अगेय कविताएँ : डॉ. रामकरण साहू ‘सजल’
Hindi Poems : Dr Ramkaran Sahu Sajal
1. मेरे श्रवण आज भी
मेरे श्रवण आज भी उसी तरह कम्पित हो जाते हैं जिस तरह उस दिन हुए थे मैं नही भूल पाता हूँ उस अविस्मरणीय भीभत्स मंजर को जिसको विभिन्न प्रसारणीय याँत्रिकों के माध्यम से सुना एक ही पल में उजाड़ दिया गया था पुष्पित पल्लवित उस उद्यान को जो अपनी खूबसूरती के लिए चर्चित है सम्पूर्ण विश्व में जहाँ हमेशा धीरे-धीरे सरसती रहती है शीतल सुगन्धित पवन जिसको कहा गया है प्रकृति का स्नेहिल वरदान जहाँ से साफ-साफ देखा जा सकता है मेघों के झरोखों से धवलित हिमालय की तुहिन युक्त श्रृंखलाओं को वहीं हो रहा था शैलानियों का सुन्दर कलरव मुखरित हो रही थी सभी के मुखो से मधुर-मधुर मुस्कान सभी खोए थे अपनो के बीच में फिर क्या ! अचानक रो पड़ी मानवता, चीखने लगा स्नेह रक्त रंजित हो गई भावनाएँ, बिखर गया अपनत्व तार-तार हो गई संवेदना, कराह उठा भाईचारा व्यथित धर्म, पीड़ित धार्मिकता के भीभत्ह मंजर में मुस्कुरा रह था बेखौफ बदसूरती हैवान क्रूरता का पर्याय शायद उसे मालूम नही था कि बहुत ही शीघ्र उसका होने वाला है अन्त
2. मैं नही
मैं नही स्वयं को सक्षम पा रहा था करूँ उसका नख सिख वर्णन जो अनुपम श्रृंगार किए अद्भुत नवल परिधान में दिव्य आभूषणों से सुविभूषित मुख में मादक मुस्कान लिए कोमलाँगी ! हिमश्रृखलाओं सी सीढ़ियों से मद्धिम-मद्धिम गति में भास्कर की स्वर्णिम रश्मियों की भाँति उतरती चली आ रही थी मेरे सम्मुख जिसको देखकर मैं स्तब्ध सा अवाक प्राण हीन जैसा केवल और केवल अपनी इन पथराई आँखों से टुकुर-टुकुर निहारे जा रहा था उसको देखकर मैं रम्भा, उर्वशी, मेनका अथवा तिलोत्तमा कहूँ या फिर इन सभी की श्रेष्ठ विशेषताओं के सम्मिश्रण से निर्मित कोई निधि अथवा निधियों का वह समूह कहूँ जिसके तेज पुन्ज को आज तक कोई चित्रांकित ना कर सका मानो जिसका केवल कल्पना ही आधार रहा हो शायद यह मेरी कोरी कल्पना ही ठहरी
3. सीमाओं में तनाव
सीमाओं में तनाव मानव मस्तिष्क में बढ़े आक्रोश पर निर्भर करता है जिसका कारण असहनीय घटनाओं का घटित होना जिस की भरपाई किसी भी तरह से ना की जा सकती हो इसी तरह की घटनाएँ जन्म देती हैं शायद ऐसे आपसी तनावों को जिसके आगोश में आकर मानव ऐसे कार्यों को कर बैठता है जिनका पश्चाताप के अलावा कोई समाधान नही होता है ऐसा प्रतीत होता है कि बचना चाहिए ऐसे कुकृत्यों से जो तार-तार कर देते हैं मानवता को व्यथित कर देते हैं मानवीय संवेदनाओं को कलंकित कर देते हैं आपसी सरोकार को यदि कुछ शेष रह जाता है तो वह है विध्वंशता जिसके शेष रहते हैं केवल व्यथित अवशेष जो बार-बार हमें पुनः कुछ करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं
4. क्रूरता की जननी है लालच
