रंगमंच : राजगोपाल

Rangmanch : Rajagopal


शरद की सुधा

मेघों से दृगों मे झाँकती पूर्णिमा तुम शरद की टपकती सुधा हो बरसों से रसवंती नयनों मे बसी तुम ही प्राण मन की मृदा हो उषा की कंचन कली चमकीली क्या सोच रही हो अनुराग भरी बंध जाओ युगों के बंधन मे मोह लिये छाई है तंद्रा गहरी तुम तन-मन की आकर्षण मधु सी अधरों में जम गई तुमसे ही है यह अस्तित्व मेरा खोल दिये तुमने जीने के राह कई धरा-जलधी जैसे साथ रहेंगे पुकार लो चाहे प्राण हो कहीं माँगा है प्रभु से चिरबंधन साथ हो तुम तो स्वर्ग है यहीं

स्तंभित क्षण

बिना तुम्हारे है क्षण-क्षण सूना अँधियारे स्वप्न भरा लोचन सूना छिपा चाँद कर विस्तृत गगन सूना तुमसे दूर, हुआ यह जीवन सूना तुम वही किन्तु दिन-रात अलग है सुख के ठौर तक एक ही मग है इस मरीचिका मे दौड़ते कई मृग हैं तुम हो उधर इस पार सारा जग है कल्पना भर रही आह मन मे तृष्णा अकुला रही मौन मन मे खो गयी है कस्तूरी जीवन मे ढूँढता हूँ उसे स्मृतियों के रजकण मे रति संग सारा जग रमा है इस चाँदनी मे जैसे सब क्षमा है यह सृष्टि का प्रवाह कब थमा है इस तंद्रा मे जलता प्रणय जमा है

कुमुदिनी

तुम तिमिर की धवल रजनीगंधा मध्य-रात्रि की आलोकित शशी नभ मे उषा की लालिमा सी मृदुल तुम जैसे पारिजात पर पड़ती आरुषी नयनों मे स्वप्नों की उन्मादिनी उर से उदगमित मधु मन्दाकिनी कोमल अधरों की प्रणय प्रद्दुम्नी तुम ही कस्तूरी, कामुक कुमुदिनी मनु की प्रथम कल्पना हो तुम जीवन से उठती स्नेहिल लय हो उम्र का श्रृंगार हो,उर का स्पंदन हो कर लें नीड़ का निर्माण जो सुरमय हो हृदय में पुनः जीने की चाह लिये जी लें इस जीवन का हर अंश धूप मे तृषित है मानस का मृग आँखों से न कह देना स्नेह सारांश

निशांत

स्पर्श मरा खोल दो मन के नयन प्राण ढूंढ रहा है क्यों सुख का शयन तृष्णा मे प्रणय का नहीं होता है चयन मरती है काया दौड़ती पीठ पर लादे गगन सारा विश्व देखा इन वृहद दृगों मे प्राची का प्रणय नाप लिया पगों से थके पथिक का रक्त जमा रगो मे भटकता मिट्टी हुआ दिशाहीन मगों मे वही पथिक कल मादकता मे डूबा दिग्भ्रांत मृग सा आज जीवन से ऊबा जग छोड़ गयी स्नेह-सगाई स्वप्न लुभा मूक-बधिर अपने ही नीड़ मे बना अजूबा जगा कर विभा क्या मुझमे प्रात भरेगी व्याकुल है मन क्या वह स्पर्श करेगी क्या वह प्रणय को मार सृष्टि से डरेगी रात सारे प्रश्नो को लियेकल डूब जायेगी

भय

उषा के बयार सी तुम चंचल सर्दियों में शाम की आग हो अधरों पर प्यार की लालिमा लिये मधुमय रजनी का प्रणय राग हो संसृति मे श्रृंगार का पर्याय हो जगती मे प्यार की अनुभूति हो प्राण, इस जीवन की सुषुम्ना हो तुम ही सर्जना की प्रतिभूति हो जीवन के निकट बैठ जाओ काल से अब डर लगता है निष्ठुर तुम्हें न उड़ा ले जाये यही सोच मन प्रायः सहम जाता है आओ लग जाओ ह्रदय से बंध जाओ अटूट आलिंगन में चलो निकल जाएँ समय से आगे दामिनी न चमक जाये इस गगन में

