हिंदी कविताएँ : प्रभुदयाल श्रीवास्तव
Hindi Poetry : Prabhudayal Shrivastava
109. भैयाजी को अच्छी लगती
भैयाजी को अच्छी लगती,
पहली की हिंदी पुस्तक।
पहला पाठ खुला तो दिखता,
जन मन गण का गान।
भैयाजी को हो जाता है,
देश प्रेम का भान।
पाठ दूसरा खुला तो होती,
क ख ग घ की दस्तक।
आगे के पाठों पर होती,
ख़ास फलों की मार।
इमली दिखती आम लटकते,
दिखते लाल अनार।
पन्ना जब आगे पलटा तो,
दिखते कार मेट्रो रथ।
अंतिम पन्नों पर दिख जाते,
सूरज तारे चाँद।
उसी पाठ में बने हुए हैं,
आँख नाक और कान।
सबसे नीचे चलता दिखता,
काला एंजिन फक फक फक।
110. भालू की हजामत
बाल हुए जब बड़े-बड़े, बूढ़े भालू चाचा के।
गुस्से के मारे चाची, उनको बोलीं झल्लाके।।
बाल कटाने उंट शाह के, घर क्यों ना जाते हो?
बागड़ बिल्ला बने घूमते-फिरते इतराते हो।।
भालू बोला उंट शाह ने, भाव कर दिए दूने।
साठ टके देने में बेगम, जाते छूट पसीने।।
इतनी ज्यादा मंहगाई है, टके कहाँ से लाऊं?
सोचा इससे है जीवन भर, कभी न बाल कटाऊं।।
नहीं हजामत भालू जी ने, अब तक है बनवाई।
बड़े-बड़े बालों मेंहरदम, रहते भालू भाई।।
111. भालू की दावत
चूहे राजा बहुत जोर से,
भालू पर चिल्लाए।
'मेरी बेटी की शादी है,
गिफ्ट क्यों नहीं लाए?
बिना गिफ्ट के तुमको भोजन,
नहीं मिलेगा भाई।
नहीं देखते कितनी ज्यादा,
बढ़ी हुई महंगाई'।
भालू बोला, 'चूहे राजा,
मत गुस्सा हो भाई।
गिफ्ट बनी है बिल्ली दीदी,
तेरे द्वारे आई।'
ऐसा कहकर भालूजी ने,
डिब्बा एक दिखाया।
म्याऊं-म्याऊं का जिसके भीतर,
से कोमल स्वर आया।
डर के मारे दौड़ लगाकर,
भागे चूहे भाई।
बिना दिए ही गिफ्ट रीछ ने,
दावत खूब उड़ाई।
112. भूल गये मोबाईल
आफिस जाते जाते भालू ,
भूल गये मोबाईल।
मार किसी ने टक्कर उनको,
किया सड़क पर घायल।
कैसे हाय हलो कर पाते,
कैसे हाल बताते।
किसी तरह वापिस घर आये,
रोते और चिल्लाते।
अब तो रस्सी डाल गले में ,
मोबाईल को बांधा।
फिर न भूलेंगे मोबाईल ,
किया सभी से वादा।
113. भालू का रसगुल्ला
भालू चाचा मचा रहे थे,
सुबह सुबह से हल्ला।
शेर चुराकर भाग गया था,
उनका एक रसगुल्ला।
सभी जानवर भाग दौड़कर,
पकड़ शेर को लाये।
मुश्किल से रसगुल्ला,
भालूजी को दिलवा पाये।
हाथ जोड़कर तभी शेर ने,
सबसे मांगी माफी।
”कभी न अब आगे से होगी,
हमसे ये गुस्ताखी।”
”चोरी करना ठीक नहीं है,
सुनलो मेरे भाई।”
शेरसिंह को सभी जानवरों,
ने फटकार लगाई।
114. मछली है रंगीन
देखो मछली है रंगीन
कितनी सुंदर और हसीन।
सोने जैसी चमकीली
लाल गुलाबी और पीली।
पानी में सरसर तैरे
पल में लेती कई फेरे।
आँखें उसकी गोल मटोल
नहीं बोलती मुँह से बोल।
115. मेरी नींद नहीं खुल पाती
मुझको नींद बहुत है आती सुबह-सुबह।
मेरी नींद नहीं खुल पाती सुबह-सुबह।
मम्मी टेर लगातीं उठने-उठने की
पापा की बातों में धमकी पिटने की
दोनों कहते जल्दी शाला जाना है
नल चालू है उठकर शीघ्र नहाना है
पर मुझको तो नींद सुहाती सुबह-सुबह
मेरी नींद नहीं खुल पाती सुबह-सुबह।
मम्मी तो उठ जातीं मुँह अँधियारे में
पापा टहलें सुबह-सुबह गलियारे में
मेरे हाथ हिलाते सिर को सहलाते
दादा-दादी उठो-उठो यह चिल्लाते
आलस आता नींद सताती सुबह-सुबह
मेरी नींद नहीं खुल पाती सुबह-सुबह।
दादा-दादी मुझको यह समझाते हैं
अच्छे लोग सुबह जल्दी उठ जाते हैं
बड़े सबेरे मुरगा बाँग लगाता है
रोज़ नियम से सूर्य उदय हो जाता है
यही बात चिड़िया चिल्लाती सुबह-सुबह
मेरी नींद नहीं खुल पाती सुबह-सुबह।
अब मुझको लगता है कुछ करना होगा
किसी तरह भी सुबह-सुबह उठना होगा
रात देर तक नहीं आज से जागूँगा
टेलीविज़न देखना अब मैं त्यागूँगा
बात समझ में पर न आती सुबह-सुबह
मेरी नींद नहीं खुल पाती सुबह-सुबह।
116. मुट्ठी में है लाल गुलाल
नोमू का मुँह पुता लाल से, सोमू का पीली गुलाल से।
कुर्ता भीगा राम रतन का, रम्मी के हैं गीले बाल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।
चुनियाँ को मुनियाँ ने पकड़ा,नीला रंग गालों पर चुपड़ा।
इतना रगड़ा ज़ोर ज़ोर से, फूल गये हैं दोनों गाल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।
सल्लू पीला रंग ले आया,कल्लू भी डिब्बा भर लाया।
रंग लगाया एक दूजे को, लड़े भिड़े थे परकी साल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।
कुछ के हाथों में पिचकारी, भरी बाल्टी रंग से भारी।
