किस्सा रूप-बसंत : फौजी मेहर सिंह (हरियाणवी कविता)

Kissa Roop-Basant : Fauji Mehar Singh (Haryanvi Poetry)


खडगपुरी में राजा खडग सेन राज किया करते। उनकी रानी रूपमती थी और उनके दो लड़के थे बड़ा रूप और छोटा बसंत। कुछ समय बाद रानी बीमार हो जाती है। एक दिन चारपाई पर लेटे हुए रानी की नजर छत की तरफ पड़ती है , जहाँ एक चिड़िया का घोंसला बना हुआ था। उस चिड़िया और चिडे के भी दो बच्चे थे। चिड़िया किसी कारण वश मर जाती है। रानी हर रोज उसी घोंसले की तरफ देखती रहती है। एक रोज वो चिड़ा दूसरी चिड़िया को ले आता है। वह चिड़िया दोंनो बच्चों को मार देती है। रानी के मन में अपने बच्चों को लेकर भय उत्पन्न हो जाता है। वह सोचती है की यदि मैं मर गई तो कहीं राजा भी दूसरी शादी ना कर लें। अगर ऐसा हुआ तो मेरे बच्चों का क्या होगा। रानी राजा को अपने पास बुलाती है और क्या कहती है-

हाथ जोड कै अर्ज करूँ मेरा इतणा कहण पुगाइये। मैं मरज्यां तै मेरे बालकां नै ठा छाती कै लाईये।। अरसे की बेमार पडी,मेरै इसा लाग्या रोग पिया, दारू -दवा असर ना करती,रही करणी का दंड भोग पिया, बुढा चाहे जवान चल्या जा,सबका हो सै शोग पिया, मैं चाली जां सुरगपुरी नै,म्हारा जागा टूट संजोग पिया, अपणे हाथां मेरे साजन मेरा किर्याक्रम कराईये।। बंस बेल चालण की खातर ब्याह करवाया जा सै, बीर मर्द का दुनिया में न्यूं मेल मिलाया जा सै, जीव पुरजंन बहु पुरजंनी यो खेल खिलाया जा सै, मैं मरगी तै के राह बालकां का न्यूं जी घबराया जा सै, ये बिन माता के हो ज्यांगे मत टूक टेर करवाईये।। समय आवणाी जाणी हो न्यूं दुनिया कहती आई, कदे गालां के म्हां फरैं रोवंते होज्या लोग हंसाई, सारे कै तेरी बांस उठ ज्या दें ताने लोग लुगाई, अपणे जाये नै आपै खाले या नागण बीर बताई, मेरे कहे की मान लिए मत बीर दूसरी ब्याहिये।। तीन बचन मेरे आगै भरले तनै कोन्या ब्याह करवाणा, मौसी कारण ध्रुव भगत नै पडा जंगळ में जाणा, मौसी कारण रामचंद्र नै लिया फकिरी बाणा, कर ईश्वर का भजन मेहर सिंह जिक्र और मत ठाईये।। रानी का देहांत हो जाता है । कुछ दिनों बाद राजा दूसरी शादी करवा लेता है। रूप बसंत दोनो भाई स्कूल जाने लग जाते है। एक दिन वे स्कूल से घर आने के बाद खेल के मैदान में खेलने चले जाते है। तो कवि क्या कहता है- पढ़कै आगे दोनूं भाई,आकै खुळिया गिंडू ठाई, फेर खेलण की सुरती लाई,गये लिकड़ मैदान में।। चले चाव उमगं में भरकै,लांबी लांबी सी डंग धरकै , किस्मत पड़कै जब सो या सै,दीन-दुनी तै खोज्या सै, बख्त इसा उल्टा होज्या सै,ना कुछ आवै ध्यान में।। मैदान में दोनूं जगाह पागे,मस्ती में हो खेलण लागे, ना आगे तै थामण पाया,हे ईश्वर तेरी अद्भुत माया, किस तरियां इब जागा लाया,यो गया मकान में।। रगं महलां में रूप बड़ग्या,मौसी की नजर में पड़ग्या, छिड़ग्या इश्क देखकै श्यान,मन पापी होग्या बेईमान, कोन्या रहया ठिकाणै ध्यान,गया आ फरक ईमान में।। इसा लाग्या गावण का रगं,डूम बताया जाट मेहर सिंह, तंग होकै पड़या भरती होणा,मिली बरेली छुटया बरोणा, इब धरती ऊपर पड़ग्या सोणा,फिरूं जहान में ।। दोनो भाई खेल रहे थे तो गेंद मौसी के महल में चली जाती है। रूप मोसी के महल में गेंद लेने जाता है। मौसी रूप की शान देखकर उसपर मोहित हो जाती है और रूप को क्या कहती है- बैठ पलंग पै रूप मान ले मेरी। जिंदगी भर मैं करूँ गुलामी तेरी।। मनै झोली करकै भीख तेरे तै मांगी, भरी जवानी में भोत घणी दुख पागी, इश्क नशे की चोट कालजै लागी, ना मान्या तै जिंदगी न्यूंए जागी, मैं सिंहणी तूं मेरी जोट का केहरी।। बिन माली के चमन पड़या सै सुक्का, कोन्या थ्यावै जो बख्त एक बै चुक्का, इश्क जले नै गात मेरा यो फुक्का, रहूं पड़ी महल मै मार सब्र का मुक्का, हां भरले मैं होली काळ भतेरी।। मात पिता नै ना करणा भूंडा चाहिये, वर धी बेटी के लायक ढुंडा चाहिये, नई बहु नै ना बालम बुढ़ा चाहिये, बीर मर्द का मिलता कूढ़ा चाहिये, तेरे बाप की होली उमर बडेरी।। मेहर सिंह तेरी टहल करया चाहूं सूं, मत घबरावै मैं पहल करया चाहूं सूं, पाप धर्म नै मैं गैळ करया चाहूं सूं, मिल्या जोड़ी का वर सैळ करया चाहूं सूं, मैं देदूं ज्यान तेरे पै मुट्ठी के म्हां लेरी।। इतनी बात सुनकर रूप को यह एहसास हो जाता है कि मौसी की तबियत ठीक नहीं है। वह मौसी को समझाता है कि मौसी ओर माँ का बराबर दर्जा होता है। तू क्या कहती है। रूप मौसी को समझाता है और क्या कहता है- होणी हो बलवान जगत मै के तै के करवा दे। इस तै आच्छा रूप कंवर नै ल्याकै जहर खवादे।। तपकै कुंदन होया करै या काया कंचन की, पूरी नहीं तृष्णा होती इस पापी मन की, सदा एकसी समय रहै ना धन और जोबन की, भजन करया कर मालिक का जिंदगी सै दस दिन की, ना चाहना इसे काम करण की जो सारै नीच कहवादे।। सत की डोरी मन कपटी पै ताण राखणी