पथ-व्यथा

किस पथ खोया है प्रणय बतलाओ वाद-संवाद नहीं मौन ही जतलाओ कथा-व्यथा सुन स्वप्नों को सहलाओ मरते प्राण को देहरी तक ले आओ काल लांघ मन यहाँ तक पहुंचा पास आ कर भी स्वयं मे ही सकुचा अस्मिता कहती प्रणय है गगन तक ऊंचा सारे यत्न कर हाथ भर की दूरी भी न पहुंचा अनकही कहने आज मन है आतुर प्रणय ढूँढता बूढ़ा हो गया है उर मूक हुआ है कंठ अश्रु-पूरित है सुर मधु मांगता मन हो गया है जैसे विधुर किस पथ पड़ा है प्रणय निर्वासित मन कब से घर जाने को लालायित हे ईश्वर तुम्हें सुख-दुख सारा समर्पित मोक्ष दो मुझे न होना है और लज्जित

अनुभव

यह किशोर सुन्दरता लगती है कोमल जैसे कोई पल्लव हो सृष्टि की ऋतुओं मे खिलती तुम ही जीवन का उत्सव हो वसंत की रंगों में निखरती पवन सी यौवन की चंचलता उर मे छिपा है प्यार तुम्हारा सीप में पलती जैसे हो सुन्दर मुक्ता पिरो लूँ मुक्ताओं की माला में लिखूँ शब्द प्रणय की भाषा में स्पर्श कर लूँ इन मदिर अधरों को ढँक लूँ तम को प्रात की आशा में सतरंगी फूलों को छूती तितलियाँ झूलती तृषित आलिंगन मे कुछ दृगों मे तुम्हारा ही विश्व देखते तन जला इस चुंबन मे कुछ

आत्मज्ञान

कब सोयेगा जीवन तुम्हारे गोद मे दुख के अँधियारे सुख के आमोद मे प्राण धर कर जीवन के प्रतिरोध मे कब तक जी सकेंगे प्रणय-बोध मे कोलाहल से दूर चिर शांति मे रात रोती जुगनुओं की कान्ति मे तिमिर मे प्रणय के दिग्भ्रांति मे डूब रहा है जीवन अशांति मे आँखों मे जमे अश्रु झर जायेंगे उभरे घाव कल नहीं भर पायेंगे इस पीड़ा मे व्यंग्य-विनोद नहीं भायेंगे जड़ तकिये पर स्वप्न भी मर जायेंगे मौन प्रणय मुख से न बोलेंगे संबन्ध भुला मधुकोष न खोलेंगे आह रोक निशब्द आँसू पी लेंगे शेष प्रयाण अजनबी बन तय कर लेंगे

अधूरा

यह मन क्यों बावला सा तुम्हे ही ढूंढता रहता है तुम तृषा हो, मृषा हो, या माया तुम्हे पाने मन डोलता रहता है मधु भरी जलधि सी गहरी प्रणय लिये नभ सा विस्तार सुषमा हो करती रति का आह्वान तुम सुख हो स्वर्ग सा निराकार कुछ कह दो, इस मन से तुमसे ही श्वासों की लय है जब तक प्राण है, तुम हो हर पल तुमसे ही मधुमय है सांझ ढली निशा देती निमंत्रण छू लो नयनों के स्वप्न असंभव मौन नीड़ मे निद्रा सकल बिछी है विश्व मे आधा-अधूरा है मानव

