हिन्दी ग़ज़लें : डॉ. रामकरण साहू ‘सजल’

Hindi Ghazals : Dr Ramkaran Sahu Sajal


1. उतर करके रूह तक का

उतर करके रूह तक का सफ़र करना ठीक है, ज़ालिमों की बेहयाई आज़ डरना ठीक है । चाह अपनी थी मिलन की जो अधूरी रह गई , याद कर उनको हृदय में आज रहना ठीक है । तेज धारा नाव जर्जर पवन हमसे अजनबी , है पारिस्थिति विषम लेकिन धीर धरना ठीक है । इस क़दर शैतान चलता ज्यों धारा की धार हो , भूमि पर इन्सानियत झरने सा झरना ठीक है । झूमता हर राह पर हैवान कुछ निज जोश में , जंग के मैदान में क्या प्राण हरण ठीक है । जीवन में गुलाम रहना"सजल"को भाता नहीं , वास्ते हक - हकूक के बे-मौत मारना ठीक है ।

2. जीवन की अनुपम धारा में

जीवन की अनुपम धारा में धीरे नाव बढ़ाना है, हर पग नीचे शूल बिछे हैं धीरे पाँव जमाना है । गहरी नदियां जर्जर नइया धारा भी मतवाली है , निज हाथों से धीरे-धीरे ख़ुद पतवार चलाना है । जिनके खातिर हम रातों में प्यारी नींदे ठुकराई , थोड़ा रोकर चुपके-चुपके उनके ख़्वाब चुराना है । जिनको हमने अपना माना हमसे रिश्ता तोड़ चले , लेकिन अपने भाव पुराने कायम रख समुझना है । सग में जीनें सग में मरनें का हमसे इकरार किया , ऐसे बेदर्दी बालम को हँस-हँस कर ठुकराना है । हमने उनसे प्यार किया है उसने समझी नादानी , दोनों"सजल"हुए हैं नैना पल-पल इन्हें बहाना है ।

3. कुछ पत्थरों से पैर भी छिलते रहे

कुछ पत्थरों से पैर भी छिलते रहे , पर मोम से ही ज़ख़्म सब मिलते रहे । हर खंजारों की धार कुछ पैनी नहीं , सब नयन की ही कोर से कटते रहे । कलियाँ बिखेरी मार्ग में खुद फ़ूल की , हम कंटकों की राह पर चलते रहे । ये छल-छला के अश्क़ छलके नैन से , हम चाँद की इस तपन पर जलते रहे । कुछ लहर बनाकर भावनाएँ खेलती , वह रात के हर ख़्वाब पर पलते रहे । इंसानियत का क़त्ल होता है यहाँ , देख कर के "सजल" कर मलते रहे ।

4. फकीरी छोड़कर सुल्तान

फकीरी छोड़कर सुल्तान कुछ बनने लगे हैं, भूल कर ईश को वह और कुछ भजने लगे हैं । ज़िन्दगी भर ख़ुदा के हम रहेंगे यह कहा था , खुदी के वास्ते अख़बार पर छपने लगे हैं । कुशा की झोपड़ी कैसी वहीं गुरुकुल कि राहें , महल पर ख़ुद वजीफा बैठकर करने लगे हैं । मुसलसल पैरवी जिसने किया इंसानियत की , वही इन्सान ख़ुद से आज कुछ डरने लगे हैं । निवालों को तरसने लोग राहों पर बिलखते , धर्म के नाम पर इतिहास कुछ लिखने लगे हैं । जिन्हें ईमान था प्यार नहीं कोई गिला था , सियासत में"सजल"होकर वही फंसने लगे हैं ।

5. मैं टूट गया हूँ दोस्त

मैं टूट गया हूँ दोस्त मुझे बदनाम मत कर , माल बजारू नहीं हूँ मुझे नीलम मत कर । कुछ तूफानी हवाएँ अब तबाही मचा रहीं , हम रूबरू हैं आपसे हमें पैग़ाम मत कर । यहाँ बंदिशों में मेरा निकलना मुश्किल हुआ , आरज़ू है अपनी कोई कि सरे-आम मत कर । कोई इन झील सी आँखों में डूबती किश्ती , मैं एक रुका हुआ अब हूँ मुझे ज़ाम मत कर । हम तकरीरों कि नहीं ज़ज्बात की कद्र करते , अपना दर्द यह जुबानी है सरे-शाम मत कर । आहिस्ते-आहिस्ते साए सा"सजल"गुम ना हो , यह तुम्हारा है साहब तुम मेहमान मत कर ।