चाहिए, किस माणस तै के कहणा कुछ पिछाण राखणी चाहिए, पीहर सासरे दोनूं कुलां की काण राखणी चाहिए, पतिव्रता के जो कायदे उनकी जाण राखणी चाहिए, ना घर इसी डायण राखणी चाहिए जो माटी नै पिटवादे।। माँ होकै तू बेटे पै नीत डूबोवण लागी, तरह तरह की बात सोच्कै भाने टोहवण लागी, मीठे मीठे बोल बोलकै मनै भलोवण लागी, बेअकली में मेरी गैल्यां झगड़ा झोवण लागी, जुण से दुख नै रोवण लागी ओ बाप मेरा कटवादे।। धड़ तै शीश दूर धरूं जै माँ ना होती मेरी, इश्क नशे में आंधी होकै कररी डूबा ढेरी, तेरी बिमारी काटण नै यो मेरा बाप सै केहरी, और कहवाणा के चाहवै बस इतणी ए बात भतेरी, मेहर सिंह ना मानै तेरी चाहे घर तै इब तहवादे।। इतनी बात होने के बाद भी मौसी नहीं मानती तो रूप और मौसी के उपरातली बोल होते है- मौसी: बिन मारे मैं मरी पड़ी सूं सै तेरे हाथ मै डोरी। रूप: तू माता मैं बेटा लागूं री सहम बावली होरी।। मौसी: माता मतना कहियेरू प मनै नहीं कूख तै जाया, रूप: माँ मौसी एकसार कहैं यो नाता ठीक बताया, मौसी: बीर मर्द का नाता करले होज्या मन का चाहया, रूप: तावल करकै जाणा सै मैं गैंद लेण नै आया, मौसी: छोड़ गैंद नै लोट पलंग पै तेरी जड़ मै लोटै गोरी।। रूप: तेरे पलंग पै लोटण खातर मेरा बाप सै धोरी।। मौसी: तेरे बाप तै रूप कंवर मेरी मिलती कोन्या जोड़ी, रूप: कोन्या बस की बात रहै जब देज्या नीत मरोड़ी, मोसी: बण असवार सवारी करले या तणी खड़ी सै घोड़ी, रूप: इसी कसूती चोट मारदी जणूं घण की गैल हथौड़ी, मौसी: अपणे हाथां पी ले ठाकै या रस की भरी कटोरी। रूप: कूण चाख ले दिखै सै काणी गंडे की पोरी।। मौसी: बण कै बैध दवाई दे दे तड़प रहया बेमार तेरा, रूप: तेरी मर्ज मनै कोन्या पावै ना टोहवण का विचार मेरा, मौसी: प्यासी नै तू पाणी प्यादे तेरे धोरै जल का ताल भरया, रूप: मेरे बस की बात नहीं यो कह दिया कती जवाब खरया, मौसी: शराप गेर दयूं रूप कंवर तेरे नां का बोझा ढोरी। रूप: उस मालिक की माया सै क्यूं व्यर्था झगड़े झोरी।। मौसी: इसा हाल करवा दयूंगी तेरै नहीं समझ में आवै, रूप: बेमाता की कर्म रेख नै री माता कूण टलावै, मौसी: इब्बी बख्त भतेरा सै जै तू मेल मिलाणा चाहवै, रूप: एक बै तै मनै पहलम कहली मतना फेर कहवावै, मौसी: होली की झल ज्यूं आग काम की बेदन मन नै खोरी। रूप: कहै जाट मेहर सिंह पड़ैंगे काटणे बीज जिसे तू बोरी।। रूप कंवर जब रानी की बात नहीं मानता तो रानी रूप कंवर की शिकायत राजा के पास जाकर करती है। रानी राजा को क्या कहती है- के जिक्र करूं,बिन मौत मरूं, मेरा आ लिया बख्त अखीर,ओ तू सुण नणदी के बीर।। महुं तै बात लिकड़ती कोन्या इसा पवाड़ा होग्या, किस ढाळा मैं जिक्र करूं मेरे जी नै खाड़ा होग्या, मैं फंसगी,मेरै फांसी घलगी,या खोटी सै तकदीर।। तेरे लाडले रूप कंवर नै करदी तन की ढेरी हो, हाथ पकड़ कै न्यूं बोल्या तू बहु बणै नै मेरी हो, मैं डरगी मेरै पक्की जरगी,जब सर तै तारया चीर।। फांसी खाकै मरणा होगा कती जीवणा ना चाहती, थारी दोनूवां की बहु बणू ना ओड़ बड़ी मेरी छाती, इसा चाला करग्या,महुं काला करग्या,करी साड़ी झीरमझीर।। मेहर सिंह मेरी ना मान्या तै अपणे बोये काट लिये, दोनूवां मै तै एक रहगा चाहे जूणसे नै छाटं लिये, मनै होंश नहीं,मेरा दोष नहीं,ना शोधी मै रहया शरीर।। राजा को रानी की बातों पर विस्वास नहीं होता वह रानी को समझाता है कि रूप कंवर ऐसा लड़का नहीं है। और राजा क्या कहता है- घड़ा पाप का फूटैगा जब ऊपर तक भर ज्यावै, कोन्या जरती रूप कंवर कै झूठी तोहमद लावै।। चाहे पश्चिम में सूरज लिकड़ै चाहे उल्टी गंगा चाल पड़ै, चाहे इंद्र का सिंहासन डोलै तख्त धरण का हाल पड़ै, ऊंट लागज्या खाण ढाक नै,चाहे बकरी आक की ढाल पड़ै, चाहे बांझ कै बालक होज्या चाहे राजा के घर काल पड़ै, आज तल्क कदे सुण्या नहीं घी बिल्ली कै पच ज्यावै।। चाहे धरती माता रस मत उगलो चाहे बिन बादल के मिंह बरसै, चाहे पवन देवता वेग त्याग दे चाहे पाणी बिन इंद्र तरसै, चाहे अंबर म्हां तै तारे टूटो चाहे चंद्रमा ना दरसै, चाहे शिवजी कैलाश छोड़ दे जो मरता नहीं अमर सै, खूब बिलो कै देख लिये ना पाणी मै घी आवै।। चाहे काग हसं की जोड़ी मिलज्या,चाहे लछमी कै टोटा आज्या, चाहे अंधे नै ज्योती मिलज्या,चाहे मौत काल नै खाज्या, चाहे अंबर तै धरती मिलज्या,चाहे गंगूा राग सुणाज्या, चाहे कुंए तै कुंआ मिलज्या,चाहे मूर्ख वेद पढाज्या, आपे नै तै देखै कोन्या और में खोट बतावै।। चाहे छोड़ दे फूल महक नै,चाहे महेंदी छोडै रगं नै, चाहे सूरज आकाश छोड़ दे,चाहे सूरा छोड़ै जंग नै, चाहे पंडित दे छोड़ व्याकरण,चाहे धरम छोडै संग नै, गावण का इसा ऐब लागग्या दुख देग्या मेहर सिंह नै, तेरे बसकी बात नहीं तू लुकमा गाणा गावै।। इस पर भी राजा की बात रानी नहीं मानती तो राजा रूप कंवर को 12 साल का दसोटा दे देता है। जब दोनों भाई