नयनों मे विश्व

तुम्हारे नयनों मे है विश्व का सार मुट्ठी भर प्रणय लगता गगन अपार ढूँढता है मन कुछ अनछुया प्यार कौन विकल यहाँ सुनने मेरी पुकार बरसों धरा नापते चला नंगे पाँव दूर छिटका पड़ा था छोटा गाँव धूप ने जलाया, कभी बिछी छांव थक कर प्राण सोया प्रणय के ठाँव दीप-शिखा सी झूमती रति-कामिनी आदि अनंता, कर्मठ, प्रज्ञा की दामिनी दृगों मे उड़ते मधु स्वप्नों की अनुगामिनी कहाँ छूट गये सिरे प्राण-प्रणय के भामिनी द्रवित कंठ मे शब्द नहीं आते हैं एकाकी मन अकाल तन तज जाते हैं स्नेह चुंबन न सूखे पर अश्रु झर जाते हैं धरा छोड़ स्वर्ग के स्वप्न किसे भाते हैं

तन्मयता

चाँदनी रात मे तुम्हें देखा है तन्मय तुम से ही बंधा है जीवन मे समय प्रणय से पृथक नहीं रजनी रतिमय काल-अकाल क्यों लगता है भय तुम्हारी छवि देखता रहा चुपचाप यही था मन के क्षितिज का नाप निर्निमेष दृगों मे बढ़ा नीर का ताप मन मे उठा मृग सा प्रणय-प्रलाप मध्य रात्रि जगती मे सन्नाटा छाया प्रणय मे यहाँ कुछ खोया कुछ पाया उलझा मन आँखों से उतर आया न जाने कब तक नयनों ने नीर बहाया सन्नाटे मे मैं प्रणय स्वर सुन पता साँझ की हवा मे भी आँसू झर जाता स्नेह पाशों में सोया-जागा पछताता बीता स्नेह नव भाव नहीं ले आता

विधि

उंगली पकड़ उर मे छिप जाऊँ सदियाँ लिये चुप वहीं सो जाऊँ उनींदी आँखों कुछ पल बहलाऊँ खोया है प्रणय किसे यह बतलाऊँ निशा ढूंढ रही खोया प्रणय दुलारा छिपा वह उर मे लज्जा का मारा रोया मन गगन से टूटा एक तारा सोता रहा चादर ओढ़े विश्व सारा झर गये आँसू के दो कण छिपा कर रखा था वे क्षण शत-क्रंदनों से क्षार हुआ जीवन रक्त हुआ जल अम्ल सा जला मन मन उन्मादित सुख किसने देखा तृष्णा के पुष्प-बाण मन्मथ ने फेंका स्वप्न मे डूबता ढूँढता हूँ तट रेखा यही जीवन मे चित्रगुप्त की लेखा

विधा

पथ पर जब से साथ चलें हैं कड़ी धूप भी लगती है वसंत तुम्हे लिए मन उड़ा है निर्बन्ध तितलियों सा दृगों में अनंत तुम सुन्दर उन्माद भरी या मेरे मन की जल्पना हो कोई उर पर चढ़ती अमर बेल या कोई उल्का सी सपना हो मुँदी पलकों का तरुण श्रृंगार मौन प्रणय का मकरंद बिखेरती अधरों पर मोहक पराग लिये तुम रात के काजल से आँखें सवांरती तुम हो जीवन का आराध्य आदि, अंत, और प्रकृति हो आद्या सी आँखों मे बसी जीवन की विधा या संसृति हो

मूर्छित भाव

समझो रिसते नयन नीर का संदेश गालों पर धरे आशाओं के अवशेष मन से उर तक का खंडित है प्रदेश अज्ञात है प्रणय के अपरिचित भेष प्रणय पर कभी था अभिमान बुलबुले सा हो गया अन्तर्धान तृषित कर हाय! सुखा गया प्राण नम भी न हुआ उर का पाषाण मन मे अब नहीं किसी की चाह नहीं बुझेगी यह जलती तरुण दाह मूक हो गयी क्षण-क्षण की आह झांक लो उर की सागर सी थाह तुम्हारे नयनों मे सृष्टि की सुंदरता छू लो कुंठित मन की भावुकता कुछ समझो प्रणय की व्याकुलता जागृत कर उन्माद मिटा दो नीरवता