क्रूरता की जननी है लालच प्राणी लालच के वशीभूत होकर वह सभी कृत्य करता है जो इन्सानियत के विरुद्ध होते हैं ऐसे कर्म जो संवेदनाओं की आधारशिला पर चोंट पहुँते हैं ऐसी क्रियाशीलता जो मानवीय मूल्यों पर प्रहार करते हैं लालच छिन्न-भिन्न कर देते हैं आपसी ताने-बाने को क्रूर आतताइयों का लालच इतना बढ़ जाता है वह अपने कृत्यों के द्वारा लाँघ जाते हैं सम्पूर्ण हदों को फिर क्या जारी होता हैं विध्वंसक क्रिया कलाप कराहने लगती है मानवता बहने लगती है संवेदना आग के शोलों सा धधकने लगता है प्रेम तभी दिखती है ऊँची-ऊँची लपटों के रूप में आपसी भाईचारा के कलंक की कालिमा जो अच्छादित कर देती है स्नेहिल नीलाम्बर
5. परिधान की दृश्यता
परिधान की दृश्यता दर्शकों को हमेशा प्रभावित किया है ऐसा केवल कहा ही नही जाता देखा और समझा भी गया है दृश्यता मानव मस्तिष्क को केवल प्रभावित ही नही करती अपितु अपनी ओर आकर्षित करते हुए देखने वालों के मनोभावों को नियंत्रित करते हुए स्वयं के वशीभूत करने में भी सफलता प्राप्त करती है परिधान केवल बाहरी आवरण नही है यह मानवीय अन्त:करण को दिग्भ्रमित करता है आन्तरिक संवेदना का प्रकटीकरण करता है जो मानव की मनोदशा को परिवर्तित करते हुए परिभाषित करने में सक्षम दिखता है परिधान परिवेश के अनुरूप होता है जिसमें विभिन्न प्रकार की विविधिता पायी जाती है अपनी लक्षणा के लिए सर्वविदित परिधान कार्य कुशलता का एक परिणाम है मानव की चाहत के अनुसार उसकी जिज्ञासा के भावों को स्वयं में परिमार्जित करते हुए समाहित करता है क्या ऐसा करने वाला ही लक्षण परिधान होता है
6. मैं मानता हूँ
मैं मानता हूँ दुआओं से आत्मिक सन्तोष मिलता है किन्तु मर्ज तो दवाओं के प्रयोग से ही ठीक होता है आतंकवाद हो अथवा दुश्मन देश वार्तालाप केवल एक आत्म सन्तोष के लिए है वास्तविक इलाज़ इनको कुचल देना ही है बिच्छू का डंक चुभोना उसका स्वाभाविक गुण है इन्सानियत को प्रभावित करना उसकी इच्छाशक्ति है मानवता को शर्म सार करना उसकी एक दृढ़ धार्मिक कट्टरता है यह जहाँ भी उपस्थिति रहेंगे अथवा उपलब्ध रहेंगे अपनी अकड़न और क्रियाशीलता को झलकाते ही रहेंगे मानवीयता को कलंकित करते रहेंगे इनका विनाश ही सही उपचार है इसलिए उठो जागो और आगे बढ़ो समय अनुकूल है लाल गर्म लोहे में चार हथौड़ा पर ही गंडासा बन जाता है ठन्ढा लोहा पीटने का कोई औचित्य नही है।
7. कल्पना की छाया में
कल्पना की छाया में बैठकर मिलन के कुछ गीत मद्धिम-मद्धिम स्वर में गुनगुना रही थी कुछ पहने हुए नवल परिधान बालों में लगाए पुष्पों की लड़ियाँ दोनों आँखों में काजल की पतली रेख श्रृवणों में झूमक नाक में बाली माथे में बिन्दी होंठों में लाली गले में अन्मोल रत्न जड़ित हार हाथों में कड़ा छड़ा ककना के सहित उंगलियों में स्वर्णीय अंगूठियाँ कमर में करधनी पैरों में नूपुर युक्त पायजेब सहित सुन्दर सी चुटकी मुदरी मीना हूरों से भी अधिक खूबसूरत अद्भुत किए श्रृंगार स्वेत वर्ण वाली वह प्रति नव युवती किसी के ओज से निकली हुई आभा की तरह अनन्त इच्छाओं से परिपूर्ण जिसने तार-तार कर दिया था विपत्तियों की उस स्याह रेखाओं को जिसके विरुद्ध दिख रही थी उसके मुख में साफ-साफ महकती मादकती एक पावन मुस्कान कोई और नही वह थी दिनमान की स्वर्णिम रश्मियों से लसी चमकती हुई भोर