खेलकर घर आते है तो दरवाजे पर रूप कंवर का 12 साल दिसोटा लगा देखकर रूपकंवर वापिस जंगल की राही चल पड़ता है। वह बसंत को समझाता है कि तेरा नाम इसमे नहीं है। मैं अकेला ही 12 साल का दिसौटा काटूंगा तो बसंत साथ चलने की जिद करता है और क्या कहता है- किसके सहारे छोड़ चल्या तू होया जंगल की राही। मैं भी तेरी गैल चलूंगा मां के जाये भाई।। आंख्यां मै पाणी आग्या जी घबरावै सै, हो रहया सूं काळ भीतरला पाट पाट आवै सै, किस तरियां दिन पूरे होंगे या चिंता खावै सै, साच बता रूप एकला क्यूं जाणा चाहवै सै, तूं न्यारा और मैं न्यारा म्हारी दोनूवां की करडाई।। बारहा साल का मिल्या दिसोटा ना गलती तेरी सै, बिना खता के मिली सजा या डूबा ढेरी सै, कोण करादे टाल विपत की जो विधना नै गेरी सै, आज तै लिख दिया तेरे नाम का कल बारी मेरी सै, मनै लछमन करकै राख लिये तू बणकै नै रघुरुाई।। जंगल झाड़ बोझड़ा में कितै एकला दुख पावैगा, कोए दुख सुख की बूझै ना तू किस तै बतलावैगा, भूखा प्यासा फिरै भटकता कित भोजन खावैगा, सुपने मै भी दीखूं ना जब फेटया चाहवैगा, जिसक कूख तै जन्म लिया वा मेरी भी माई।। मतना छोड़ै रूप मनै तेरी गैल डूब तिर लूंगा, पिछले जन्म के करे कर्म का आपै दंड भर लूंगा, इन महलां तै आछा तै मैं जंगल में फिर लूंगा, तेरे बिना जी लागै कोन्या रो रो कै मर लूंगा, इतणी कहकै मेहर सिंह नै नीची नाड़ झुकाई।। दोनो भाई जंगल की तरफ चल पड़ते हैं। चलते चलते गहरे जंगल में पहुँच जाते हैं। रात हो जाती है। दोनों भाई एक पेड़ के निचे रात गुजारने की सोचते है। दोनों भाई काफी दूर पैदल चलने से थके हुए थे तो सो जाते है। भगवान की करनी बसंत को सर्प डस लेता है। जब रूप की आँख खुलती है तो भाई की हालत देखकर बहुत व्याकुल हो जाता है। और क्या कहता है- भाई रै मेरा क्युकर पेटा भरज्या, तूं जींवता कोन्या एकला छोड़ गया।। किसी गहरी निंद्रा सोवै, बैठया जड़ में भाई रोवै, टोहवै एक बै नाड़ी मिलज्या, क्यूं बोलता कोन्या मुंह मोड़ गया।। हे मालिक के जतन बणा लूं, किस ढालां मैं तनै जवालूं, ठालुं जै मेरी पेश चलज्या, मुंह खोलता कोन्या के कर मरोड़ गया।। होणी नै किसे घर घाले, हे ईश्वर तू मनै भी ठाले, काले नाग मनै भी डसज्या, यो सोंवता कोन्या दम तोड़ गया।। जाट मेहर सिंह बिना कोए ना हिमाती, पाट पाट आवै मेरी छाती, बाती का जै तेल सपड़ज्या, भेद खोलता कोन्या तजकै खोड़ गया।। रूप कवर बहुत बिलख बिलख कर रोता है। एक बात के द्वारा अपना दुःख प्रकट करता है- इस जिंदगी में तेरी पैड़ां नै मूधा पड़ पड़ टोऊं। मां के जाये बोल एकबै तेरी जड़ में बैठा रोऊं।। देख बसंत तेरा भाई रोवै तेरा गोडां मै सर धरकै, हे भगवान तेरै के थ्यागा म्हारी रे रे माटी करकै, जीवण का ना मरण का छोडया पटक दिया सर धरकै, न्यूं तै मैं भी जाण गया इब पैंडा छूटैगा मरकै, मनै दुनिया ताने दिया करैगी किस किस तै श्यान ल्हकोऊं।। क्युकर सब्र मेरै आज्या हम आये थे बतलाकै, मनै एकला छोड़ डिगरग्या कालर बीच बठाकै, ओर तै सब कुछ मिलज्या सै तम देख लियो अजमाकै, एक माँ का जाया पावै कोन्या देखो खूब लखाकै, पणमेसर की करणी आगै झूठे झगड़े झोऊं।। बड्डा रहग्या छोटा मरग्या दुख था तकदीर में, चालण की ना आसंग रहरी जान ना शरीर में, तेरी गैल्यां मरणा चाहूं सू मां के जाये बीर मैं, पैसा धेला पास नहीं कित तै ल्याऊं चीर मैं, बणखंड़ के म्हां तेरी गैल्यां अपणे जी नै खोऊं।। इसी कसूती चोट लागगी ना जाती विपता काटी, झूठे ताने सुण सुण कै झाल गई ना डाटी, सन 37 में भरती होग्या तकदीर राम नै छांटी, जाट मेहर सिंह तेरे भाग नै खूब पीट दी माटी, मनै बेकूप बतावण लागे के मैं वृथा थूक बिलोऊं।। काफी रोने धोने के बाद रूप कंवर अपने भाई बसंत के क्रिया कर्म की सोचता है। पैसा धेला उसके पास नहीं था। कही से चिर का प्रबंध करने के लिए बसंत को जंगल में अकेला छोड़कर शहर की तरफ निकल पड़ता है और अपने मन में क्या सोचता है- भाई आळी भुजा टूटगी यो नक्शा कती भीड़ा रहग्या। चीर लेण नै रूप चाल दिया जंगल मै बसंत पड़या रहग्या।। चाल पड़या नस नस नै टोहकै, मन में विचार करण लग्या रोकै, मनै भाई खो दिया आप तै सोकै , यो सर पै पाप घड़ा रहग्या।। मेरी किस्मत पड़कै सोगी, मेरे राह मै कांटे बोगी, मेरे लेखै जग परलै होगी, यो भाई का भाग बड़ा रहग्या।। सिर पै चढ़री सै करडाई, तेरे बिना के दे था दिखाई, तू मरगाया मेरी कोनाया आई, मेरा पाछला कर्म अड़ा रहग्या।। दर्द होया करै जिसकै लागै, मौत तै कोए क्युकर भागै, मेहर सिंह गुरू लख्मी चदं के आगै, जोड़े हाथ खड़ा रहग्या।। रूप कंवर चलता चलता एक शहर के पास पहुँच जाता है। उसको एक आदमी रास्ते में मिल जाता है। वह उसको परेशानी में देखकर पूछता है कि भाई तू कोंन है? और इतना परेशान क्यों है? तो रूपकंवर उसको जवाब देता है- मैं सूं