6. महल की हर ईंट बस

महल की हर ईंट बस इतना कहा है , दर्द हद से जब बढ़ा हँसकर सहा है । जिस धारा पर बुर्ज हँसते अरु कंगूरे , यश हमारा उस धरा पर ही बहा है । गंगनचुम्बी हौसले बढ़ते रहे कुछ , धैर्य सबके सामने अब जल रहा है । साथ में अवरोध के गतिरोध देखा , मीत का साहस वहीं रो कर ढहा है । आज भी इस नीव के पत्थर चहकते , ज़िन्दगी सहती रही दुःख जो महा है । लूटते यश आप ऊपर से दमक कर , वे बचे जो"सजल"हो स्वयं तनहा है ।

7. कोई चिता की आग़ में जलता रहा

कोई चिता की आग़ में जलता रहा , चिंगारियों के ख़्वाब पर पलता रहा । मजबूरियों ने तोड़ा कदम के छाले , कोई फ़िज़ा की झाग में चलता रहा । इक शख्सियत कबूल करना था उन्हें , मौका गया तो हाथ फिर मलता रहा । शोले नहीं शबनम कि उनको चाह थी , कुछ वादियों की ठण्ड में गलता रहा । रश्मियों के साथ था सम्बन्ध जिनका , साँझ के दिनकर सा वह ढलता रहा । हर बात करती"सजल"होकर धड़कने , कुछ चुटकियों में शैल को छलता रहा ।

8. हम तुम्हारी ज़ुल्फ का ही

हम तुम्हारी ज़ुल्फ का ही आशियाना चाहते , दो पलों की ज़िन्दगी हँसकर बिताना चाहते । कुछ नहीं शिकवा-गिला इंकार या इकरार हो , इश्क़ जो हमसे किया सबको बताना चाहते । मुस्कुराना गुनगुनाना फितरतों में आपकी , चुभन तीरे-ज़िगर की उनको दिखाना चाहते । तुम हमारे हो न हो पर हम तुम्हारे हो गए , तिलमिलाती आँख से नैना लड़ाना चाहते । हूर सी हस्ती तुम्हारी आज हम ठहरे फ़कीर , हुस्न-मलिका सूरते सीरत मिलाना चाहते । भावनाएँ"सजल"तो कैसा भिखारी बादशा , ख़्वाब में आते रहें हम यह सुनाना चाहते ।

9. तुम रूठ जाने की सज़ा

तुम रूठ जाने की सज़ा क्यों दे रहे , नज़रें छिपाने की सज़ा क्यों दे रहे । अब दर्द सीने में लबों में प्यास है , तुम अश्क़ पीने की सज़ा क्यों दे रहे । हम तो तड़पते मीन जैसे रेत पर , अब लाश होने की सज़ा क्यों दे रहे । हर वक्त अपना इश्क़ यूँ रोता रहा , इतना सिसकने की सज़ा क्यों दे रहे । कुछ भूल जाना याद आना तुम हमें , हमको भुलाने की सज़ा क्यों दे रहे । दिन-रात रोता"सजल"तेरे प्यार में , रोने रुलाने की सज़ा क्यों दे रहे ।

10. अपने मिलने के पल

अपने मिलने के पल नहीं आते हैं , कितना भाते थे अब नहीं भाते हैं । तेरी तरन्नुम थी कोकिला जैसी , जैसा गाते थे अब नहीं गाते हैं । तुमसे मिलना भी मेरी मजबूरी थी , जैसा पाते थे अब नहीं पाते हैं । वह कैसी होती है धूप क्या जाने , घन सा छाते थे अब नहीं छाते हैं । तुम्हारे आने पर अपनापन होता , रिश्ते - नाते थे अब नहीं नाते हैं । हो"सजल"आते थे प्यार लाते थे , दौड़ चले आते हैं नहीं लाते हैं ।

