श्रीकृष्ण बाल-माधुरी : भक्त सूरदास जी
Shri Krishna Bal-Madhuri : Bhakt Surdas Ji
76. जसोदा, तेरौ चिरजीवहु गोपाल
जसोदा, तेरौ चिरजीवहु गोपाल ।
बेगि बढ़ै बल सहित बिरध लट, महरि मनोहर बाल ॥
उपजि परयौ सिसु कर्म-पुन्य-फल, समुद-सीप ज्यौं लाल ।
सब गोकुल कौ प्रान-जीवन-धन, बैरिन कौ उर-साल ॥
सूर कितौ सुख पावत लोचन, निरखत घुटुरुनि चाल ।
झारत रज लागे मेरी अँखियनि रोग-दोष-जंजाल ॥
राग धनाश्री
77. मैं मोही तेरैं लाल री
मैं मोही तेरैं लाल री ।
निपट निकट ह्वै कै तुम निरखौ, सुंदर नैन बिसाल री ॥
चंचल दृग अंचल पट दुति छबि, झलकत चहुँ दिसि झाल री ।
मनु सेवाल कमल पर अरुझे, भँवत भ्रमर भ्रम-चाल री ॥
मुक्ता-बिद्रुम-नील-पीत--मनि, लटकत लटकन भाल री ।
मानौ सुक्र-भौम-सनि-गुरु मिलि, ससि कैं बीच रसाल री ॥
उपमा बरनि न जाइ सखी री, सुंदर मदन-गोपाल री ।
सूर स्याम के ऊपर वारै तन-मन-धन ब्रजबाल री ॥
78. कल बल कै हरि आरि परे
कल बल कै हरि आरि परे ।
नव रँग बिमल नवीन जलधि पर, मानहुँ द्वै ससि आनि अरे ॥
जे गिरि कमठ सुरासुर सर्पहिं धरत न मन मैं नैंकु डरे ।
ते भुज भूषन-भार परत कर गोपिनि के आधार धरे ॥
सूर स्याम दधि-भाजन-भीतर निरखत मुख मुख तैं न टरे ।
बिबि चंद्रमा मनौ मथि काढ़े, बिहँसनि मनहुँ प्रकास करे ॥
राग बिलावल
79. जब दधि-मथनी टेकि अरै
जब दधि-मथनी टेकि अरै ।
आरि करत मटुकी गहि मोहन, वासुकि संभु डरै ॥
मंदर डरत, सिंधु पुनि काँपत, फिरि जनि मथन करै ।
प्रलय होइ जनि गहौं मथानी, प्रभु मरजाद टरै ॥
सुर अरु असुर ठाढ़ै सब चितवत, नैननि नीर ढरै ।
सूरदास मन मुग्ध जसोदा, मुख दधि-बिंदु परै ॥
80. जब दधि-रिपु हाथ लियौ
जब दधि-रिपु हाथ लियौ ।
खगपति-अरि डर, असुरनि-संका, बासर-पति आनंद कियौ ॥
बिदुखि-सिंधु सकुचत, सिव सोचत, गरलादिक किमि जात पियौ ?
अति अनुराग संग कमला-तन, प्रफुलित अँग न समात हियौ ।
एकनि दुख, एकनि सुख उपजत, ऐसौ कौन बिनोद कियौ ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे गहत ही एक-एक तैं होत बियौ ॥
राग बिलावल
81. जब मोहन कर गही मथानी
जब मोहन कर गही मथानी ।
परसत कर दधि-माट, नेति, चित उदधि, सैल, बासुकि भय मानी ॥
कबहुँक तीनि पैग भुव मापत, कबहुँक देहरि उलँघि न जानी !
कबहुँक सुर-मुनि ध्यान न पावत, कबहुँ खिलावति नंद की रानी !