दुखिया लाचार मेरा ना ठोड़ ठिकाणा सै। मनै कुछ भी जाण नहीं यो देश बिराणा सै।। हम घर तै मिल कै चाले,नादान उम्र के बाले, सारा दिन चलते चलते पायां में पड़गे छाले, उडै ना थे शाल दुशाले,ना नर्म बिछाणा सै।। होग्या घोर अंधेरा,करया धरती ऊपर डेरा, एक बड़ के पेड़ के नीचै हमनै कर लिया रैन बसेरा, होणी नै घाल्या घेरा,उड़ै के पीणा खाणा सै।। दिन लिकड़या पीली पाटी, झाल गई ना दुख की डाटी, छोटा था ओ बसंत मेरे तै उसकी होई पड़ी थी माटी, मेरै होगी गात उचाटी इब के जीणा जाणा सै।। था मां का जाया बीर, मेरी फूट गई तकदीर, उसके क्रियाकर्म की खातर आड़ै आग्या मांगण चीर, मेहर सिंह लग्या कालजै तीर तेरा लय सुर का गाणा सै।। जब रूप कंवर शहर के दरवाजे पर पहुँच जाता है तो सामने से एक अर्थी आती दिखाई देती है। उस सहर के राजा की इच्छा थी कि जब भी वह मरे उसकी अर्थी के आगे जो भी बाहर का आदमी पहले आये उसको ही राजा बना देना। रूप कंवर को उस नगरी का राजा बना दिया जाता है। उधर एक कुम्हार ओर कुम्हारिन चलते चलते उस जंगल में बसंत के पास पहुँच जाते है। उसकी नीली काया को देखकर अंदाजा लगा लेते है कि इसको कोई सर्प डस गया है। इसको शहर में ले चले। हो सकता हैकि कोई वैद्य इसको ठीक करदे। दोनो आपस में क्या कहते है- उस माणस नै कूण मार दे जिसका खुद भगवान रूखाला हो। इस बालक नै ले चालैंगे साजन मतना करिये टाला हो।। काम करण की नहीं घड़ी सै, इसके सर पै मौत खड़ी सै, इसकी काया लीली होई पड़ी सै, इसकै लड़ग्या विषयर काला हो।। क्युकर डाटूं ममता की लहर नै, इसनै भी ले चालो शहर नै, कोए गारडू दे काट जहर नै, ना इसके जी का गाला हो।। आज करांगे हम योहे धंधा, ईश्वर नै दिया म्हारे तै बंदा, तनै मरती बरियां यो दे दे कंधा, तावल करकै इसनै ठाले।। टोटा रह ना धर्म करण में, सुख मिलता ईश्वर की शरण में, जाट मेहर सिंह छंद धरण में, पूरै मकड़ी केसा जाला हो।। बसंत ठीक हो जाता है। कुम्हारी कुम्हार को उसे अपने साथ ले चलने के लिए बोलती है- चालै नै ले चालै नै तू इसनै भी साथ। जंगल म्हां तै ठाकै लाये संटगी खुभात।। लिखी कर्म की रखे टलै ना, बिन बाती के जोत जलै ना, मालिक बिना किसे तै झलै ना,भ्रगु आली लात।। सारे दुख नै मैं ठा लूंगी, इसनै छाती कै ला लूंगी, इसनै गोद बैठा लूंगी,मैं करकै नै पंचायत।। इसनै जब हम ब्या हावैंगे, सारे मिलकै रगं लावैंगे, मेरे भाई भात भरण आवैंगे,न्योत आऊंगी भात।। जाट मेहर सिंह म्हारा सै रूखाली, इब रही ना किसे की काली, अपणे घर की कुंजी ताली,करदां इसके हाथ।। दोनो बसन्त को घर ले जाते है। एक वैद्य उसके जहर को काट देता है। और बसंत ठीक हो जाता है। इस बात का पता शहर के दरोगा को लग जाता है कि कुम्हार और कुम्हारी एक लड़का कही से ले कर आये है। दरोगा बसंत को डरा धमका कर कैद में डाल देता है। जब दरोगा बसंत को पीटता है तो बसंत क्या कहता है- मतना मारै मेरै दरोगा खोट ना करया।। ओ माणस ना घटता बल तै, जो कदे बात करै ना छल तै, यो मनुष्य जन्म मिलता मुश्किल तै,क्यूं पाप में भरा।। मतना डोर पाप की ताणै, उसके घर की कोए ना जाणै, बिन जौहरी के कोण पिछाणै,खोटा सै अक खरा।। गरीब आदमी नै पड़ै कमाणा, धंधा करकै टुकड़ा खाणा, ना चाहिये था गरीब सताणा,के दोष सै मेरा।। एकदम इसी बीजली पड़गी, मेरे सर पै करड़ाई चढ़गी, जाट मेहर सिंह जिनकी नीत बिगड़गी,वो पार ना तरा।। दरोगा बसंत को गुलाम बनाकर एक सौदागर के साथ जहाज पर भेज देता है। बसंत सौदागर के पास नौकरी करने लगता है। सौदागर का जहाज भी उसी शहर में पहुँच जाता है। जिस शहर में चंद्रा का स्वयंवर रचा हुआ था। तो सौदागर क्या कहता है- उस चंद्रा के रचे स्वयंवर मै,किसी होरी जय जयकार, सजा सारा दरबार सै।। जयकारां की गंजू उठरी, आनंद सारी प्रजा लूटरी, खुशबू छूटरी अंबर में,सुणरी सै झंकार, गावैं गीत मल्हार सै।। अनहद साज सुणाई देरे, सारे शहर में पटरे बेरे, फिर सै भतेरे लंगर में,उडै कर रे भोजन त्यार, किसी ऊठरी महकार सै।। सोच कै न्यूं आ रहे छत्रधारी, वा चंद्रा बणज्या दिल की प्यारी, जणूं कोए पुजारी मदंर में,न्यूं कर रहा सै इंतजार, ना आया कोए साहूकार सै।। बसंत तू भी चालण की त्यारी करले, उस चंद्रा का देख स्वयंवर ले, धीरज धर ले अंदर में,गुरू लख्मीचदं जिम्मेवार, मेहर सिंह ताबेदार सै।। सौदागर ओर बसंत दोनो चंद्रा के स्वंयवर में पहुँच जाते है। सारा दरबार सजा हुआ था। दूर दूर से राजा व्यापारी स्वयंवर में पहुँचे हुए थे। चंद्रा कु कुछ सहेलिया इक्कठी होकर चंद्रा के पास जाती है और क्या कहती है- गमु सुम हो क्यूं बैठी चंद्रा चाल ऊठ खड़ी होले। घरां बाप कै उमर कटै ना जोड़ी का वर टोहले।। चंद्रा तेरे ब्याह की सुणकै हम भरगी घणी उमंग में, पहलम तै तू बालक थी इब हुई दूसरे ढ़ंग में, ओड़ सवासण आच्छी लागै जब चलै पति के संग में, भोली