मानस का मृग : राजगोपाल

Manas Ka Mrig : Rajagopal


मानस

पतझर मे कोई पेड़ न मन भाया चरमर करते पत्तों का दुख छाया डाली पर कल नव पल्लव आया मर कर सृष्टि मे कोई नव-प्राण लाया वसंत मे संगीतमय धरा-गगन है विश्व पुलकित और प्रसन्न है मन कहता यह मौन निज क्रंदन है मुँदी आँखों मे जगती का मंचन है जब दुख उठा उर घबराया जग मे स्वयं को अकेला पाया नहीं किसी ने अश्रु मे मधु मिलाया अपना दुख अपने पास ही छिपाया मन की आशाएँ कौन है दबा पाता गिरता-उठता जीवन सब सह जाता लगता कोई आता साँझ ढले सहलाता महाप्रयाण से पहले मन बहला जाता

नियति

भीड़ मे मन अंदर ही चिल्लाया चक्रव्यूह मे किसने है मुझे फंसाया सुधा ढूँढता धरा पर कुछ न भाया दृगों मे है केवल भागते मृग की छाया कौन विकल यहाँ उर के प्यास को समझने विव्हल मन के आभास को छू ले कोई जीवन के उच्छवास को प्राण भर दे जीत कर श्वास-श्वास को तृणों पर कल हमने बटोरा था प्रीत आज उन्मत्त स्वर भी हुआ भयभीत पूछता हूँ क्यों हार गया प्रणय जीत निरुत्तर ही गये सुख के सारे दिन बीत बीता युग न लौट कर आयेगा उलझा मन न कभी सुलझ पायेगा तुम्हारे बिना अब कौन धैर्य बंधाएगा वह नीड़ मे स्वर्ग कैसे उतार पायेगा

मौन प्रलाप

यह जगती है यौवन से भरी दौड़ते मृगतृष्णा मे नहीं मरी मधु की हाला नयनों से झरी तिमिर मे भी ताकती है विभावरी प्रणय पुकार से गूँजता है गगन बिखरा है सत्य मे छल वचन लोचन का रस-रंग न बसा जीवन छिप गई मधुबाला मिट्टी हुआ मन कोई नहीं बुझाता है लगी प्यास होता है अश्रु-आह का उपहास कौन समझा है मन का उच्छवास तन-मन का जगती मे कैसा विश्वास समझते हैं विहंग आपस की बात लेते हैं जीवन का रस पात-पात हम सहते हैं मौन अगणित आघात किन्तु कठिन है मनुज से मनुज का साथ

काल-चक्र

मुड़ कर देखा कुछ दूर चल कर पिछला वर्ष लौट गया थक कर जीवन है, पग बढ़े दृगों को फेरकर क्या दे गया क्या ले गया वर्ष ठहर काल हँसा, अश्रु वही आह वही नव वर्ष ने क्या बात नयी कही यही बात दिन-रात चुभती रही तृष्णा, चिंता, पीड़ा भी बसी यहीं यह मेरे हिस्से का काल ले गया जगती को हँस कर नव-वर्ष दे गया लेन-देन ही है सृष्टि की गूढ प्रक्रिया जी लूँ यह युग भी मांग प्रणय की दया वर्ष भर सजे नव-रसों की रंगोली तीज-त्योहार बरसे रंगों की होली नहीं किसी ने सुनी मन की बोली निर्लज्ज तृष्णा ने फिर मदिरा घोली

प्रणय कृति

यह जीवन जैसे तेरे जलज नयन उसमे बसा है मेरा काजल सा मन सामने या स्वप्न मे उच्छ्रंखल तन प्रणय की हाला मे झूलता मगन प्राण धरे उर जैसे विशाल गगन अधर हैं उपवन के सौरभ सुमन पवन संग लजाते कुंतल सघन दृगों मे कभी न समाया यह मन जगती मे दुर्गा से वृहद लोचन स्वर्ग की शशि सा गोल आनन तुझ मे है कल्पनाओं का कानन खो गया आज यहीं मन का चेतन दिन है तुम्हारे सौन्दर्य का दर्पण साँझ का निशा मे स्निग्ध समर्पण रजनी मे सिमटते आँचल का क्षण-क्षण प्रणय रुधिर तुम से है इस उर की धड़कन

