Hindi Poetry Mohanjeet Kukreja

हिंदी कविताएँ मोहनजीत कुकरेजा



1. बूढ़ी किताब

(मूल रचना: शिव कुमार बटालवी: हिंदी अनुवाद: मोहनजीत कुकरेजा) मैं मेरे दोस्त तुम्हारी किताब पढ़ कर कई दिन हो गए हैं सो नहीं सका ! मेरे लिए यह किताब बूढ़ी है इसके शब्दों के हाथ कांपते हैं इसकी हर पंक्ति सठियाई हुयी है यह जल के बुझ चुके अर्थों की आग है यह मेरे लिए शमशानी राख है ! मैं बूढ़े हांफते इसके शब्द जब भी पढ़ता हूँ और झुर्रियाये वाक्यों पर नज़र धरता हूँ तो घर में देख कर इस शमशानी राख से डरता हूँ और इसके बुझ चुके अर्थों की आग में जलता हूँ. जब मेरे घर में यह बूढ़ी किताब खांसती है हांफती और ऊँघती अर्थों का घूंट मांगती है तो मेरी नींद के माथे पर रात कांपती है ! मुझे डर है यह बूढ़ी किताब मेरे ही घर में कहीं मर ना जाये और मेरी दोस्ती पर हर्फ़ आये. इसलिए मेरे दोस्त मैं यह बूढ़ी किताब लौटा रहा हूँ अगर ज़िंदा मिल गयी तो एक ख़त लिख देना और अगर रास्ते में मर गयी तो कोई ख़त भी नहीं तुम्हारे शहर में भी क़ब्रों की कोई कमी नहीं ! मैं मेरे दोस्त तुम्हारी किताब पढ़ कर कई दिन हो गए हैं सो नहीं सका !

2. प्रतिबिंब!

आज... बरसों के बाद मन के आईने में ख़ुद को देखा मैंने. पहले सी मासूमियत कहीं भी तो न थी. आँखों से जो सच्चाई झाँका करती थी खो चुकी थी कहीं. मक्कारी का कालापन चेहरे की रंगत में झलकने लगा है. अंतरात्मा पर निरंतर बढ़ता बोझ झुर्रियाँ बनने लगा है. और ख़ून की तरह बाल भी कहीं-कहीं सफ़ेद हो चले हैं...

3. चेतना

याद है वो दिन... जब ख़्यालों की दुनिया में मैं कुछ ज़रूरत से ज़्यादा ही खो गया था... कुछ सोचते-सोचते, लगभग बेसुध हो गया था ! फिर जब चेतना लौटी... तो मैंने पाया - कुछ लोग लिए जा रहे थे काँधों से लगाए - मेरी ही अर्थी को ! जनाज़े के पीछे की भीड़ को मैंने ग़ौर से देखा, काफ़ी लोग थे - जाने-पहचाने और कुछ अनजाने ! कुछ ऐसे चेहरे, जिन्हें मैं पहचानता था; और कुछ ऐसे, जो शायद मुझे जानते रहे हों ! सब की आँखें नम थीं और ज़ुबाँ पर मेरे अफ़्साने थे - ‘ख़ुदा जन्नत बख़्शे... बहुत ख़ूबियां थीं मरने वाले में !’ मुझे लगा मैंने शायद कुछ जल्दबाज़ी की, इन सबको तो वाक़ई मुझ से प्यार था... पर दिल ने दलील पेश की - ‘तूने कोई ग़ल्ती नहीं की, ये मुर्दा-परस्त लोग बस यूँ ही किया करते हैं !’ और मैं... एक बार फिर ‘अचेत’ हो गया था ! मुझे आज भी याद है वो दिन !!

4. तालिबानी फ़रमान

(मूल रचना: डा. रमेश कुमार; हिंदी अनुवाद: मोहनजीत कुकरेजा) तुम्हारा यह तालिबानी फ़रमान कि मैं नज़्म तो कहूँ पर होंटों पर अपने शब्द चिपका कर ख़ामोश घूमता रहूँ अर्थों की निरथर्क गलियों में ‐ तुम्हारा यह तालिबानी फ़रमान तुम्हारा यह तुग़लकी फ़रमान । नज़्म कही तो जाए लिखी न जाए । लिखी जाए पर पढ़ी न जाए । और पढ़ी जाए तो सिर्फ़ मूक रह कर ‐ तुम्हारा यह तालिबानी फ़रमान तुम्हारा यह तुग़लकी फ़रमान । कोई क्या खाये क्या पहने क्या लिखे क्या गाये ‐ तुम्हारा यह तालिबानी फ़रमान तुम्हारा यह तुग़लकी फ़रमान । शब्द हूँ ‐ सोच हूँ वाक्य हूँ एक मैं बीज बन के पनप जाऊँगा बंद‐प्रतिबंद की मिट्टी से ‐ इक रोष-वृक्ष बन उग आऊँगा । मैं हाज़िर हूँ मेरे दोस्तो अपने माथे पर जलते‐सुलगते शब्द सजा कर, किसी मुकुट जैसे… किसी ताज की तरह एक समूची‐सालम नज़्म बन कर ।