भोली सूरत नै ले रंग बालम के रंग में, बल और रूप जवानी नै बता आप तै कूण ल्हकोले।। चढ़ी जवानी साल सतरहवां क्युकर होज्या टाला, तू कचिया गोभ फूटरी चाहिये माली सीचण आला, फूल गुलाबी खिल रहया तनै चाहिये धणी रूखाला, तेरे पिता नै रचा स्वयंवर करया धन माया का गाला, तू राजा की लड़की सै किसे राजकंवर नै मोहले।। सुथरा बांका छैल छबीला करकै गौर टोह लिए, मीन मेख कुछ रह ना जा तू लाकै जोर टोह लिए, रूपवान गुणवान सजीला तू चादंचकौर टोह लिए, सारी दुनिया करै सहराना बण का मोर टोह लिए, जोड़ी जोगम जोग मिली न्यूं सारै पड़ज्यां रोले।। ऊपर तै तू नखरा कररी सै भीतरला चाह में, हम भी मौज मनावैंगी सुण छोरी तेरे ब्याह में, दूर दूर तै राजा आहरे भरकै घणे उम्हा में, उडै़ जाट मेहर सिंह पावैगा जै आज्या तेरी निंगाह में, उसकै माला घाल दिये तेरे हो ज्यांगे दिन सोले।। बसंत ओर सौदागर भी चंद्रा के स्वयंवर में पहुँचे हुए थे। जब चंद्रा अपनी जोड़ी का वर ढूंढने सभा में पहुँचती है तो उसकी नजर बसंत पर पड़ती है। तो चंद्रा को बसंत के साथ अपनी जोड़ी ठीक लगती है तो वह बसंत की तरफ माला डालने चलती है तो बसंत क्या कहता है- मानज्या कहे की चंद्रा मतना रोपै चाला। मैं सूं निर्धन कंगाल मेरै मत घालिए माला।। एक बणिये का नौकर सूं सुण खोल बतादूं सारी मैं, मेरी गैल्यां ब्याह करवाकै पडै़ मुश्बित भारी में, जिंदगी भर दुख पावै चंद्रा मुझ कंगले की यारी में, मत टेकै पैर बिमारी में,तू करज्या टाला।। तनै पलंग निवारी चाहिएगा मेरै घर की खाट नहीं सै, सुक्के टीकड़ पड़ैं चाबणे उड़ै हलवा चाट नहीं सै, राजा कै तनै भोग लिये इसे रहणे ठाट नहीं सै, पेट भरण की बाट नहीं सै,जान का गाला।। बग्गी घोड़े टमटम कोन्या पैदल जाणा पड़ ज्यागा, तरकारी घी दूध दही बिन लूखा खाणा पड़ ज्यागा, तला बावड़ी पावै कोन्या चलुआं न्हाणा पड़ ज्यागा, मनै बाहर भी जाणा पड़ ज्यागा घाल दे लाला।। ध्यान लगाकै सुणले चंद्रा इसमै कती निचोड़ सै, मैं दो धेल्ले में भी सस्ता सूं तू लाल नौ करोड़ सै, जाट मेहर सिंह गैल्यां तेरा मिलता कोन्या जोड़ सै, यो सब बातां का तोड़ सै,तू खाडं मैं राला।। बसंत चंद्रा को समझाता है लेकिन चंद्रा फिर भी नहीं मानती। वह उस पर मोहित होकर उस को अपना सब कुछ मान लेती है। और बसंत को क्या समझाती है- तेरे चरणां की दासी रहणै नै मेरा जी भटकै सै। मतना नाटै भीतरले मै शान तेरी खटकै सै।। शान देखकै पागल होगी मेरे जी नै खाड़ा करया तनै, तोडूं नजर टूटती कोन्या के मंत्र झाड़ा करया तनै, ब्याह करवावण नै नाटया यो कती पवाड़ा करया तनै, चंद्रा बहु बणै तेरी बता मन क्यूं माड़ा करया तनै, सबका काम गिरड़ज्या सै बता किसका के अटकै सै।। नक सक का आच्छा सै कितणी सुथरी श्यान सै, तेरी जोड़ी का और दूसरा ना जवान सै, जोड़ी जोगम जोग मिलै मेरा तेरा ठीक मिजान सै, पां धोकै पी लूं तेरे मेरा तूं हे भगवान सै, भोली मोहनी सूरत तेरी जान मेरी झटकै सै।। पति के कारण सावित्री गई धर्म राज के धोरै, पति के कारण बिकी मदनावत कांशी के गोरै, पति के कारण दमयंती रहगी थी कालर कोरै, कोन्या बसकी बात तृष्णा पापण चित नै चोरे, मन पापी भी नहीं मानता ठा ठा कै पटकै सै।। अपणे मन की सारी कहदी घाली घाट नहीं सै, टोटा नफा कर्म का हो सै कुछ भी छांट नहीं सै, न्यूं तै दुनिया फिरै भतेरी इब और का बाट नहीं सै, दासी बणकै चंद्रा रहले मुल्की लाठ नहीं सै, जाट मेहर सिंह क्यूं डररया बता कूण तनै हटकै सै।। बसंत चन्द्रा को आगे समझाता है- कर्महीन मै दुखियारा सु तू स साहूकार गुजारे की मेरे तै ना चोट झीलै, तू छिड़री नाग पिटारे की।। तू तै हूर मेनका सी हो री, मै तेरे लायक छैल नहीं मेरे रै गात में धूल जमी सै, तेरे रै गात में मैल नहीं हाथी घोड़े अर्थ पालकी, मेरे टूटी सी बैल नहीं म्हारे बाग बगीचे महल नहीं, तू खा री हवा चुबारे की।। मै नोकर बन के करू रै गुजारा, मेरे थारे जैसे नवाबी ना मै टुकड़े का मोहताज रहू सु, थारे जैसी रकाबी ना मेरे दुख में काया काली होरी, मै थारे जैसा गुलाबी ना मेरे कोई भाई अर भाभी ना, तू मर्गा किसे लगांरे की।। तेरे भोजन की सौ सौ चाकी, तू सत पकवान खावै सै मेरे कपड़े झीरम झिर बावली, तू तै नए नए रोज शिमावै सै मखमल आले बिछे गलीचे, तने खद्दर नहीं सुहावै सै मेरे गात म्य बदबू आवै सै, तू खिल री फूल हजारे की।। मै काला अक्षर भैंस बराबर, तू पढ़ी लिखी घणी चंगी सै मने गादड तै भी डर लागै, तू तेग दुधारी नंगी सै जाट मेहर सिंह होई क्यों बावली, यो छोरा सत्संगी सै तू सौ सुर की सारंगी सै, मै तार नहीं एकतारे की।। इतनी बात दोनो तरफ से होने के बाद भी दोनो अपनी अपनी बात पर अड़े रहते है। आगे दोनो की बात इस उपरांतली की रागनी में- ब्होत घणी दुख पावै चंद्रा इस कंगले गैल्यां जाकै। जोड़ी का वर चाहिये मनै के करणा लूट मचा