रंग बिरंगे सबके कपड़े, रंग रंगीले सबके भाल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।
इंद्र धनुष धरती पर उतरा, रँगा, रंग से कतरा कतरा।
नाच रहें हैं सब मस्ती में,बहुत मज़ा आया इस साल।
मुट्ठी में है लाल गुलाल।
117. मुन्नी बोली ही ही ही ही
मुन्ने ने मुन्नी का बस्ता।
छीन लिया है चलते रस्ता।
मुन्नी जोरों से चिल्लाई।
भीड़ इकट्ठी होकर आई।
सबने मुन्ने को समझाया।
मुन्नी का बस्ता दिलवाया।
मुन्ने बोले सारी दीदी।
मुन्नी बोली ही ही ही ही।
118. मत करना मनमानी
हाथी दादा थे जंगल में,सबसे वृद्ध सयाने,
डरे नहीं वे कभी किसी से, किए काम मनमाने।
आया मन तो सूंड़ बढ़ाकर,ऊंचा पेड़ गिराया,
जिस पर चढ़ा हुआ था बंदर, नीचे गिरकर आया।
कभी सूंड़ में पानी भरकर, दर्जी पर फुर्राते,
मुझको दे दो शर्ट पजामे, हुक्म रोज फरमाते।
तब पशुओं ने शेर शाह से, कर दी लिखित शिकायत,
शेर शाह ने आनन-फानन, बुलवाई पंचायत।
पंचायत ने किया फैसला, करता जो मनमानी,
बंद करेंगे पांच साल तक, उसका हुक्का पानी।
माफी माँगी तब हाथी ने, लिखकर किया निवेदन,
आगे अब ना होगी गलती, करता हूँ ऐसा प्रण।
तुमसे भी कहते हैं बच्चों, मत करना मनमानी,
बंद तुम्हारा कर देंगे हम, वरना हुक्का पानी।
119. मन को भा जानेवाले दिन
याद मुझे अक्सर आ जाते, आने,दो आने वाले दिन।
दूध मलाई गरम जलेबी, और रबड़ी खाने वाले दिन।।
तीस रुपये में मझले काका, दिल्ली तक होकर आ जाते।
एक रुपये में ताजा खाना, होटल में छककर खा आते।।
बिन कुंडी के बाथ रूम में, बेसुर में गानेवाले दिन।
याद मुझे अक्सर आ जाते, आने दो आने वाले दिन।।
नाई काका बाल बनाने, पेटी लेकर घर आ जाते।
दो रुपये में एक सैकड़ा, चाचा हरे सिंगाड़े लाते।।
जेब खर्च के लिये पिता से, दो पैसे पाने वाले दिन।
याद मुझे अक्सर आ जाते, आने दो आने वाले दिन।।
गब्बर बैल जुती गाड़ी में, भेरों के मेले में जाना।
फुलकी,गरम कचौड़ी, बर्फी, किसी हाथ ठेले पर खाना।।
हँसते गाते, धूम मचाते, मन को भा जाने वाले दिन।
याद मुझे अक्सर आ जाते, आने दो आने वाले ।।
120. मुन्ना बोला
मैंने सपने में देखा है,तुम दिल्ली जानेवाले हो।
किसी बड़े होटल में जाकर,रसगुल्ले खाने वाले हो।
मैंने सपने में देखा है भ्रष्टाचार समापन पर है।
झूठी बातें हवा हो गई,सच्चाई सिंहासन पर है।
मैंने सपने में देखा है,लल्लूजी फिर फेल हॊ गये।
सुबह सुबह ओले बरसे हैं, बाहर रेलम ठेल हॊ गये।
मैंने सपने में देखा है,मुन्नी की मम्मी आई है।
चाकलेट के पूरे पेकिट,अपने साथ पांच लाई है।
मैंने सपने में देखा है, तुमने डुबकी एक लगाई।
सबसे बोला चलो नहा लें,नदी आज खुद घर पर आई।
मैंने सपने में देखा है तुम मेले में घूम रहे हो।
अच्छे अच्छे फुग्गे लेकर, बड़े मजे से चूम रहे हो।
मैंने सपने मॆं देखा है, तुम बल्ले से खेल रहे हो।
चौके वाली गेंद दौड़कर, कूद कूद कर झेल रहे हो।
मुन्ना बोला पर दादाजी,सपने तो झूठे होते हैं।
हम बच्चों को चाकलेट और ,बिस्कुट ही बस सुख देते हैं।
चलकर कल्लू की दुकान से,चाकलेट बिस्कुट दिलवा दो।
दिन में जो सपने देखे हैं ,पलकों पर सॆ उन्हें हटा दो।
121. माल खाऒ
चुहिया रानी रोज बनाती,
लौकी की तरकारी।
कहती है इसके खाने से,
दूर हटे बीमारी।
पर चूहे को बीमारों का,
भोजन नहीं सुहाता।
कुतर कुतर कर आलू गोभी,
बड़े प्रेम से खाता।
उल्टी सीधी सीख जमाने,
की ना उसको भाती।
झूठ कभी ना बोला करता,
सच्ची बात सुहाती।
बजा बजा डुगडुगी रोज वह,
लोगों को बुलवाता।
बड़े प्रेम से यही बात फिर,
सबको ही समझाता।
बढिया भोजन करने से ही,
हटती हर लाचारी।
माल खाओ और मस्त रहो,
कहती दुनिया दारी।
122. मोबाईल का आर्डर
सुबह ‘चार’ पर मुर्गे उठकर,
हर दिन बाँग लगाते थे।
सोने वाले इंसानों को,
“उठो उठो “चिल्लाते थे।
किंतु आजकल भोर हुये,
आवाज़ नहीं ये आती है।
लगता है कि अब मुर्गों की,
नींद नहीं खुल पाती है।
मुर्गों के घर चलकर उनको,
हम मोबाईल दे आयें।
और अलार्म है, कैसे भरना,
उनको समझाकर आयें।
चार बजे का लगा अलार्म,
मुर्गे जब उठ जायेंगे।
कुकड़ूं कूं की बांग लगेगी,
तो हम भी जग जायेंगे।
मुन्नूजी ने इसी बात पर,
पी. ए.को बुलवाया है।
दस हज़ार मोबाईल लेने,
का आर्डर करवाया है।
123. मेंढक मामा
क्यों न सच्ची बात बताते।
मेंढक मामा क्यों टर्राते।
डबरों में पानी कम है तो,
बादल को क्यों नहीं बुलाते?
