स्वप्न-छाया : राजगोपाल

Swapn-Chhaya : Rajagopal


चिरकामना

अतीत की मौन मधुर स्मृतियाँ भिगोती हैं आज निर्निमेष नयन अनायास बरसती हैं वे नित-दिन बन कामना देहरी पर घन-सघन मन चीर कर काल भर लूँ अधूरे स्वप्न पूरे कर लूँ सुख का सागर नहीं जगती मे क्षण भर मृगतृष्णा मे विचार लूँ तुम इस उर मे बस जाओ न सूखेगा नयनों का सागर इस उछ्रंखल लघु-जीवन मे ढूंढ लेंगे थोड़ी सी तृप्ति क्षण भर रहना इस उर मे काल-अकाल बहना तन मे रुधिर बन कर तुमसे ही स्पंदित होता यह जीवन तुमसे ही खड़ा है इंद्रधनुष तन कर बन पृथा की अचल रेखा सदा संग रहना जीवन मे न दिखना स्वप्न-छाया सी नीड़ तुम ही हो इस बंधन मे

अपेक्षा

हथेली की अचल रेखा सी सदा रहना निकट जीवन के फेंक विरह-वेदना देहरी से दूर खोल देना सारे द्वार मन के चिरमिलन की अपेक्षा नहीं तुम अंत समय सी बह जाना झुक कर छू लूँ प्रणय की धारा तुमसे दूर विश्व भी है अनजाना मांगता हूँ ऋण दो मधुकणों का दूंगा ब्याज जीवन के उन क्षणों का खोला था तुमने द्वार शत क्रंदनों का कर लें लेखा-जोखा अब चिरबंधनों का उड़ जायें गगन मे स्वछंद होकर सुख के तृणों को सींचे धरा पर रात चाँदनी और सुबह ओस पर जी लें स्वप्न निशा के चादर पर जगती मे है यही रोदन-गायन सुख समेट छिपा दें प्रिय धन इसके समतुल्य नहीं मणि-कंचन तुम ही धन जीवन का कण-कण

स्वप्न-छाया

आँखों मे भर कर स्वप्न अमर प्रणय दोनों मुट्ठी मे भर कर विश्व देखता मौन क्षितिज पर सो जाऊँ अपने चाँद के अंदर तो रहो सजल नयनों मे कभी फिसल जाना मधु सी घुल कर दुख के अवगुंठन से स्मृतियों मे आना नव-वधु सी रजनी मे बिखरे तारों की तुम मेरी अंतहीन नभ होना पल-पल लगता जैसे युग बीते सृष्टि है इस जीवन का कोना-कोना तुम अमर प्रतीक्षा हो मेरी जीवन पथ का मैं पथिक धीमा चाँद सा तुम्हें देखता रहूँ पाऊँ न प्रणय की कोई सीमा उठता-गिरता स्वप्नों मे बहता गोद मे आँखें फाड़े सो जाता झूलते कुंतलों को तन्मय सहलाता पास तुम्हारे विश्व थामे खो जाता

भूख

ईप्सा सृष्टि का है पुरातन दर्शन जग मे हर जीवन का आलिंगन सपने यहाँ बस गये लोचन-लोचन फिर भी भूखा है इस मन कण-कण गीली आँखों मे कल स्वप्न सूखा प्रणय पुकारते हुआ कंठ रूखा विहंगो सा उड़ता है यौवन भूखा मिल जाती कोई कामाक्षी सी सुमुखा तुम रहना नयनों मे सजल सुख सींचती जीवन पल-पल तोड़ दुख के अवगुंठन सकल खोलना मधु भरे अधरों के पटल विभावरी मे अपार नभ तक तुम हो मेरे नक्षत्र की चमक क्षण-क्षण जैसे युग की कसक बहुत निष्ठुर है समय की दहक तुम मेरी स्वछंद गगन होना अपना है यह जीवन का कोना आंसुओं से नीड़ को न भिगोना इस मिट्टी मे एक प्रणय बीज बोना

अधूरापन

विश्व मे कहीं जब तुम्हें पाया सीखा कुछ हँसना अश्रु बहाना चिर आशाएँ समायी मन मे जीवन है मृगतृष्णा मे मिट जाना तुम खिलते प्रभात की चितवन प्रणय बिखेरती भर-भर पुलक भ्रमर सा मन अनछुये ही जी लेता है नित मीठी कसक क्या यह मेरे आँखों मे स्वप्न कहीं दिखता कोई आज समीप नहीं कल्पना के नीड़ मे कोई दीप नहीं घूम गई धरा पर मैं खड़ा आज वहीं सुख-दुख का ताना-बाना युगों से बुनना जीवन ने ठाना देख रहा हूँ पथ पर आना-जाना और प्रणय की वही कथा दोहराना परिणय मे कहाँ छिपा प्रणय है दो प्राण, दो हृदय और एक भय है अधिकार, अस्मिता, विजय-पराजय है अधूरेपन मे यह पूर्णता का अभिनय है

