Sada Bahar Shayari Yashu Jaan



यशु जान की सदाबहार शायरी

1. मैंने लोग पानी पे चलते देखे हैं, पेड़ के आंसू निकलते देखे हैं, ईरान की हसीनाओं का हुस्न देख, दिल ही नहीं पत्थर भी पिघलते देखे हैं, मैंने नामुमकिन तब्दीलियों को देखा है, रेगिस्ताऩ समंदर में बदलते देखे हैं 2. छलांग लगाओ दरिया में क्या पता किनारा मिल जाये, आप भी हमारी ग़ली में आईये हो सकता कोई सहारा मिल जाये 3. कुछ दिनों से सोच रहा था कोई अच्छा काम करूँ, सोचा आज आपसे मिलता ही चलूँ 4. उनकी ज़ुबां पे मेरा नाम इस कदर रहता है, जैसे झूठ बन गया हूँ मैं उनके लिए, उससे मिलने की यूँ ज़िद न कर, कभी वक़्त ने वक़्त निकाला है किसी के लिए 5. आप इश्क़ में लुट जाने की परवाह करते हैं, दीवाने तो इसमें मर जाने की इल्तिज़ा करते हैं, आपकी तबियत तो अच्छी भली है, वरना लोग तो मरने की दुआ करते हैं 6. सुबह उठते ही हमारी आँखें नम होती हैं, ऐसा लगता है जैसे ख़्वाहिशें ख़त्म होती हैं, बड़ा दर्द होता जब ऐसे ख़्वाब देखती हैं, जिसके पूरा होने की उम्मीदें बहुत कम होती हैं  7. शराब की एक नदी बनाओ, क़ाग़ज़ की कश्तियाँ चलाओ, पता जब चले ख़ेल ख़त्म है, आग लगाओ और मर जाओ  8. वो जब अपने ख़ून से ख़त लिख़ते हैं, मेरी नाराज़गी को भी मोहब्बत लिखते हैं, मैं गुस्से में ख़त को जला देता हूँ, इस गुस्ताख़ी को वो ख़त में इबादत लिख़ते हैं  9. अभी तुमने होश संभाली नहीं है, पटाख़े मत बजाओ आज दीवाली नहीं है, सारा जहां शहद में ज़हर दे रहा है, साहब दुनियां अभी ख़तरों से ख़ाली नहीं है  10 पत्तियां नहाई हुई हैं क्यों जमकर आज ओस में, एक नीले रंग का फ़ूल ख़िला है मेरे पड़ोस में, नशे में रहकर किसी को अग़र जन्नत नसीब हो, वो कम्बख़्त क्या करेगा आकर होश में 11. आना है तो आ जाओ जेब में कुछ भरके आना, मिलने की तमन्ना रखते हो मरने का इरादा भी करके आना, कुछ ऐसा वैसा हो गया तो मुझे दोष मत कहना, ऐसा करना तुम अपने घर से ही मरके आना 12. मैं जब सोता हूँ ख़ुदा की निग़रानी में होता हूँ, वो उसकी मौजूदगी में मुझपर हमले करने लगे, जब उनकी सारी कोशिशें नाक़ाम हो गईं, वो मुझे ज़िंदा जलाने की साज़िश करने लगे 13. नशा कम है लगता है कोई शराब में कुछ मिलाकर चला गया है, सच बताओ कौन है जो पानी में आग लगाकर चला गया है, आग लगने वाली है ज्वालामुखी फ़टने का झांसा देकर, ज़ालिम चारों तरफ़ धुंआं ही उड़ाकर चला गया है 14. उनसे इश्क़ करने की मत दुआ कीजिए, अपनी ना सही उनकी तो प्रवाह कीजिए 15. तुझसे मोहब्बत करके मुझे कुछ मिला तो नहीं है, तू बता कहीं तुझे मुझसे कोई गिला तो नहीं है 16. हमने सबसे वफ़ा की उम्मीद की, इसीलिए किसी एक के भी हो ना सके 17. कुछ ऐसा हो जाएगा दुनियां का नसीब, ख़ुद को हाथ लगाने से भी डर सा लगेगा 18. आज के दौर में अग़र जनाज़ा उठा, याद रखना महफ़िल में सब ग़ैर होंगे 19. इश्क़ की बीमारी का यही इलाज है, सोच लो कि इसका कोई हल नहीं 20. अजीब लोग हैं तेरी इस दुनियां के जान, जानते हुए भी पूछते हैं मेरा हाल क्या है 21. अपनी मुसीबतों पर ज़िद में आना सीख़ लो, अग़र आग नहीं बन सकते तो मशाल जलाना सीख़ लो 22. रोज़ अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब लिख़ता हूँ, लोग़ कहते हैं मैं कौनसी किताब लिख़ता हूँ 23. ख़ुदा का कैसा दस्तूर है ग़ज़ब का फ़रमान है, हम सब ख़तरे में भी हैं और ख़तरे में ही हमारी जान है, ख़तरे से बचें या ख़तरे को बचाएं उलझन सी है, दोनों तरफ़ का हिसाब करें तो हमारा ही नुक़सान है  24. अग़र सारी ज़िम्मेदारियाँ मैं निभा पाता, लोग़ मेरी इबादत करते हो ख़ुदा जाता 25. मुझे ही नहीं मेरे दोस्त सबको दिक़्क़त आजकल हो रही है, तुम नौक़री की बात करते हो यहाँ ज़िन्दग़ी बचानी मुश्क़िल हो रही है  26. इश्क़ का क़ानून ख़तरनाक़ है ख़ुदा से भी ऊपर है, उन्होंने क़त्ल भी मेरा किया इल्ज़ाम भी मेरे ऊपर है  27. हम दोनों के एक जैसे ही कर्म हैं, तुम भी बे - शर्म हो हम भी बे - शर्म हैं 28. जब मेरा मेरे दिल का क़त्ल किया जाये  रहम किया जाये आख़िरी ख़्वाहिश को भी पूछ लिया जाये 29. ख़ुदा की कुदरत का एक क़ायदा समझा, हमने इश्क़ में नुक़सान को भी फ़ायदा समझा 30. मैं सारे ग़म भुलाकर हाल - ए - दिल कहता हूँ, ज़माना कहता है कि मैंने पी रख़ी है  31. आज उनकी ज़ुल्फ़ों से हवा ली है, इसी ख़ुशी में मरने की क़सम ख़ा ली है 32. जिस्म जमीं के नीचे और अरमाँ और कहीं हैं, वो मरने का शौक़ पाल रहे हैं जो ज़िन्दा ही नहीं हैं 33. उनसे हमें बेहद ख़तरा है जान, जो दिल चुराने के बाद नज़रें चुराते हैं 34. हसीनाओं को कर हलाल दूँगा, मैं सबको अपनी आदत डाल दूँगा  35. ख़ुदा के हुक़्म में सदाक़त है, ये जो मौत आलम गूँज रहा है  संभलकर निकलियेगा बाहर, यही ख़तरा हमें भी ढूंढ रहा है  36. अब जीतकर हार से हारा कैसे जाये, जो चीज़ ज़िन्दा ही नहीं उसे मारा कैसे जाये 37. चोरों की नज़र दूसरों के घरों पर ही रहती है, पर दुनियां की नज़र तो दूसरों पर ही रहती है 38. सुना है वो रोज़ एक शिकार कर रहे हैं, उन्हें आज़माने का हम भी इंतज़ार कर रहे हैं, हमने अपने कुछ अज़ीज़ों को उनके घर भेजा, अब वो हमें ही पहचानने से इनकार कर रहे हैं


 
 
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