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यार जुलाहे गुलज़ार
Yaar Julahe Gulzar
मुझको भी तरकीब सिखा कोई, यार जुलाहे
शहतूत की शाख़ पे
मुझसे इक नज़्म का वादा है
देखो आहिस्ता चलो
वो जो शायर था
अलाव
वक़्त
अभी न पर्दा गिराओ
बस्ता फ़ेंक के
गोल फूला हुआ
किताबें
ये गोल सिक्के
सुबह से शाम हुई
फ़सादात
लिबास
दिल ढूँढता है
चार तिनके उठा के
ख़ुदा
चाँदघर
भमीरी
हमदम
मैं कायनात में
सितारे लटके हुए हैं
आदमी बुलबुला है
आज फिर चाँद की पेशानी से
मर्सिया
आँसू
समय
ईंधन
खेत के सब्ज़े में
दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म
इस मोड़ से जाते हैं
ग़ालिब
कंधे झुक जाते हैं
एक और दिन
विरासत