मानव व्यवहार (काव्य-श्रृंखला) : सुरेंद्र कल्याण 'बुटाना'
1. चेहरों का नगर
मैंने एक नगर देखा, जहाँ हर चेहरे पर मुस्कान थी, पर हर मुस्कान के पीछे एक अलग कहानी। कोई प्रेम छुपा रहा था, कोई ईर्ष्या, कोई सम्मान दिखा रहा था, कोई गणना। मनुष्य शायद एकमात्र प्राणी है, जो अपने चेहरे से कम और अपने मन से अधिक जीता है। दुनिया अक्सर चेहरे पढ़ती है, पर जीवन ने सिखाया— चेहरे नहीं, व्यवहार पढ़ो।
2. स्वार्थ का वृक्ष
स्वार्थ कभी बीज बनकर नहीं आता। वह धीरे-धीरे मन में उगता है। पहले वह सुविधा बनता है, फिर आदत, और एक दिन चरित्र। तब मनुष्य रिश्तों को नहीं, लाभ-हानि को देखने लगता है। और उसे पता भी नहीं चलता कि उसने अपने ही भीतर एक जंगल उगा लिया है।
3. मौन की भाषा
हर बात शब्दों में नहीं कही जाती। कुछ बातें आँखें कहती हैं, कुछ प्रतीक्षा, और कुछ मौन। मनुष्य का सबसे सच्चा रूप कई बार उसकी चुप्पी में दिखाई देता है। क्योंकि शब्दों को सजाया जा सकता है, मौन को नहीं।
4. भीड़ में अकेला
वह सैकड़ों लोगों से घिरा था, फिर भी अकेला था। क्योंकि साथ होना और समझा जाना दो अलग बातें हैं। मनुष्य को रोटी से पहले कई बार समझे जाने की आवश्यकता होती है।
5. प्रशंसा का दर्पण
प्रशंसा मीठी होती है। इतनी मीठी कि कई बार मनुष्य सत्य भूल जाता है। जो केवल प्रशंसा सुनता है, वह धीरे-धीरे अपनी कमियाँ खो देता है। और जो आलोचना से सीखता है, वह स्वयं को पा लेता है।
6. ईर्ष्या की आग
ईर्ष्या दूसरों को कम, स्वयं को अधिक जलाती है। वह धीरे-धीरे मन में जन्म लेती है, जब मनुष्य अपनी यात्रा भूलकर दूसरों की मंज़िलें गिनने लगता है। तब दूसरे की सफलता उसे प्रेरणा नहीं देती, पीड़ा देती है। और वह भूल जाता है कि सूर्य किसी दीपक से अपना प्रकाश नहीं खोता।
7. विश्वास
विश्वास शब्दों से नहीं बनता। वह समय की धीमी आँच पर पकता है। एक सच्चा व्यवहार, एक कठिन समय में साथ, एक निभाया हुआ वचन— और मनुष्य अपना हृदय खोल देता है। पर जब विश्वास टूटता है, तो केवल रिश्ता नहीं, मनुष्य का एक हिस्सा भी टूट जाता है।
8. अवसरवादी लोग
कुछ लोग मौसम की तरह होते हैं। धूप हो तो साथ चलते हैं, आँधी आए तो दिशा बदल लेते हैं। वे मित्रता में भी लाभ खोजते हैं, और संबंधों में भी सुविधा। समय ने सिखाया— ऐसे लोग जीवन की भीड़ तो बढ़ाते हैं, पर जीवन को समृद्ध नहीं करते।
9. करुणा
दुनिया में ज्ञान आवश्यक है, शक्ति भी, पर करुणा के बिना मनुष्य अधूरा है। एक बूढ़े की सहायता, एक बच्चे की मुस्कान, एक दुखी मन को दो शब्दों का सहारा— यही वे छोटे कार्य हैं जो मनुष्य को महान नहीं, मानवीय बनाते हैं। और कई बार मानवीय होना ही सबसे बड़ी महानता है।
10. मनुष्य
मनुष्य विरोधाभासों का घर है। वह प्रेम भी करता है, घृणा भी। वह त्याग भी जानता है, स्वार्थ भी। वह मंदिर बनाता है, और युद्ध भी। वह कविता लिखता है, और इतिहास में घाव भी छोड़ता है। शायद इसी कारण मनुष्य को समझना सबसे कठिन है। क्योंकि उसके भीतर एक साथ प्रकाश भी रहता है, और अँधेरा भी। जीवन का संघर्ष दूसरों से कम, अपने भीतर के इन्हीं दोनों पक्षों के बीच अधिक होता है।