यदि नहीं बरसा पानी तो
नगर पालिका क्यों न जाते
एक टेंकर पानी भरकर,
क्यों अपने घर नहीं ले आते?
124. महिने में पंद्रह इतवार
महिने में कम से कम आएं
हे भगवन पंद्रह इतवार ।
पता नहीं क्यों सात दिनों में ,
बस इतवार एक आता ।
छ: दिन का बहुमूल्य समय तो ,
शाळा में ही धुल। जाता ।
ऐसे में कैसे चल पाये ,
खेल कूद का कारोबार ।
शाळा एक दिवस लग जाए ,
दिवस दूसरे छुट्टी हो।
रोज रोज पढ़ने लिखने से,
कैसे भी हो कुट्टी हो ।
एक -एक दिन छोड़ हमेशा ,
हम छुट्टी से हों दो चार ।
पढ़ना लिखना बहुत जरूरी ,
बात सभी ने मानी है ।
खेल कूद भी है आवश्यक ,
कहते ज्ञानी ध्यानी हैं ।
खेल कूद से ही तो बनता ,
सच में स्वस्थ सुखी परिवार ।
पढ़ें एक दिन ,खेल एक दिन,
यह विचार कितना अच्छा ,
इस विचार से झूम उठेगा ,
इस दुनियां का हर बच्चा ।
बच्चों का भी कहना मानों ,
बच्चों का ही तो संसार ।
125. योगाभ्यास
सुबह सुबह उठकर करो
प्रतिदिन योगाभ्यास
दिनभर फिर न रहेगा
मन और चित्त उदास।
होना कभी निराश मत
निस दिन करो प्रयास
तुम्हें मिलेगी सफलता
रखो आत्म विश्वास।
126. रस भरे आम
रस भरे आम कितने मीठे।
पत्तों के नीचे लटके हैं।
आँखों में कैसे खटके हैं.
इन चिकने सुंदर आमों पर,
पीले रंग कैसे चटके हैं।
सब आने जाने वालों का,
यह पेड़ ध्यान बरबस खींचे।
रस भरे आम कितने मीठे।
मिल जाएँ आम यह बहुत कठिन।
पहरे का लठ बोले ठन-ठन।
रखवाला मूँछों वाला है,
मारेगा डंडे दस गिन-गिन।
सपने में ही हम चूस रहे,
बस खड़े खड़े आँखें मीचे।
रस भरे आम कितने मीठे।
पापा के ठाठ निराले थे।
बचपन के दिन दिलवाले थे।
उन दिनों पके आमों पर तो,
यूँ कभी न लगते ताले थे।
ख़ुद बाग़वान ही भर देते,
थे उनके आमों से खींसे।
रस भरे आम कितने मीठे।
127. राम कटोरे
सिर पर बस्ता लादे शाला,
जाते राम कटोरे।
मिले आम के पेड़ राह में,
झट उस पर चढ़ जाते।
गदरे गदरे आम तोड़कर,
बस्ते में भर लाते।
ऊधम में तो ग्राम चैम्पियन,
पढ़ने में बस कोरे।
ऊपर लगे पेड़ में ऊँचे,
वहाँ पहुँच न पाते।
लक्ष्य भेदने तब गुलेल से,
पत्थर वे सन्नाते।
बीन बीनकर गिरे हुए फल,
भर लेते हैं बोरे।
ऊमर आम बेचकर उनको,
कुछ पैसे मिल जाते।
निर्धन बच्चों की शाळा में,
फ़ीस पटाकर आते।
रामकटोरे मन के सच्चे,
निर्मल, कोमल भोरे।
जाने कितने राम कटोरे,
दुनियां में रहते हैं।
बिना कहे ही मदद दूसरों,
की करते रहते हैं।
लोग समझते इन लोगों को,
हैं नाकारा छोरे।
128. राखी का त्यौहार
राखियों से गुलजार बजार,
आ गया राखी का त्यौहार।
मिठाई सजी दुकानों में
शॊरगुल गूंजे कानों में
रेशमी धागों की भरमार
राखियों के ढेरों अंबार
कहीं पर बेसन की बरफी
कहीं पर काजू की कतली
कहीं पर रसगुल्लॆ झक झक
कहीं पर लड्डू हुये शुमार।
आ गया राखी का त्यौहार।
कमलिया राखी लाई है
थाल में रखी मिठाई है
साथ में कुमकुम नारियल है
खुशी का पावन हर पल है,
बहन ने रेशम का धागा
भाई के हाथों में बांधा
भाई की आँखों में श्रद्धा
बहन की आँखों मे है प्यार।
आ गया राखी का त्यौहार।
बहन भाई का पावन पर्व,
रहा सदियों से इस पर गर्व
जरा सा रेशम का धागा
बनाता फौलादी नाता
बहन की रक्षा करना धर्म
भाइयों ने समझा यह मर्म
बहुत स्नेहिल पावन है
भाई बहनों का यह संसार।
आ गया राखी का त्यौहार।
129. रोटी का सम्मान
गोल गोल रोटी अलबेली
कितनी प्यारी लगती है
बिना शोरगुल किये बेचारी
गर्म तवे पर सिकती है।
त्याग और बलिदान देखिये
कितना भारी रोटी का
औरों की खातिर जल जाना
उसकी बोटी बोटी का।
बड़े प्यार से थाली में रख
जब हम रोटी खाते हैं
याद कहाँ उसकी कुर्वानी
कभी लोग रख पाते हैं।
इसीलिये जानो समझो
रोटी की राम कहानी को
नमन करो दोनों हाथों से
इस रोटी बलिदानी को।
गेहूं पिसकर आटा बनता
चलनी में चाला जाता
ठूंस ठूंस कर बड़े कनस्तर
पीपे में डाला जाता।
फिर मन चाहा आटा लेकर
थाली में गूंथा जाता
ठोंक पीट की सारी पीढ़ा
वह हँस हँसकर सह जाता।
अब तक जो आटा पुल्लिंग था
वह स्त्री लिंग हो जाता
स्त्रीलिंग बनने पर उसका
लोई नाम रखा जाता।
हाथों से उस लोई पर
कसकर आघात किये जाते
पटे और बेलन के द्वारा
दो दो हाथ किये जाते।
बेली गई गोल रोटी को
गर्म तवा पर रखते हैं
