेक प्रकार पग जले छांव तले करने आँखें चार स्नेह-सगाई रस-रंग छाया अनंत ईप्सा ने किया वय-काल का अंत आभास किया था क्षण-क्षण जीवंत अंजन से सजे आँखों मे स्वप्न दिगंत तिमिर मे झाँकता रहा वह सृष्टि उस पर ही अटकी निंर्निमेष दृष्टि मन रोया, हुई आंसुओं की वृष्टि जगती मे मिली अनछुई संतुष्टि प्रणय का बुलबुला था सत्य सघन शून्य मे उड़ता था वह स्वप्न गहन हुआ शलभ सा उसका लौ पर दहन सुनता हूँ केवल उस का शत-क्रंदन

क्या भूलूँ

प्रणय का इतिहास लिये जीवन मधुमास की आशा मे मगन बूढ़े तन मे यह तरुण सा मन देख रहा आँखों से झरता सावन उस दिन उस मधु मे घुला पराग बूंद-बूंद मे छलकी शलभ की आग मधुबाला का जीवन मे वह अनुराग सजीव है जीवन मे उस कौतुक का भाग वह चिरपरिचित मंद मुस्कान करती है जीवन का नव-आव्हान मधु की किस बूंद मे छिपा है प्राण स्वप्नों मे ही है उसकी पहचान मधु के उस कण का पार न पाया कभी पास कभी दूर ही उसे भाया मन क्यों रोया मौन विरह पर छाया ऐसे प्रश्न अनेक पर उत्तर एक न पाया प्रणय समीरण निर्बल हो चला बरसों का आभास आँखों मे ढला उर के पिंजर मे वह बीता काल जला क्या भूलूँ क्या याद करूँ आज मैं भला

स्वप्न और यथार्थ

मुझे उसकी है सजीव स्मृति आँखें जैसे हो आद्या की कृति इस जीवन की वही है प्रकृति उडी वह प्रणय लिए पवन की द्रुति स्मरण है उस पराग का भार मुख जैसे शशि सा साकार मुट्ठी भर जीवन का विस्तृत आधार दीप जला पुकारता शलभ का प्यार छू कर मन सारी रात जगाती स्वप्नों को चूम नीर बहा जाती आँखों से ढलती हर बूंद दुलारती विश्व दिखा मूक कंठ भर जाती निचोड़ प्राण से पीड़ा की कसकन भर लूँ उर मे स्नेह का कण-कण जी लूँ साथ जीवन का क्षण-क्षण शेष रह जायेगा कल केवल क्रंदन स्वप्न ढोता गगन तले पड़ा हूँ ढूँढता यथार्थ समाधि मे गड़ा हूँ पुकारता प्रणय देहरी पर अड़ा हूँ तम मे एक टूटे तारे सा बिछुड़ा हूँ

कौन है

प्रणय-भार से पलकें मूंदती वह घन दामिनी सी कौंधती जला दीप तम का उर रौंदती साकार युगों का विरह भेदती बहती वह आंसुओं की धार सी खिलती कभी इंद्रधनुष के हार सी घिरती साँझ मे बावले प्यार सी उड़ती रही अनंत शरद के बयार सी जगती मे सुंदर वह कौन है दामिनी की मुस्कान सी कौन है टूटी नींद के उच्छवास मे कौन है पल-पल दृगों को खोलता कौन है बांध कर जीवन मे विस्मृत धन कर रहा पथिक कैसा अन्वेषण स्वप्न मे खो कर करता है जागरण यही है देखना जगती मे तृषित जीवन किस पथ जा रहा दुख से भाग सुख के गान मे भी है विरह राग प्रणय मांगता है जीवन का त्याग तृष्णा मे नहीं मिलता है अनुराग

हार-जीत

याद है तुम्हें वह प्रणय गीत शब्दों से खेल तुम्हें लाया था जीत आज क्यों वह काल हुआ अतीत रात-प्रात से यह जीवन है भयभीत जगती मे प्रणय हिम-हेमंत है इन आँखों मे आज बूढ़ा वसंत है निस्तब्ध उल्का सा जीवन वृत्तान्त है मुट्ठी भर प्रणय आज कहीं दिगंत है इस आरव मे बरसों हो गये माया मे हम युगों तक सो गये जाग कर भी स्वप्नों मे खो गये बाहों मे बंध कर कितने दूर हो गये अनुराग ढूँढने इस बंधन मे मन लौटा इतिहास के चुंबन मे नहीं मिली वह जन-विजन मे अब प्रलाप ही शेष है इस मन मे अदृश्य प्रणय का संसार मिला है जगती मे मन का उपहार मिला है मनुज को नहीं कोई अधिकार मिला है यहीं सिसकता हुआ प्यार मिला है