छाया

जीता रहा, हर रात सो कर जगा मन कभी अंगार कभी शीतल लगा हर्षित होने जगती मे स्वयं को ठगा इस भीड़ मे कौन हुआ किसका सगा कौन विकल यहाँ सुनने मेरी बात अपनी ही छाया रहती है मेरे साथ अकेला छोड़ जाती मौन सारी रात खुले लोचन उदास आती फिर प्रात नीड़ मे जड़ सा पड़ा हुआ हूँ निज समाधि मे गड़ा हुआ हूँ अचेतन मे चेतन पर चढ़ा हुआ हूँ अकेला पर सब से जुड़ा हुआ हूँ मेरी विडम्बना बढ़ती जाती है उर की धड़कन चलती जाती है स्नेह-सगाई शनैः ढलती जाती है अपनी छाया पास आती जाती है

असमर्थता

मैं जगती मे कितना असमर्थ ज्ञात मुझे ही मेरे मन का अर्थ प्रणय-परिणय सारे संबंध व्यर्थ मन-शब्दों के मध्य कितने अनर्थ मौन रहूँ मैं विकृत कहलाऊँ अपना दुख मैं क्यों जतलाऊँ प्रणय मांग कर उसे न भाऊँ शलभ सा हर रात जलता जाऊँ अलग नीड़ करे संबंध विरुद्ध साथ रह कर जीवन सृष्टि क्रुद्ध शब्द-शब्द कर रहे मौन युद्ध ज्ञात नहीं कौन है यहाँ प्रबुद्ध क्यों गये मेरे व्यर्थ सारे प्रयास हुये बातों मे विलोम आभास लौटता क्यों है मन प्रेयसी के पास इस रण मे लंगड़ाती चलती है श्वास

अज्ञानता

बरसों उसके साथ चल कर पथ अगणित नापे जीवन भर श्रम संताप से नीड़ बना कर तम हर लो प्रणय दीप जला कर इस नीड़ की सीमाएं बतला दो अधिकारों की परिधि दिखला दो क्या कहूँ क्या पूछूं यह सिखला दो यदि संबंध सच्चे हैं तो जतला दो बरसों से दूर-दूर जीवन है समीपता मे मुख पर आवरण है कैसा असमर्थ मूक निमंत्रण है देह जला किन्तु मौन यह मन है नीड़ मे अवरुद्ध निशा है मन मे जागती धृष्ट तृषा है धुंधली यहाँ प्रणय दिशा है जीवन सुख-संघर्ष मे धंसा है

अनुभूति

करता रहा मानस दृढ़ आव्हान बसा है तुम्हारे उर मे मेरा प्राण सबल काल से लड़ गया ध्यान कितना विस्तृत है प्रणय का परिमाण उड़ कर स्वर्ग मे खोया यह मन भटका वह ढूंढ रहा है एक चुंबन जगती मे कहाँ है मन्मथ का मधुवन अंजलि मे भर दो मधु का कण-कण रेत मे छालों से जलते हैं चरण नहीं मिलती धूप मे शीतल शरण दिवास्वप्न बिछे तुम्हारी गोद मे मगन कैसा है दुख मे यह प्रणय समर्पण दूर गगन उड़ते बादलों का यौवन विक्षिप्त मन भिगोता उच्छ्रंखल सावन निर्लज्ज भीगा पर संबंध न हुआ कंचन मुँदी पलकों मे मूक सुनता रह घन गर्जन

लाचारी

क्या यह अनुचित मांग मेरी है जगती की भी यह लाचारी है कौन सुख का अधिकारी है ज्ञात नहीं, पर व्यंग्य बड़ा भारी है उर मे चक्रवात उठा कर कहते हो बोलो हँस कर छिपे घाव नहीं दिखाते खुल कर जी लो जीवन पीड़ा मे दब कर कुछ बातें दीवारों ने भी सुनी है तर्क-वितर्क यहाँ अनसुनी है न्याय नहीं, शब्दों ने अस्मिता बुनी है इस प्रपंच मे नवकर ही मनुज गुणी है एक ओर दृगों का खारा जल दूसरी ओर यह प्रणय चंचल दूर तक फैला जीवन का मरुथल मैं लघु मृग तृष्णा मे मरता पल-पल

