मराठी कविता हिंदी में : कुसुमाग्रज

Marathi Poetry in Hindi : Kusumagraj



रीढ़

"सर, मुझे पहचाना क्या?" बारिश में कोई आ गया कपड़े थे मुचड़े हुए और बाल सब भीगे हुए पल को बैठा, फिर हँसा, और बोला ऊपर देखकर "गंगा मैया आई थीं, मेहमान होकर कुटिया में रह कर गईं! माइके आई हुई लड़की की मानिन्द चारों दीवारों पर नाची खाली हाथ अब जाती कैसे? खैर से, पत्नी बची है दीवार चूरा हो गई, चूल्हा बुझा, जो था, नहीं था, सब गया! " 'प्रसाद' में पलकों के नीचे चार क़तरे रख गई है पानी के! मेरी औरत और मैं, सर, लड़ रहे हैं मिट्टी कीचड़ फेंक कर, दीवार उठा कर आ रहा हूं!" जेब की जानिब गया था हाथ, कि हँस कर उठा वो... ’न न’, न पैसे नहीं सर, यूँ ही अकेला लग रहा था घर तो टूटा, रीढ़ की हड्डी नहीं टूटी मेरी... हाथ रखिए पीठ पर और इतना कहिए कि लड़ो... बस!" मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

चांद और सूरज ख़त्म हुए

चांद और सूरज ख़त्म हुए सारे सितारे ख़त्म हुए ख़त्म हुए सब दरिया दरिया सारी हवाएं ख़त्म हुईं...! गर्मियों के बादल की तरह मोरों की मानिंद सीना फुला कर खड़े रहो शोलों सी नज़रों से बेंध के देखो नज़रें और कहो आग़ोश तुम्हारी जन्नत है ! काई लगे अल्फ़ाज़ और क़ाफ़िया बंदी से क्या होगा ? डामर की सड़क पर सावन की सतरंगी डाल के क्या होगा ? गर्मियों के बादल की तरह आवारा हवा में फिरते रहोगे वक़्त निकल जाने से पहले, आंखें खोलो बहुत हुआ तो, बारह महीने, ग़म की मारी बैठी रहेगी उस के बाद भी, क्या शादी का दावतनामा नहीं आयेगा ? इसलिये कहता हूं वक़्त निकल जाने से पहले, आंखें खोलो प्यार नहीं, अलफ़ाज़ की हण्ड कलया का खेल... जंगल की आग बनो, और आग में जलते रहो प्यार करो ''भीलों'' की तरह... तीर की नोक पे रखा हुआ मिट्टी में उगा, पर बादल को छूता हुआ अल्फ़ाज़ के कुहरे में मत अटको अल्फ़ाज़ के कुहरे में मत अटको टीले पर परचम की तरह फड़फड़ाओ नहीं बिखरा दो ये तूफ़ां सारा प्यार करो ''भालों'' की तरह तीर की नोक पर रखा हुआ ! मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

केक का टुकड़ा

होटल की छत पर बैठे रहमदिली से फेंका उस ने चौक्लेट केक का एक बड़ा सा टुकड़ा रस्ते के कुत्ते के लिए! कुत्ता लपका.... होटल के साए में खड़ा गन्दा एक फटीचर लड़का जान का ज़ोर लगा कर भागा कुत्ते की रफ्तार को मात किया, और कब्ज़ा जमा कर टुकड़े पर, कुत्ते को मौका न दिया, और बेग़ैरत फांक गया! छत पर बैठे रहमदिल ने शेवाराज़ रीगल व्हिस्की का प्याला होंठों से लगाया और कहा.... उफ़्फ़ ! ये हलकट छोकरे !! मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

आख़िर हासिल

आधी रात बीत चुकी तो, शहर के पाँचों पुतले एक थड़े पर बैठ गए और आंसू पिघलाने लगे 'ज्योतिबा बा थे, बोले "मैं तो आख़िर ठहरा मालियों का । " शिवाजी महाराज भी बोले, " और मैं सिर्फ़ मराठों का । " बोले अम्बेडकर, "मैं तो बोधियों का ही ठहरा।" तिलक ने कहा कि ''मैं चितपावन ब्राह्मणों का हूँ।" गाँधीजी ..... तब रुँधा गला खँकार के बोले, "आप बड़े खुशकिस्मत हैं सब कम से कम एक जमात तो, फिर भी आप के पीछे है। मेरे पीछे तो.... सरकारी कचहरियों की दीवारें हैं !! " मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

शोहरत

शोहरत मतलब पहले दिन तो फूलों का..... सहरा और साफा ! दूसरे दिन कूड़े में. कुछ और इज़ाफा ! मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

