Govind Vinayak Karandikar / गोविंद विनायक करंदीकर (विंदा करंदीकर)
गोविंद विनायक करंदीकर (23 अगस्त 1918 - 14 मार्च 2010), जिन्हें लोकप्रिय रूप से विंदा करंदीकर के नाम से जाना जाता है, मराठी भाषा के प्रसिद्ध कवि, लेखक, साहित्यिक आलोचक और अनुवादक थे। इनका जन्म महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के देवगढ़ तालुका स्थित धलावाली गाँव में हुआ था।
इनकी मुख्य काव्य रचनाओं में स्वेदगंगा (1949), मृदगंधा (1954), ध्रुपद (1959), जातक (1968) और विरुपिका (1980) शामिल हैं। इनकी चुनी हुई कविताओं के दो प्रसिद्ध संकलन संहिता (1975) और आदिमाया (1990) भी प्रकाशित हुए। बच्चों के लिए इन्होंने रानीचा बाग (1961), शश्याचे कान (1963) और परी गा परी (1965) जैसी लोकप्रिय कृतियाँ रचीं। प्रयोगशीलता करंदीकर की कविता की एक मुख्य विशेषता रही है। इन्होंने अपनी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद "Vinda Poems" (1975) के नाम से किया तथा ज्ञानेश्वरी और अमृतानुभव जैसे प्राचीन मराठी साहित्य का आधुनिकीकरण भी किया।
करंदीकर को वर्ष 2006 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान 39वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वी. एस. खांडेकर (1974) और कुसुमाग्रज (1987) के बाद ज्ञानपीठ पुरस्कार जीतने वाले वे तीसरे मराठी लेखक थे। इसके अतिरिक्त इन्हें केशवसुत पुरस्कार, सोवियत भूमि नेहरू साहित्य पुरस्कार, कबीर सम्मान तथा 1996 में साहित्य अकादमी फैलोशिप प्रदान की गई।