5. अभिव्यक्ति

रुकता है सोचना मेरा, किसी ब्रेक की आवाज़ से, एक और दुर्घटना… कोई घायल हुआ होगा, या मर ही गया हो शायद ! उतसुक्ता से सामने देखता हूँ - मगर यह क्या? क्रोध और दया के मिश्रित से भाव चेहरे पर लिए ड्राईवर तो मुझे ही घूर रहा है ज़िंदगी से उक्ताया हुआ या फिर कोई पागल समझ कर ! यत्न कर के ख़ुद को उसकी गाड़ी के आगे से हटाता हूँ… उस बेचारे का भी क्या दोष? दीवाना तो मैं हूँ ही… जो यूँ सड़कों पर निकल पड़ता हूँ जैसे शब्दों की तलाश में… विचारों की अभिव्यक्ति के लिए !!

6. जुस्तजू-ए-हमराह

ख़ुद इश्क़ का फ़साना था तेरी आँखों का दीवाना था... जिसकी सुबह तू... शाम तू हयात का दूसरा नाम तू ! टूट कर जिसने तुझे चाहा हर अदा को तेरी सराहा... इबादतों में लिया तेरा नाम, ओ बुत-परस्ती का इलज़ाम ! सिर्फ तेरी ही थी एक चाह तू ही बस जुस्तजू-ए-हमराह... हर सोच में.... हर एक बात में, तू बसी थी जिसकी ज़ात में... जिसके ज़ेहन में थी तू नक़्श मर गया कहीं कल वो शख़्स, मर गया कल वो ही शख़्स !!

7. साथ... एक ख़्वाब!

बहुत दूर तक रहा बहुत देर तक रहा बड़ा तो हुआ मगर पूरा नहीं मैंने भी बुना था एक ख़्वाब ! बहुत दूर तक चला बहुत देर तक चला मंज़िल तक मगर पहुँचा नहीं मैंने भी चुना था एक साथ !!

8. समस्या!

आज फिर मैं उदास हूँ... लेकिन आज की उदासी में आ जुड़ी है परेशानी एक - ठीक वैसी शान्ति की तरह जो गुज़र चुके किसी तूफ़ान या शायद अपेक्षित किसी तूफ़ान का प्रतीक सा हो! जब मैं उदास होता हूँ तब तुम्हारी याद आती है, या मैं तब उदास होता हूँ जब तुम्हारी याद आती है! शान्ति को... तूफ़ान को उदासी को, तुम्हारी याद को आख़िर कौन सा क्रम दूँ?!

9. बदलाव

बरसों किया है इन्तज़ार… तुम्हारा कुछ इसी तरह से. लहरों के उतार-चढ़ाव… और डूबते हुए सूरज को, देखते इसी समुद्र-तट पर. शिकायत वादा-खिलाफ़ी की हो भी तो किस तरह…? निभाने के लिए तुमने… कोई वादा किया ही कब था! पर वो नाहक़ सी कोफ़्त वो बिना वजह की उलझन, नहीं हुआ करती मुझे अब… इन लहरों के 'उतार' से इस 'डूबते' हुए सूरज से मोहब्बत जो हो गयी है !!

10. कविता

कभी-कभी... घंटों... एकान्त में किसी उदास से माहौल में बैठ कर अपनी ज़िन्दगी के अतीत में से तन्हा और उदास से जीये हुए पलों को तल्लीनता से सोचने पर; या कभी... ख़ुद-ब-ख़ुद (!) दिलो-दिमाग़ में एक हलचल सी मचाकर कोई भूली सी याद शब्दों का रूप धर पन्नों पर उभर आती है...!

11. महबूब से…

सभी चेहरा छुपा कर निकलते हैं इक-दूसरे से कतरा कर चलते हैं हरेक दिल में बदगुमानी बहुत है ! इश्क़-मोहब्बत की भी कैसे बात हो रोज़ी-रोटी के मस्लों में दम ना रहा आँखों में इन दिनों वीरानी बहुत है ! तेरी अदा अब भी दिल-फ़रेब होगी अपने हुस्न के जलवों में ना उलझा अभी ज़िन्दगी में परेशानी बहुत है !

 
 
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