कबहुँक अमर-खीर नहिं भावत, कबहुँक दधि-माखन रुचि मानी ।
सूरदास प्रभु की यह लीला, परति न महिमा सेष बखानी ॥
राग धनाश्री
82. नंद जू के बारे कान्ह, छाँड़ि दै मथनियाँ
नंद जू के बारे कान्ह, छाँड़ि दै मथनियाँ ।
बार-बार कहति मातु जसुमति नँदरनियाँ ॥
नैकु रहौ माखन देउँ मेरे प्रान-धनियाँ ।
आरि जनि करौ, बलि-बलि जाउँ हौं निधनियाँ ॥
जाकौ ध्यान धरैं सबै, सुर-नर-मुनि जनियाँ ।
ताकौ नँदरानी मुख चूमै लिए कनियाँ ॥
सेष सहस आनन गुन गावत नहिं बनियाँ ।
सूर स्याम देखि सबै भूली गोप-धनियाँ ॥
राग बिलावल
83. जसुमति दधि मथन करति
जसुमति दधि मथन करति, बैठे बर धाम अजिर,
ठाढ़ै हरि हँसत नान्हि दँतियनि छबि छाजै ।
चितवत चित लै चुराइ, सोभा बरनि न जाइ,
मनु मुनि-मन-हरन-काज मोहिनी दल साजै ॥
जननि कहति नाचौ तुम, दैहौं नवनीत मोहन,
रुनक-झुनक चलत पाइ, नूपुर-धुनि बाजै ।
गावत गुन सूरदास, बढ्यौ जस भुव-अकास,
नाचत त्रैलोकनाथ माखन के काजै ॥
84. आनँद सौं, दधि मथति जसोदा
(एरी) आनँद सौं, दधि मथति जसोदा, घमकि मथनियाँ घूमै ।
निरतत लाल ललित मोहन, पग परत अटपटे भू मैं ॥
चारु चखौड़ा पर कुंचित कच, छबि मुक्ता ताहू मैं ।
मनु मकरंद-बिंदु लै मधुकर, सुत प्यावन हित झूमै ॥
बोलत स्याम तोतरी बतियाँ, हँसि-हँसि दतियाँ दूमै ।
सूरदास वारी छबि ऊपर, जननि कमल-मुख चूमै ॥
राग आसावरी
85. त्यौं-त्यौं मोहन नाचै ज्यौं-ज्यौं रई
त्यौं-त्यौं मोहन नाचै ज्यौं-ज्यौं रई-घमरकौ होइ (री) ।
तैसियै किंकिनि-धुनि पग-नूपुर, सहज मिले सुर दोइ (री)॥
कंचन कौ कठुला मनि-मोतिनि, बिच बघनहँ रह्यौ पोइ (री)।
देखत बनै, कहत नहिं आवै, उपमा कौं नहिं कोइ (री)॥
निरखि-निरखि मुख नंद-सुवन कौ, सुर-नर आनँद होइ (री)।
सूर भवन कौ तिमिर नसायौ, बलि गइ जननि जसोइ (री)॥
राग-बिलावल
86. प्रात समय दधि मथति जसोदा
प्रात समय दधि मथति जसोदा,
अति सुख कमल-नयन-गुन गावति ।
अतिहिं मधुर गति, कंठ सुघर अति,
नंद-सुवन चित हितहि करावति ॥
नील बसन तनु, सजल जलद मनु,
दामिनि बिवि भुज-दंड चलावति ।
चंद्र-बदन लट लटकि छबीली,
मनहुँ अमृत रस ब्यालि चुरावति ॥
गोरस मथत नाद इक उपजत,
किंकिनि-धुनि सनि स्रवन रमावति ।
सूर स्याम अँचरा धरि ठाढ़े,
काम कसौटी कसि दिखरावति ॥
87. गोद खिलावति कान्ह सुनी
गोद खिलावति कान्ह सुनी, बड़भागिनि हो नँदरानी ।
आनँद की निधि मुख जु लाल कौ, छबि नहिं जाति बखानी ॥
गुन अपार बिस्तार परत नहिं कहि निगमागम-बानी ।
सूरदास प्रभु कौं लिए जसुमति,चितै-चितै मुसुकानी ॥
राग कान्हरौ
88. कहन लागे मोहन मैया-मैया
कहन लागे मोहन मैया-मैया ॥
नंद महर सौं बाबा-बाबा, अरु हलधर सौं भैया ॥