प्रायश्चित

मौन श्रम है प्रायश्चित मेरा दुख मे है सुख अनिश्चित मेरा अपरिचित हुआ परिचित मेरा खो गया वह प्रणय ललित मेरा क्षीण हुआ स्नेहिल स्वर मेरा हँसा मुझमे निहित प्रणय तेरा शेष जीवन काल-मेघ ने घेरा मिट्टी हुआ शेष नयन नीर मेरा उठता हूँ रातों मे डर कर क्या प्रेत बना प्रणय मर कर आह जा लटकी किसी बरगद पर प्रयाण मे अब यही बचा है राह पर तन-मन एकाकी मौन त्रस्त मेरी प्रकृति आरोपों से ग्रस्त रवि-रजनी दोनों मेघों मे अस्त निर्लज्ज जीवन पुनः हुआ व्यस्त

नव-निर्माण

शून्य गगन मे देख तुम्हे उड़ते घन रेलों मे बहते बरसाते हैं प्रणय सघन सावन मे छू लेना कभी भीगा मन बूंदें सरिता और सागर सा होगा जीवन कल्पना से दूर तुमसे थके नयन निर्निमेष बाँट जोहते धरा-गगन जब कभी मौन मरा यह मूक मन नंदिनी मेरी कुछ तो करो जतन संसृति मे तुम से ही स्नेह सृजन घर-आँगन का कोना-कोना पावन उषा संग पीहू सा सुमधुर गायन कितना मदिर संग है मन-भावन अलि ढूँढता जगती मे तुम सा सुमन भटकता चूमता पराग खेलता पवन देख तुम्हें निखरता सुमन का यौवन बना लें आज नीड़ दोबारा इसी उपवन

एक क्षण

मैं हारा-हारा सा जग मे दिशाहीन भीड़ भरे मग मे ढूँढता हूँ उसे पग-पग मे श्वासों मे रुधिर मे रग-रग मे व्याकुल आज प्रयाण मे प्राण अधर भूल गये वसंती मुस्कान न तन-मन न ही है जगती का ध्यान किन्तु जीवित है प्रणय का अभिमान बदलेगी जीवन की आशा प्रणय-परिणय की परिभाषा उठेगी नव प्रभात आभिलाषा प्रणया बोलेगी फिर प्रणय की भाषा कुछ अंश शेष है मुझमे जीवन जर्जर तन पर है पुलकित मन यहीं कहीं है मेरा खोया प्रिय धन यह जीवन का है एक ही क्षण

प्रश्न

गगन तले मैं विक्षिप्त अकेला कई रूप बना रहा मेघों का रेला माया मे डूबा है जगती का मेला उतरी हैं नयनों मे संध्या की वेला तुम्हें स्वप्नों से चुरा कर बातें करेंगे रात बिसुरा कर तन-मन जीवन है आतुर पर पत्थर रखा है बरसों से उर पर यह रात बरसों सोयी नहीं है प्रणय की तृष्णा छिपी यहीं है बंद अधरों से मधु रिसती नहीं है पास ही वह निज वेदना मे कहीं है तुम्हारे प्रणय का मैं शरणागत मैं सुख-दुख के अर्ध्य का अक्षत क्षीण होते प्रणय से भी मैं अवगत क्या करूँ नीड़ के ऊपर है एक ही छत

परिचय

समय थका, इन आँखों तले बादलों से तुम्हारे ही स्वप्न चले चाँद देखते पग कितनी बार फिसले तुम तक चाँदनी मे हम भी जले यह प्रणय तुमसे ही पला है वह सूरज अब तक नहीं ढला है साथ तुम्हारे जीवन अथक चला है तुमसे अलग प्राण शलभ सा जला है तुम रुधिर की अविरल धार हो, आषाढ़ घन की कामुक बौछार हो अस्तित्व हो जीवन का भार हो तुम ही इस जीवन का सार हो शून्यता भी जीवन की कला है जग छोड़ आरती करने चला है दीप लिये भाग्य भी कभी जला है आज वह तुम तक ही निकला है