8. अब नही चलेगा
अब नही चलेगा काम केवल दुन्दुभियों से करना ही पड़ेगा दो-दो अथवा चार-चार हाथ अपनी उचित शक्ति और शौर्य का प्रदर्शन जिसको देखने के लिए लालाइत है हैवान की पागल हठधर्मिता से लवरेज लालिमा युक्त आँखें शायद विध्वंस ही है उस आतताई की चाहत है वह व्यथित और पीड़ित कर देना चाहता है सम्पूर्ण जन-मानस को जबकि उसको भान नही है जरा सा भी इस बात का उसे भी रोना पड़ेगा एक-एक आँख में चार-चार आँसू यह परिणाम होगा उसकी शैतानियत का उसकी क्रूरता का उसकी इन्सान के विरुद्धक नीतियों का उसकी अमर्यादित भाषा का उसको उसकी इस हरकत का दण्ड अवश्य मिलेगा वह भी उसकी सोच से बहुत-बहुत अधिक जिसके लिए वह अपना रहा है बार-बार ओछी कार्यप्रणाली जिससे नही आता है वह बाज जबकि भुगता है भुगतेगा और शायद भुगतता ही रहेगा
9. कलम का चलना
कलम का चलना मुस्कुराना फिर रुक जाना हृदय के भावों को लिखते-लिखते शर्माना अपनों पर इतराना उरीय पीड़ा पर सिसकना चाहतों पर मचल जाना वेदना में बहक जाना कटुता पर निखर जाना सौंदर्य में सिहर जाना एक स्वाभाविक गुण था पर ज्वर के ताप से तपना निमोनिया की गलन से गलना हैजा की उल्टियों में डूब जाना केवल इतना ही नही अपितु कोरोना जैसी महामारी का शिकार हो जाना यह कलम का ना तो स्वाभाविक गुण था ना ही अनुवांशिक शायद यह थी उस कलम की सम्वेदनशीलता वह इसको समझ रही थी अपनी जुम्मेवारी जिससे स्वयं को जोखिम में डालकर उठा रही थी इतने कठोर प्राण घातक कदम कर रही थी मुकाबला प्रत्येक समस्या का लिखना चाहती थी वह चिर् इतिहास करके त्याग और देकर अपना बलिदान आखिरकार कलम तो कलम ही है
10. जीवन एक
जीवन एक बहती हुई धारा का पर्याय है जिस तरह से किसी सलिला में एक-एक बूँद का महत्व है ठीक उसी तरह से जीवन में एक-एक पल का जिस तरह से पत्थर की चट्टानें नदी के प्रवाह में गतिरोध उत्पन्न करतीं हैं ठीक उसी तरह समय-समय पर आने वाली समस्याएँ जीवन की राह में बाधाएँ खड़ी करतीं हैं इन बाधाओं से संघर्ष करना जीत जाना ही जीवन है जीवन रूपी धारा में बहकर भावनाओं के सागर में खुद का बिलय करना संक्रीणता कहलाती है जिससे व्यक्ति को बचना चाहिए जीवन समय का पूरक होने के कारण उससे सामंजस्य स्थापित करना अनिवार्य सा है यही तो जीवन की विशेषता है जो होनी भी चाहिए जीवन भ्रम की पगडंडियों पर भटक ना जाए विचलित होने से बचे यही तो इस जीवन के अरकान है जीवन केवल अरकानों पर आधारित है।
11. दमक उठा हिम का शैल