ऊँचे चड़ी-चढ़ि कहति जसोदा, लै लै नाम कन्हैया ।
दूरि खेलन जनि जाहु लला रे, मारैगी काहु की गैया ॥
गोपी-व्वाल करत कौतूहल, घर-घर बजति बधैया ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ, चरननि की बलि जैया ॥
राग देवगंधार
89. माखन खात हँसत किलकत हरि
माखन खात हँसत किलकत हरि, पकरि स्वच्छ घट देख्यौ ।
निज प्रतिबिंब निरखि रिस मानत, जानत आन परेख्यौ ॥
मन मैं माख करत, कछु बोलत, नंद बबा पै आयौ ।
वा घट मैं काहू कै लरिका, मेरौ माखन खायौ ॥
महर कंठ लावत, मुख पोंछत चूमत तिहि ठाँ आयौ ।
हिरदै दिए लख्यौ वा सुत कौं, तातैं अधिक रिसायौ ॥
कह्यौ जाइ जसुमति सौं ततछन, मैं जननी सुत तेरौ ।
आजु नंद सुत और कियौ, कछु कियौ न आदर मेरौ ॥
जसुमति बाल-बिनोद जानि जिय, उहीं ठौर लै आई ।
दोउ कर पकरि डुलावन लागी, घट मैं नहिं छबि पाई ॥
कुँवर हँस्यौ आनंद-प्रेम बस, सुख पायौ नँदरानी ।
सूर प्रभू की अद्भुत लीला जिन जानी तिन जानी ॥
राग बिलावल
90. बेद-कमल-मुख परसति जननी
बेद-कमल-मुख परसति जननी, अंक लिए सुत रति करि स्याम ।
परम सुभग जु अरुन कोमल-रुचि, आनन्दित मनु पूरन-काम ॥
आलंबित जु पृष्ठ बल सुंदर परसपरहि चितवत हरि-राम ।
झाँकि-उझकि बिहँसत दोऊ सुत, प्रेम-मगन भइ इकटक जाम ॥
देखि सरूप न रही कछू सुधि, तोरे तबहिं कंठ तैं दाम ।
सूरदास प्रभु-सिसु-लीला-रस, आवहु देखि नंद सुख-धाम ॥
राग आसावरी
91. सोभा मेरे स्यामहि पै सोहै
सोभा मेरे स्यामहि पै सोहै ।
बलि-बलि जाउँ छबीले मुख की, या उपमा कौं को है ॥
या छबि की पटतर दीबे कौं सुकबि कहा टकटोहै ?
देखत अंग-अंग प्रति बालक, कोटि मदन-मन छोहै ॥
ससि-गन गारि रच्यौ बिधि आनन, बाँके नैननि जोहै ।
ससि -गन गारि रच्यौ बिधि आनन, बाँके नैननि जोहै ॥
सूर स्याम-सुंदरता निरखत, मुनि-जन कौ मन मोहै ॥
राग गौरी
92. बाल गुपाल ! खेलौ मेरे तात
बाल गुपाल ! खेलौ मेरे तात ।
बलि-बलि जाउँ मुखारबिंदकी, अमिय-बचन बोलौ तुतरात ॥
दुहुँ कर माट गह्यौ नँदनंदन, छिटकि बूँद-दधि परत अघात ।
मानौ गज-मुक्ता मरकत पर , सोभित सुभग साँवरे गात ॥
जननी पै माँगत जग-जीवन, दै माखन-रोटी उठि प्रात ।
लोटत सूर स्याम पुहुमी पर, चारि पदारथ जाकैं हाथ ॥
राग सारंग
93. पलना झूलौ मेरे लाल पियारे
पलना झूलौ मेरे लाल पियारे ।
सुसकनि की वारी हौं बलि-बलि, हठ न करहु तुम नंद-दुलारे ॥
काजर हाथ भरौ जनि मोहन ह्वै हैं नैना रतनारे ।
सिर कुलही, पग पहिरि पैजनी, तहाँ जाहु नंद बबा रे ॥
देखत यह बिनोद धरनीधर, मात पिता बलभद्र ददा रे ।
सुर-नर-मुनि कौतूहल भूले, देखत सूर सबै जु कहा रे ॥
राग बिलावल
