कुण्डलियाँ छंद : डॉ. विजय प्रताप शाही
Kundaliyan Chhand : Dr. Vijay Pratap Shahi
कुण्डलियाँ छंद
कठिनाई पथ में भले, आये बारंबार, चलना है हर हाल में, हार नहीं स्वीकार, हार नहीं स्वीकार, भले स्थिति हो भारी, बड़े धैर्य के साथ, करो हल बारी - बारी, कहें "विजय" यह बात, न हिम्मत हारो भाई, आए जितनी बार, भले पथ में कठिनाई ॥ आवै आँधी बैठिए, तनिक न रहिए तान, सिर नवाइ स्वीकारिए, बिधि बिधना के मान, बिधि बिधना के मान, सत्य को हृदय लगाकर, करिए नव प्रारम्भ, हृदय को सबल बना कर, कहें "विजय" यह बात, परीक्षा सत को भावै, अडिग रहे विश्वास, कभी जब आँधी आवै ॥ अंधेरा जब हो घना, डग - मग हो विश्वास, मन की ज्योति जलाइए, करिए हृदय प्रकाश, करिए हृदय प्रकाश, देख आँखों से मन की, सुगम कीजिए राह, आप अपने जीवन की, कहें "विजय" यह बात, कि आए एक सवेरा, सूर्य दिखाए राह, घना हो जब अंधेरा ॥ मानव मन मजबूत कर, कर अपने सब काम, सुख-दुख सबके साथ है, क्या केशव क्या राम, क्या केशव क्या राम, कठिन दिन सबके आए, समय - चक्र का फेर, ये प्राणी जान न पाए, कहें "विजय" यह बात, पार पाना है सम्भव, सत्य - धर्म अरु धैर्य, धरे जो मन में मानव ॥ ब्रह्मा गुरु के रूप धरि, समुझावैं सौ बार, तो भी मूरख मन कभी, बदले नहीं विचार, बदले नहीं विचार, स्वयं को माने ज्ञानी, हँसे ठठाइ - ठठाइ, बके बानी अज्ञानी, कहें "विजय" यह बात, रहे जो ठेठ निकम्मा, उनकी बिगड़ी बात, बनावें कैसे ब्रह्मा ॥ घर में न्यायाधीश के, मिले अधजले नोट, पर उसके आचार में, मिला न कोई खोट, मिला न कोई खोट, रहा वो पद पर बैठा, सुनता रहा विवाद, ठसक से ऐंठा - ऐंठा, पर 'सौ रुपया' घूस, लिया चपरासी छुपकर, चालिस वर्षों बाद, छूट कर आया घर पर ॥ उछल कूद के बाद भी, पक्व पहुँच से दूर, नहीं मिला तो कह दिया, खट्टे हैं अंगूर, खट्टे हैं अंगूर, कहा वह क्रोधित होकर, करने लगा कुतर्क, अज्ञानी आपा खो कर, कटुता पर विश्वास, किया वह आँख मूँद के, थक कर हुआ हताश, बेचारा उछल कूद के ॥ कदम - कदम पर दीखते, राजनीति के दाँव, पहले जैसा अब 'विजय', नहीं रह गया गाँव, नहीं रह गया गाँव, आज पहले के जैसा, झूठ, कपट, कुविचार, जाल फैलाये ऐसा, लोभ, मोह, आसक्ति, न छोड़ें कोई अवसर, छल, प्रपंच, चातुर्य, दीखते कदम - कदम पर ॥ बेमतलब ही भिड़ गये, अमरीका - ईरान, इनके चक्कर में हुआ, विश्व आज हलकान, विश्व आज हलकान, हो रही है कठिनाई, बाधित है आपूर्ति, बढ़त में है महंगाई, संयम से लो काम, धैर्य फिर धारो साहब, आने वाला वक्त, कठिन है बस बेमतलब ॥