रंग-महल

विश्व जीवन का रंग-महल है असीमित तृष्णा का मरुथल है ज्ञात नहीं कितना मधुर कल है यह मेरे उर का अंतःस्थल है यह सृष्टि का है सत्य सघन माया मे डूबा मन-स्वप्न गहन मधुमय शब्दों का प्रात दहन न जाने कितने जल गये वचन सुख ढूँढता जगती मे जीवन स्वप्न मे देखता मूक मिलन बांध कर स्मृतियों के रज-कण जीने का क्यों कर रहा नव-प्रण हँस लेता कभी विरह मे नीर भरे नयनों के गिरह मे गिरता-उठता तृष्णा के निग्रह मे जीवन संग हुआ प्रणय अनुग्रह मे हार गया बंद आँखों मे युद्ध लांघ गया मरता प्रणय अवरुद्ध देखा तुम्हें क्षितिज मे सकल-शुद्ध लगा प्रणय-परिणय मे नही कोई प्रबुद्ध

तृषा

क्यों उठी ऐसी चाह मन मे खोयी जो कल्पना के वन मे सुलगती रही तृष्णा सी मन मे दौड़ता प्यार छिप गया क्षण मे दिन मे दिखता एक जग है रात हर घर की बात अलग है मौन ही दुखती मन की रग है जलता जीवन चलता पग-पग है धरा पर रात भी नहीं शीतल यथार्थ के आगे भागता है छल नहीं यहाँ कोई मन-भाव कोमल जग मे है प्रणय बहुत निर्बल लुका-छिपी है जीवन सारा गगन मे दिखता है चाँद प्यारा ढँक लेता मेघ उसे कर अँधियारा किन्तु न सोता वह प्रणय का मारा पल मे यह मयंक फिर निखरा मन फूल कर दोबारा बिखरा प्रणय बाँचता स्मृतियों मे बिसरा छू कर चाँदनी निर्लज्ज पुनः सिहरा

अनकही

चाँद दूर से रात झाँकता है वह अपनी सीमा पहचानता है धरा पर प्रणय अकेले बिसुरता है अपने ही घर मे स्मृतियाँ ढूँढता है छिपती चाँदनी मेघों के बीच देखती छवि उसकी पलकें खींच सिसकती है आस आहें सींच नापती दूरियाँ मौन आँखें मींच मन कहता ढूंढ उसे आँखें खोले पास ही प्रणय तुझसे यह बोले क्यों मौन आंसुओं मे विष घोले पी कर बुझ जायेंगे आग के छल्ले है प्रणय की शक्ति पर विश्वास कंठ सूख रहा, नहीं है सागर पास तुमसे ही है प्राण का आभास कल तिमिर भेद बुझा जाना प्यास स्वर्ग उतरेगा धरा, प्रणय कस दो धूमिल स्मृतियों को उर मे लस दो मन की व्यथा फेंक थोड़ा हँस लो आज हृदय मे तुम दोबारा बस लो

चेतना

हवा सी स्मृतियाँ छू लेता हूँ उनमे ही क्षण भर सो लेता हूँ उड़ता कभी वहीं फँस जाता हूँ आँखों से आँसू सा ढह जाता हूँ रात प्राण मेरा दीपक सा जला दिन मे वह मौन मोम सा गला तपा, पिघला, और शव सा ढला वही स्तब्ध तुम्हारा अर्ध्य करने चला कितनी शक्ति है रगों मे झर जाऊँ प्रणय भर दृगों मे खींच लूँगा जग बांध पगों मे छल भी है मन के उमंगों मे आँखों मे उठे पुनः आज घन बरसे सावन से तम सघन क्षितिज देखता रहा भीगा मन बीता युगों सा मेरा क्षण-क्षण आगे अपना पथ अब पहचान प्रणय की पराकाष्ठा कितनी जान जीवन मे उसे प्रतिष्ठित प्रतिमा मान जगती मे शून्य पर ही कर ले ध्यान

