खिड़कियाँ : अशोक चक्रधर

Khidkiyan/Khirkian : Ashok Chakradhar

1. सद्भावना गीत

गूंजे गगन में,
महके पवन में
हर एक मन में
-सद्भावना।

मौसम की बाहें,
दिशा और राहें,
सब हमसे चाहें
-सद्भावना।

घर की हिफ़ाज़त
पड़ौसी की चाहत,
हरेक दिल को राहत,
-तभी तो मिले,

हटे सब अंधेरा,
ये कुहरा घनेरा,
समुज्जवल सवेरा
-तभी तो मिले,

जब हर हृदय में
पराजय-विजय में
सद्भाव लय में
-हो साधना।
गूंजे गगन में,
महके पवन में,
हर एक मन में
-सद्भावना।

समय की रवानी,
फतह की कहानी,
धरा स्वाभिमानी,
-जवानी से है।

गरिमा का पानी,
ये गौरव निशानी,
सूखी ज़िंदगानी,
-जवानी से है।

मधुर बोल बोले,
युवामन की हो ले,
मिलन द्वार खोले,
-संभावना।

गूंजे गगन में,
महके पवन में,
हर एक मन में
-सद्भावना।

हमें जिसने बख़्शा,
भविष्यत् का नक्शा,
समय को सुरक्षा
-उसी से मिली।

ज़रा कम न होती,
कभी जो न सोती,
दिये की ये जोती,
-उसी से मिली।

नफ़रत थमेगी,
मुहब्बत रमेगी,
ये धरती बनेगी,
-दिव्यांगना।

गूंजे गगन में,
महके पवन में,
हर एक मन में
-सद्भावना।

मौसम की बाहें,
दिशा और राहें,
सब हमसे चाहें,
-सद्भावना।

2. झूम रही बालियां

रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।
फल और फूलों से,
पटरी के झूलों से
खाय हिचकोले मगन भईं डालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।

ऋतु है बसंती ये
बड़ी रसवंती ये।
कोयलिया कूक रही,
जादू सा फूंक रही।
सखियां हैं चुनमुन है,
पायलों की रुनझुन है।
मस्ती में जवानी है,
अदा मस्तानी है।
चुनरी है गोटे हैं,
झूला है, झोटे हैं।
घंटी बजी ख़तरों की,
टोली आई भंवरों की।
धूल नहीं फांकेंगे,
बगिया में झांकेंगे।
बगिया में तितली है,
अरे ये तो इकली है।
नहीं नहीं और भी हैं,
अमियां पे बौर भी हैं।
तितली के नख़रे हैं,
भंवरे ये अखरे हैं।
भंवरे ने मुंह खोला,
सखियों से यों बोला—
हम भए जीजा कि तुम भईं सालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।

बगिया में रास रचा,
बड़ा हड़कम्प मचा।
सुध-बुध भूला जी,
थम गया झूला जी।
कैसे घुस आए हो,
किसने बुलाए हो?
हम नहीं मानें जी,
तुम्हें नहीं जानें जी!
काले हो कलूटे हो,
तुम सब झूठे हो।
मुंह धो के आ जाओ,
तितली को पा जाओ।
भंवरों की टोली ये,
सखियों से बोली ये—
कान्हा भी तो कारे थे,
मुरलिया वारे थे।
हम न अकेले हैं,
ख़ूब खाए-खेले हैं।
मुरली बजाएंगे,
सबको ले जाएंगे।
सब हैं तुम्हारे जी!
शरम के मारे जी,
सखियों के गालों पर छा गईं लालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।

रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।
फल और फूलों से,
पटरी से झूलों से
खाय हिचकोले मगन भईं डालियां।
रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।

3. छूटा गांव, छूटी गली

रोको, रोको!
ये डोली मेरी कहां चली,
छूटा-गाँव, छूटी गली।

रोक ले बाबुल, दौड़ के आजा, बहरे हुए कहार,
अंधे भी हैं ये, इन्हें न दीखें, तेरे मेरे अंसुओं की धार।
ये डोली मेरी कहां चली,

छूटा-गाँव, छूटी गली।

कपड़े सिलाए, गहने गढ़ाए, दिए तूने मखमल थान,
बेच के धरती, खोल के गैया, बांधा तूने सब सामान,
दान दहेज सहेज के सारा, राह भी दी अनजान,
मील के पत्थर कैसे बांचूं, दिया न अक्षर-ज्ञान।
गिरी है मुझ पर बिजली,
छूटा-गाँव, छूटी गली।
ये डोली मेरी कहां चली,
छूटा-गाँव, छूटी गली।