94. क्रीड़त प्रात समय दोउ बीर
क्रीड़त प्रात समय दोउ बीर ।
माखन माँगत, बात न मानत, झँखत जसोदा-जननी तीर ॥
जननी मधि, सनमुख संकर्षन कैंचत कान्ह खस्यो सिर-चीर ।
मनहुँ सरस्वति संग उभय दुज, कल मराल अरु नील कँठीर ॥
सुंदर स्याम गही कबरी कर, मुक्त-माल गही बलबीर ।
सूरज भष लैबे अप-अपनौ, मानहुँ लेत निबेरे सीर ॥
95. कनक-कटोरा प्रातहीं
कनक-कटोरा प्रातहीं, दधि घृत सु मिठाई ।
खेलत खात गिरावहीं, झगरत दोउ भाई ॥
अरस-परस चुटिया गहैं, बरजति है माई ।
महा ढीठ मानैं नहीं, कछु लहुर-बड़ाई ॥
हँसि कै बोली रोहिनी, जसुमति मुसुकाई ।
जगन्नाथ धरनीधरहिं, सूरज बलि जाई ॥
96. गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी
गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी ।
माखन सहित देहि मेरी मैया, सुपक सुकोमल रोटी ॥
कत हौ आरि करत मेरे मोहन, तुम आँगन मैं लोटी?
जो चाहौ सो लेहु तुरतहीं, छाँड़ौ यह मति खोटी ॥
करि मनुहारि कलेऊ दीन्हौ, मुख चुपर्यौ अरु चोटी ।
सूरदास कौ ठाकुर ठाढ़ौ, हाथ लकुटिया छोटी ॥
97. हरि-कर राजत माखन-रोटी
हरि-कर राजत माखन-रोटी ।
मनु बारिज ससि बैर जानि जिय, गह्यौ सुधा ससुधौटी ॥
मेली सजि मुख-अंबुज भीतर, उपजी उपमा मोटी ।
मनु बराह भूधर सह पुहुमी धरी दसन की कोटी ॥
नगन गात मुसकात तात ढिग, नृत्य करत गहि चोटी ।
सूरज प्रभु की लहै जु जूठनि, लारनि ललित लपोटी ॥
98. दोउ भैया मैया पै माँगत
दोउ भैया मैया पै माँगत, दै री मैया, माखन रोटी ।
सुनत भावती बात सुतनि की, झूठहिं धाम के काम अगोटी ॥
बल जू गह्यौ नासिका-मोती, कान्ह कुँवर गहि दृढ़ करि चोटी ।
मानौ हंस-मोर भष लीन्हें, कबि उपमा बरनै कछु छोटी ॥
यह छबि देखि नंद-मन-आनँद, अति सुख हँसत जात हैं लोटी ।
सूरदास मन मुदित जसोदा, भाग बड़े, कर्मनि की मोटी ॥
99. तनक दै री माइ, माखन
तनक दै री माइ, माखन तनक दै री माइ ।
तनक कर पर तनक रोटी, मागत चरन चलाइ ॥
कनक-भू पर रतन रेखा, नेति पकर्यौ धाइ ।
कँप्यौ गिरि अरु सेष संक्यौ, उदधि चल्यौ अकुलाइ ।
तनक मुख की तनक बतियाँ, बोलत हैं तुतराइ ।
जसोमति के प्रान-जीवन, उर लियौ लपटाइ ॥
मेरे मन कौ तनक मोहन, लागु मोहि बलाइ ।
स्याम सुंदर नँद-कुँवर पर, सूर बलि-बलि जाइ ॥
राग आसावरी
100. नैकु रहौ, माखन द्यौं तुम कौं
नैकु रहौ, माखन द्यौं तुम कौं ।
ठाढ़ी मथति जननि आतुर, लौनी नंद-सुवन कौं ॥
मैं बलि जाउँ स्याम-घन-सुंदर, भूख लगी तुम्हैं भारी ।
बात कहूँ की बूझति स्यामहि, फेर करत महतारी ॥
कहत बात हरि कछू न समुझत, झूठहिं भरत हुँकारी ।
सूरदास प्रभुके गुन तुरतहिं, बिसरि गई नँद-नारी ॥
राग बिलावल