दमक उठा हिम का शैल पड़ते ही शीतल चाँदनी के सिहर सा जाता उसका तन और मन सुन्दर कोमल छुवन से तुहिन कणों के उस समूह से विह्वल हो उठता जैसे ही स्पर्श करती चाँदनी उसके श्वेत बदन को वह अति आनन्दित हो ही रहा था उसी समय चमक उठीं ऊषा की स्वर्णिम किरणें सिमट गई सम्पूर्ण वह चाँदी सी चाँदनी की चादर जिसको ओढ़ रखा था हिम शैल ने स्वर्ण रश्मियों के छूते ही रोने लगा जोर-जोर से हिम शैल बहाकर अपने मोती जैसे गर्म-गर्म अश्क़ उसके हृदय में थी तो केवल पीड़ा ही पीड़ा अवरुद्ध हो रहा था उसका कण्ठ करता भी तो क्या करता लाचार हिम शैल बैठा जा रहा था प्रभा रश्मियों के प्रभाव से तपन से ऊष्णता से हो चुके थे उसके शरीर पर एक-दो नही बल्कि अनेकानेक ज़ख़्म अब वह दिख रहा था निरीह और असहाय जो खड़ा था अभी तक सीना ताने बढ़ता जा रहा था ज्यों-ज्यों सूर्य का ताप घटता जा रहा था त्यों-त्यों हिम शैल का अस्तित्व अस्तित्व तो अस्तित्व है फिर वह हिम शैल का हो अथवा इन्सान की इन्सानियत का
12. झुर्मुटों की पत्तियों से
झुर्मुटों की पत्तियों से चू रहे थे बूँद बनकर अश्क़ वह नही थे गर्म छूने से हाथ में महसूस होती थी उनकी शीतलता आँसू तो थे शायद ग़म के नही वातावरण भी एकदम से शान्त और सहमा-सहमा सा था चाहत का उल्लास भी नही चहक रहता था उसके आस-पास दूर-दूर तक कही भी प्रसन्नता का कलरव भी सुनाई नही देता था खामोश प्रकृति स्तब्ध व्योम स्थिर रश्मियों से अच्छादित आभा मण्डल स्याह की समाप्त होती रेखाओं से उन आँसुओं की टपकन को समझा जा सकता था यह चित्र हृदय पटल पर बार-बार प्रतिबिम्बित हो रहा था अग्रेतित उत्साह को देखकर खुशी तो वाग-वाग हो रही थी किन्तु छोड़ रही थी कई एक प्रश्न यह अश्क हैं अथवा चाँदनी की स्नेहिल बारिश की एकत्रित शबनम जो बूँद बनकर चू रही थी लतीय झुर्मुट की पत्तियों से
13. लोगों ने कहा
लोगों ने कहा यह जीवन पानी का बुलबुला है शायद उनको नही है मालूम पानी के बुलबुले की क्या है परिभाषा उसका कितना है वजूद क्या परिभाषा है जीवन की कितना है इसका अस्तित्व इसी विभेद ने दिया है जन्म हमारे हृदय में विकृत के अंशों को जो केवल फल फूल ही नही रहा है अपितु वह हो गया है एक विशाल दरख़्त जो अपनी छाया में समेट रखा है सभी असंसदीय भावनाओं को तभी तो वह पसार रहा है अपने हाथ और पैर दिखता है मधुर मुस्कान से लवरेज बल्कि वह जानता है अच्छी तरह से नही है इसका कोई ठहराव यही तो वास्तविक है बनता बिगड़ता पानी का बुलबुला
14. मैं बैठ गया था
मैं बैठ गया था उस छाया में यह समझकर इसी छाया पर मेरा हो जाएगा पूरा-पूरा निर्वाहन व्यतीत हो जाएगा यह अपना कुछ पल का जीवन मुझे नही मालूम था मैं जिस छाया का शौकीन हो गया हूँ वह शायद कुछ ही क्षण बाद मुझे छोड़कर चली जाने वाली थी यह मेरा भ्रम था या फिर और कुछ ? मुझे महसूस होने लगा था मेरे जीवन की क्रमवध्यता में उस छाया की तारतम्यता में एक सी समानता जरा सी भिन्नता नही थी छाया और जीवन दोनों में बराबर प्रवाह था किसी में दूर-दूर तक कोई ठहराव नही दिखता मैं समझ पा रहा था दोनों में एक सी गतिशीलता एक सा आचरण और एक सी विवसता दोनों में धूप-छाँव का समावेश दोनों पर सुख-दु:ख की उपलब्धता दोनों में हर्ष-विषाद के लक्षण साथ ही दोनों में आनन्द और कष्ट की प्रचुरता पर जीवन तो जीवन है और छाया तो छाया