रद्दी

एक दफा, जब राशन ख़त्म हुआ था तो रद्दी निकाली थी घर से कि बेच आएँ ! हँस के कहा था तू ने तब कहो तुम्हारी नज़्में भी डाल दूँ उन में ? उन से वज़न बढ़ जाएगा। मैंने कहा था : "कल जो वक़्त करेगा, वो मत आज करो!" आँखे भर आई थीं तेरी ! और कहा था "मैं तो क्या..... वो वक़्त भी न कर पाएगा !!" मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

कर्ज

मेरी मिट्टी मिटाये से नहीं मिटती फलक मुझ से हटाये से नही हटता फलक मिट्टी के इस जद्दोजहद में मेरे जख्मों का कर्जा चुकाए से नहीं चुकाता मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

मेरे घर में

मेरे घर में फकत अल्फाज का धन है गिला कोई नहीं उस का । मगर महसूस होता है। कि लेते देते लफ्जों को कुछ ऐसा हो गया है ये दिल भी इक धड़कता लफ्ज बन के रह गया है । मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

हैरत

आदिवासी बुढिया वो जान की मारी गिरती पड़ती एक पहाड़ी के कोने से ऐसे सट के खड़ी रही पत्थर से चिपकी छिपकली जैसी, उधड़ी खुदड़ी, नंग धडंग झुर्रियों से भरी चमड़ी में ठँसी हड्डियों का पिंजर ! इक पल आदिवासी बनकर देखा मैं उस की तरफ उफ्फ तोबा ! उस की छाती के लटके लोथडे से झूल रहा था, अपना पार्लियामेन्ट और दूसरे लोथडे से हमारा साहित्य सम्मेलन !! मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

खामोशी

एक थके से पेड़ के पास, कोयल आई, बोली, "गाना गाऊँ क्या?" पेड़ मगर कुछ बोला नहीं कोयल उड़ गई ! और थके से पेड़ के पास आई बिया और बोली "मै घोंसला बनालूँ क्या ?” पेड़ मगर, कुछ बोला नहीं और बिया भी उड़ गई। एक थके से पेड़ के पास, चाँद की फाँक आई, और बोली "शाखों में छुप जाऊँ क्या?" पेड़ मगर खामोश रहा चाँद की फाँक भी लौट गई! और थके से पेड़ के पास, बिजली आई बोली, "क्या आगोश में आऊँ ?" पेड़ की टूटी खामोशी मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

सातवां

चमचों के स्टेंड पर.... सात चमच थे, हमेशा एक चमच, एक दिन गुम हो गया छः बचे थे । छइयों के लब से ही पहली बार बेअख्तियार एक सिसकी निकली बोल उठे, "वो होती तो..... खोता नही वो!" मैं भी मजबूरन ..... सातवां चमच हुआ और उस की खाली जगह लेकर छ, छइयों की सिसिकयों में हो के शामिल, बुदबुदाया, "सच है यारो, वो जो होती, मैं खो न जाता !!" मूल मराठी से अनुवाद : गुलज़ार

समझ

और एक— मैं ऐसा समझ रहा था जीवन की आधार-शिलाओं को बिखेर देने वाला प्रेम मैं किसी से कभी नहीं कर पाऊँगा, लेकिन तुम अपना अस्थिमय हाथ मेरे हाथ में दे देती थीं और मृत्यु की नद बनी हुई और फिर भी स्मित का प्राणांतिक प्रयास करने वाली आँखों से मेरी ओर देखती रहती थीं, तब— वह भी समझ... मूल मराठी से अनुवाद : लीला बांदिवडेकर

डोली

भोर के तारों के कंधों पर बैठकर आती है एक डोली मेरे द्वार पर, केशर किरणों के पर्दे के पीछे जिसमें बैठा होगा एक कोयल गीत। मूल मराठी से अनुवाद : लीला बांदिवडेकर

स्वायत्त

तुम्हारे संतप्त शब्दों का स्पर्श तुम्हारे ओंठों ने नकारा और तटस्थ स्वायत्तता से वे थरथराते रहे मेरे ओंठों की ओर छलाँग भरने के लिए। मूल मराठी से अनुवाद : लीला बांदिवडेकर

पेड़

तुम ही हो वर्षा तुम ही हो धूप मैं सिर्फ़ एक पेड़ आसमान में चिना हुआ तुम्हारा वर्षाघात तुम्हारा धूपाघात तुम्हारी आँधी देह पर सहते-सहते थका हुआ। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