कौन हो तुम

स्वर्ग के विलास भरे नभ से पारियों सी प्रज्ञा सुरवामिनी कैसे साधारण उतर आई धरा पर कोई कल्पना हो तुम या मधु-यामिनी उषा मे पारिजात सी खिली निशिगंधा सी तिमिर में महकती शून्य मे प्रलय का उन्माद भर कर उल्का सी मन में हो दहकती तुमसे ही सारी ऋतुएँ है वसंत-शरद सी बिखेरती अनुराग दृगों से सावन सी श्रृंगार बरसाती जलती हो जैसे शीत की आग उड़ती हो जैसे मेघों के रेले क्षण मे हो जाती ओझल तुम तृष्णा हो जीवन हो हवा सी छूते रहना हर पल

सुंदरता

सृष्टि की सारी सुंदरता है कहाँ घन-घन स्वप्नों की बरसात जहाँ प्रणय के धुलते हैं रजकण वहाँ लेकिन क्यों मौन है प्राण यहाँ आँखों से झरती मीठी बूंदे मृषा देखती रहीं पलकें मूँदे स्वप्न उच्छ्रंखल आशाओं मे कूदे वही मन की मृदा को निर्मम रौंदे स्वप्न नहीं मिटाती है नीरवता समझती नहीं मन की भावुकता बढ़ाती है विक्षिप्त मन की आकुलता जड़ तकिये तले है कितनी व्याकुलता मधु लेने क्यों बाहें फैलाता है छोड़ यथार्थ स्वप्नों मे क्या पाता है मृगतृष्णा मे दौड़ता प्राण जलाता है क्या यही सृष्टि की सारी सुंदरता है

आधार

सुंदर तरुणी क्यों निराकार हो हवा सी हृदय के आर-पार हो संसृति मे जीवन का सार हो जड़-चेतन मे प्रणय का आधार हो पास आकर क्यों दूर जाते हो प्राण लेकर क्यों प्राण कहलाते हो नींद से जगा कर स्वप्न सुहाते हो जीवन भर छल मे अश्रु बहाते हो यह गगन सदियों से सोया नहीं मुट्ठी भर प्यार नीड़ मे खोया कहीं वाद-संवाद सारे कंठ हीन हुये यहीं जड़ सम्बन्धों मे वह पुरानी प्रीति नहीं यह तृषा न बुझेगी स्वप्नों से बात है मन की केवल अपनों से इतिहास बना है परस्पर क्षणो से छू लेने दो सत्य अश्रु के कणों से

अस्तित्व

देखा जब तुम्हें ऐसा लगा जैसे तपती ज्येष्ठ मे छाया हो पलाश सी दहकती सुन्दर तृष्णा, मन मुग्धा तुम कैसी माया हो देखते थकती नहीं यह आँखें बरसो सघन यौवन बन कर मन मरीचिका मे शिथिल हुआ है भिगो दो आज सावन उलीच कर मधुहास लिये खिल जाओ तुम जैसे सावन की प्रथम कली छू लूँ इन मृदुल दलों को चख लूँ मधु बन उच्छ्रंखल अलि तुम संध्या की सुंदर लालिमा अरुण सरोज पर छाई मुस्कान रेखा हो भाग्य की हथेली पर जटिल विश्व मे हो मेरी पहचान

मौन-मिलन

मांग था प्रभु से मुट्ठी भर कंचन उसकी छवि मे हुआ था स्पंदन वहीं बंधा नव-जीवन का बंधन कहाँ है आज वह प्रियधन खोल कर प्राण प्रणय भरे अंजन नित अर्ध्य करूँ उर से अभिनंदन मधु से भर दो यह चिरबंधन महादेवी तुम्हें मेरा शत-शत वंदन बरस गये नयनों मे अविरल छलकी वह बन आँखों का जल सहते मानस का ताप पल-पल अंत से कुछ दूर है जीवन सकल छोटी सी आशा इस जीवन मे संग चलें तो धैर्य रहेगा मन मे गिरते-उठते मन के इस रण मे सो जायें मौन मधुर-मिलन मे

