मुक्तक : डॉ. रामकरण साहू ‘सजल’

Muktak : Dr Ramkaran Sahu Sajal


भावना पावन हृदय के बीच रखना चाहिए , पंथ भाषा भिन्न पर अनुराग बहना चाहिए , हर समस्या आपसी है बात करना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । भाव के बागान पर कुछ नेह बोना चाहिए , मित्रता के दाग कलुषित स्वयं धोना चाहिए , प्रेम छाया शजर जैसी शीश रहना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । भारती की शक्ति गाथा गीत गाना चाहिए , मातु जैसे प्रेम की उर प्रीति रहना चाहिए , ज़िन्दगी में हर मधुर संवाद करना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । भारती की आरती के भाव रखना चाहिए , शत्रु से बाजी लगे प्रण प्राण लड़ना चाहिए , हाथ जो हम पे उठें वह हाथ कटना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । बोलते हर शब्द को निज तौल लेना चाहिए , स्वयं का दुःख पास में रख प्रेम देना चाहिए , मानकर सम्भावना हर क़दम बढना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । कन्द से मकरन्द का कुछ द्वन्द्व होना चाहिए , आपसी मतभेद सबका बन्द होना चाहिए , नीतियाँ सबके लिए इक रूप होना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । साधना का कार्य हर उत्कृष्ट होना चाहिए , प्राणियों में आपसी सदभाव होना चाहिए , शिखर कोई या तलहटी सुगम होना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । शक्ति शासन भाव में अनुरक्त होना चाहिए , मधुर माधव वचन का आनन्द होना चाहिए , भृकुटियों के मध्य परमानन्द होना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । भावना के ज्वार का आभास होना चाहिए , रक्त रंजित खेल जग का बन्द होना चाहिए , हर हिया में व्याप्त सुचिता नेक होना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए । स्वयं का इतिहास गौरव गान होना चाहिए , भव्य भारत भूमि में अवतार होना चाहिए , हर हृदय में राम का सम्मान होना चाहिए , हम रहें या ना रहें पर देश रहना चाहिए ।