11. रैना रोती अश्क़ सिसकते

रैना रोती अश्क़ सिसकते दिल के टुकड़े लाख हुए, टूटी उर की मोती माला ग़म के मुखड़े लाख हुए । हम पर होते ज़ुल्म हजारों सहना लगता भारी अब , दोनों के मन प्यार उमड़ता लेकिन झगड़े लाख हुए । तन्हाई यह क्यों तड़पती दिल भी सहमा-सहमा है , कोई मीत नहीं मिल पाया तन के चिथड़े लाख हुए । अपनी मौजों का हर सावन हमसे लगता रूठ गया , ऐसा लगता हम दोनों को बरसों बिछड़े लाख हुए । सूख गई है साख इश्क़ की पेड़ पुराना सदियों का , प्यासी ममता की माटी को वर्षों जकड़े लाख हुए । नैनों का गुलशन में हँसना हमको लगता मुश्किल है , भूल नहीं पाए ज़ख्मों को फिर से दुखड़े लाख हुए ।

12. ठोकरें जो पैर की मिट्टी को

ठोकरें जो पैर की मिट्टी को मारा मान लो , संगेमरमर में फिसलते पग उन्हीं के जान लो । राह का राही कहाँ जीवन कि मंज़िल कठिन है , मंज़िल तुम्हारे क़दम चूमेगी जरा तुम ठान लो । बाग़ अपना फूल अपना पेड़ सारे डाल अपनी , घर बचाना तो कुल्हाड़ी का उन्हीं से दान लो । मित्रता का भाव लेकर भेंटना उर चाहते सब , ज़िन्दगी की प्रगति को पीने का पानी छान लो । घूमते कुछ कीट जहरीले बहुत भू-भाग पर , हो अगर बचना तुम्हें तो मन की चादर तान लो । हो"सजल"या शुष्क हो इसमें नहीं कुछ फ़र्क है , प्रेम आखिर गर मिले तो हँस उसी से ज्ञान लो ।

13. अपनी सब गलतियाँ मशहूर है

अपनी सब गलतियाँ मशहूर है ज़माने में , कुछ यहाँ चुपके से मशहूर है फंसाने में । हम जिनकी राह के काँटे उठाया ता-उम्र , वही परेशान है अपना किला ढहाने में । तब आँख मूँदकर कई तालियाँ बजा रहे थे , वह छाती पीटते अब अस्तित्व बचाने में । सुना उनकी गुफ्तगू तो हम भी मुस्कुराए , स्वयं आग लगाकर के लगे हैं बुझाने में । सारे सफर में जिसने यारी कि दी दुहाई , आँसू बहा कर रोया मुझको हि उठाने में । कोई नहीं हमारा केवल"सजल"थी आँखें , इस मौत को बधाई ज़मींदार बनाने में ।

14. छोड़ मेरे ज़ख़्म मत मरहम

छोड़ मेरे ज़ख़्म मत मरहम कि जहमत पल तू , हम मुसाफ़िर कुछ पलों के नेक नज़रें डाल तू । लफ़्ज़ होठों से जो निकले गुनगुनाते वह रहे , कड़क हो ना तिलमिलाओ शूल सा मत शाल तू । पंख हों तो फड़फड़ाना आदतों में इक सुमार , हम परिंदे आशिक़ी के मत बिछा अब जाल तू । भूलना फितरत तुम्हारी कि यह हमें मंजूर अब , रहम करके बख़्श देना खींच मत अब खाल तू ‌। इश्क़ के मैदान-ए-जंग पर छोड़ दो तन्हा हमें , मुस्कान ही शमशीर मेरी मत बनो अब ढाल तू । हुस्न के दिन चार कोई मत करो इस पर गुरूर , आरज़ू है"सजल"की इस अर्ज़ को मत टाल तू ।

15. हँस हुस्न की महफ़िल

हँस हुस्न की महफ़िल सजाया आप ने , ख़ुद मुस्कुरा हमको बुलाया आप ने । मैं खिलखिलाती फ़ूल अपने बाग़ का , फिर तोड़ करके क्यों जलाया अप ने । कुछ गुनगुनाता एक रही राह का , हमको मुसाफ़िर क्यों बनाया आप ने । हम मुद्दतों से ख़्वाब कुछ पाले हुए , आवाज़ देकर क्यों जगाया आप ने । वीरान सी कुछ बस्तियाँ अब लग रही , उनको हँसकर फिर बसाया आप ने । मैं सिरफ़िरा इक"सजल"तुमसे पूछता , क्यों नेह का दीपक बुझाया आप ने ।

16. चाँद हँसकर तुम सिसकना छोड़ दो

चाँद हँसकर तुम सिसकना छोड़ दो , मुस्कुरा कर गुल बिखरना छोड़ दो । खो रही सम्वेदना अब पुरुष की , इश्क़ बेहद तुम निखारना छोड़ दो । शुष्क होती चाहतों की आद्रता , होंठ समझो तुम दहकना छोड़ दो । मैंखानों की खिड़कियाँ तो बन्द है , राह पर राही बहकना छोड़ दो । सुन जीवन सुन तन मन लग रहा , मान लो साथी महकना छोड़ दो । आज़ फूटे ना कसौटी सत्य की , "सजल"साथी है परखना छोड़ दो ।