जीवन

नित मिलने निज सांत्वना देते दिन की कड़ी धूप सह लेते साथ चार कदम चल लेते सारी रात मन की कह जाते आँखों में अविरल प्रतीक्षा रहती छत पर आँखें क्षितिज देखती जब भी देहरी पर छाया होती आंसू भरे आँखें भींच लेते जगती मे जीना अनिश्चित था फिर भी मन में विश्वास था गगन-धरा की दूरियां बहुत थी यह प्रणय किन्तु आस-पास था प्रणय से कभी मन भरा नहीं कुछ देर और ठहर जाता दिन स्पर्श, रूप, रस बटोर कर मांग लेता ईश्वर से नित-दिन

धरा संवाद

यह कथा प्रणय से निकली भाग्य से कल जीवन मे मिली झेलती ऋतुये यह कली खिली मधु-मकरंद समेटे समय संग चली मन के अवसाद मे खिला यौवन यहाँ हम है और सारा जग निर्जन उर मे श्वासों का उठा घन-घन गर्जन तन-मन का हुआ प्रबल भुज-बंधन तुम तक है जीवन का भूगोल जल-थल मरु-गिरि सारे अनमोल तुमसे प्यार के सभी प्रश्न गोल-गोल लौटेगा जीवन कल विरह मे मधु घोल तुम्हारे बिना किस पथ चलते नीड़ मे ही जगती पार निकलते देख तुम्हें कितने पल मचलते कभी हँसते, रोते मन के धारे बहते

आव्हान

वे दिन बहुत अच्छे थे जब कहीं दूर साथ जाते नाप लेते जीवन की परिधि थक कर प्रणय पुकार लेते कभी गर्म प्याले के साथ या कभी जी लेते कुछ बहाने से कभी अकेले कुछ पल बीत जाते फिर लौट आते अपने वीराने में उन्मत्त कसक सा आज हृदय में मन गुब्बारा होता जब तुम आती बाहर तम भीतर दुख-सुख सम ज्ञात नहीं कब शाम घिर आती तुम ही प्राची, तुम ही प्रभा हो अरुण कमल सी लिये मुस्कान कितनी सुन्दर सजीव आभरण हो उठ रहा धरा पर प्रणय का आव्हान

प्रतीक्षा

चुन लो बिसुरे स्नेहिल सम्बोधन वही प्रलोभित युगों का सम्मोहन जीवन मे प्रणय का प्रबल आरोहण दे गये अगणित सुख-स्नेह के क्षण पुकारता था तुम्हें भीड़ मे अधीर बह गये नयनों के बांध से नीर धूमिल हुआ शशि मुख से क्षीर समय संग खड़े है संबंध धीर-वीर तुम्हारी छवि कितनी है निस्पंद उस मे है बरसों का मधु-मकरंद प्यार से काल मुट्ठी मे कर लो बंद बांध जाओ बाहुपाशों मे पुनः निर्बंध छू कर मन उठा देना सोया प्राण अवसान से पहले है यह आव्हान तुम पर ही है प्राण का सारा ध्यान खड़ा हूँ छोड़ निज संज्ञा का ज्ञान

मिट्टी का घर

यह द्वार दिनो से पड़ा है सूना छाया सी तुम इन दृगों को छूना इस नीड़ के निर्माण मे श्रम-संताप दूना और दीप शिखा पर मन शलभ सा भूना कपोल पर स्वप्निल स्नेह चुम्बन पोंछ दे नित रिसते अश्रु के कण निर्निमेष देखते उसे क्षण-क्षण आँखों मे रीता वह भीगा स्वप्न देख तुम्हें कंठ से शब्द न आते उच्चारित शब्द लौट कर आते चाँद दर्पण मे देख उसे छू नहीं पाते उसे पाने कितने निर्बल यत्न कर जाते प्रणय उमंग हृदय में भर कर घूम रहा प्राण नीड़ की परिधि पर किन्तु उर मे उठता सूनेपन का डर ढेर कर जाता मन के मिट्टी का घर

