माहिया छंद : डॉ. विजय प्रताप शाही
Mahiya Chhand : Dr. Vijay Pratap Shahi
माहिया छंद
बौराए बागों में, बोली कोयलिया, मतवाली रागों में ॥ सूरज की लाली है, अंधियारी देखो, अब जाने वाली है ॥ दिल कैसे झूमा है, किरणों ने आकर, धरती को चूमा है ॥ वासंती बेला है, मन के आँगन में, खुशियों का मेला है ॥ ठंडी पुरवाई है, मौसम में थोड़ी, मदहोशी छाई है ॥ मुसुकाता मधुबन है, फूलों पर मीठी, भँवरों की गुंजन है ॥ ये पल पल पावन है, जी भर के जीयो, जीना ही जीवन है ॥