17. ख़त मिला तकिया के नी

ख़त मिला तकिया के नीचे रख दिया मैं सो रही , ख़्वाब में उस यार के संग गुलशनों में खो रही । नज़र जिससे थी मिली ना गाँव गलियों में कभी , भ्रमर की शहनाइयों पर आज उनकी हो रही । दूर तक जाती सुगंधित पवन उनके मिलन की , जागरण पर यह लगा जलधार से ज्यों धो रही । बैठकर मैं सोचती थी क्या करूँ यह क्या हुआ , आँख से आँसू यूँ छलका लग रहा खुद रो रही । टूटता अब बदन अंग अंग नज़र भी शर्मा रही , दर्द अपना रात वाला शीश रख खुद ढो रही । "सजल"पूरी थी कहानी शेष कहना कुछ नहीं , मिलन वाले बीज अपने रेत पर कुछ बो रही ।

18. झील सी आँखें तुम्हारी लग रहीं

झील सी आँखें तुम्हारी लग रहीं यह मानता हूँ , श्वेत मोती सिन्धु वाले बह रहे कुछ जानता हूँ । क़ातिलों में नेक क़ातिल आँख का तिल एक उनके , क़ातिलाना हरकतें कुछ मन लो पहचानता हूँ । आँख उनकी तिलमिलाती देख कर मदहोश होता , तिरछी नज़र घायल किया रहम उनसे माँगता हूँ । कोरें कंटीली भौंह भाला वार को तत्पर खड़ी , नियत उनकी भाँपकर तुम मान लो मैं भागता हूँ । देखना उनको न भाता जो चहकते व्योम पथ पर , छप्परों के हर सुरागो से स्वयं फिर झाँकता हूँ । स्याह रेखा छवि बढ़ाती"सजल"देखा नेक इनकी , आँसुओं से कालिमा को मौन होकर छानता हूँ ।

19. उनकी इक हूर सी कहानी है

उनकी इक हूर सी कहानी है , कहते जन्नत कि इक निशानी है । दिलों में राज सबके करती वह , फिर क्या मत मत सी जवानी है । इस समंदर से उसे हिमालय तक , जिनके करतब सुना जुबानी है । उन्हें निज प्यार का वारिस माना , लिखी जो सनद वही दिखानी है । वार पर वार उनके देखा हम , अब दर्द की दास्तां सुननी है । ये"सजल"सिरफिरों में इक कोई , खुद पर बीती वही बतानी है ।

20. कितनी चितवन है कंटीली तेरी

कितनी चितवन है कंटीली तेरी , चन्चल चलें हैं नशीली तेरी । मैं सुबह-शाम जिन्हें देखा करूँ , छटा मदमस्त यह छबीली तेरी । जो श्रवण मेरे नहीं सुन थकते , वही आवाज़ है रसीली तेरी । हवा का झोंका देखकर रुकता , वैसी सूरत है रुबीली तेरी । हम हैं ममनून इन अदाओं पे , यह आँखें पीली:- नीली तेरी । "सजल"ए चाहता मनाऊँ तुझे , फिर ये आदत है हठीली तेरी ।

21. इन आँखों ने जब से देखा तब से

इन आँखों ने जब से देखा तब से बहती रहती हैं , मिलन हमारा अब कब होगा केवल कहती रहती हैं । भूला उन्हें पुराना वादा हँस-हँस करके स्वयं किया , रोते-रोते मिलने वाले दुःख ख़ुद सहती रहती हैं । वर्षा विगत शरद है आई दुनिया गलने को आतुर , मन की मुरझाई पंखुड़ियाँ सारी जलती रहती हैं । बूँदें स्वेद लसी मोती सी भींगे तन के पट उनके , बैठ रहा है हृदय क्षोभ से मन में गलती रहती हैं । उठती-गिरती पलकें दोनों बरस रही हैं तरस रही , कब आओगे कब आओगे कहती चलती रहती हैं । मन वर्षा फुहार घन बर्षो"सजल"हुई मैं खुद बैठी , पलक पाँवडे स्वयं बिछाए हर पल मारती रहती हैं ।