नीड़ का दुख

दिन हो या निस्तब्ध निशा मृग की भ्रमित हुयी है दिशा कुछ कहने मन रोता है चुपचाप कौन विकल सुनने एकाकी संताप अनछुये ही तृष्णा मुग्ध होती है अँधियारे जड़ तकिये पर रोती है संसृति दंड क्यों नहीं देती है उसे बच्चों सा क्यों नहीं सेती है यह जैसे हो कल की बात याद आये प्रणय के भी तात बंटा नीड़, छाया घना शोक बाहर नहीं था कोई और लोक उर हुआ आज जगती मे वैरागी चिरबंधन हुये विलाप मे सहभागी मौन बांधे सांसें रही जूझती थकती स्मृतियाँ मरी नित निशब्द सिसकती

घन बरसे

तुम हो प्रिये मेरे नयनों का नीर शरद चाँदनी की पावस प्रणय क्षीर पास बैठे खींचते रहे अर्थहीन लकीर मौन रोते हैं हवा से निज हृदय चीर रोम-रोम से झरी बूँदें सुख की, वह मुस्कान भरी मुद्रा मुख की, झरती मिट्टी सी कभी दुख की कनखियों से ढूंढत सुख श्रीमुख की मन तम स्वप्नों मे आकर जीवन मे तुम को खो कर सुख भरा हृदय खंडित होकर बिखर गया कण-कण धरा पर प्रणय घिर कर स्मृतियों के घन से गिरता है मीठे आँसू के कण-कण से सूखता है रक्त जल कर तन से हाय! कब मुक्त होगी श्वासें धड़कन से

आत्म-सम्मान

मुझ पर है तुम्हारा उधार तुमसे ही बना यह परिवार और आशाओं का विस्तार तुम्हारे प्यार को इस नीड़ का आभार जीवन मे रोना-हँसना सभी था झरते नीर मे प्रणय कभी था खारे जल मे भी मधु जभी था इस नीड़ मे मौन प्राण कल भी था इस नीड़ मे ही बच्चे बड़े हुये उँगलियाँ पकड़ पैरों पर खड़े हुये हम उनकी प्रत्याशाओं मे पड़े हुये देख रहे हैं जग धड़ तक गड़े हुये तुमने ही किया इस नीड़ का निर्माण इस नीड़ मे संचित थे सभी के प्राण ज्ञात नहीं कौन धरेगा शेष का ध्यान मूक-बधिर से कर लें आज का सम्मान

उलझन

क्यों मुझे विक्षिप्त बताती हो किसे अपनी अस्मिता जताती हो इस नीड़ मे है वह प्रेम कहाँ न भटको अब तुम यहाँ-वहाँ उड़ गये मीठे हाव-भाव भरते नहीं हैं अब तन के घाव काल लूट गया लावण्य-लोच है सम्बन्धों की अपनी अलग सोच झांक ले आतिथ्य मिलेगा क्या पाषाण हृदय कभी हिलेगा क्या उत्तर आँखों से ही है जान लिया ऐसा अर्ध्य देवों को भी नहीं किया कैसे उपजा है यह मोह प्रीति है या वासना का विद्रोह बांध दो नीड़ को इस जीवन से अब और न बहने दो नीर नयन से

बीते दिन

उर पर पत्थर रख कर दृगों मे भीगते स्वप्न निर्झर कंठ से निकलता यह द्रवित स्वर कह रहा है अपनी कथा मौन हो कर बरसों पहले खिला था वसंत स्मृतियों मे छाया है वही अनंत ढूँढता हूँ तिमिर मे अनछुआ दिगंत शलभ सा है जीवन दीप शिखा पर ज्वलंत शब्द मरे, कंठ से क्या पूछें यदि पूछें तो कैसे विरह उलीचें जीवन दबा है यहाँ पाँव के नीचे निज भार लिये चल रहा हूँ आँखें मींचे आज मौन है कोई उर के पास होता है नित प्रणय का आभास अंत से पहले लौटा दो मेरा इतिहास अब और न करो मेरा उपहास

