हिन्दी कविताएँ - सुरेन्द्र अग्निहोत्री



सावन

नील वर्ण से बादल लेकर आया सावन। बहनों को है खुशियां भाइयों का है पावन। बंजर भूमि हरियाली से लग रही है सुहागिन। हरे भरे बाग में भाग रही है नागिन। आसमान में सात वर्ण का बना हुआ है इन्द्र धनुष। देख-देख कर मस्त हुआ है मनुष्य। सावन की है सबकी बहुत प्रतीक्षा। बहनों बांधे राखी भाई करेगें रक्षा।

हँसी ओठ से कह रही

हँसी ओठ से कह रही बेनाम से गीत एक दिन नाव जायेगी नदी से जीत। छूट जायेगा मुक्तधारा का तो अतीत आत्मवादी व सत्यवादी यों की तो प्रीत। लाग लपेट निरन्तर चल रही है शीत आदिम राग भोर का सपना है संगीत। बरसाती नदी का वेग बना है नीत आकाश से झरके मिलते है मन मीत। अनंत विस्तार में गया जीवन है तो बीत शिल्प कथ्य और कहन में भूला तो गीत। बातूनी समय पटर-पटर की है राजनीत आग हार की दे गयी सबको अब है जीत।

कितना कठिन है निकलना

कितना कठिन है निकलना मछुआ के जाल में, डूबे रहे सदा ही हम सब बस इसी ही ख्याल में। दहके पलाश फिर से वर्षो के बाद ही सही में, काश रिश्ता सुधार लेते मगर डबू रहे सवाल में। रफ्ता-रफ्ता छा गया अंधेरा फिर से चारों ओर, जिन्दगी गुजरती रही हमेशा ही सिर्फ बवाल में। ठंड़ी-ठंड़ी हवा देती रही सदा समाधान की राह, फसे लेकिन तितलियों के सुनहरे रंग की चाल में। सौगात मिले न मिले लेकिन फिर भी खुश है, सलीका सीखना ही पड़ेगा अब तो हर हाल में। किसको पता था कौन क्या क्या छुपा रखे है, हमने देखा भेड़िया छिपा था शेर की खाल में। रोशनी दिखाती है राह हम सबको सदा ही यहां, खुशियों की सौगात आयेगी लगता इस साल में।

गीत-भोर की पवन

भोर की पवन, दे गयी छुवन। बोल रह गये अधर में, बन गये अब तो वचन। रात अनमनी न रही, दूर हो गया अकेलापन। भोर की पवन, दे गयी छुवन। प्रार्थना के गीत बज उठे, बासुरी के स्वर में मगन। अधखुली नींद में भी, रोषनी का हो रहा हवन। भोर की पवन, दे गयी छुवन। बरफ की तरह पिघल गये अनगढ़ी जिन्दगी में नयन शुभ मंत्रणा के स्वर से गूजे बेजान पत्थरों के भवन भोर की पवन, दे गयी छुवन। कथक के घुघरूओं सा नृत्य में झूमता यौवन, पुलकित हृदय की धड़कन नेह से देह वन गयी मधुवन भोर की पवन, दे गयी छुवन।

सब्र खोने का वक्त आ गया है

सब्र खोने का वक्त आ गया है कुल जमा तस्वीर धुंधली है कहने का लब्बोलुबाब यही है देश फेल हो रहा है? देश के अंदर से नये देश फूट रहे हैं जो देश के लिए नहीं अपनी राजनीति चमकाते हैं सत्ता की खातिर झूठ को सच मनवाते हैं और लगता है हमने मान लिया है देश नहीं क्षेत्रीयता की बारी है सपनों को तोड़ने की तैयारी है थोड़े बेसब्र रहे और हम तब तक जोड़ घटाव करे दोराहे पर रहे देश! हम हाथ पर हाथ धरे जो वो चाहे करे हमें सिर्फ चुप करे।

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