चक्र

संध्या शलभ को साथ लाती रजनी का स्मित ले उषा उठाती दिन मे पवन प्रणय झुलाती रंगमहल मे निशा मोती दे मुस्काती वह जाती कभी प्रणय बरसा बह जाता विरह उर मे फंसा निस्पन्द पड़ा मन रोया तरसा लघु बन्धन में खो कर सहसा लघु सुख अधरों पर पा कर दुख बह जाता आँसू बनकर मन थिरका क्षणिक स्मित बनकर अभिनय कर जाता स्वप्न पलकों पर जीवन के लघु श्वास में अपार गगन जैसे मानस में तृषित सुखों के अनंत आस मे सपनों को स्पंदित कर देता पास मे मुझसे है वह आज अपरिचित किन्तु मेरा सत्य प्रणय अपरिमित क्यों मिट्टी हुआ प्रथम स्पर्श सुनिश्चित आँखों से अंजन आज हुआ निर्वासित

जीवन का द्वंद

मधु कणों का कैसा है आकार प्रणय का जैसे असीम विस्तार कल उस पर जमे रजकण दो चार मन धुंधलाया, नहीं उस का उपचार समय से मांगा इतिहास उधार दिखा नहीं आज आनन साकार दृगों में सोते हैं वे दिन बार-बार कहाँ है युगों के प्रणय का अवतार छोड़ प्रणय का उन्मत्त फाग बजता है जीवन मे विरह राग जलती है घन अतृप्ति की आग थकी आशा भी मरी मरु मे भाग प्रणय की उर्म्मि और आह की वात मन का तम और आशा की प्रात करते हैं जीवन मे परस्पर आघात अकेले ही किसे बतलाऊँ यह बात जीवन मे मूर्छित प्रणय का दाह, मन मे कल्पना का अविरल प्रवाह नहीं है जगती मे सम्बन्धों की थाह क्रंदनों के बीच दबी है एक ही आह

प्रतीति

प्रणय का आभास युगों से, भरता छलकता तृषित दृगों से कभी बहता रुधिर सा रगों मे कभी खेलता मन के मेघों से मरु में प्रणय लिख कर नादान हँसता है उस मे ही हो अन्तर्धान चूम तपती रेत करता है अभिमान हाय! हुआ मृगतृष्णा मे ही अवसान स्नेह उर मे जब भरता चुपचाप हिम सा पिघलता उर का ताप सुनाई देता रात प्रणय आलाप ज्ञात नहीं किस पथ होगा मिलाप उनकी आँखों मे जीवन अलसित शिशु सा अधर वक्ष देख विस्मित मृदु पगों के अर्थ से यह पथ परिचित किन्तु गंतव्य से है पग-पग विचलित अलक्षित प्रणय की यह डोर, खींचती है उल्का सी शून्य की ओर लोचन नहीं समाता तृष्णा का छोर किसे पूछूं तम तोड़ कब होगा भोर

आत्मबोध

तुम मिली किस पथ मुस्कुराती ज्येष्ठ जले आषाढ़ सी लहराती प्राण लिए यौवन घन बरसाती धरा पर हर जीवन को भिगाती आशाएँ बह कर बांध बनी आंखे प्रणय व्यूह मे घिरी घनी सरल मन और स्मित की धनी सुरवामिनी स्वप्नों से साकार छनी लेटा रहा बरसों तुम्हारी ही छाया फिर क्यों नहीं उसके मन भाया अनछूया ही मन पार चला आया संचित मधु को आंसुओं ने बहाया जब चमकी आषाढ़ की दामिनी रंगमंच पर आयी मिलन-यामिनी रति सी स्वर्ग धरा पर लायी स्वामिनी स्मृतियाँ मे खो गई है आज कामिनी जड़ तकियों पर विलाप कर प्रेम-गीत रोये अपने ही आलाप पर सोचता रहा टूटे तारे के मिलाप पर उर पर पत्थर रख, मैं हंसा आप पर

अनुबंध

आँखों मे अंजन सा उसे सहलाता उन्मत्त भरे उर मे प्यार से बहलाता मुट्ठी भर प्रणय लिये मन मुस्कुराता उठता गिरता यह जीवन बहता जाता स्मृतियों लादे नित सूरज नापता जाता प्यार ढूँढता चुप अँधियारे में खो जाता छू लेती जब, जड़ तकिये पर अश्रु बहाता सूखे आँखों मे ही सारा विश्व घूम आता शब्द मधुर जब कहती, मन भर जाता इतिहास लौट आँखों मे उभर आता पल -पल युगों सा उर मे निथर जाता सुख-दुख बांधे जीवन का सार पाता ऋतु बदला आँखों से मधुमास ढला, जीवन का अवसाद आंसुओं में घुला मन का अवशेष तन पर मोम सा गला शून्य मे प्राण अकेला ही धरा पर पला तुम यथार्थ हो, सत्य हो, जीवन हो श्वास हो, रुधिर हो, स्नेह का सृजन हो अमेय हो, अमृता हो, नियति का दर्पण हो क्षण-क्षण इस श्रांत जीवन का प्राण हो अगस्त, 2026