रोटी के अरमान आँच पर
रोते और बिलखते हैं।
कहीं कहीं तो तंदूरों में
सीधे ही झोंकी जाती
सोने जैसी तपकर वह
तंदूरी रोटी कहलाती।
जिस रोटी के बिना आदमी
कुछ दिन भी न रह पाता
उस रोटी को बनवाने में
कहर किस तरह बरपाता।
इसलिये आओ सब मिलकर
रोटी का गुणगान करें
जहाँ मिले रोटी रख माथे
रोटी का सम्मान करें।
130. लौटे घर को गंगाराम
एक साथ करके कई काम,
लौटे घर को गंगाराम।
बैंक गये रुपया निकलाया,
राशन कार्ड जमा करवाया।
बीमा के आफिस में जाकर,
किश्तों का पैसा भरवाया।
करके कई, कई काम तमाम,
लौटे घर को गंगाराम।
जब भी घर से वे जाते हैं,
कई काम करके आते हैं।
राशन हल्दी धनिया मिर्ची,
सब्जी भी लेकर आते हैं।
समय नहीं करते बेकाम,
लौटे घर को गंगाराम।
वे कहते कितनी मँहगाई,
मंहगी है पेट्रोल भराई।
एक बार में सब निपटाकर,
करते ईंधन की भरपाई।
बचते इसी तरह कुछ दाम,
लौटे घर को गंगाराम।
बच्चों को शाला ले जाते,
हुई छुट्टी तो लेने जाते
खेल खेल में शाम ढले तक,
उनका सारा सबक कराते।
बीत रही जीवन की शाम।
घर को लौटे गंगाराम।
131. वही सफलता पाता है
पीपल मेरे पूज्य पिताजी,
तुलसी मेरी माता है।
बरगद को दादा कहने से,
मन पुलकित हो जाता है।
बगिया में जो आम लगा है,
उससे पुश्तैनी नाता।
कहो बुआ खट्टी इमली को,
मजा तब बहुत आता है।
घर में लगा बबूल पुराना,
वह रिश्ते का चाचा है।
“मैं हूँ बेटे मामा तेरा,”
यह कटहल चिल्लाता है।
आंगन में अमरूद लगा है,
मंद मंद मुस्कराता है।
उसे बड़ा भाई कह दो तो,
ढेरों फल टपकाता है।
यह खजूर कितना ऊंचा है,
नहीं काम कुछ आता है।
पर उसको मौसा कह दो ,
मीठे खजूर खिलवाता है।
अब देखो यह गोल मुसंबी,
इसका पेड़ लजाता है।
पर इसका मीठा खट्टा फल,
दादी सा मुस्काता है।
जिन लोगों का पेड़ों से,
घर का रिश्ता हो जाता है।
पेड़ बचाने की मुहीम में,
वही सफलता पाता है।
132. वन्स मोर
कूद कूद मेंढक भैया ने,
कविता एक सुनाई।
टर्र टर्र बस टर्र टर्र की,
ही ध्वनि पड़ी सुनाई।
ग़ुस्से के मारे दर्शक सब,
ज़ोरों से चिल्लाये।
मेंढक भैया गए मंच से,
ताबड़ तोड़ भगाए।
तभी बहन कोयल ने आकर,
हँसकर मंच सँभाला।
शक्कर जैसे पगे कंठ से,
मीठा गीत निकाला।
उसके मीठे शहद सरीखे,
बोल सभी को भाये।
सारे दर्शक ज़ोर ज़ोर से,
वन्स मोर चिल्लाये।
133. व्यर्थ हँसी न उड़वायें
इक दिन घर में बनी योजना,
रसगुल्ले कुछ बनवायें।
फिर बैठक में हुआ फैसला,
कच्चा माल कहां पाएं।
खोवा लल्लू की दुकान से,
शक्कर लाला के घर से।
करें निरीक्षण खुद पापाजी,
माल ठीक से तुलवायें।
थोड़ी सी मेंदा औ काजू,
खुशबू वाले इत्र जरा।
किसी पड़ौसी के घर जाकर,
मम्मीजी खुद ही लायें।
गैस है घर में पानी घर में,
बड़ी कढ़ाई है घर में,
प्रश्न था लेकिन रसगुल्ले अब ,
किसके द्वारा बनवायें।
पापा बोले अखवारों में
विग्यापन हम देते हैं।
रसगूल्लों के सिद्धहस्त को,
अपने घर में बुलवायें।
एक किलो निर्माण कराने,
में कितना खर्चा होगा।
सभी निवेदन करने वाले,
ठीक ठीक से बतलायें।
सुनकर ये बातें मम्मी का,
पारा सौ के पार हुआ।
बोलीं चलते हैं बज़ार में,
चलकर रसगुल्ले लायें।
बात वही अच्छी होती है,
जो यथार्थ में सच्ची हो।
शेख चिल्लियों जैसे बनकर,
व्यर्थ हँसी ना उड़वायें।
134. श्रम करने पर रुपये मिलते
घर में रुपये नहीं हैं पापा,
चलो कहीं से क्रय कर लायें।
सौ रुपये कितने में मिलते,
मंडी चलकर पता लगायें।
यह तो पता करो पापाजी,
पाँच रुपये कितने में आते।
एक रुपये की कीमत क्या है,
क्यों इसका न पता लगाते।
नोट पाँच सौ का लेना हो,
तो हमको क्या करना होगा।
दस का नोट खरीदेंगे तो,
धन कितना व्यय करना होगा।
पापा बोले बाज़ारों में,
रुपये नहीं बिका करते हैं।
रुपये के बल पर दुनिया के,
सब बाज़ार चला करते हैं।
श्रम शक्ति के व्यय करने पर,
रुपये हमको मिल जाते हैं।
कड़े परिश्रम के वृक्षों पर,
रुपये फूलकर फल जाते हैं।
135. सच्चे घर
मुझको दे दो प्यारी अम्मा,
दो दो के दो सिक्के।
उन सिक्कों से बनवाऊँगा,
दो सुंदर घर पक्के।
दो सुंदर घर पक्के अम्मा,
दो सुंदर घर पक्के।
इतने पक्के घुस ना पाएं
उनमें चोर उच्चके।
उनमें चोर उच्चके अम्मा,
उनमें चोर उच्चके।
अगर घुसे तो रह जाएँगे,
