एक जवान मौत : जाँ निसार अख़्तर
Ek Jawan Maut : Jaan Nisar Akhtar
ग़ज़लें
1. जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
देखना ये है कि अब आग किधर लगती है
सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है
हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है
2. हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे
हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे
ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे
जो आँसू में कभी रात भीग जाती है
बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे
मैं सो भी जाऊँ तो मेरी बंद आँखों में
तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे
मैं जब भी उस के ख़यालों में खो सा जाता हूँ
वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे
मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह
ये मेरा गाओँ तो पहचाना सा लगे है मुझे
बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद
हर एक फ़र्द कोई सानेहा लगे है मुझे
3. आज मुद्दत में वो याद आये हैं
आज मुद्दत में वो याद आये हैं
दरोदीवार पे कुछ साए हैं
आबगीनों से न टकरा पाए
कोहसारों से जो टकराए हैं
जिंदगी तेरे हवादिस हम को
कुछ न कुछ राह पे ले आये हैं
इतने मायूस तो हालात नहीं
लोग किस वास्ते घबराए हैं
उनकी जानिब न किसी ने देखा
जो हमें देख के शर्माए हैं
संगरेज़ों से खज़फ़ पारों से
कितने हीरे कभी चुन लाये हैं
4. आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शर्माए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
संदल सी महकती हुई पुरकैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नदी कोई बलखाये तो लगता है कि तुम हो
5. वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं
वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं
जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं
तूफ़ानों की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन
लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं
उनको न पुकारों गमेदौरां के लक़ब से
जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं
हम भी तेरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन
कुछ और भी चेहरे हमें मरगूब रहे हैं
इस अहदे बसीरत में भी नक्क़ाद हमारे
हर एक बड़े नाम से मरऊब रहे हैं
6. मौजे गुल, मौजे सबा, मौजे सहर लगती हैं
मौजे गुल, मौजे सबा, मौजे सहर लगती हैं
सर से पा' तक वो समाँ है कि नज़र लगती है
हमने हर गाम पे सजदों के जलाये हैं चराग़
अब तेरी राहगुज़र राहगुज़र लगती है
लम्हे-लम्हे में बसी है तेरी यादों की महक
आज की रात तो ख़ुशबू का सफ़र लगती है
7. हम से भागा न करो दूर गज़ालों की तरह
हम से भागा न करो दूर गज़ालों की तरह
हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह
खुद-बा-खुद नींद-सी आँखों में घुली जाती है
महकी महकी है शब्-ए-गम तेरे बालों की तरह
और क्या इस से जियादा कोई नरमी बरतूं
दिल के ज़ख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह
और तो मुझ को मिला क्या मेरी मेहनत का सिला
चाँद सिक्के हैं मेरे हाथ में छालों की तरह
ज़िन्दगी जिस को तेरा प्यार मिला वो जाने
हम तो नाकाम रहे चाहने वालों की तरह
8. एक तो नैनां कजरारे और तिस पर डूबे काजल में
एक तो नैनां कजरारे और तिस पर डूबे काजल में
बिजली की बढ़ जाए चमक कुछ और भी गहरे बादल में
आज ज़रा ललचायी नज़र से उसको बस क्या देख लिया
पग-पग उसके दिल की धड़कन उतर आई पायल में
प्यासे-प्यासे नैनां उसके जाने पगली चाहे क्या
तट पर जब भी जावे, सोचे, नदिया भर लूं छागल में
गोरी इस संसार में मुझको ऐसा तेरा रूप लगे
जैसे कोई दीप जला दे घोर अंधेर जंगल में
प्यार की यूं हर बूंद जला दी मैंने अपने सीने में
जैसे कोई जलती माचिस डाल दे पीकर बोतल में
9. ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था
ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था
मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझ को
वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था
शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे
कुछ इस तरह से तूने बदन चुराया था
गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था
पता नहीं कि मेरे बाद उन पे क्या गुज़री
मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था
10. जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये
जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये
तिश्नगी कुछ तो बुझे तिश्नालब-ए-ग़म की
इक नदी दर्द के शहरों में बहा दी जाये
दिल का वो हाल हुआ ऐ ग़म-ए-दौराँ के तले
जैसे इक लाश चट्टानों में दबा दी जाये
हम ने इंसानों के दुख दर्द का हल ढूँढ लिया
क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाये
हम को गुज़री हुई सदियाँ तो न पहचानेंगी
आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाये
फूल बन जाती हैं दहके हुए शोलों की लवें
शर्त ये है के उन्हें ख़ूब हवा दी जाये
कम नहीं नशे में जाड़े की गुलाबी रातें
और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाये
हम से पूछो ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या है
चन्द लफ़्ज़ों में कोई आह छुपा दी जाये
11. हमने काटी हैं तिरी याद में रातें अक़्सर
हमने काटी हैं तिरी याद में रातें अक़्सर
दिल से गुज़री हैं सितारों की बरातें अक़्सर
और तो कौन है जो मुझको तसल्ली देता
हाथ रख देती हैं दिल पर तिरी बातें अक़्सर
हुस्न शाइस्ता-ए-तहज़ीब-ए-अलम है शायद
ग़मज़दा लगती हैं क्यों चाँदनी रातें अक़्सर
हाल कहना है किसी से तो मुख़ातिब हो कोई
कितनी दिलचस्प, हुआ करती हैं बातें अक़्सर
इश्क़ रहज़न न सही, इश्क़ के हाथों फिर भी
हमने लुटती हुई देखी हैं बरातें अक़्सर
हम से इक बार भी जीता है न जीतेगा कोई
वो तो हम जान के खा लेते हैं मातें अक़्सर
उनसे पूछो कभी चेहरे भी पढ़े हैं तुमने
जो किताबों की किया करते हैं बातें अक़्सर
हमने उन तुन्द हवाओं में जलाये हैं चिराग़
जिन हवाओं ने उलट दी हैं बिसातें अक़्सर
12. फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो
फुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो
ये न सोचो कि अभी उम्र पड़ी है यारो
अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको
ज़िन्दगी शम्अ लिए दर पे खड़ी है यारो
हमने सदियों इन्हीं ज़र्रो से मोहब्बत की है
चाँद-तारों से तो कल आँख लड़ी है यारो
फ़ासला चन्द क़दम का है, मना लें चलकर
सुबह आयी है मगर दूर खड़ी है यारो
किसकी दहलीज़ पे ले जाके सजायें इसको
बीच रस्ते में कोई लाश पड़ी है यारो
जब भी चाहेंगे ज़माने को बदल डालेंगे
सिर्फ़ कहने के लिए बात बड़ी है यारो
उनके बिन जी के दिखा देंगे उन्हें, यूँ ही सही
बात अपनी है कि ज़िद आन पड़ी है यारो
13. अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
अश्आर मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शे’र फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
आँखों में जो भर लोगे, तो काँटे-से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मन्दिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहजीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
14. रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे
रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे
अदा शनास तो बहुत हैं मगर कहाँ हमसे
सुना दिये थे कभी कुछ गलत-सलत क़िस्से
वो आज तक हैं उसी तरह बदगुमाँ हमसे
ये कुंज क्यूँ ना ज़िआरत गहे मुहब्बत हो
मिले थे वो इंहीं पेड़ों के दर्मियाँ हमसे
हमीं को फ़ुरसत-ए-नज़्ज़ारगी नहीं वरना
इशारे आज भी करती हैं खिड़कियाँ हमसे
हर एक रात नशे में तेरे बदन का ख़्याल
ना जाने टूट गई कई सुराहियाँ हमसे
15. ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो
ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो
कू-ए-क़ातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें
क्या ख़बर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही न हो
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी
चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो
ज़िन्दगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो
16. ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
सम्भल भी जा कि अभी वक़्त है सम्भलने का
बहार आये चली जाये फिर चली आये
मगर ये दर्द का मौसम नहीं बदलने का
ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हैं
मगर किसे है सलीका ज़मीं पे चलने का
फिरे हैं रातों को आवारा हम तो देखा है
गली-गली में समाँ चाँद के निकलने का
तमाम नशा-ए-हस्ती तमाम कैफ़-ए-वजूद
वो इक लम्हा तेरे जिस्म के पिघलने का
17. चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए
चौंक चौंक उठती है महलों की फ़ज़ा रात गए
कौन देता है ये गलियों में सदा रात गए
ये हक़ाएक़ की चटानों से तराशी दुनिया
ओढ़ लेती है तिलिस्मों की रिदा रात गए
चुभ के रह जाती है सीने में बदन की ख़ुश्बू
खोल देता है कोई बंद-ए-क़बा रात गए
आओ हम जिस्म की शम्ओं से उजाला कर लें
चाँद निकला भी तो निकलेगा ज़रा रात गए
तू न अब आए तो क्या आज तलक आती है
सीढ़ियों से तिरे क़दमों की सदा रात गए
18. आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर
आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर
उस का काग़ज़ चिपका देना घर के रौशन-दानों पर
आज भी जैसे शाने पर तुम हाथ मिरे रख देती हो
चलते चलते रुक जाता हूँ साड़ी की दूकानों पर
बरखा की तो बात ही छोड़ो चंचल है पुरवाई भी
जाने किस का सब्ज़ दुपट्टा फेंक गई है धानों पर