इति

निर्निमेष नयन घूरती हैं आकाश मरे प्रश्न ढूंढ रहे तिमिर मे प्रकाश मौन नीड़ तले एकाकी आभास खो रहा पल-पल निज विश्वास मुँदी पलकों मे स्वप्न काला बरसों प्रणय मूक मन मे पाला न बोला मैंने न समझी मधुबाला अपने ही हाथ लुढ़क गयी हाला पढ़ रही हैं आँखें चिट्ठियाँ पुरानी किस्से समेटती बिसुरी वह कहानी प्रणय पंक्तियाँ आज हुई अनजानी शव हुयी भावना किसी ने न पहचानी नित दिखते थे काले शून्य नयन कौन विकल यहाँ पोछने शत-क्रंदन सिधार गया देखते उसे खुले लोचन छू न सका वह तृषित प्रणय का बंधन

निर्वात

स्नेह-संसर्ग कभी मन बहलाता स्मृतियाँ बन कर नयन छलकाता मृग सा तृष्णा मे हृदय जलाता कभी तड़पता मौन अश्रु बहाता है प्रणय यहाँ कितना दीन हाय ! निर्बल मन से सदा रहता असहाय मन पढ़ने का नही है कोई उपाय उर पर पत्थर धरे कैसा है न्याय कौन समझे निर्वात मन की मौन जैसे शून्यता गगन की छाई है निस्तब्धता विजन की ऐसे टूट गयी कड़ियाँ बंधन की विधि अपनी, दोषी किसे ठहराएँ हृदय चीर सत्य किसे दिखलायें समय सारी आशाओं को झुठलाए प्रणय दूर खड़ा याचक सा अकुलाए

अभिसार

हठी प्रणय घन-सघन सा बरसा है छोटी छत के लिये बहुत तरसा है सिहरते बीता एक लंबा अरसा है आज भी काजल इन आँखों मे बसा है आँखों को प्रणय से सेंकता रहता हूँ अकेले हवा से भी लंबी बातें करता हूँ जगती मे तुम्हारी साँसों के लिये डरता हूँ दिन-रात मैं ऐसे ही जीता-मरता हूँ आँखें अंधेरे मे तुम्हें झांक आती हैं रात की चादर चुपके से सहलाती है आँखों मे स्मृतियाँ दौड़ती जाती हैं यही मुझे उजाले तक जीवित रखती है जगती मे जीवन का आधार हो मेरा तुमसे ही विश्व मे है अभिसार मेरा तुम ही जीवन का सृजन, हो संसार मेरा साँझ ढले दिखलाना दृगों मे छिपा प्यार मेरा

याचना

किस ने दिया नीड़ मे स्नेह निमंत्रण विरह-वेदना का जीवन मे नित रण नीरस स्नेह-सानिध्य का सम्मोहन ज्ञात नहीं अब कितना शेष है जीवन छिपा प्रणय दूर कहीं तुम्हारे नयन जीवन अनंत जैसे विशाल गगन घन-सघन दामिनी छू जाती मन मैं तृण छोटा सा तुम सृष्टि सृजन तिमिर मे उठती आशा की किरण चुरा गयी प्रणय का रतिमय आभूषण टपकती अधरों से तारुण्य मधु कण युग बीता जैसे जीवन का टूटा क्षण लौट आया भटका प्रेत सा प्राण स्वप्न काट ढूँढता तिमिर मे भान मन सादर मांग रहा है एक वरदान धरा पर तुम्हारी गोद मे हो अवसान

समर्पण

पृथक तुमसे नहीं तन-मन न चाहिये जगती मे यश-धन रात सोऊँ कुंतलों मे सघन भोर बनूँ इन आँखों का अंजन जग सारा लगता है निर्जन उठता है नित तड़ित-प्रभंजन दूर मिट्टी भी दिखती है कंचन है मृगतृष्णा केवल शत-क्रंदन तुम्हारे विश्व भरे लोचन पोछते हैं मेरे अश्रु-कण कम लगता है युगों का बंधन जब मिलता है एक स्नेह-चुंबन तुम श्वास मेरी हो चिरंतन तुम्हारे पास है मेरा जीवन है वहाँ स्नेह का अपार धन नंदिनी, तुम्हें मेरा शत-शत नमन