4. चिड़िया की उड़ान

चिड़िया तू जो मगन, धरा मगन, गगन मगन,
फैला ले पंख ज़रा, उड़ तो सही, बोली पवन।
अब जब हौसले से, घोंसले से आई निकल,
चल बड़ी दूर, बहुत दूर, जहां तेरे सजन।

वृक्ष की डाल दिखें
जंगल-ताल दिखें
खेतों में झूम रही
धान की बाल दिखें
गाँव-देहात दिखें, रात दिखे, प्रात दिखे,
खुल कर घूम यहां, यहां नहीं घर की घुटन।
चिड़िया तू जो मगन....

राह से राह जुड़ी
पहली ही बार उड़ी
भूल गई गैल-गली
जाने किस ओर मुड़ी

मुड़ गई जाने किधर, गई जिधर, देखा उधर,
देखा वहां खोल नयन-सुमन-सुमन, खिलता चमन।
चिड़िया तू जो मगन...

कोई पहचान नहीं
पथ का गुमान नहीं
मील के नहीं पत्थर
पांन के निशान नहीं
ना कोई चिंता फ़िक़र, डगर-डगर, जगर मगर,
पंख ले जाएं उसे बिना किए कोई जतन।

चिड़िया तू जो मगन, धरा मगन, गगन मगन,
फैला ले पंख ज़रा, उड़ तो सही, बोली पवन।
अब जब हौसले से, घोंसले से आई निकल,
चल बड़ी दूर, बहुत दूर, जहां तेरे सजन।

5. ज़रा मुस्कुरा तो दे

माना, तू अजनबी है
और मैं भी, अजनबी हूँ
डरने की बात क्या है
ज़रा मुस्कुरा तो दे।

हूं मैं भी एक इंसां
और तू भी एक इंसां
ऐसी भी बात क्या है
ज़रा मुस्कुरा तो दे।

ग़म की घटा घिरी है
तू भी है ग़मज़दा सा
रस्ता जुदा-जुदा है
ज़रा मुस्कुरा तो दे।


हाँ, तेरे लिए मेरा
और मेरे लिए तेरा
चेहरा नया-नया है
ज़रा मुस्कुरा तो दे।

तू सामने है मेरे
मैं सामने हूं तेरे
युं ही सामना हुआ है
ज़रा मुस्कुरा तो दे।

मैं भी न मिलूं शायद
तू भी न मिले शायद
इतनी बड़ी दुनिया है
ज़रा मुस्कुरा तो दे।

6. नया साल हो

नव वर्ष की शुभकामनाएं
हैपी न्यू इयर, हैपी न्यू इयर।

दिलों में हो फागुन, दिशाओं में रुनझुन
हवाओं में मेहनत की गूंजे नई धुन
गगन जिसको गाए हवाओं से सुन-सुन
वही धुन मगन मन, सभी गुनगुनाएं।

नव वर्ष की शुभकामनाएं
हैपी न्यू इयर, हैपी न्यू इयर।
नया साल हो आप सबको मुबारक।

ये धरती हरी हो, उमंगों भरी हो
हरिक रुत में आशा की आसावरी हो
मिलन के सुरों से सजी बांसुरी हो
अमन हो चमन में, सुमन मुस्कुराएं।

नव वर्ष की शुभकामनाएं
हैपी न्यू इयर, हैपी न्यू इयर।
नया साल हो आप सबको मुबारक।

न धुन मातमी हो न कोई ग़मी हो
न मन में उदासी, न धन में कमी हो
न इच्छा मरे जो कि मन में रमी हो
साकार हों सब मधुर कल्पनाएं।
नव वर्ष की शुभकामनाएं
हैपी न्यू इयर, हैपी न्यू इयर।
नया साल हो आप सबको मुबारक।

7. नई भोर

खुशी से सराबोर होगी
कहेगी मुबारक मुबारक
कहेगी बधाई बधाई

आज की रंगीन हलचल
दिल कमल को खिला गई
मस्त मेला मिलन बेला
दिल से दिल को मिला गई
रात रानी की महक
हर ओर होगी
कल जो नई भोर होगी
खुशी से सराबोर होगी।
कहेगी बधाई बधाई!