वे घर में ही फंस के।
अम्मा बोली दो रुपए में,
ना बनते घर पक्के।
ढेर ढेर रुपए लगते हैं,
तब घर बनते अच्छे।
कड़े परिश्रम के बल्ले से,
मारो चौके छक्के।
पैसा रहे पास में तो ही,
घर बनते हैं सच्चे।
136. सॉरी मत बोलो दादाजी
नाक पकड़ कर बेमतलब मत, सॉरी बोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी अपनी, पोल न खोलो दादाजी।
कान पकड़कर ही तो सॉरी, बोला जाता है हरदम,
किंतु ताज्जुब है दादाजी, अक्ल आपमें इतनी कम।
अब तो कान पकड़ कर सॉरी, सबको बोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी अपनी, पोल न खोलो दादाजी।
नहीं थैंक यू अब तक बोला, कितने काम किए मैंने,
दिन भर घर में घूमा करते, लुंगी एक फटी पहने।
'थैंक्स-थैंक्स' के मधुर शब्द, कानों में घोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी अपनी, पोल न खोलो दादाजी।
जब जाता है कहीं कोई भी, बाय-बाय, टाटा करते।
कभी अचानक मिले कोई तो, उसे हाय हैलो कहते।
नई सभ्यता सीखो अपना, हृदय टटोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी, अपनी पोल न खोलो दादाजी।
137. सूर्य ग्रहण
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ,
मन में कब से लगी लगन है।
आज बताओ हमें गुरुजी,
कैसे होता सूर्य ग्रहण है।
बोले गुरुवर, प्यारे चेले,
तुम्हें पड़ेगा पता लगाना।
तुम्हें ढूँढना है सूरज के,
सभी ग्रहों का ठौर ठिकाना।
ऊपर देखो नील गगन में,
हैं सारे ग्रह दौड़ लगाते।
बिना रुके सूरज के चक्कर
अविरल निश दिन सदा लगाते।
इसी नियम से बंधी धरा है,
सूरज के चक्कर करती है।
अपने उपग्रह चंद्रदेव को,
साथ लिए घूमा करती है।
चंद्रदेव भी धरती माँ के,
लगातार घेरे करते हैं।
धरती अपने पथ चलती है,
वे भी साथ चला करते हैं।
इसी दौड़ में जब भी चंदा,
बीच, धरा सूरज के आता।
चंदा की छाया से सूरज,
हमको ढंका हुआ दिख पाता।
सूरज पर चंदा की छाया,
ही कहलाती सूर्य ग्रहण है।
जरा ठीक से समझोगे तो,
इसे जानना नहीं कठिन है।
138. सच्चा मित्र
झगड़ू बंदर ने रगड़ू,
भालू से हाथ मिलाया।
बोला तुमसे मिलकर तो,
प्रिय बहुत मज़ा है आया।
रगड़ू बोला हाथ मिले,
तो मन भी तो मिल जाते।
अच्छे मित्र वही होते,
जो काम समय पर आते।
कठिन समय पर काम नहीं,
जो कभी मित्र के आता।
मित्र कहां? अवसर वादी,
वह तो गद्दार कहाता।
139. सूरज ऊंगत से उठबो
सूरज निकर परो पूरब सें,
परे परे तुम अब लौ सो रये।
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।
ढोर ढील दये हैं दद्दा ने,
और चराबे तुमखों जाने।
चना चबेना गुड़ के संगे,
बांध दओ है बौ अम्मा ने।
अब तो उठ जा मोरे पुतरा,
कक्का बेजा गुस्सा हो रये।
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।
कलुआ को मोड़ा तो कबको,
बखर हांक कें हारे ले गओ।
बड़े साव की गैया ब्या गई,
उनको मोड़ा तेली दे गओ।
मझले कक्का कबके उठ गये,
कुल्ला करकें गोड़े धो रये।
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।
कल्लो मल्लो मटका लेकें,
नदिया, पानी भरबे जा रईं।
कतकारीं तो सपर सपर कें,
मिलजुर कें पीपर पुजवा रईं।
फूल धरे हैं टोर टोर कें,
मझले भैया माला गो रये।
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।
तेलन फुआ तेल दे गईं हैं
और बरोनी काकी भेड़ा।
पंडितजी ने पूजा कर लई,
दे गये चार भोग के पेड़ा।
दोई गधा पुन्नी मम्मा के,
बड़े भोर सें ईंटें ढो रये।
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।
जल्दी उठबो भौत जरूरी,
कहत रेत हैं जेठे स्याने।
सूरज ऊंगत से उठबो तो,
अच्छो होत स्वास्थ्य के लाने।
आलस करकें काये लल्ला,
तुम अपनी तंदुरुस्ती खो रये।
कुनर मुनर अब काये करत हो,
काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।
140. सूरज भैया
अम्मा बोली सूरज भैया जल्दी से उठ जाओ।
धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।
मुर्गे थककर हार गये हैं, कब से चिल्ला चिल्ला।
निकल घोंसलों से गौरैयां, मचा रहीं हैं हल्ला।।
तारों ने मुँह फेर लिया है, तुम मुंह धोकर जाओ।
धरती के सब लोग सो रहे, जाकर उन्हें उठाओ।।
पूरब के पर्वत की चाहत, तुम्हें गोद में ले लें।
सागर की लहरों की इच्छा, साथ तुम्हारे खेलें।।
