अहमद नदीम क़ासमी Ahmad Nadeem Qasmi
अहमद नदीम क़ासमी की रचनाएँ
ग़ज़लें - अहमद नदीम क़ासमी
- अजब सुरूर मिला है मुझे दुआ कर के
- अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था
- अंदाज़ हू-ब-हू तिरी आवाज़-ए-पा का था
- अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या
- अब तक तो नूर-ओ-निक़हत-ओ-रंग-ओ-सदा कहूँ
- अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
- इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़-ओ-समा दे दूँगा
- इक सहमी सहमी सी आहट है, इक महका महका साया है
- इंक़लाब अपना काम करके रहा
- एजाज़ है ये तेरी परेशाँ-नज़री का
- एहसास में फूल खिल रहे हैं
- क़लम दिल में डुबोया जा रहा है
- क्या भरोसा हो किसी हमदम का
- क्या भला मुझ को परखने का नतीजा निकला
- किस को क़ातिल मैं कहूं किस को मसीहा समझूं
- कौन कहता है कि मौत आयी तो मर जाऊँगा
- खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए
- ख़ुदा नहीं, न सही, ना-ख़ुदा नहीं, न सही
- गुल तेरा रंग चुरा लाए हैं गुलज़ारों में
- गो मेरे दिल के ज़ख़्म ज़ाती हैं
- जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी
- जब भी आँखों में तिरी रुख़्सत का मंज़र आ गया
- जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम
- जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ
- ज़ीस्त आज़ार हुई जाती है
- जेहनों में ख़याल जल रहे हैं
- जो लोग दुश्मन-ए-जाँ थे वही सहारे थे
- तंग आ जाते हैं दरिया जो कुहिस्तानों में
- तुझे इज़हार-ए-मुहब्बत से अगर नफ़रत है
- तुझे खोकर भी तुझे पाऊं जहाँ तक देखूँ
- तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा
- तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ
- तेरी महफ़िल भी मुदावा नहीं तन्हाई का
- दावा तो किया हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ का सब ने
- दिल में हम एक ही जज्बे को समोएँ कैसे
- दिलों से आरज़ू-ए-उम्र-ए-जावेदाँ न गई
- न वो सिन है फ़ुर्सत-ए-इश्क़ का
- फ़ासले के मअ'नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो
- फिर भयानक तीरगी में आ गए
- फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ
- बारिश की रुत थी रात थी पहलू-ए-यार था
- मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ
- मुदावा हब्स का होने लगा आहिस्ता आहिस्ता
- मैं कब से गोश-बर-आवाज़ हूँ पुकारो भी
- मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता
- मैं वो शाएर हूँ जो शाहों का सना-ख़्वाँ न हुआ
- मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे
- यूँ तो पहने हुए पैराहन-ए-ख़ार आता हूँ
- यूँ बे-कार न बैठो दिन भर यूँ पैहम आँसू न बहाओ
- लब-ए-ख़ामोश से इफ़्शा होगा
- लबों पे नर्म तबस्सुम रचा कि धुल जाएँ
- वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे
- शाम को सुबह-ए-चमन याद आई
- शुऊर में कभी एहसास में बसाऊँ उसे
- साँस लेना भी सज़ा लगता है
- सूरज को निकलना है सो निकलेगा दोबारा
- हम उन के नक़्श-ए-क़दम ही को जादा करते रहे
- हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते
- हम दिन के पयामी हैं मगर कुश्ता-ए-शब हैं
- हमेशा ज़ुल्म के मंज़र हमें दिखाए गए
- हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है
- हैरतों के सिल-सिले सोज़-ए-निहां तक आ गए
- होता नहीं ज़ौक़-ए-ज़िंदगी कम
नज़्में - अहमद नदीम क़ासमी
- अक़ीदे
- अज़ली मसर्रतों की अज़ली मंज़िल
- इंफ़िसाल
- एक दरख्वास्त
- एक नज़्म-छुटपुटे के ग़ुर्फ़े में
- क़यामत
- क़रिया-ए-मोहब्बत
- क़ानून-ए-क़ुदरत
- गुनाह ओ सवाब
- जंगल की आग
- ढलान
- तदफ़ीन
- तर्क-ए-दरयूज़ा
- दरांती
- दश्त-ए-वफ़ा
- दुआ
- नया साल
- पत्थर
- पस-ए-आईना
- पाबंदी
- फ़न
- बहार
- बीसवीं सदी का इंसान
- महफ़िल-ए-शब
- मुझे कल मेरा एक साथी मिला
- लज़्ज़त-ए-आगही
- लम्हा
- लरज़ते साए
- रूह लबों तक आ कर सोचे
- रेस्तोराँ
- वक़्त
- वक़्फ़ा
- रात दिन सिलसिला-ए-उम्र-ए-रवाँ-गीत
- सफ़र और हम-सफ़र