कै।। कुछ भी ख्याल करया कोन्या मैं करता फिरूं गुलामी, साचा माणस वो हो सै जो कहदे सबके स्याहमी, कंगले गैल्यां ब्याह करवाया सब काढंगे खामी, अपनी जोट मिलावण में के हो सै बदनामी, आसंग टूट तेरी जागी मेरी गैल्यां धक्के खाकै।। तन में शीलक हो ज्यागी तेरी सेवा का फल पाकै।। अपणे पां पै आप कहवाड़ी चंद्रा मतना मारै, जो छतरी हो छतरापण के धरम नै ना कदे हारै, लाचारी पर्वत तै भारी तान्या तै मतना सारै, अपणा धर्म निंभाऊंगी चाहे घर हो मतना थारै, के थ्या ज्यागा अपणे गल में फांसी आप घलाकै , जै मालिक की याहे राजी तै मैं देखूंगी आजमाकै।। जै तेरी समझ में आगी हो तै इब्बी टाला करदे, नहीं उल्हाणा तनै तेरे सर कोण बुराई धरदे, जाण बूझ कै फोड़ै सै मत उखल में सरदे, ब्याह शादी बिन किसनै सरज्या तू मेरा पेटा भरदे, मैं आधीन पराया सूणले नौकर सूं बाणीया कै। सीता की ज्यूं फिर लूंगी तेरी गैल्यां दुखडा ठाकै।। इसी कसूती जिद ला ली तनै फेर पडै पछताणा, अपणे बोये आप काटल्यूं कोन्या तनै उल्हाणा, मेरे बसकी बात नहीं तेरा चाल गया धिंगताणा, उस ईश्वर की दया हुई मिलग्या बालम स्याणा, जाट मेहर सिंह चपु होग्या उनै बीती आप बताकै, माला घाल दई चंद्रा नै अपणा मन समझाकै।। चंद्रा बसंत के गले में वर माला डाल देती है। बसंत और सौदागर चंद्रा को लेकर आ जाते है। अगले दिन जहाज रवाना हो जाता है। चंद्रा का रूप देखकर सौदागर के मन में बेईमानी छा जाती है। जब जहाज गहरे समुन्द्र में पहुँच जाता है तो सौदागर बसंत को समुन्द्र में धकेल देता है। चंद्रा को बता देता ह के बसंत समुन्द्र में गिर कर मर गया। और तुझे अपनी जिंदगी अब मेरे साथ बितानी होगी। इस पर सौदागर क्या कहता है- तेरे भले की कहरया चंद्रा रौवै मतना। उस बसंत के बहम में जिंदगी खौवै मतना।। ओर किसे का दोष नहीं सै कर्मां का लहणा, चोट कर्म की उक्कै ना,सै दुनिया का कहणा, मूर्ख की गैल्यां जिंदगी मै पड़ज्या सै दुख सहणा, वो बसंत डूबग्या ईब तनै मेरी गैल्यां रहणा, राजी होकै बोल मेरे तै,छोहवै मतना।। फूल से खिले मुखड़े पै छारी सै उदासी, सूजा लई रो रो कै मोटी आँख डला सी, सुख हो ज्यागा मान लिए मेरी बात जरासी, मेरी सठाणी बणज्या तू,तेरी टहल करैंगी दासी, नादानी में डले बोझ के ढोवै मतना।। रजं फिकर में उड़री लाली तेरे चेहरे की, तालीम करैंगे नौकर चाकर हुक्म तेरे की, न्यारी न्यारी दासी लादयूं शाम सवेरे की, एक दो बै बूझ लिये तूं मन मेरे की, इस चादं तै चकोरी दूर होवै मतना।। सेठपणे की धजा मेरी चोगरदै फरकै, उरे सी नै हो ले मतना दूर दूर सरकै, मेरा मन भी राजी होज्या लाड़ तेरे करकै, पड़ै कसूती झाल जगर में लड़या जावै ना तरकै, भूलज्या मेहर सिंह नै तू टोहवै मतना।। इतनी बात सुनकर चंद्रा सौदागर की बात का जवाब देती है- चोर जार ठग छलिया कपटी का बता ईमान के। दर्शन करणा चाहती ना तुझ बेईमान के।। सौदागर तनै बदी करण में छोड़ी कसर नहीं सै, बिन धणी समझ कै चर ले सुनी पसर नहीं सै, मेरे तै समझावण का तेरा कुछ भी बिसर नहीं सै, मैं पतिव्रता नारी सू तनै इतणी खबर नहीं सै, जो धोखे तै बात करै बता वो इंसान के।। तू न्यूं जाणै जात बीर की,मैं बिलकुल नहीं डरूंगी, पतिव्रता सूं अपणे धर्म की आपै रूखाल करूंगी, जो फेरयां पै वचन भरे मैं उनतै नहीं फिरूंगी, जै मेरी पार बसाई ना तै गल नै काट मरूंगी, काग की गेल हंसणी का बता मिजान के।। बेईमान तेरै कीडे पडियो तकता नार पराई, धर्म का रस्ता छोड़ दिया ली पकड़ पाप की राही, इस दुनिया में कितै बहम की मिलती नहीं दवाई, तू बहु बणाणा चाहवै सै मैं समझूं सूं तनै भाई, साला ओर बहणोईया हो बता एक समान के।। घर की आड़ देहल हो सै न्यूं दुनिया कहती आई, खेत की आड़ होया करै डोल सीम की हो सै खाई, बीर की आड़ पति हो सै या साची बात बताई, जाट मेहर सिंह छंद धरण की होया करै चतुराई, वृथा में यूं मुंह बावै बता बिन सुर तान के।। बसंत डूबता नहीं वह किसी प्रकार किनारे पर पहुँच जाता है। भगवान की ऐसी माया की वह उसी शहर में पहुँच जाता है जहाँ पर वो सौदागर उस चंद्रा को छोड़कर गया। चलते चलते वह अपने दिल में क्या विचार करता है- चंद्रा प्यारी भोली भाली क्युकर उतरै दिल तै री मैं लूट लिया घणे छल तै धगंताणे तै ब्याह करवाया मेरी एक ना मानी उस सौदागर अन्याई नै मेरी गैल करी बेईमानी जणु जंगल में दमयंती राणी अलग पाटगी नल तै।। बीच समंद्र जा पहोंचे जब ईसा बहाना टोहया सौदागर नै बाहर बुला मैं जल के बीच डूबोया इस दुख का बोझा ना जागा ढोया मैं बिलकुल घटग्या बल तै।। उस माणस का के जीणा जिसकी बणकै हवा बिगड़ ज्या, हे मालिक कितै सुणता हो तै मेरा फैसला कर ज्या, इससे आछा जी तै मर ज्या,मेरा शीश उतर जा गल तै।। खाणा पीणा छूटग्या मेरा होया पागल आला ढंग मनैं खूब घूम कै देख लिए इस दुनिया के रंग उस चंद्रा के बिना जाट