15. अभिव्यक्ति की आजादी
अभिव्यक्ति की आजादी क्या मिली हमने तो सारी सीमाएँ ही तोड़ दिया अन्तर आ गया है हमारी प्रतिक्रिया में बदल सी गई है हमारी दिनचर्या विकृत सी होने लगी हैं हमारी मानसिकताएँ ओछे से होने लगे हैं हमारे वर्ताव हमारी सोच में हो गया है अभूतपूर्व परिवर्तन हम क्या थे क्या हो गये आजादी के नाम पर हमको केवल याद हैं आपने अधिकार शायद हम नही पढ़ पाए हैं उस किताब को जिसमें लिखें हैं हमारे कर्तव्य हमको पढ़ना चाहिए था ऐसा प्रतीत होता है कि हम हो गए हैं अपने कर्तव्यों से विमुख हम उन्मुख हो चुके हैं आकण्ठ डूबे स्वार्थों के विकृत हो चुकी हैं हमारी मानसिकताएँ भटक सा गए हैं हम अपने मूल पथ से पाना होगा हमको छुटकारा अपनी सोच से निकलना होगा अपनी संकीर्ण मानसिकता से जिससे फिर ना हों हम गुलाम सहेजकर रखें और रखें इस आजादी को
16. प्रकृति के
प्रकृति के शुआपन्खी गात पर अपनी रुआब ज़मानें के लिए खुद के गठीले बदन को दिखाकर डट गया था चना बाँधकर लाल रंग का कलगीदार मुडैठा तरेरकर देख रहा है चारो ओर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से जैसे वह अब मार ही डालेगा सभी को मुश्किल ही कर देगा जीना उसकी रुआब के सामने दिख रहे थे सभी के सभी बौने बन्द थीं सभी की बोलियाँ सन्नाटे से आच्छादित था सम्पूर्ण वातावरण कुछ भी कह पाने की स्थिति में नही था कोई तभी एक लिल्ली ने हिम्मत दिखाई किया आक्रमण फिर क्या एक चौथाई कर दिया चने के सारे के सारे रुआब को अब चना खड़ा था बिना वज़न का बिना अस्तित्व का झाँक रहा था अपनी दोनों बगलों को शायद मिल जाता किसी भी तरह से सहारा तभी चला उसपर धारदार हँसिया कर दिया धराशाई अब देख रहा था टुकुर-टुकुर चना ज़मीन पर पड़े चारो ओर को
17. मधुमाती चाँदनी
मधुमाती चाँदनी तुम समेटे थी अपने आँचल में अवनी के सम्पूर्ण अंधेरे को इस तरह से जैसे प्रभा रश्मियाँ समेट लेती हैं किसी कालिमा को पवन समेट लेती है पातों की कोरों से शबनम की बूँदों को अम्बरीय मेघों को नीर समेट लेता है वर्षीय कण समेट लेते हैं अग्नि की ज्वालाओं को क़लम समेट लेती है मानवीय भावनाओं जिह्वा समेट लेती है सम्पूर्ण शब्दकोश को कहीं ना कहीं दिख रही थी वह प्यारी सी मधुमाती चाँदनी व्यथित उसके हृदय में साफ-साफ देखे जा सकते थे वेदना के पिघलते मोती जैसे कण उसके अन्त: उरीय सागर पर ताल और उत्ताल की स्थिति में ज्वारीय लहरें संवेदित कर रहीं थीं उत्साहित कलमीय अंकन को स्वयं में वह आच्छादित कर रही थी अपने प्रकाशीय आभा मण्डल से समूचे तिमरीय समूह को जो उत्पन्न कर रहा था कहीं ना कहीं भय ज़िन्दगी के जीवन को मधुमाती चाँदनी तुम धन्य हो तुम धन्य हो तुम धन्य हो!
