किस्सा हरनन्दी का भात : फौजी मेहर सिंह (हरियाणवी कविता)

Kissa Harnandi Ka Bhaat : Fauji Mehar Singh (Haryanvi Poetry)


ग्यारा करोड़ की ग्यारा धजा थी फरकैं करैं थी चुबारै रै तनैं जब क्यूं ना भात भराया मन्शा ईब क्यूं बोली मारै रै।टेक हरनन्दी थी जेठी बेटी सेठाणी नै जाई थी भागमल पिता मरण लग्या जब माया भी बंटवाई थी तेतीस करोड़ नकद रोकड़ा भाईयां नै गिणवाई थी मनशाराम इब गलत टेम पै तनैं कति शर्म ना आई थी मेरी बदनामी का ढोल बाजज्या जाण पाटज्या सारै रै। कृष्ण जी का सेवक बणकै बहोत घणा पछताया था गंगा जी पै न्हाण गया तनैं छलिया रूप दिखाया था ब्राह्मणं बणं कै दक्षिणा मांगै मांग मांगने आया था मैं नाट गया जब कृष्ण जी बहोत घणा छौह म्हं आया था मेरी मस्क बांध चिता म्हं धरदी क्यूं हाथ पसारै रै। भगत जगत का बैर दुनिया म्हं प्रजा कहती आवै सै तूं समधी होकै ईज्जत तारै ईब मनैं क्यू आजमावै सै सोने चांदी के लिख कै पत्र मेरे धारै भिजवावै सै मेरा अन्त टेम मांग कै खाता क्यूं मेरी बेइज्जती करवावै सै तूं कितका रिश्तेदार बण्या जब आब सग्यां की तारै रै। कृष्ण जी के कहणे तै सब माया धर्म म्हं लाई थी गंगा जी पै न्हाण गया उड़ै गैल सेठाणी आई थी कृष्ण जी नै रूप बदल कै सेठां की रजत अजमाई थी मेहर सिंह कहै या करनी नौकरी लिखी कर्म मैं पाई थी हरी करैंगे तो भात भरैंगे आके तेरे द्वारै रै। सेठ ताराचन्द सुती छोड़ दई सेठाणी बिस्तर पर तै हुया खड़्या हे भगवान भरोसै तेरै छोड़ बहू नैं चाल पड़्या।टेक चन्द्रगुप्त पूत जण कै मां बणी चोरटी हत्यारी मां बापां तैं हुअया अलैहदा हे मालिक तेरी गत न्यारी हापुड़ के म्हां करणी होगी मंशा की ताबेदारी ओर किसे का दोष नहीं मेरे रूस गये खुद गिरधारी क्युकर ठाऊं उठता कोन्या यो हरिचन्द आला जबर घड़ा। क्युकर छोडूं ना छोड़ी जाती सब तरियां लाचार बण्या ओढ़ पहर सिंगर रही गौरी इस गौरी का भरतार बण्या न्हाणा धोणा सब छूटग्या इसे बख्त बेकार बण्या उस ईश्वर की मेहर फिरी जब मेरा-तेरा प्यार बण्या दोनूं आंख बांध ब्याही थी राही म्हं दिया गाड़ छड़ा। जितनी जीन्स तेरे पिता की तार जहाज तैं तलै धरी बेरा ना कुण खसम बणैगा धन की नई सन्दूक भरी ओढ़ पहर सिंगर रही गौरी सिर पै चमकै चीर जरी मैं मुलजिम सूं धर्मराज कै माफी दे दिये मनैं परी तोते की गलती म्हं देख्या यो काबुल का अंगूर सड़्या सुती उठ सजन टोहवैगी रोवैगी अखियां खोल परी टापू म्ळं ना जहाज दिखै कूण पटावै तोल परी केसरी कैसी ढेरी मेरी लुटज्यागी बेमोल परी मेहर सिंह कै आगै प्रेम की साच्ची बाणी बोल परी दिल्ली के म्हं जाता दिखै यो ताराचन्द का नाश खड़्या। गजना बणी बणी का सब कोए साथी ना बिगड़ी का यार होसै मरते गेल्यां कौण मरै से यो जिंवते जी का प्यार हो सै।टेक एक राजा कै चार पूत थे मैं था सबतैं छोटा पिता बोल्या खाओ किसकै कर्म का अन्न प्राणी लोटा मैं बोल्या खां आपणे कर्म का नफा रहो चाहे टोटा इतणी सुण कै मेरे पिता नै लिख्या बारा साल दसोटा वो तो सारा कुणबा नजर बदलग्या मतलब का संसार हो सै। फेर पांच सात दिन मंजिल काट कै मैं गजपुर कै म्हं आग्या बियाबान मैं फिरूं भरमता बच्चा था घबराग्या एक बुढ़ा सा मणयार आणकै मनैं पुचकारण लाग्या बेटा करकै घरां ले आया उस बुढ़ीया कै मन भाग्या ईब थारे शहर म्हं करण लागग्या जो मणियारे की कार होसै। चूड़ी बेचण चाल पड़्या चाल पड़्या मैं सर पै गाठड़ी ठाकै थोड़ी सी दूर मणियार छोड़ग्या आच्छी तरहां समझाकै राजमहल की ऊंची पैड़ी रूक्का मार्या जाकै उस गजना नै बांदी भेज दी लेगी मनैं बुलाकै रूप देख कै पागल होग्या प्रेम घणां लाचार हो सै। दुःख सुख तै रहण लागगे ना आपण भेद छिपाया हंस मुखी नै जा चुगली खाई अपणा पिता सीखाया यूं बोली तेरी गजना दे नै मणियारा पति बणाया मैं भेज संतरी कैदी कर लिया राजा नै पास बुलाया फांसी का मेरा हुक्म दिया जित लग्या हुअया दरबार हो सै। हाथ हथकड़ी पायां म्हं बेड़ी तौंक गले म्हं जड़कै उस राजमहल के आगे कै लेज्यां थे जल्लाद पकड़ कै झांकी के म्हं गजना बेठी न्यूं बोली बाहर लकड़ कै फांसी के तख्ते पै खड़ी मोहताज मिलूंगी तड़कै कहै मेहर सिंह मरती बरियां बी ना आई के इन बीरां का एतबार हो सै।

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