चांदनी इस नील नभ में
नव उमंग चढ़ा गई
और ऊपर और ऊपर
मन पतंग उड़ा गई
सुबह के कोमल करों
में डोर होगी
कल जो नई भोर होगी
खुशी से सराबोर होगी।
कहेगी बधाई बधाई!

यामिनी सबके हृदय में
अमृत कोष बना गई
हीर कनियों सी दमकती
मधुर ओस बना गई
स्नेह से भीगी सुबह की
पोर होगी
कल जो नई भोर होगी
खुशी से सराबोर होगी।
कहेगी बधाई बधाई

8. घर बनता है घर वालों से

दरवाज़ों से ना दीवालों से,
घर बनता है घर वालों से!

अच्छा कोई मकां बनाएगा
पैसा भी ख़ूब लगाएगा
पर रहने को नहिं आएगा
तो घर उसका भर जाएगा
सारा मकड़ी के जालों से।

दरवाज़ों से ना दीवालों से,
घर बनता है घर वालों से!

घर में जब कोई न होता है
दादी है और न पोता है
घर अपने नैन भिगोता है
भीतर-ही-भीतर रोता है
घर हंसता बाल-गुपालों से।

दरवाज़ों से ना दीवालों से,
घर बनता है घर वालों से!

तुम रहे भी मगर लड़ाई हो
भाई का दुश्मन भाई हो
ननदी से तनी भौजाई हो
ऐसे में तो राम दुहाई हो
घर घिरा रहेगा सवालों से।

दरवाज़ों से ना दीवालों से,
घर बनता है घर वालों से!

गर प्रेम का ईंट और गारा हो
हर नींव में भाईचारा हो
कंधों का छतों को सहारा हो
दिल खिडक़ी में उजियारा हो
घर गिरे नहीं भूचालों से।

दरवाज़ों से ना दीवालों से,
घर बनता है घर वालों से!

9. बमलहरी

बिन अदब के बिना मुलाहिजा
(जब तबाही गुमसुम हो जाए तो सच्चाई बोलनी
चाहिए, भले ही सख़्त मनाही हो।)

बम बबम्बम्ब बम लहरी,
गल्लां हैं गहरी-गहरी।
शहरी हैं सारे गूंगे,
बहरी हो गई कचहरी। ज़िन्दाबाद!

कोरट में चले गवाही
गुमसुम हो गई तबाही।
सच्चाई कह मत देना
है इसकी सख़्त मनाही। ज़िन्दाबाद!

चलता है गोरखधंधा
क़ानून नहीं है अंधा
खुल्लमखुला है सब कुछ
पर दूर गले से फंदा। ज़िन्दाबाद!

सूरज है भ्रष्टाचारी
राहू-केतू से यारी
लाचारी दुनिया की है
फिर भी घूमे बेचारी। ज़िन्दाबाद!

धरती को तुमने देखा,
फिर आसमान को देखा,
ये दोनों मिले जहां पर,
है वही गरीबी रेखा। ज़िन्दाबाद!

तेरी तो हो गई छुट्टी,
घपलों की पी के घुट्टी,
मुट्ठी भर लोगों की बस,
लो गरम हो गई मुट्ठी। ज़िन्दाबाद!

चल यार अंधेरा बांटें
वोटर के तलुए चाटें
शम्शान के उद्घाटन पर
ताबूत का फीता काटें। ज़िन्दाबाद!

जन्नत का ले ले जायज़ा,
बिन अदब के बिना मुलाहिजा।
सत्ता है आनी जानी
तू तो मस्ती में गाए जा— ज़िन्दाबाद!

10. नीति बदलेगी नहीं

(महिला दिवस पर एक गीत)
नीति बदलेगी नहीं
रीति बदलेगी नहीं,
जब तलक कस के कमर
द्वार से निकलेगी नहीं।

रास्ता ख़ुद ही बनाना होगा,
सामने खुल के अब आना होगा,
अपना हक सबको जताना होगा।
बने रहेंगे ये दस्तूर सभी,
जब तलक तू ही ख़ुद आके
इन्हें बदलेगी नहीं।
रीति बदलेगी नहीं,
नीति बदलेगी नहीं।

हौसला अपना दिखाना होगा,
काबू हालात पे पाना होगा,
अपनी ताकत को जगाना होगा।
कगार तोड़के दीवार गिरा,
बाढ़ के पानी सी दमदार
तू मचलेगी नहीं।
रीति बदलेगी नहीं,
नीति बदलेगी नहीं।