रंगमंच

बरसों बाद मैंने दुनिया पहचानी प्रणय यहाँ जैसे बहता पानी संताप मिलाप की एक कहानी काल से परे है वही सृष्टि पुरानी मन के सतरंगी रंगमंच पर प्रणय के बहुरूप धर कर मुट्ठी मे कुछ आशाएँ भर कर कितने यत्न किये है जीवन भर पट उठा लगा क्या यही प्रणय है श्वास अलग पर एक ही हृदय है गिरते उठते पथ भटकने का भय है भूल गया मन यह तो अभिनय है जगती का यह छलता रंगमहल है यहाँ भागते भीड़ की चहल-पहल है रोदन गायन के आगे अपार मरुथल है ज्ञात नहीं जीवन के शेष कितने पल हैं

निर्वाण

तोड़ कर मुस्कुराती है सुख की घड़ियाँ जलती हैं नित स्वप्निल फुलझड़ियाँ भस्म हुयी आमोदित प्रणय की लड़ियाँ डाल देना निर्लज्ज तृष्णा पर हथकड़ियाँ आरव मे मौन हुये बरसों हो गये स्मृतियों मे हम युगों तक सो गये जाग कर भी आज जगती मे खो गये युगबाहों से हम कितने दूर हो गये कैसे यह उठता दर्द संभालें आंसुओं पर कैसे नया बांध बना लें नहीं यहाँ कोई पुचकारने वाला हैं सभी पर नहीं है कोई समझनेवाला जान कर भी तू अनजान बन जा रौंद कर प्रणय आज पाषाण बन जा प्रसंग मरे सारे अब निष्प्राण बन जा आज निर्वाण का प्रतिमान बन जा

अंतर्दर्शन

जग छोड़, नीड़ मे अकेला आज मैं तृषित ही भीड़ मे मौन हुआ आज मैं गिरता-उठता अधम हुआ आज मैं संसृति मे हार गया जीवन आज मैं थके जीवन का नव निर्माण हुआ दृगों पर प्रणय मोरपंखी स्वप्न हुआ खारे जल से भी मन प्रसन्न हुआ विश्व मुट्ठी मे लिये स्पर्श सुन्न हुआ प्रेयसी यहाँ अदृश्य तन-मन मे बहती है सरिता सी वह क्रंदन मे उर छलनी होता है मौन मर्दन मे डरता है मन आप ही आत्म-गर्जन से मन ढूंढ रहा खोया उल्लास बटोरता पुनः प्रणय का विश्वास मुट्ठी मे बांध कर युगों की आस देहरी पर बैठा वह ताकता मधुमास

इमली पर आह

इमली की डाल टंगी है मेरी आह मन का वेताल छोड़ आता उस राह प्रेत हुआ प्रणय अब किस की है चाह निष्प्राण हाय! बह रहा है मन का प्रवाह आज मौन हुआ कल का उन्माद न कोई संवाद न ही वाद-प्रतिवाद कोलाहल मे अनसुना हुआ आर्तनाद ज्ञात नहीं क्या होगा इस क्षण के बाद अँधियारे प्रणय का साथ छूटा पकड़ भाग्य, हथेली का बल टूटा हाथ से बरसों भरा मधु का घट फूटा मानस के मृग ने जीवन क्षण-क्षण लूटा गगन-धरा मे नहीं आज वह प्रेयसी छोड़ कर तन माया भी चल बसी जाते हुये इमली पर टंगी आह पर हँसी पथ पर दौड़ती निज समाधि मे धँसी

अपूर्णता

जिस के गोद मैं निस्तब्ध सो जाता विश्व मे हाथ पकड़ कहीं खो जाता संग उसके घन सघन गरजता रो पाता मन की बात उसे कभी समझा पाता सोचा था मन का शून्य भर दूँगा प्रत्याशा मे अपना दुख हर लूँगा अंत निकट मधुबाला तक जाऊंगा उसके ही कुंतल तले तर जाऊंगा मृगतृष्णा मे दौड़ा, रुका, और पछताया प्रणय फिर भी आँखों मे सघन छाया आज समझा होती है मिट्टी की काया रौंद जिसे चाक पर घुमाती है माया आधे-अधूरे कौन यहाँ सम्पूर्ण हो पाया वेताल बनी आशाओं से मन घबराया स्वप्न मे यथार्थ मे प्रणय बहुत भरमाया यत्न झूठे काल न कभी लौट कर आया

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