मुक्त

पिंजरा तोड़ कर मुक्त हुआ वह पंछी —ज़ख़्मी पंखों के ख़ून से हरी भूमि पर लाल सर्पिल रेखा खींचता हुआ उड़ रहा है अपने घोंसले की ओर, शायद अपनी मृत्यु की ओर भी लेकिन— उसके पास करुणा से देखने वाला सारा आकाश भी नहीं छीन सकता रक्तसना उसका आनंद... अभिमान... पिंजरे को तोड़ने का। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

नज़र

मार्क्स रसल जैसे सारे निरीश्वरवादी ठहरते हैं सृष्टि के उद्गम संबंधी एक क़ायदे के पास उदय नहीं, अंत नहीं रूप नहीं, रंग नहीं इस पार नहीं, उस पार नहीं ऐसे पार्थिव क़ायदे के पास एक स्वयंभू बोधहीन अस्तित्व के पास मेरा तर्क इससे सहमत है और फिर भी लगता है कि इन निरीश्वरवादियों ने उत्तर रात्रि में उठकर देखा नहीं कभी भी तारों से खचाखच भरा अपार कुहरे से शराबोर आकाश मेरी नज़र से। पिंजरे को तोड़ने का। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

सँभलकर

सॉक्रेटिस के प्याले का विष यहाँ गिरा है गौतम गाँधी के करुण अश्रु सिंचित ये हैं रक्त येसू का बहा सूलि से इस भूमि पर दलदल में इस यात्री, रखना क़दम सँभलकर। पिंजरे को तोड़ने का। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

देना

माटीपन मेरा मिटाए नहीं मिटता आकाशपन मेरा हटाए नहीं हटता आकाश माटी के इस संघर्ष में मेरा ज़ख़्मों का देना चुकाए नहीं चुकता। पिंजरे को तोड़ने का। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

दुशाला

बर्फ़ से अटा पड़ा यह प्रारंभहीन दिगंत प्रदेश क्षितिज की सीमा तक दिखता नहीं कुछ भी, सिर्फ़ बर्फ़ रूपरसगंध के समस्त समुद्र जमाने वाली अनंत रहस्यों के द्रव अपने निःशब्द में संचित करने वाली जगत्-युगों की सीमाओं को भाव-शून्य स्मिति में शीलित करने वाली केवल बर्फ़ इस बर्फ़िस्तान के मध्य पर उगी वह नन्हीं-सी चंद्रशाला सात रंगों की सहस्रों शलाकाओं को अंतराल में बिखेरने वाली रूपनगर की राजकन्या इस शिल्पफूल ने दी है उस सार्वभौम बर्फ़ को पराजय और फेंका है उसकी नग्नता पर कलाबत्तू का दुशाला नाम का अस्तित्व का और अर्थ का भी। पिंजरे को तोड़ने का। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

आश्चर्य

वह आदिवासी बुढ़िया प्राणांतिक भय से छटपटाती पहाड़ के कगार के पास गई और चिपक कर खड़ी रही छिपकली की तरह, पत्थर से नंग-धड़ंग हज़ारों झुर्रियों की त्वचा में ठूँसी हुई हड्डियों की जीर्णाकृति मैं क्षण-भर के लिए बना आदिवासी और उसकी ओर देखा, अहो आश्चर्य उसके एक थन की गठरी से लटक रहा था हमारा पार्लियामेंट और दूसरी गठरी से लटक रहा था हमारा साहित्य सम्मेलन। पिंजरे को तोड़ने का। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

अनुप्रास अकाल का

धूप में तपी गिट्टी तोड़ने से टूटती नहीं स्तन से चिपका बालक छोड़ते छूटता नहीं उंगली से बहता ख़ून रोकते रुकता नहीं बाई तोड़ती रही बाई टूटती रही। पिंजरे को तोड़ने का। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत बांदिवडेकर

रीढ़ की हड्डी

“पहचाना क्या मुझको सर?”—बारिश में गूँजी वाणी मैले-मैले से कपड़े थे बालों पर था पानी क्षण-भर बैठा, हँसा, बाद में बोला ऊपर देख : “गंगा मैया पाहुन आई, नीड़ में रहकर नेक, मैके आई बेटी जैसी, घर में नाची, रही ख़ाली हाथों जाए कैसे—पत्नी ही बच गई— चूल्हा बुझा, ढही दीवार, समेट ले गई पूरा प्रसाद जैसा पलकों भीतर पानी थोड़ा भरा— बीवी जी को साथ लिए मैं जूझ रहा इस बेला खड़ी कर रहा हूँ दीवार, निकाल रहा हूँ मैला”— जेब की ओर बढ़ता हाथ देखकर हँसने लगा “पैसे नहीं चाहिए सर, अकेलापन लगा— टूट चुकी है गृहस्थी मेरी, रीढ़ न टूटी पर रखकर हाथ पीठ के ऊपर ‘लड़ो’ कहिए सर!” मूल मराठी से अनुवाद : विजया वावदे

