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परछाईयाँ साहिर लुधियानवी हिंदी कविता
Parchhaiyan Sahir Ludhianvi
परछाईयाँ
खून अपना हो या पराया हो
मादाम
हर चीज़ ज़माने की जहाँ पर थी
शाहकार
सांझ की लाली सुलग-सुलग कर
ज़िन्दगी से उन्स है
सदियों से इन्सान यह सुनता आया है
फ़रार
सनाख्वान-ए-तक्दीस-ए-मश्रिक़ कहाँ हैं?
मैं जिन्दा हूँ ये मुश्तहर कीजिए
जब कभी उन के तवज्जो में कमी पाई गई
अक़ायद वहम है मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
मेरे ख्वाबों के झरोकों को सजाने वाली
रद्द-ए-अमल
सज़ा का हाल सुनाये जज़ा की बात करें
मोहब्बत तर्क की मैंने गरेबाँ सी लिया मैं
मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
हिरास
शिकस्त
एक तसवीर-ए-रंग