शहर के तपते फ़ुटपाथों पर गाँव के मौसम साथ चलें
बूढ़े बरगद हाथ सा रख दें मेरे जलते शानों पर
सस्ते दामों ले तो आते लेकिन दिल था भर आया
जाने किस का नाम खुदा था पीतल के गुल-दानों पर
उस का क्या मन-भेद बताऊँ उस का क्या अंदाज़ कहूँ
बात भी मेरी सुनना चाहे हाथ भी रक्खे कानों पर
और भी सीना कसने लगता और कमर बल खा जाती
जब भी उस के पाँव फिसलने लगते थे ढलवानों पर
शेर तो उन पर लिक्खे लेकिन औरों से मंसूब किए
उन को क्या क्या ग़ुस्सा आया नज़्मों के उनवानों पर
यारो अपने इश्क़ के क़िस्से यूँ भी कम मशहूर नहीं
कल तो शायद नॉवेल लिक्खे जाएँ इन रूमानों पर
19. ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर
ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर
एक नदी में कितने भँवर
सदियों सदियों मेरा सफ़र
मंज़िल मंज़िल राहगुज़र
कितना मुश्किल कितना कठिन
जीने से जीने का हुनर
गाँव में आ कर शहर बसे
गाँव बिचारे जाएँ किधर
फूँकने वाले सोचा भी
फैलेगी ये आग किधर
लाख तरह से नाम तिरा
बैठा लिक्खूँ काग़ज़ पर
छोटे छोटे ज़ेहन के लोग
हम से उन की बात न कर
पेट पे पत्थर बाँध न ले
हाथ में सजते हैं पत्थर
रात के पीछे रात चले
ख़्वाब हुआ हर ख़्वाब-ए-सहर
शब भर तो आवारा फिरे
लौट चलें अब अपने घर
20. इसी सबब से हैं शायद, अज़ाब जितने हैं
इसी सबब से हैं शायद, अज़ाब जितने हैं
झटक के फेंक दो पलकों पे ख़्वाब जितने हैं
वतन से इश्क़, ग़रीबी से बैर, अम्न से प्यार
सभी ने ओढ़ रखे हैं नक़ाब जितने हैं
समझ सके तो समझ ज़िन्दगी की उलझन को
सवाल उतने नहीं है, जवाब जितने हैं
21. उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है
उफ़ुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है
मुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है
हमारे शहर में बे-चेहरा लोग बसते हैं
कभी-कभी कोई चेहरा दिखाई पड़ता है
चलो कि अपनी मोहब्बत सभी को बाँट आएँ
हर एक प्यार का भूखा दिखाई देता है
जो अपनी ज़ात से इक अंजुमन कहा जाए
वो शख्स तक मुझे तन्हा दिखाई पड़ता है
न कोई ख़्वाब न कोई ख़लिश न कोई ख़ुमार
ये आदमी तो अधूरा दिखाई पड़ता है
लचक रही है शुआओं की सीढियाँ पैहम
फ़लक से कोई उतरता दिखाई पड़ता है
चमकती रेत पर ये ग़ुस्ल-ए-आफ़ताब तेरा
बदन तमाम सुनहरा दिखाई पड़ता है
22. तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है
जिसे ना हुस्न से मतलब ना इश्क़ से सरोकार
वो शख्स मुझ को बहुत बदनसीब लगता है
हदूद-ए-जात से बाहर निकल के देख ज़रा
ना कोई गैर, ना कोई रक़ीब लगता है
ये दोस्ती, ये मरासिम, ये चाहते ये खुलूस
कभी कभी ये सब कुछ अजीब लगता है
उफक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
मुझे चिराग-ए-दयार-ए-हबीब लगता है
ना जाने कब कोई तूफान आयेगा यारो
बलंद मौज से साहिल क़रीब लगता है
23. हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे
हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे
ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे
अब उस के तर्ज़-ए-तजाहुल को क्या कहे कोई
वो बे-ख़बर तो नहीं फिर भी बे-ख़बर सा लगे
हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है
ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे
नशात-ए-सोहबत-ए-रिंदाँ बहुत ग़नीमत है
कि लम्हा लम्हा पुर-आशोब-ओ-पुर-ख़तर सा लगे
किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा
कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे
वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सकें
हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर सा लगे
जहान-ए-नौ के मुकम्मल सिंगार की ख़ातिर
सदी सदी का ज़माना भी मुख़्तसर सा लगे
24. रुखों के चांद, लबों के गुलाब मांगे है
रुखों के चांद, लबों के गुलाब मांगे है
बदन की प्यास, बदन की शराब मांगे है
मैं कितने लम्हे न जाने कहाँ गँवा आया
तेरी निगाह तो सारा हिसाब मांगे है
मैं किस से पूछने जाऊं कि आज हर कोई
मेरे सवाल का मुझसे जवाब मांगे है
दिल-ए-तबाह का यह हौसला भी क्या कम है
हर एक दर्द से जीने की ताब मांगे है
बजा कि वज़ा-ए-हया भी है एक चीज़ मगर
निशात-ए-दिल तुझे बे-हिजाब मांगे है
25. बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है
बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है
चमन माँगा था पर उस ने ब-मुश्किल इक कली दी है
मिरे ख़ल्वत-कदे के रात दिन यूँही नहीं सँवरे
किसी ने धूप बख़्शी है किसी ने चाँदनी दी है
नज़र को सब्ज़ मैदानों ने क्या क्या वुसअतें बख़्शीं
पिघलते आबशारों ने हमें दरिया-दिली दी है
मोहब्बत ना-रवा तक़्सीम की क़ाएल नहीं फिर भी
मिरी आँखों को आँसू तेरे होंटों को हँसी दी है
मिरी आवारगी भी इक करिश्मा है ज़माने में
हर इक दरवेश ने मुझ को दुआ-ए-ख़ैर ही दी है
कहाँ मुमकिन था कोई काम हम जैसे दिवानों से
तुम्हीं ने गीत लिखवाए तुम्हीं ने शाइरी दी है