गांठ

कल कैसे बदलेगा मन का रंग लौटेगी वही चाँदनी निशा के संग बंद आँखों मे छायेगी प्राची की भूषा नयाओं मे होगी आशाओं की मंजूषा मृगतृष्णा नित करती रहेगी क्रांति इस से विमुख हो नहीं मिलेगी शांति समझ सृष्टि उर के पट खोल दो तुम नीम चढ़े आज मीठा बोल दो तुम पृथक जीवन एक आत्मवंचना है व्यर्थ अहं से तन-मन खरोंचना है समेट कर शेष प्रणय इस वय मे थाम लें नीड़ सम्बन्धों के क्षय मे गिन लें एक दिन फिर एक रात रोक दें नीड़ तले घात-प्रतिघात प्रणय मे कैसा यह तोल-मोल प्रिये लौट कर यह बंधन खोल

निज-बोध

कल मैं था, पास ही मधुबाला थी मिली-जुली वह कैसी हाला थी मन से उठती अद्भुत चंचल ज्वाला थी यह स्वप्न नहीं गले मे सजी जयमाला थी शनैः शनैः अँधियारे से हुई पहचान रात तोड़ गयी युगों के प्रणय का मान विकृत सा बंद कमरे मे लेटा है प्राण जग उठा मैंने भी देखा मौन विहान गगन ढोता है पत्थर सा यह मन इसे लिये चलता है निष्प्राण बंधन किसे कहूँ एकाकी पीड़ा है गहन तुम्हारे बिना प्रणय का हुआ दहन बरसों का अनुराग नहीं आया रास कितनी ऊंची और उठेगी यह श्वास गिरते-उठते तुम तक ही है सारे प्रयास अंत से पहले मिटा जाना मन की आस मुझे निर्वासित सा मौन ही रहने दो सोयी-जागी गीली स्मृतियाँ कुरेदने दो मुट्ठी भर प्रणय लिए मन को तड़पने दो आज गगन मे स्वछंद उड़ जाने दो

वेदना

उद्दंड शिशु सा है यह मन अपनी ही धुरी पर रहता है मगन किन्तु निर्लज्ज क्यों खरोंचता है तन सोता-जागता हवा से लड़ता है जीवन हार कर जाने कब होगा प्रवास अँधियारे अब न होगा प्रकाश घूम रहा मन का वेताल आस-पास अब न होगा उस जैसा मधुमास देख लेना प्रात क्या प्राण शेष है जीवन का यह कैसा छ्द्म वेष है परछाइयों मे भी छिपा कहीं क्लेश है आँखों मे आज विश्व का यही परिवेश है बीता सुख शून्य सा सकल है वह स्पर्श अनछुआ ही अटल है अश्रु कभी गरल कभी तरल है जगती मे यह जड़ पत्थर पर जल है

वर्तमान बेचारा

छोड़ आया दूर प्रणय का रण जिसमे था समर्पण क्षण-क्षण हाथ झटक कर फेंक दिया मन गिरा आँखों से अंतिम अश्रु कण टूट गया विलास भरा रंगमहल उषा भी ढूंढती रही कोलाहल चिर शांति काटती रही पल-पल झींगुरों के गान से उर जाता दहल अब न होगा उस जैसा मधुमास रात-दिन बढ़ने लगा है संत्रास पागल मन पर नहीं अब विश्वास है यहाँ मौन प्रेतों का आवास उर छलनी कर रस भर लो यम उयाह क्षण भी तुम हर लो भूत से भविष्य मे घर कर लो और वर्तमान पर पत्थर धर दो