अस्मिता

मैं दिनमान तन-मन से हूँ यहाँ आह कानों मे बज रही है कहाँ क्यों रुकता है जीवन यहाँ-वहाँ मत कुरेदो घाव दुखता है जहाँ क्या कह दिया तो बवाल हुआ एक शब्द से मन वाचाल हुआ स्वर्ग यहाँ पाँव तले पाताल हुआ भाग्य पर हँसता कर्म निढाल हुआ प्रणय रोया आज किस बात पर बरस ढहे एक शब्द के आघात पर वह खेलता रहा जीवन पात-पात पर क्षुब्ध हुआ आज शून्य के मात पर शब्दों से क्यों खेले झूठी अस्मिता बातों से नहीं टूटती है सिद्ध वनिता अपमान से जली प्रणय की चिता नहीं कोई अस्मिता की आचार संहिता जी लें छोड़ शब्दों का अहंकार न करें खंडहर प्रणय का आगार सृष्टि की मधुता मे कटुता है अपार शेष प्रयाण चलना लिये शब्दों का भार

निरुत्तर

कितने प्रश्न जीवन मे रहे निरुत्तर मन निर्लज्ज न होता कभी जर्जर पत्थर पर क्यों बहाता नीर झर-झर आँखों मे निर्विवेक सपने भर कर जब साँझ लौट जाता उजाला नयनों मे झूलती वही मधुबाला प्रणय के उर मे जलती ज्वाला गीले लोचन मे घिरता तम काला क्या दिया मुझको प्रात का प्रयास स्वप्न टूटते जैसे हो कोई उच्छवास मन से उड़ा विहंग कब लौटेगा पास इन प्रश्नो का होता केवल मूक आभास जिसके पीछे बरसों विकृत होकर अपने अंजलि मे मृगजल भर कर पाया उसे उसके ही उर मे छिप कर किन्तु क्यों सूखते नहीं आँसू गिर कर अगणित प्रश्नों से पिंजर टूटा कभी मौन कंठ घन-सघन फूटा बह गया इतिहास, हुआ कल झूठा लेकिन आज भी यह जीवन है अनूठा

कल्पना

प्राण मेरा दीप सा जला है आंसुओं से प्रणय गला है निर्लज्ज क्यों वज्र सा ढला है यह जगती के तृष्णा मे पला है कौन पूछे मन क्यों टूटा कुछ कहने क्यों कंठ न फूटा प्रणय पथ मीलों दूर छूटा इस पथिक को स्मृतियों ने लूटा पास हो तुम या आकाश मे मन ठहरा है तुम्हारे ही पास मे समीपता मे सामने के प्रयास मे आज मिला प्रणय मृत आभास मे नाप लूँ कितनी शक्ति है पगों मे सागर सा स्नेह भर कर दृगों मे ढूंढती है आंखे तुम्हें बीते युगों मे प्राण व्याकुल टटोलता है रगों मे पंथ मे तुम हो ध्येय मेरे चीर कर घन-सघन के घेरे फैलाये बाहें नीड़ के किनारे कर लूँ आज आत्मसात आह सारे

संस्मरण

दिन ने मुझे क्या दिखाया रात मे मूक ही मन रिझाया नयनों से निज नीर बहाया किन्तु उसने न पास बुलाया कब उजाला मन को भाया कब तिमिर ने गोद मे छिपाया मैं, तुम और यह जगती भी माया कभी छल कभी यथार्थ आँखों मे छाया कभी तुम केंद्र कभी परिवेश बनी इस जीवन की सूत्रधार बनी ध्येय तुम ही इन आँखों मे ठनी तुम संग ही हर निवाला हुआ धनी क्षितिज बाँचती रही यह जगती पोंछती कपोलों पर रात तपती पीड़ा उच्छ्रंखल सी गिरती-उठती मूक ही प्राण-प्रणय सब कुछ सहती लांघ जायें सारे बरस बीते करे स्वागत रजनी का मधु पीते हार कर भी हमने कितने रण जीते आज भी तुमसे नहीं कोई पल रीते

विश्लेषण

कैसी कसक है ह्रदय मे बंद पलकों के निलय मे घूमता प्रणय के विजय मे ढूँढता रहा मैं उसे बीते समय मे धरा पर उसका चंचल अभिसार पुलकित सुमन का सार-सार निथर रहा है मधु सा प्यार दिख रहा है सामने स्वर्ग साकार आज वही प्रणय जागा उर मे पास आ रही पग-ध्वनि नूपुर से कह रही अनकही बात सुर मे मन लजाया हुआ मौन कातुर से जगती मे है अतृप्ति संचित मन की तृष्णा है जग चर्चित हार विश्व तुम्हें जीवन समर्पित सत्य हो माया नहीं है यह निश्चित कौन हो तुम जो बसती मन मे लसती प्रणय अनछुये चुंबन मे आज छीन कर मुझे निज तन से उड़ा ले गयी कहाँ धरा से गगन मे

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