जब तलक कस के कमर
द्वार से निकलेगी नहीं,
रीति बदलेगी नहीं,
नीति बदलेगी नहीं।

11. रैन गई ओ नवेली

अभी पसीना मत सुखा अभी कहां आराम
(धरती रूपी इस ग्लोबल गांव में
भारतीय औरत सबसे ज़्यादा काम करती है)

रैन गई ओ नवेली,
मत कर सोच विचार,
दिन निकला चल काम कर,
आंगन झाड़ बुहार।

भेज पराए गांव में
तुझे गए सब भूल,
करनी हैं अनुकूल सब
स्थितियां प्रतिकूल।

पानी लेने सब चलीं,
जा उन सबके साथ,
सानी कर पानी पिला,
बाहर गोबर पाथ।

यह चाकी यह ओखली,
देख न हो बेहाल,
बाद रसोई के तुझे,
जाना है तत्काल।
अभी पसीना मत सुखा,
अभी कहां आराम,
शाम ढले तक यहां भी,
करना होगा काम।

जितने भी पैसे मिले,
चल अब घर की ओर,
दिन की मेहनत ने दिया,
तन का सत्त निचोर।

बोझ लाद वापस चली,
जब हो आई सांझ,
देह नगाड़े सी खिंची,
बजतीं सौ-सौ झांझ।

फिर से चूल्हा फूंक चल,
सबको रोटी सेक,
ऐसे ही बीते सदा,
दिन तेरा प्रत्येक।

12. वैसे ही जीवन में क़ानून है

जैसे कि इस देह में ख़ून है
(क़ानून एक से एक कठोर हैं, लेकिन,
लोकपालन नहीं होगा तो लोकपाल
भी क्या कर लेगा?)

जैसे कि इस देह में ख़ून है,
वैसे ही जीवन में क़ानून है।

छोटा बड़ा कोई
अनपढ़ पढ़ा कोई
सबको है एक समान ये।
निर्धन धनी कोई
बन्ना बनी कोई
सब पे तनी है कमान ये।
ये हो तो रहता है चैनो-अमन
इसकी वजह से ही सुक्कून है।
जैसे कि इस देह में ख़ून है,
वैसे ही जीवन में क़ानून है।

सबकी सुरक्षा का
चीज़ों की रक्षा का
देता है जीवन का ज्ञान ये।
हर गांव रहता है
हर ठांव रहता है
रहता है दुनिया-जहान ये।
हमको बचाता है ये इस तरह
सर्दी में जैसे गरम ऊन है।
जैसे कि इस देह में ख़ून है,
वैसे ही जीवन में क़ानून है।

जीने का रस्ता है
नियमों का बस्ता है
हर मुल्क का मानो प्रान है।
कैसे चलाते हैं, कैसे बनाते हैं
इसके लिए संविधान है।
ये संविधान, होता है क्या?
क़ानूनों का भी ये क़ानून है।
जैसे कि इस देह में ख़ून है,
वैसे ही जीवन में क़ानून है।

दिक़्क़त हमें
आती है तब

13. ऐसे काया जलती है

गीली लकड़ी सुलगे जैसे
(एक विरहिणी का पीड़ा-गीत)

गीली लकड़ी सुलगे जैसे
ऐसे काया जलती है,
बांध की दीवारों के पीछे
धारा एक मचलती है।

जब दिख जाते चोंच मिलाते
डाली पर चकवी चकवा।
अंधड़ सी बनकर उड़ती है
अंदर पागल मस्त हवा।

भीतर भीतर धुंआ घुमड़ता
धुंआ घुमड़ता भीतर भीतर
दहके जैसे कोई अवा,
लाइलाज ये रोग बनाया
ना इलाज ना कोई दवा।

प्यास की मारी तपते रेत में
तपते रेत में प्यास की मारी
मछली एक उछलती है।
गीली लकड़ी सुलगे जैसे
ऐसे काया जलती है।

पंच तत्व की देह सुरीली
भाटा पत्थर क्यों न हुई
पीर बढ़ाती राग-रागणी
चुभती कोई मधुर सुई।

हिवड़े के अंदर रह रह कर
रह रह कर हिवड़े के अंदर
क्यों उठती है टीस मुई
मर कर भी क्यों जी उठती है
इच्छाओं की छुई-मुई।

सन्नाटे में अंधियारे के
अंधियारे के सन्नाटे में
गूंगी चीख़ निकलती है।
गीली लकड़ी सुलगे जैसे
ऐसे काया जलती है।

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