18. शैल मत करो
शैल मत करो केवल तुम ही गर्व शैलजा पर उस पर अभिमान है सम्पूर्ण संसार को वह केवल शैलजा ही नही है सारे जगत की मूल है यह हमारी भूल है हम शैलजा को केवल शैलजा ही मानते हैं वह इस विश्व के आदि और अंत दोनों में विद्यमान है उसके व्योहार से ऐसा प्रतीत होता है शायद उसने ही निर्माण किया है प्रकृति सहित सारे जहाँन का वही है समस्त प्राणियों का लक्ष्य वही है पोषक एवं संहारक वह क्यों नही सुधार देती सभी के आचरण क्यों नही शुद्ध कर देती है सभी की अभिव्यक्ति क्यों नही पन्पाती सभी के हृदय में सद्भावना समता के स्वच्छ अम्बर में क्यों नही भरने देती स्वतंत्रत उड़ान दिशाओं की सीमा को क्यों नही समाप्त कर देती क्यों नही मिटा देती अंधेरे और उजाले का भेद शैल जब शैलजा एक है तो फिर किस बात की अनेकता कैसी भ्राँन्ति और विविधिता अनुसंधान की कसौटी में सत्य की शैलजा तो शैलजा है
19. ऐ ज़िन्दगी
ऐ ज़िन्दगी तू क्यों करती है अनर्गल प्रलाप क्या तू यह नही जानती अनर्गल प्रलाप का कितना है महत्व कितना प्रभावी है अस्तित्व कितनी इस अनर्गल प्रलाप की है आयु सत्य संभाषण के सामने यह उसी तरह छँट जाता है जिस तरह भोर के प्रकाश से छँट जाता है अंधेरा नष्ट हो जाती है सम्पूर्ण कालिम मिट जाता है अनन्याय कम्पित होने लगता है अधर्म का स्वर धूमिल हो जाती है उसकी यशीय पताका फिर भी तू किए जा रही है सहर्ष अनर्गल प्रलाप-दर-प्रलाप ऐ ज़िन्दगी तू छोड़ दें! अनर्गल प्रलाप को समता के भाव से हो जा विभूति समानता को कर ले हृदय से अंगीकार बन्धुत्व का सागर बन के अच्छादित कर दोनों किनारे प्रवाहित होती भाईचारे की धार बनकर मोड़ दे अपनी आण्विक शक्ति को वह बढ़ती जा रही है विध्वंसक राह पर छोड़कर युद्ध को चली जा बुद्ध की शरण में क्रान्ति की अभिलाषा को त्यागकर बन जा शान्ति का पर्याय ऐ ज़िन्दगी छोड़ दे अनर्गल प्रलाप को
20. ढहा दिया तुमने जिसको
ढहा दिया तुमने जिसको होगा वह तुम्हारे लिए एक पेड़ वह तो मेरा था एक संसार मेरे परिवार की आशाओं का स्नेहिल रंगभवन मेरे अपनों की यादगार का ताजमहल मेरा था वह हँसता खेलता जीवन मुझे उसी में मिलीं थीं ज़िन्दगी की यही कुछ दो-चार सांसें शायद तुम्हें नही मालूम इसमें मेरे पूर्वजों की खप गई हैं कितनी पीढ़ियाँ कितनों ने धारण किया है नवीनतम शरीर प्रातः से सायं तक करते थे सभी चारो ओर से किलोल इसको गुंजायमान रखते थे अपने मधुरतम् स्वर लहरी से पर-पर-पर! नही देखा गया तुमसे पार कर दी तुमने सारी की सारी हदें कितना स्वार्थी हो गया है तू मनुष्य मैं मानता हूँ तुम्हारी भी हैं कुछ आवश्यकताएँ किन्तु क्या मन में विचार आया क्या होगा हमारा बिना विचार किए ढहा ही दिया तुमने