मेहर सिंह जीवणा मुश्किल तै।। बसंत घूमता घूमता उसी शहर में एक मालिन के पास पहुँच जाता है। जब मालिन ने उस की परेशानी का कारण पूछा तो बसंत मालिन को क्या जवाब देता है- मत बूझै मेरे मन की ताई मैं पड़या मुसीबत भारी में। दुख देखे सुख भोग्या कोन्या आ कै दुनियादारी में।। बालक से की मां मरगी कुछ ना खेल्या खाया, बड्डा भाई रूप कंवर था खुद मेरी मां का जाया कुछ दिन पाछै मेरे पिता नै दुजा ब्याह करवाया उस मौसी नै कुछ ना सोची मोटा जुल्म कमाया, वा रूप कंवर पै मोहित होगी फंसकै इश्क बीमारी में।। उस बैरण की पेश चालगी म्हारा मोह लिया बाप बहकै, हम दोनूं घर तै काढ़ दिए उसनै झूठी तोहमद लाकै, होणी नै हम कती लूट लिए जंगल बीच सवा कै, दोनूं न्यारे पाट गए मैं बैठ गया गम खाकै, दुख सुख के म्हां साझी होज्यां ना था किस्मत म्हारी में।। जब मेरी आंख खुली धौरे ना मित्र यार था, लाल कहै थी मनै कुम्हारी बेटा कहै कुम्हार था, बेटे की ज्यूं लाड़ करैं उनका सच्चा प्यार था, धंगताणे तै रोक लिया जुल्मी थाणेदार था, सौदागर की गैल घाल दिया फंसग्या करडी लाचारी में।। ब्याह करवावण का मनसूबा मेरै बिलकुल ना था दिल में, उस चंद्रा नै धंगताणे तै मेरै माला घाली गल में, सौदागर की नीत बदलगी मैं ठाकै फैंक्या जल में, इस तै बत्ती के दुख होगा म्हारा खेल बिगड़ग्या पल में, यो जाट मेहर सिंह धोखा खा आज पड़या शरण थारी में।। बसंत मालिन को कहता है अगर उसे चंद्रा नहीं मिली तो वह अपनी जान खो देगा। क्योकी वह चंद्रा की सोच में पागल से हो जाता है। उसको स्वपन में भी चंद्रा दिखाई देती है। तो मालिन बसंत को समझाती है और क्या कहती है- मर्दां कै क्यूं बट्टा लावै मरकै नै बिन आई। कहया मान ले मेरा बेटा इसमें तेरी भलाई।। माँ तै ऊंचा नाता हो सै बेटा सुण ताई का, तेरे सिर तै भी उतरैगा चक्कर करड़ाई का, भेद पट ज्यागा ब्याही का टुक करले गात समाई।। जिसका कोए हमाती ना उसकी दया राम ले, कोन्या पार बसावै तै अकल तै काम ले, बोलते नै थाम ले थारी हो ज्यागी मिलाई।। वो रावण भी लेग्या था उस सीता माँ नै ठाकै, कोन्या धर्म डुबोया उसकी लंकापुरी मै जाकै, फेर भी झूठी तोहमंद लाकै करी बणां की राही।। तेरे बहम मै रो रो कै वा जिंदगी नै खोवैगी, तेरै उचाटी लागरी वा के सुख तै सोवैगी, जाट मेहर सिंह तनै टोहवैगी जै उसकी पार बसाई।। बसंत आगे क्या कहता है- आज रोऊं टक्कर मार, मेरी नहीं बसाई पार, होया सब तरियां लाचार, मेरा रहया ना ठिकाणा।। के बुझैगी ताई री तू दुखिया के मन की, परिंदे के ऊपर पड़गी बिजली घन की, दुखियारे की गैल्यां बण्गी कार बिघन की, होया मैं बेहोश सोधी रही ना तन की, इसमै मेरा नहीं दोस, लिया सब खोस, रहया आत्मा मोस, छुटया पीणा खाणा।। आया ना उसाण मनै उस घड़ी मै, बेईमान नै लुट लिया धोखाधड़ी मै, बणै ना हिम्माती कोये विप्ता पड़ी मै, धौरै नहीं रहया मोती था जो खास लड़ी मै, इब मेरै नहीं हाथ,म्हारा छुटग्या साथ, मेरी खिंड लई जात, होग्या अपणा बिराणा।। बेबस और लाचार होया बेवारस कि ढाला, पणमेसर के आगै जोर किसे का ना चाल्या, बिन सांकल कुंदी के किसा भेड़ दिया ताला, बेईमान नै बेईमानी मै रोप दिया चाला, उसनै घाली कोन्या घाट, मै करा बारा बाट, मेरे छुटे रंग ठाठ, दूं किसतै उल्हाणा।। मेहर सिंह दुख आज काटे तै ना कटता, क्यूकर डाटूं मन डाटे तै ना डटता, क्यूकर मेटूं दुख मेटे तै ना मिटता, आधे अंग की साझी बिन सांटा ना सटता, इसमै मेरा ना कसूर, होगे कोसां दूर, थी वा फेरयां की हूर, होया किसा धंगताणा। बसंत को चंद्रा का बारे में तरह तरह के विचार आते हैं। सोचता है चंद्रा तो कही पर मर चुकी है। तो बसंत अपने मन में क्या सोचता है- मेरे मरण की उस चंद्रा कै पक्की जरली होगी। मेरे बहम में रो रो कैनै तबीयत खारी करली होगी।। उसकै रहगी मन की मन में, न्यारे पाट लिए दस दिन में, वा चंद्रा मेरे बिछड़न में,एकली रहकै डरली होगी। मनै ढूढ़ती जहाज में चौगरदै फिरली होगी।। जिगर के घा नै चंद्रा सेक री, पहलम दुख कदे नहीं देख री, अपणे तन की टूम ठेकरी,उन्है तार तार धरली होगी।। ना सोधी मै गात होगा गहरे दुख में घिरली होगी।। उसके दुख का ना रहै ठिकाणा, छुटग्या होगा पीणा खाणा, सौदागर नै कर धिंगताणा,उसकी कोली भरली होगी।। अपणी बीर बणावण खातर उसपै टेक नजर ली होगी।। उतरया ना था महैंदी का रगं, होणी नै किसा कर दिया ढंग, जब पाया कोन्या होगा मेहर सिंह,जहाज पै क्युकर सरली होगी।। अलबत तै वा मेरी सोच मै हब्का खाकै मरली होगी।। रागनी 29 दरवाजे प खड़ी पालकी बैठ के ताई साथ चली दरबारा में पहुँचे प्यादे रूप बसन्त की बात चली (टेक) खड़गपुरी में खड़गसेन थे राजा छत्रधारी रूप बसन्त दो बेटे उनकी रूपवती थी नारी कर्मा करके रूपवती के लागी इसी बीमारी राजा पास बुलाके उसने कही हकीकत सारी दोनु बालक रोवते रहगे छोड़के