वही जाने

त्वष्टा ने कातकर निकाला सूर्य संज्ञा के संतोष के लिए अपने ही बढ़ई के चक्र पर, वैसे ही कात रहा है मुझे सूर्य काल के करवती चक्र पर और फेंक देता है मेरी अनगिनत फाँकें सहस्र स्थानों पर करोड़ों क्षणों पर पलों-छिनों से काता हुआ मैं अनेक स्थलों से निगला हुआ मैं असंख्य घटनाओं से तोड़ दिया गया मैं शेष कितना बचा हूँ? सूर्य ही जाने! मूल मराठी से अनुवाद : विजया वावदे

आनंद-लोक

मेरे आनंद-लोक में चंद्र नहीं डूबता दरिया अथाह प्रेम का तूफ़ानी नहीं बनता मेरे आनंद-लोक में घर बसाया वसंत ने हर आम की शाख़ पर फूटे कोयल के स्वर सात रंगों की महफ़िल बहती इन हवाओं में यहाँ नाचती है मृत्यु भी मोरपंख से सजकर। मूल मराठी से अनुवाद : विजया वावदे

दाँव

गोधूलि के कोहरे में कमर पर कलश धरकर माथे पर सिंदूर लगाकर चल पड़ीं तुम देख-देखकर राह पथराईं आँखें मेरी मुड़े डरे से क़दम नदी की ओर ज्ञात हुआ तुम्हारा दाँव कलश गिरा तीर पर कुंकुम की रेखाएँ चार जल पर। मूल मराठी से अनुवाद : विजया वावदे

गीदड़

आसमान लाल भड़कीला रक्तरंजित माँस खंडों से खचाखच भरा हुआ— और ज़मीन पर उस आकाश की ओर एकटक देखते गीदड़— निश्चल असंख्य इस क्षितिज से उस क्षितिज तक। मूल मराठी से अनुवाद : विजया वावदे

चिड़िया

शाख़ पर चिड़िया भूरी सफ़ेद चूँ-चूँ करती— मेरी ओर देखती नभ की ओर देखती चूँ-चूँ करती— शाख़ पर चिड़िया भूरी सफ़ेद रुमझुम नाचती मन मेरा घीसता— चिड़िया का आना-जाना आकाश में होता है तभी उसे बहुत कुछ ज्ञात होता है। मूल मराठी से अनुवाद : विजया वावदे

प्रार्थना

जब महापुरुष मरते हैं तब जगह-जगह के संगमरमरी पत्थर जग जाते हैं और चौराहे पर शिल्प में उनकी आत्माओं को चिनकर उन्हें मार डालते हैं फिर एक बार... शायद हमेशा के लिए इसलिए— महापुरुष की मृत्यु होती है दो बार, एक बार शत्रु के द्वारा और फिर भक्तों के द्वारा ऐसी संगमरमरी मृत्यु तुम्हें न मिले इस शुभ दिन पर यही मेरी आंतरिक प्रार्थना। मूल मराठी से अनुवाद : विजया वावदे

संस्कृति

और अंत में संस्कृति है शक्ति मेरे मन की जो असीम है सीमा उसे देने की विश्वात्मक ईश्वरता को मंदिर की... मूर्ति की... मृत्यु के तीर-हीन सागर को मोक्ष की... भक्ति की... प्रेम की... शक्ति की... यह संस्कृति तार रही है मुझे मार भी रही है मुझे। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत देवताले

तात्पर्य

चोर के भाल पर वेश्या के स्तन पर मवाली की कलाई पर कभी— मैंने पढ़े हैं शिलालेख निथरी महात्मता के और कभी पढ़े हैं— सज्जनों के स्मित पर साधु-संतों की कफनियों पर सचिवों की फ़ाइलों पर ताज़ा क़लम— वेश्यावृत्ति के मवालीगिरी के चोरपन के तात्पर्य— संज्ञा स्थिर हो तो भी प्रवृत्तियाँ प्रवाही हैं। मूल मराठी से अनुवाद : चंद्रकांत देवताले