22. हमारी पीर ज़ालिम ख़ुद हमें

हमारी पीर ज़ालिम ख़ुद हमें रोने नहीं देती , किसी की याद पर पागल हमें होने नहीं देती । चाँदनी मुस्कुरा लो तुम तुम्हारा चाँद हँसता है , अंधेरे तीमिर की प्यारी चुभन सोने नहीं देती । मुलाकातें हमारी ख़्वाब की तुम ख़्वाब रहने दो , दिलों पर चोट करती याद को खोने नहीं देती । हमें क़ाबिज़ किया तुमने क़ाबिज़ हमको रहने दो , मना करती मोहब्बत का वज़न ढोने नहीं देती । अगर ज़ाहिल हमें कहती ज़ाहिल होना अच्छा है , लगे तोहमत के दागों को हमें धोने नहीं देती । "सजल"ए दिल मधुर उपवन बहारें रोज़ आती हैं , धरातल में मिलन के बीज वह बोने नहीं देती ।

23. अब छोड़ दो मगरूरियत

अब छोड़ दो मगरूरियत कुछ हँस हँसा लो, तुमने फँसाया मीन को ख़ुद फँस फँसा लो । तहज़ीब की नज़ीर काफ़ी सुना है हमने , कुछ एक दूजय के दिलों में बस बसा लो । यह लग रहा अब कुफ्र का कहर आएगा , ईमान सच्चा रख ज़रा कुछ बच बचा लो । मुहब्बते-दीद की चाहत उनके ज़िगर में , ए चाहतों का गुल लिए तुम मिल मिला लो । वह खिलखिलाती चाँदनी हँसकर पुकारा , कुछ प्यार की आती सदाएँ सुन सुना लो । बेजार है ज़रा "सजल" उनके रुसुवा से , मुहब्बत पाक करने को कुछ चुलबुला लो ।

24. हाथ में उनके सदा कुछ मरहमी

हाथ में उनके सदा कुछ मरहमी अहसास था , थी दवा या फिर हमारे साथ रिश्ता ख़ास था । दरद गायब हो गया मुस्कान पलटी मुस्कुरा , हो गया हल्का बदन अथवा कहो विश्वास था । बदन सहलाते मुकद्दस याद हँसकर आ गई , थी हवाएँ तेज या हँसते पवन का वास था । था अंधेरा जो चतुर्दिक देख सकते कुछ नहीं , लग रहा कुछ हाथ पहचाना हमारे पास था । मोर सा मान नाचता ऋतुराज आएगा समझ , आ रहे मधुमास के संग या मेरे मन आस था । आपकी शीतल"सजल"सुंदर सलोनी छाँव ए , व्योम में घन घुमड़ते या मतु साया काश था ।

25. ऐ हवा मत गुनगुना

ऐ हवा मत गुनगुना अब तो हमारे आ रहे हैं , खिलखिलाएगी सुबह ऐसे इशारे आ रहे हैं । वक्त पूरा हो गया इकरार का हमको पता है , आज मौजों की रवानी के दुलारे आ रहे हैं । सब्र का दरियाव मेरा चाहता है टूटना अब , हँस किसी ने यह कहा तेरे सहारे आ रहे हैं । हो गया भुन्सार बीती रात जिनको याद करके , वह तुम्हारे हमसफ़र जिनको पुकारे आ रहे हैं । दोस्ती या दुश्मनी किस पर भरोसा हम करें ए , झूमती नभ घन घटाएँ सग फुहारे आ रहे हैं । दर्द हद से बढ़ रहा तूफ़ान बनकर आ गया है , ठहर जाओ तुम"सजल"राहें बुहारें आ रहे हैं ।

26. गुज़र जाती रात तिल-तिल

गुज़र जाती रात तिल-तिल निकल जाता प्रहर है , हँस रहे ज़ुल्मी तिमिर को निगल जाता सहर है । नेक राहों पर निकलना कार्य परहित के करें , मान से स्वीकार कर सब अमिय बनता ज़हर है । लक्ष्य अपना साधकर तुम मंजिलों पर पग बढ़ा , कश्तियों को तुम बचाना धार में कुछ लहर है । भूल मत पगडंडियाँ अरु छाँव बरगद की सरस , गाँव सब ओझल हुए अब मिल रहे बस शहर है । ज़िन्दगी जीने कि चाहत हम संजोए थे मगर , नियत को हम क्या कहें सब ढा रहे वह कहर हैं । टूटते कुछ हौंसले हैं "सजल" होकर के यहाँ , बिखरतीं जितनी कतारें रूठते कुछ बहर है ।