उनकी मात चाली कुछ दिन पाछे समो बदल ज्या सै ईश्वर की माया भरे वचन भूल गया राजा बीर दूसरी लाया उस मौसी ने रूपकंवर त इश्क कमाना चाहा जूठे साचें एलम लाक़े घर त बाहर कड़वाया बेटे की त कुछ ना बुझी उस रानी की हिमात चली बसन्त रोवता गेल्या हो लिया करके ने धींगताणा घर त बाहर लिकडे पाछे उनका ना था ठोड़ ठिकाणा प्राण सुखगे मरे भूखे प्यासे ना था पीना खाणा रात हुई एक बड़ के निचे पड़ग्या डेरा लाणा के बेरा था या नुए बणजयागी बीत या दुख की रात चली रूप उठके देखन लागा जाणु पड़ग्या पहाड़ टूटकै लिली काया हुई पड़ी कोई विषयर गया लूटकै रोया दे किलकारी अपने सर ने कूट कूटकै मा के जाए भाई कहदे एक ब मने उठकै होश रहा ना रूपकंवर की बह आंख्या त बरसात चली चिर लेण ने रूप चाल दिया उज्जैन शहर की राही दरवाजे पै पहुँचा आती अर्थी दई दिखाई यो म्हारा राजा रहा आज त नुए कह रे लोग लुगाई प्रजा आगे रूपकंवर ने बीती आप बताई ओ रूपकंवर त राजा होगा बिगड़ बसन्त की हालात चली नो मण लकड़ी चंदन की हो चिर रेशमी लाओ सवा मण घी और सामग्री का हवन यघ करवाओ छोटा भाई बसन्त मेरा उसकी किर्याक्रम कराओ चील काग कदे चोंच मार ज्या तावल करके जाओ उस थानेदार ने जा दाबा उस राजा की ना औकात चली उसी घड़ी में माटी खोदन गये मर्द ओर बीर उडे तावल करके काड लिया उहका हलता देख शरीर उडे रिश्ता नाता कोन्या था पर होगया सांझा सीर उडे पूत समझ के राख लिया उहकी बदल गयी तकदीर उडे राज करणीये बालक की फेर माटी गेल खूभात चली वो है बालक दिखे मन में ली शाल दरोगा ने बिना खोट के वो पकड़ कैद में दिया डाल दरोगा ने उडे भी वो ना छोड़ा उस चंडाल दरोगा ने गुलाम बणा सौदागर गेल्या दिया घाल दरोगा ने इस तै आगे बसन्त कंवर पै बनिये की करामात चली बसन्त सभा में चला गया उडे जा थी दुनिया सारी कुर्सी मुंडा पै सज धज के बैठे छत्रधारी सखियां गेल्या चंद्रा घूमे अपनी जोट मिलारी बसन्त के माला घाल दई उसने बहुत करि इन्कारी दरबारा में वो चंद्रा उस पकड़ बसन्त का हाथ चली सौदागर ने कूच बोल दिया बांध पाप का पाला आधी मंजल पहुँच गये जब ओड़ रोप दिया चाला धका दे गेरा पाणी में था भितरले में काला वो दुख सुख पा के बाहर लिकडगया सबका राम रुखाला उसके भितरले में दुख से बण भिरगू आली लात चली दुख पाता वो फिरे एकला उस चंद्रा ने टोहवे सै कोई हिमाती कोन्या उसका भाग पड़ा सोवे सै याद कर वो उस चंद्रा ने कई कई बै रोवे सै खाना पीना छोड़ दिया वो जिंदगी ने खोवे सै ना पाई वा चंद्रा तै उस उतर बसन्त की जात चली का मानस की कद्र होया करे जिसका कूडा ठाडा जाण बुझ आप ओट लिया गर्मी सर्दी जाड़ा सारा कुनबा छो में आवे कदे ना चाला आडा फ़ौज ने जाना ना चाहूं था पर इस गाने ने काडा कहे जाट मेहर सिंह मित्र प्यार त छूट तेरी मुलाकात चली रागणी 30 परवाने मै लिख्या बसंत नै धोखा मेरी गेल होगा दया करी म्हारै ऊपर हर नै फेर दोबारा मेल होगा पहलम तै मेरी राम राम ले झूठ कती बोलूं ना धर्म का दर्जा भीतर ले में घाट कती तोलूं ना कोन्या सब्र आवै जब तक तनै टोहल्यूं ना को दिन सुक्का गया नहीं तनै याद करूँ रोल्यूं ना एक मिनट भी लागी कोन्या यो आंख मिचाई खेल होगा। सौदागर नै जुल्म करै घणी खोट कार करी सै म्हारी गैल्यां दगा करया उसकी पाप में नीत भरी सै धक्का दे कै जल में गेरया धोखा सरासरी सै नाव पाप की डूबैगी या कदे ना पार तरी सै लिकड़न का नहीं कोऐ रास्ता बिना पकड़ के जेल होगा ।। जै मेरी पार बसावै हे तै के न्यारा पाटूं था सौ सौ मण की झाल उठती मुश्किल तै डाटूं था तेरे बिना इस जिंदगी के दिन रो रो कै काटूं था आधीनी तै करूँ गुजारा तनै शादी नै नाटूं था मणी लाल की हेराफेरी घी की जघां तेल होगा ।। मेरे मात पिता तै ऊंचा नाता लिए जाण ताई का जिऊं इतणै भूलूं कोन्या करया शान ताई का परवाने में लिख दयूं सूं लिए कहा मान ताई का कती खोल दयूं या जिंदगी सै दिया दान ताई का कह जाट मेहर सिंह जो धर्म छोड़दे वो पास नहीं फैल होगा ।। रागणी 31 परवाना पढ आनंद होगे या आई रूत पै मल्हार लागी। पैर पकड़ कै छोडऐ कोन्या चेहरे पै उनिहार लागी।। दुख बिछड़ण का खारया था बोलता काल घणा पारया था फूल गुलाबी मुर झारया था,ईब पाणी की फुहार लागी कद के बिछड़े फेर मिलगे न्यूं मन में करण विचार लागी।। बालम तै बिछड़न में घणी फंसरी थी उलझन में उस मालिक का अपणे मन में,करण वा शुक्र गुजार लागी । कद की करणी आगै आज्या बुरी कर्मां की मार लागी।। मालिक सबके कार सारता भव तै बेड़ा पार तारता पीया जी का करूँ आरता वा हटकै करण सिंगार लागी तार तार के धर राखी थी पहरण गुठी हार लागी । दूणे शेल चूभो दें तंग कै गडया नहीं करती सै नंग कै बालकपण में मेहर सिंह कै गावण की फटकार लागी । जाट जाम कोए गाईयो मतना आछी कोन्या कार लागी।।

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