21. रजनी
रजनी निद्रा के आगोश में इस तरह से समाती चली जा रही थी जिस तरह धुआँ अम्बर के दिवाकर संध्या के अंधेरा प्रातः के वसुन्धरा प्रकृति के आगोश में समा जाती है फिर चाहे जो भी ऋतु हो या फिर परिस्थिति जबकि उसके नाजुक अधरों से टपक रही थी मादक युक्त श्वेत मोती सी शबनम की कुछ बूँदें जो दमक रहीं थीं साफ-साफ उसके तन में उसके मन में हरित परिधान में सुशोभित रजनी का परिदृश्य ही कुछ अलग था मुस्कान युक्त चेहरा गदराया छरहरा बदन गुलाबी होंठ शंखाकार ग्रीवा अम्रांक जैसी आँखें मेघीय अलकें स्वर्णीय पलकें कीर चन्चु जैसी नासिका लावंणीय सौंदर्य की मलिका आखिरकार रजनी समा ही गई
22. वह था
वह था झरने से झर-झर कर कल-कल छल-छल करता सलिला का मृदुल जल अथवा उस पाषाण शिखर के कठोर अश्कों का समूह जो कर रहा था हमारे कुकृत्य का विरोध शान्त भाव से स्वत: रुदन करके क्योंकि नष्ट किया था हमने उसके वृक्षीय परिवारी जनों को छलनी कर दिया था उसके सीने को अलग कर दिया था उसके धड़ से सिर को काट डाली थी उसकी भुजाओं को ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ ही समय बाद बन्द हो जाएगा उसका रोना अश्कों का बहाना आखिरकार वह भी रोए तो कितना रोए रोने की भी तो एक कोई सीमा है पीड़ा सहन करने की कोई एक हद है क्या बहते ही रहेंगे इसी तरह से उसके अश्क जन्म जन्मान्तरों तक
23. सुषुप्त होती सद्भावना
सुषुप्त होती सद्भावना सिसकती संवेदना ग्रीवा में अटकती अभिव्यक्ति पतन की ओर अग्रसर नैतिकता मानवीय मूल्यों की श्रृंखला पदारूढ़ होते अधिकार सम्पत्तीय हबिश क्रूरता की पराकाष्ठा क्या यही है ! संसार की संसारिकता मैंने सुना था कि किसी ने दे दिया था काटकर अपने शरीर के अंगों को एक पक्षी के वचाव में नेवछावर कर दिया था अपनी देंह की अस्थियों को आतताइयों के संहार हेतु अस्त्रीय सृजन के लिए काल के गाल से वापस कर लिया था किसी ने अपने पति के प्राण को मैं खोज रहा हूँ उसी जहाँन को शायद मिल जाए जिसमें उपलब्ध था यह सब कुछ मेरी खोज जारी है और पाने तक जारी रहेगी आपको मिल जाए तो जरूर बताना जरा सा ही सही पर करना मेरा मार्गदर्शन केवल इतनी सी है मेरी चाहत मेरी इच्छा
24. मैं लघु नही
मैं लघु नही लघुता का पर्याय हूँ अंश नही बल्कि अंशिका हूँ कोई श्रृंखला नही जबकि एक कड़ी हूँ फिर भी तुम समझकर मुझे बहा रहे हो अपनी आँखों से गर्म-गर्म पानी जबकि तुम्हें हँसना चाहिए खिलखिलाना चाहिए डूब जाना चाहिए जस्न की श्रृंगारिकता में उद्गारों के समन्दर में यथार्थ के प्रकाश में संवेदना के कुण्ड में विचारों के नीलाम्बर में क्यों ? मैं ही तो एक हूँ जो पाया जाता हूँ प्रकाश बनकर एक नही प्रत्येक के अन्तस में सम्बन्ध बनकर सभी के सद्भावों में चेतना बनकर सभी के हृदय में मिटा देता हूँ अपने पराए का विभेद करता हूँ सभी को प्यार लगाता हूँ सभी को अपने वक्क्ष से अब तो मुस्काओ आओ मेरी चाहत से गले लग जाओ
