मुक्तक छंद : डॉ. विजय प्रताप शाही

Muktak Chhand : Dr. Vijay Pratap Shahi


मुक्तक छंद

सच्चे मन से आगे बढ़ने वालों को हिम्मत दे देना, सत पथ पर चलने वालों के पैरों को ताकत दे देना, साहस दे देना उनको जो हरदम सच लिखते रहते हैं, फिर मुझको सच लिखते रहने वालों की संगत दे देना ॥ सभी के बीच अपनापन, सभी के बीच सम्मत हो, सभी के घर सुरक्षित हों, सभी की जाँ सलामत हों, जमाने से मिटे नफरत, दिशाओं में विजय बाकी, मुहब्बत हो, मुहब्बत हो, मुहब्बत हो, मुहब्बत हो ॥ पलक जब बंद करता हूँ तो आ जाती है मेरी माँ, अंधेरे हों भले, रस्ता दिखा जाती है मेरी माँ, सुनो ! जब दर्द बढ़कर के कभी हद से गुजरता है, तो अपने हाथ मेरा शीष सहलाती है मेरी माँ ॥ कभी यादों में आती है कभी सपनों में आती है, मगर जब भी वो आती है मेरी हिम्मत बढ़ाती है, सुनों ! उसकी दुआ से ही हमेशा मुस्कुराता हूँ, वो माँ है वो हवा बनकर मेरी ताकत बढ़ाती है ॥ ये चेहरे पर हँसी जो है मेरी माँ की दुआ से है, ये आँखो में खुशी जो है मेरी माँ की दुआ से है, हवा बन कर हमेशा वो मेरे पहरे पे रहती है, चमक माथे बसी जो है मेरी माँ की दुआ से है ॥ पिता हैं धूप के जैसे, पिता हैं छाँव के जैसे, नहीं है ठाँव कोई भी, पिता के ठाँव के जैसे, भले ऊँची उड़ानें हों, भले भारी तरक्की हो, नहीं मिलती कहीं खुशियाँ पिता के पाँव के जैसे ॥ एक दीपक ज्ञान का अज्ञानता के घर जलाओ, एक दीपक सूर्य सा अंधेर के सिर पर उगाओ, एक दीपक राष्ट्र के रख दो प्रगति के रास्ते पर, एक दीपक हाथ लेकर राह दुनियाँ को दिखाओ ॥ ॠतुओं ने अब अपना अपना मौसम खोया, जीवन ने अपने अंदर का जीवन खोया, नये दौर की नई हवाओं की संगत से, प्रेरित होकर आँगन ने अपनापन खोया ॥