27. राज हमसे क्यों छिपाया

राज हमसे क्यों छिपाया अर्ज़ करता , ठोकरें खाकर निभाया फ़र्ज़ करता । भरण-पोषण को बची ना एक पाई , बेचकर के सब चुकाया क़र्ज़ करता । पीर जो दिल में उठी कैसे मिटेगी , दे दवा सबका मिटाया मर्ज़ करता । दोस्ती सच्ची किया लेकिन बगावत , मुस्कुरा करके शिकायत दर्ज़ करता । बह रहे ख़ुद हम नदी में कुछ किनारे , कर रहे थे स्वयं ज्यों ख़ुदग़र्ज़ करता । पीर तन में हो रही थी"सजल"होकर , वह किया मन से बिहँस बेदर्द करता ।

28. बनेगी ज़िन्दगी रंगीन गर

बनेगी ज़िन्दगी रंगीन गर उनका सहारा हो , अंधेरों में उजाला हो अगर उनका इसारा हो । यहीं जन्नत जहन्नुम है हमारा भी तुम्हारा भी , विचारों में बहारें साथ दरिया का किनारा हो । कहा था साथ रह कर दोस्ती को मैं निभाऊँगी , सही तोफा वही होगा मिलन उनका दुबारा हो । कभी टूटें नहीं वह तार जीवन के सहारे के , वही चाहत वही जुर्रत वही करतब हमारा हो । कहा था आप ने हमसे मिलेंगे रोज़ मुस्काकर , मगर करते रहो जैसा तुम्हें जो भी गवारा हो । हमारी रूह उनकी है"सजल"मालूम अपने हैं , हमारी जान में बसते भले तुमको नकारा हो ।

29. क्या उस हवा की ओर चलना

क्या उस हवा की ओर चलना ठीक है , हँसते मलय के साथ गलना ठीक है । हर पल पवन के साथ कचरा उड़ रहा , क्या उस ख़ुशी के साथ जलना ठीक है । अब दर्द ही केवल दवा हर दर्द की , क्या उस ज़ख़्म में वार करना ठीक है । हर राह कुछ शूलों भरी अब दिख रही , क्या इन पगों को आज छलना ठीक है । उनसे कहो की हम तुम्हारे हो गए , क्या चाँदनी सी रात ढलना ठीक है । मुझ"सजल"का विश्वास ही इकरार था , तन्हाइयों पर आज पलना ठीक है ।

30. आशियाना अब बनाना है

आशियाना अब बनाना है तुम्हारे शहर में , दर्द कुछ हमको सुनाना है तुम्हारे शहर में । चाँदनी बिखरी हुई है अवनि अम्बर में यहाँ , रात हँसकर अब बिताना है तुम्हारे शहर में । गुलशनों की महक कोई कर रही मदहोश है , ख़्वाब नींदों पर सजाना है तुम्हारे शहर में । आ गई ऋतु मिलन वाली किन्तु मिल पाए नहीं , हाथ अब हमको मिलना है तुम्हारे शहर में । आशिक़ी घायल हुई तो देखते आशिक़ कहा , ज़ख़्म अपने कुछ दिखाना है तुम्हारे शहर में । शेष थीं यादें "सजल"ही और कुछ बाक़ी नहीं , याद के लम्हे छिपाना है तुम्हारे शहर में ।

31. हमारे प्यार को झूँठा नहीं कह

हमारे प्यार को झूँठा नहीं कह आप सकते हैं , मुहब्बत के बिना मेरी नहीं रह आप सकते हैं । तुम्हारी चाहते बह कर लगू सागर किनारे पर , हमारे आँसुओं के बिन नहीं बह आप सकते हैं । शिक़ायत तुम करो हँसते हुए तुमको मनाऊँगी , जुदाई के दर्द को अब नहीं सह आप सकते हैं । हमारे प्यार का सूखा शजर रूठी बहारें कुछ , मगर विश्वास है अपना नहीं ढह आप सकते हैं । करो हम पर ज़रा रहमो-करम चाहत हमारी यह , बहुत नाज़ुक कलाई यह नहीं गह आप सकते हैं । अधूरे ख़्वाब हैं अपने "सजल" बाक़ी नहीं कुछ है , जवानी के लिए ऋण ज़िन्दगी चह आप सकते हैं ।