शीतल पवन कर रहा कत्थक, धूप गीत तुम गाओ।
धरती के सब लोग सो रहे, जाकर उन्हें उठाओ।।
सूरज मुखी कह रहा” भैया", अब जल्दी से आएं।
देख आपका सुंदर मुखड़ा, हम भी तो खिल जायें।।’
जाओ बेटे जल्दी से जग, के दुख दर्द मिटाओ।
धरती के सब लोग सो रहे, जाकर उन्हें उठाओ।।
नौ दो ग्यारह हुआ अंधेरा, कब से डरकर भागा।
तुमसे भय खाकर ही उसने, राज सिंहासन त्यागा।।
समर क्षेत्र में जाकर दिन पर, अपना रंग जमाओ।
धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।
अंधियारे से क्यों डरना, कैसा उससे घबराना।
जहां उजाला हुआ तो निश्चित, है उसका हट जाना।।
सोलह घोड़ों के रथ चढ़कर, निर्भय हो कर जाओ।
धरती के सब लोग सो रहे जाकर उन्हें उठाओ।।
141. सब ओलंपिक जीत लिये हैं
मम्मी किसको डाले दाने,
चिड़ियों के अब नहीं ठिकाने।
पितृ पक्ष में पापा कहते,
कौये जाने कहां रमाने।
तरस गईं हैं कब से दादी,
नील कंठ के दर्शन पाने।
मुर्गे अब तैयार नहीं हैं,
सुबह सुबह से बांग लगाने।
नहीं दिख रहे अब कठ फोड़े,
कहां चले गये हैं न जाने।
था गरीब का भोजन कोदों,
दुर्लभ हैं अब उसके दाने।
पापा कितने पैदल चलते,
मां से पूछा है दादा ने।
रोटी पर अधिकार जमाया,
चीज़ और वर्गर पिज्जा ने।
सब ओलंपिक जीत लिये हैं,
बेशर्मी और लाज हया ने।
142. सच बतलाना
नहीं कहानी भूतों वाली कहना अम्मा,
ना ही परियों वाला कोई गीत सुनाना।
क्या सचमुच ही चंदा पर रहती है बुढ़िया,
इस बारे में मुझको बिल्कुल सच बतलाना।
कहते हैं सब चंदा पर अब ,
इंसानों के पैर पड़ चुके।
वायुयान ले धरती वाले,
चंदा पर दो बार चढ़ चुके।
चंद्र ग्रहण पर उसको केतु डस लेता है,
यह बातें तो सच में लगतीं हैं बचकाना।
राहू पर भी तो सूरज को,
डसने के आरोप लगे हैं।
सोलह घोड़ों के रथ वाले,
सूरज भी क्या डरे हुये हैं।
दुनियां वाले ढूंढ़ ढूंढ़ राहू को हारे,
लेकिन अब तक नहीं मिला है पता ठिकाना।
घर से बाहर कदम रखे गर,
छींक कभी भी आ जाती है।
अशुभ मानकर अम्मा तब क्यों,
बाहर जाना रुकवाती है।
क्या सच में ही छींक हुआ करती दुखदाई,
किसी वैद्य से मिलकर पक्का पता लगाना।
143. सभी पेश आते इज़्ज़त से
बंदर मामा पहन पाजामा,
नहीँ जा रहे अब स्कूल।
करते रहे अब तलक थे वे,
यूँ ही व्यर्थ भूल पर भूल।
खिसका कभी कमर से था तो,
कभी फटा नादानी में।
फटे पजामे के कारण ही ,
मिली आबरू पानी में।
फटे पाजामा के कारण ही,
हँसी हुई थी शाळा में।
हुई बंदरिया से गुस्ताख़ी,
इस कारण वरमाला में।
अब तो मामा जींस पहनकर,
टाई लगाकर जाते हैं।
जींस बहुत मज़बूत जानकर,
इतराते मस्ताते हैं।
तोड़ दिया सम्बन्ध आजकल,
पूरी तरह पाजामा से।
सभी पेश इज़्ज़त से आते,
अब तो बन्दर मामा से।
144. सूरज चाचा
सूरज चाचा कैसे हो,
क्या पहले के जैसे हो,
बिना दाम के काम नहीं,
क्या तुम भी उनमें से हो?
बोलो बोलो क्या लोगे?
बादल कैसे भेजोगे?
चाचा जल बरसाने का,
कितने पैसे तुम लोगे?
पानी नहीं गिराया है,
बूँद बूँद तरसाया है,
एक टक ऊपर ताक रहे,
बादल को भड़काया है।
चाचा बोले गुस्से में,
अक्ल नहीं बिल्कुल तुममें,
वृक्ष हज़ारों काट रहे,
पर्यावरण बिगाड़ रहे।
ईंधन खूब जलाया है,
ज़हर रोज़ फैलाया है,
धुँआ धुँआ अब मौसम है,
गरमी नहीं हुई कम है।
बादल भी कतराते हैं,
नभ में वे डर जाते हैं,
पर्यावरण सुधारोगे,
तो ढेर ढेर जल पा लोगे।
145. सोच रहा हूँ
सोच रहा हूँ,इस गर्मी में,
चन्दा मामा के घर जाऊँ।
मामा मामी नाना नानी,
सबको कम्प्यूटर सिखलाऊँ।
सोच रहा हूँ पंख खरीदूँ,
उन्हें लगाकर नभ में जाऊँ।
ज़्यादा ताप नहीं फैलाना।
सूरज को समझाकर आऊँ।
सोच रहा हूँ मिलूँ पवन से,
शीतल रहो उन्हें समझाऊँ~।
ज़्यादा ऊधम ठीक नहीँ है,
उसे नीति का पाठ पढ़ाऊँ।
सोच रहा हूँ रूप तितलियों,
का धरकर मैं वन में जाऊँ।
फूल-फूल का मधु चूसकर,
ब्रेक फास्ट के मज़े उड़ाऊँ।
सोच रहा हूँ कोयल बनकर,
बैठ डाल पर बीन बजाऊँ।
कितने लोग दुखी बेचारे,
उनका मन हर्षित करवाऊँ।
सोच रहा हूँ चें-चें चूँ-चूँ,
वाली गौरैया बन जाऊँ।
दादी ने डाले हैं दाने,
चुगकर उन्हें नमन कर आऊँ।
146. हमारी माँ अगर होती
हमारी माँ अगर होती, हमारे साथ में पापा।