25. चाँद से कह दो
चाँद से कह दो चमका तो करे पर इतना नही रेत मक्खन हो जाए ओस मोती बन जाए निशा दिवस सी बन जाए चाहत वेदना मे परिवर्तित जाए वस्तु परछाईं जैसी बन जाए बल्कि रहने दो फूल को फूल कली को कली यौवन को यौवन लली को लली इतना मत चमको यथार्थ परिवर्तित हो जाए कल्पनाओं के ढेर में वीरता खो जाए श्रृंगार के अतीत पर सम्भावनाएँ चश्मा की बूँद सा गिरकर बिखर जाएँ काँच सा बल्कि साथ दो सहयोग के सहित मैं निखर जाऊँ आप सा सिसकना छोड़कर मैं चहक जाऊँ बहकना भूलकर मैं महक जाऊँ इत्र सा दहकना त्यागकर चमक जाऊँ आप सा चाँद मुझे नही मेरी भावनाओं को पढ़ो समझो और फिर चमको
26. हमेशा
हमेशा चूसते रहते हो तुम रस फूल के पुंकेशर का कभी-कभी तो ले लिया कीजिए पुष्प के बाह्दल का चुम्बन लगता है यही तो है समता समानता बन्धुत्व भाईचारा अपनत्व की स्वस्थ्य लोकतांत्रिक परम्परा जिसका नही करते अनुपालन तुम मधुप तुम आशिक हो सम्पूर्ण गुलशन के गुलों का किन्तु दिख रहा है तुम्हारे क्रिया कलाप से भेदभाव साफ-साफ आखिरकार कुछ तो है मधुकर के मन में ऐसी विकृत जिसको जाना ही नही अपितु देखा भी जा सकता है बागवान विह्वल तो तब हो जाता है जब वह देखता है द्रुमदलीय शेष अंगों का परिष्करण आहत होती हैं उसकी भावनाएँ टूटकर बिखर जाती है उसकी संवेदना वह देखता रहता है खड़ा दूर-दूर तक अपनी निश्छल आँखों से
27. व्याकरण
व्याकरण तुम एक अति प्राचीन महिला हो किन्तु -------- ! एक नई नवेली दुल्हन सी नाम है संज्ञा सर्वनाम की गोटेदार ओढ़े चुनरिया क्रिया का सुन्दर पोलका (ब्लाउज) कर्म के कुचों को ढके विशेषण युक्त चाल पर मचल रहा है मदन व्याकरण तुम्हारी अव्यय सी मुस्कान अलंकारों की बिन्दी झलक रही है माथे पर शब्द-विलोम से दोनों श्रवण पर्याय की लम्बी ग्रीवा तद्भव-तत्सम सा विशाल वक्षस्थल अनेकार्थी भुजाएँ व्याकरण तुम्हारा समानार्थी यौवन छंद सी पायल की छनछनाहट मुक्तक की चार चुटकियाँ कारक के आठ नगीनों से आच्छादित सवैया सा स्वरूप दोहा जैसी सुन्दर देंह सोरठा से गुलाबी कपोल साखी जैसे मधुर शब्द उलझे हैं रमैनी के काले केसों पर व्याकरण तुम उपसर्ग एवं प्रत्यय के नाजुक होठों से संधि जैसी अभिव्यक्ति सरसा रही हो समासों की कामुकता रसों से सुरमई कंटीले नैनो से चला रही हो तीखे-तीखे बाण व्याकरण तुम शर्मा रही हो अपने मनोरम सिंगार पर किन्तु -------- ! बढ़ रही हो आगे कुण्डलियों के सहारे धीरे-धीरे व्याकरण तुम