नीरवता

सन्नाटे मे प्रायः सपने बात करते हैं पोंछ आँसू मन के भाव कुरेदते हैं मुट्ठी मे छोटा सा चाँद भर लेते हैं आंखे खोल उसी राह चल पड़ते हैं मूक खारे जल से घाव धो रहा हूँ फटे दृगों मे निज-बीती रो रहा हूँ ज्ञात नहीं किसे ढूँढता जी रहा हूँ काल बांध मौन आँसू पी रहा हूँ आवाक उर सब कुछ सह लेता है निज दीवारों से कह-सुन लेता है सूखे पत्ते सा दुख मुक्त बह लेता है सागर भी धरा की थाह छू लेता है मन गिरा प्रणय से फिसल कर स्वप्न मे भी टूटा बिछल कर किस राह चलें नीड़ से निकल कर तपता मन जम गया पिघल कर

सदगति

अजेय है शून्यता मेरे मन की किसे सुनाऊँ कथा क्षण-क्षण की कौन विकल सुनने बात मेरे अगन की हाय! ऐसी सदगति मेरे तन-मन की व्यर्थ है अहम तले कुछ सिखाना नेत्रहीन को जैसे मधुमास दिखाना उसे क्या तर्क-वितर्क समझाना पाषाण से वृथा है प्रणय जतलाना विक्षिप्त सा भागता मन जीवन भर भूला कर्म-धर्म की गठरी देहरी पर अस्मिता भी हँसी हृदय हुआ जर्जर टूट गई मिट्टी की मटकी इसी चाक पर पुनःदिखा वही जटिल इतिहास सुख की तृषा ने तोड़ा शेष श्वास आह का भी हुआ विक्षिप्त उपहास कौन विकल यहाँ समझने आभास

क्या कह दिया

आँखों मे स्वप्नों का रंगमंच रचा मुँदी पलकों मे प्रणय शेष बचा व्यर्थ ही मन में कोहराम मचा पास आता जीवन और दूर खिंचा किसके लिये आज मैं मधु घोलूँ रात सोयी, अब तुमसे क्या बोलूँ मौन ही स्वप्नों मे मद्यप सा डोलूँ बंद जीवन के द्वार कल कैसे खोलूँ मन का उच्छवास निर्लज्ज काया खेलती रही छेड़ती प्रणय की माया लूट गया काल दिन मे अपनी छाया दुख मे भी हँसना किस उर को भाया अंत से पहले क्या कह दिया तुमने जीवन मे इतिहास ने टेक दिये घुटने अँधियारे ही सिधार गये सारे सपने हो कर भी हुये न कोई जग मे अपने

विडम्बना

स्मृतियाँ बांधे आँखों मे निस्तब्ध आज उर के अंदर ही सुन रहा है पुराना साज कानों तक नहीं गयी मन की आवाज़ निज ध्वनि भी लगती जैसे गिरती गाज कंठ से कोई शब्द छूटा भूचाल हुआ मन उद्वेलित सन्नाटे मे वाचाल हुआ स्नेह छिटका स्वर्ग यहाँ पाताल हुआ जीवन पथ पर पल-पल निढाल हुआ घन गरजा आषाढ़ मे मधु टपका मुंह खोले उस ओर यौवन लपका दामिनी से भयभीत पलक झपका स्वप्न लिये आँखों मे यह मन भटका लौट कर कुछ और जी लेते हैं प्राण लिये हाथ मे हँस-रो लेते हैं झरते आँसू अंजलि मे भर लेते हैं जीवित हैं लेकिन क्यों मुंह फेर लेते हैं

प्रयाण

बरसों बाद आज मैं हंसा आप पर थका जड़ तकियों में विलाप कर प्रेम-गीत रोये अपने ही प्रलाप पर आभास करते प्रणय उर मे छाप कर अँधियारे मूक हुये सारे संवाद न कल की बातें न ही कोई प्रतिवाद शून्य ताकता रहा निज का भार लाद किसने देखी है जगती अवसान के बाद कल यह तन है मिट्टी की ढ़ेरी, उधार दे दो प्रणय इतनी चाह मेरी न टूट सकी है यह तृष्णा की घेरी जगती मे कैसी है मन की हेरा-फेरी बरसों का सुख मन भर जाता शब्द मधुर आँखों मे उभर आता पल युगों सा बन बिखर जाता और उर पर पत्थर रख मौन मर जाता मार्च 2026

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