न आने दुःख कभी देती, हमारे पास में पापा।
सुबह तो दूध हमको रोज़ ही, हँसकर पिलाती थी।
कभी किशमिश कभी काजू कभी, हलवा खिलाती थी।
अगर होती सुबह से ही, कभी की उठ चुकी होती।
हमें रहने नहीं देती, कभी उपवास में पापा।
हमारे स्वप्न जो होते उन्हें, साकार करती थी।
किसी भी और माता से अधिक, वह प्यार करती थी।
नहीं अब साथ में तो यह, जहां बेकार लगता है।
नहीं अब कुछ बचा बाकी, हमारे पास में पापा।
हमेशा नींद से पहले हमें, लोरी सुनाती थी।
इशारे से कभी चंदा कभी, तारे दिखती थी।
हमें है जब ज़रूरत प्यार के, बदल बरसने की।
पड़ा है किस तरह सूखा, भरी बरसात में पापा।
अकेला छोड़ जाने की मुझे, यूँ क्या ज़रूरत थी।
हमारे साथ रह लेती उसे, तो क्या मुसीबत थी।
हमें लगता किसी ने, यूँ नज़र, हमको लगाई है।
छुपा बैठा हमारे घर, हमारी घात में पापा।
बना दो कुछ नियति ऐसी कभी, माता नहीं छूटे।
ज़माना लाख रूठे पर कभी, माता नहीं रूठे।
हमेशा हाथ ममता का, रहे सर पर दुआओं का।
लगाये टकटकी बैठा, इसी की आस में पापा।
147. हाथी दादा पूजे जाते
सर पर अपने आसमान को,
क्यों हर रोज़ उठाते भैया।
मछली मेंढक से यूँ बोली,
क्यों इतना टर्राते भैया।
मेंढक बोला नियम क़ायदे,
तुम्हें समझ न आते दीदी।
टर्राने वाले ही तो अब,
शीघ्र सफलता पाते दीदी।
नेता जब टर्राता है तो,
मंत्री का पद पा जाता है।
अधिकारी टर्रा कर ही तो,
ऊपर को उठता जाता है।
उछल कूद मेंढक की, मछली,
कहती मुझको नहीं सुहाती।
व्यर्थ कूदने वालों को यह,
दुनियां सिर पर नहीं बिठाती।
हाथी दादा सीधे सादे,
नहीं किसी को कभी सताते।
अपने इन्हीं गुणों के कारण,
अब तक घर घर पूजे जाते।
148. हिसाब किताब
बिल्ली ने चूहे पर फेंकी,
कोरी एक किताब।
बोली इसमें लिखना भैया,
नियमित रोज हिसाब।
कितने चूहे पकड़े मैंने,
कितने किये शिकार।
कितने भागे छूट छूट कर,
मुझसे बारंबार।
चूहा बोला इससे दीदी,
हमें नहीं इंकार।
यह प्रस्ताव किसी कुत्ते से,
करवा लो स्वीकार।
149. होगी पेपर लेस पढ़ाई
होगी पेपरलेस पढ़ाई, बहुत आजकल हल्ला।
काग़ज़ की तो शामत आई, बहुत आजकल हल्ला।
काग़ज़ पेन किताबों की तो, कर ही देंगे छुट्टी।
बस्ते दादा से भी होगी, पूरी पूरी कुट्टी।
पर होगी कैसे भरपाई, बहुत आजकल हल्ला।
रबर पेंसिल परकारों का, होगा काम न बाकी।
चाँदा सेटिस्क्वेयर कटर भी, होंगे स्वर्ग निवासी।
होगी कैसे सहन जुदाई, बहुत आजकल हल्ला।
ब्लेक बोर्ड का क्या होगा अब, रोज़ पूछते दादा।
पेपरलेस पढ़ाई वाला, होगा पागल आधा।
चाक करेगी खूब लड़ाई, बहुत आजकल हल्ला।
कभी किराना सब्जी लेने, जब दादाजी जाते।
लेकर पेन किसी कापी में सब हिसाब लिख लाते।
हाय करें अब कहाँ लिखाई, बहुत आजकल हल्ला।
रखे हाथ पर हाथ रिसानी, बैठी मालिन काकी।
काग़ज़ पर ही तो लिखती है, जोड़ घटाकर बाकी।
कर्ज़ बसूले कैसे भाई, बहुत आजकल हल्ला।
काग़ज़ पेन किताबें ओझल, कैसी होगी आँधी।
पूछो तो इन बातों से क्या, सहमत होंगे गाँधी।
यह तो होगी बड़ी ढिठाई, बहुत आजकल हल्ला।
150. हाथी भैया कहां चले
थैले जैसा पेट तुम्हारा, हाथी भैया कहां चले।
जंगल से तुम कब आए हो, बहुत दिनों के बाद मिले।
पेड़ यहाँ अब नहीं बचे हैं, डालें कहां हिलाओगे।
पत्तों का भी कहां ठिकाना, अब बोलो क्या खाओगे।
नहीं नलों में पानी आता, नदिया नाले हैं सूखे।
रहना होगा हाथी भैया, तुम्हें यहाँ प्यासे भूखे।
कई शिकारी सर्कस वाले, पीछे पड़े तुम्हारे हैं।
पता नहीं किस पथ के नीचे दबे हुए अंगारे हैं।
अगर तुम्हें रहना है सुख से, जंगल में वापस जाओ।
ले खड़ताल मंजीरा भैया, राम नाम के गुण गाओ।
151. हाथी बड़ा भुखेला
हाथी बड़ा भुखेला अम्मा,
हाथी बड़ा भुखेला।
खड़ा रहा मैं ठगा ठगा-सा,
खाएँ अस्सी केला अम्मा,
खाएँ अस्सी केला।
सूंड़ बढ़ाकर रोटी छीनी,
दाल फुरक कर खाई।
चाची ने जब पुड़ी परोसी,
लपकी और उठाई।
कितना खाता पता नहीं है,
पेट बड़ा-सा थैला अम्मा,
पेट बड़ा-सा थैला।
चाल निराली थल्लर-थल्लर,
चलता है मतवाला।
राजा जैसॆ डग्गम-डग्गम,
जैसे मोटा लाला।
पकड़ सूंड़ से नरियल फोड़ा,
पूरा निकला भेला अम्मा,
पूरा निकला भेला।
पैर बहुत मोटे हैं उसके,
ज्यों बरगद के खंभे।
मुंह के अगल-बगल में चिपके,
दांत बहुत हैं लंबे।
रहता राजकुमारों जैसा,
पास नहीं है धेला अम्मा,
पास नहीं है धेला।
पत्ते खाता डाल गिराता,
ऊधम करता भारी।
लगता थानेदार सरीखा,
बहुत बड़ा अधिकारी।
पेड़ उठाकर इस कोने से,
उस कोने तक ठेला अम्मा,
उस कोने तक ठेला।
152. होती व्यर्थ कपोल कल्पना
एक दिन चाचा गधेराम ने, देखा सुंदर सपना।
लेकर नभ में घूम रहे थे, उड़न खटोला अपना।।
खच्चर दादा बैठ बगल में, गप्पें हाँक रहे थे।
रगड़ रगड़ तंबाकू चूना, गुटखा फांक रहे थे।।
चंद्र लॊक की तरफ यानथा, सरसर बढ़ता जाता ।
अगल-बगल में तारों का था, झुरमुट मिलता जाता ।।
हाय -हलो करते थे दोनों, तारे हाथ मिलाते ।
चंदा मामा स्वागत करते, हंसकर हाथ बढ़ाते
जैसे उड़न खटोला उतरा, चंदा की धरती पर।
कूद पड़े दोनों धरती पर, खुशियों से चिल्ला कर।।
पर जैसे ही कदम बढ़ाए, दोनों ने कुछ आगे।
देख सामने खड़े शेर को, डर कर दोनों भागे।।
नींद खुल गई गधेराम की, पड़ा पीठ पर डंडा।
खड़ा हुआ था लेकर डंडा, घर मालिक मुस्तंडा।।
कल्पित और कपोल कल्पना, होती है दुख दाई।
सच्चे जीवन कड़े परिश्रम, में ही है अच्छाई।
153. हमें उजाला करना है
रुपये एकत्रित करना है,
हमको गुल्लक भरना है।
इन रुपयों से वृद्धों की,
हमको सेवा करना है।
गली सड़क में इधर उधर,
बूढ़े ठेड़े दिख जाते।
लाचारी में बेचारे,
पीते न कुछ खा पाते।
इनकी झोली भरना है,
इन्हें मदद कुछ करना है।
कपड़े इनके पास नहीं,
सरदी गरमी सह जाते।
सहन नहीं जो कर पाते,
बिना मौत के मर जाते।
हमें दुखों को हरना है,
उनकी रक्षा करना है।
पर सेवा का बच्चों में,
भाव जगाना है हमको।
हाथों में लेकर सूरज,
हमें हटाना है तम को।
हमें उजाला करना है,
अंधकार से लड़ना है।
154. हथिनी दीदी
हथिनी दीदी बैठ ट्रेन में,
निकल पड़ीं भोपाल को।
धुम चुक धुम चुक बजा रहीं थीं,
अपने सुंदर गाल को।
तभी अचानक टी टी आया,
बोला टिकिट कहाँ ताई,
हथनी बोली टिकिट मांगकर,
तुमको शरम नहीं आई।
टिकिट काउंटर इतना छोटा,
सूंड़ नहीं घुस पाई थी।
इस कारण से टी टी भैया,
टिकिट नहीं ले पाई थी।
पहिले आप टिकिट की खिड़की,
खूब बड़ी करवाओ।
उसके बाद श्री टी टीजी,
टिकिट मांगने आओ।
155. हाथी और चूहा
दो चूहों को मिले सड़क पर,
काले हाथी दादा।
उन्हें देख बोला इक चूहा
क्या है यार इरादा?
कई दिनों से हाथ सुस्त हैं,
कसरत ना हो पाई।
क्यों ना हम हाथी दादा की,
कर दें आज धुनाई।
बोला तभी दूसरा चूहा,
उचित नहीं यह भाई।
किसी अकेले से दो मिलकर,
कर दे हाथापाई
दुनियाँ वालों को भी यह सब,
होगा नहीं गवारा।
लोग कहेंगे दो सेठों ने,
एक गरीब को मारा।
156. हाथी मामा
हाथी मामा पहिन पजामा,
पहुंच गये स्कूल।
जैसे ही पढ़ने वह बैठे,
टूट गया स्टूल।
चित्त गिरे धरती पर मामा,
कुछ भी समझ न पाये।
पसर गये फिर धीरे धीरे,
पैरों को फैलाये।
जैसे तैसे दो चूहों ने,
मिलकर उन्हें उठाया।
गरम गरम काफी का प्याला,
लाकर एक पिलाया।
157. हुए साक्षर चूहेराम
अ-आ ,इ-ई,उ-ऊ पढ़कर ,
हुए साक्षर चूहेराम ।
कागज कलम किताबें लेकर,
किया शुरू लिखने का काम ।
दिन भर कड़ा परिश्रम करते ,
पैसे खूब कमाते ।
शाम ढ़ले ही किसी बैंक में ,
जाकर जमा कराते ।
उन्हें बैंक से एक पास बुक ,
और चैक बुक आई ।
बड़े जतन से, बहुत सुरक्षित ,
बिल में ही रखवाई ।
दिवस दूसरे सुबह उठे तो ,
देखा खेल निराला ।
हाय! चेक बुक और पास बुक
को खुद ने खा डाला ।
माथा रहे पीटते दिन भर ,
अपना चूहा भाई ।
अपनी ही आदत क्यों खुद को ,
हो जाती दुखदाई ।
158. जयंती या पुण्य तिथि
रात सूरज जनेगी
देख लेना
सुबह सुबह तुम,
उपेक्षा की आकृतियाँ
प्रसव पीड़ा बनकर
चीखेंगी
यह भी देखना तुम,
यह बात ज़रूर है
रात की लाश पर खड़े होकर
लोग पूजेंगे सूरज को
जो अभी अभी जन्मा है
अँधेरे की कोख से
पता नहीं अँधेरे की
पुण्य तिथि मनायेंगे
या उजाले की जयंती।
159. पत्र
अब नहीं है
इस पेड़ पर
पंछियों का बसेरा
साँप बनाकर ले गया है
उन्हें कोई आस्तीनों का सपेरा
और पता दे गया है
बाँबियों का
यह कह कर कि
मौके बेमौके
पत्र ज़रूर लिखना।
160. बदला
सूरज के जुल्म से
घबराकर
पेड़ के नीचे
छुपी सिकुड़ी
सिमटी छाया ने कहा
यह मुआ पेड़
बीच में आ गया
अन्यथा मज़ा चखाती
उस दुष्ट सूरज को ।