आगगाड़ी और ज़मीन

मत रौंदो ..! मत रौंदो चीख़ती ज़मीन थी! आँखों में बिनती थी पैरों पर लीन थी!! बदन पर हो दौड़ती मस्ती रफ़्तार में ! दब रही हूँ मैं नीचे मिट रही हूँ कण-कण में !! फ़ौलादी सीने में बना दिए है सौ छर्रे ! फेंक रही हो ऊपर से अनगिनत अंगारे !! मत रौंदो मत रौंदो चीख़ती ज़मीन थी! मत जलाओ यूँ मुझे मस्ती में झूमती !! छोड़ कर फव्वारा धुएँ का बादल में आगगाड़ी गुर्राई मस्ती थी हलचल में कायर ! लाचार !! तुम !!! चीख़ती रहो हरदम ! रहती क्यूँ इस जग में , गर नहीं है तुझ में दम ? छाती पर रखूँगी फ़ौलादी ये पग ! रौंदती मैं दौडूँगी देखता रहे जग!! फिरो फिरो चक्कों तुम तेज़ रफ़्तार से गरज़ते रहो हरदम शोर और पुकार से कर्कश थी सीटियाँ गर्वोन्नत गाड़ी थी! पेट में थे अंगारे बेख़ौफ़ दौड़ी थी!! धड़म-धड़ाम दौड़ती पहाड़ चट्टान में मीलों का फ़ासला लाँघती थी वो पल में सुन कर उस गाड़ी का उद्दंड सा वचन ! गुस्से में उबलती हिल रही थी अब ज़मीन !! कायर ! लाचार !!मैं ! क्रोध और त्वेष था ! डर गए पहाड़ खाई मही का आवेश था !! बदले की आग का नारा बुलंद था ! लंबा सा पुल पल में खाई में ढेर था !! पल में धुआँ-धुआँ डरावना आक्रोश ! हिल रहा था जंगल काँप उठा आकाश ! उलटी-पल्टी आगगाड़ी गिर गई थी नीचे ! टुकड़ों में चूर-चूर कुछ न बचा पीछे !! मूल मराठी से अनुवाद : स्वाती ठकार

क्रांति का जयजयकार

गरजो जय-जयकार क्रान्ति का, गरजो जय-जयकार और छाती पर झेलो वज्रों के प्रहार खलखल करने दो शृंखलाएँ हाथों-पावों में फ़ौलाद की क्या गिनती, मृत्यु के दरवाज़ों में सर्पो! कस लो, कस लो, तुम्हारे भरसक पाश टूटे प्रकोष्ठ, फिर भी टूटेगा नहीं कभी आवेश तड़िघात से क्या टूटता है तारों का संभार? कभी यह तारों का संभार? गरजो जय-जयकार क्रुद्ध भूख भले मचाए पेट में तूफ़ान कुतरने दो ताँतों को, करने रक्त का पान संहारक कलि! तुझे बलि हैं देते आव्हान बलशाली मरण से बलवान हमारा अभिमान मृत्युंजय हम, हमें क्या हैं कारागार? अजी, क्या हैं कारागार? गरजो जय-जयकार क़दम क़दम पे फैल अंगारे अपने हाथों से हो के बेख़ुद दौड़ते हैं हम अपने ध्येयपथ पे रुके नहीं विश्रांति को, देखा नहीं कभी पीछे बांध सके नहीं हमें प्रीति या कीर्ति के धागे एक ही तारा सन्मुख और पाँव तले अँगार हाँ था पाँव तले अँगार! गरजो जय-जयकार हे साँसो! तुम जाओ वायु संग लांघ यह दीवार कह दो माँ से हृदय में हैं जो जज़्बात कहो कि पागल तेरे बच्चे इस अंधियारे से बद्ध करों से करते हैं तुम्हें अंतिम प्रणिपात मुक्ति की तेरी उन को थी दीवानगी अनिवार उन को थी दीवानगी अनिवार, गरजो जय-जयकार फहराते तेरे ध्वज बंध गए हाथ शृंखला में यश के तेरे पवाड़े गाते आए फन्दे गले में देते जो जीवन अर्घ्य तो कहलाए दीवाने माँ दीवानों को दोगी न तेरी गोद का आधार? माँ तेरी गोद का आधार? गरजो जय-जयकार क्यों भिगोती हो आँखें, उज्ज्वल है तेरा भाल रात्रि के गर्भ में नहीं क्या कल का उषःकाल? चिता में जब जल जाएंगे कलेवर ये हमारे ज्वालाओं से उपजेंगे नेता भावी क्रांति के लोहदण्ड तेरे पावों टूटेंगे खन-खनकर हाँ माँ! टूटेंगे खन-खनकर, गरजो जय-जयकार ओंकार! अब करो ताण्डव लेने को ग्रास नर्तन करते पहन लिए हैं गले में पाश आने दो लूटने रक्त और माँस गिद्धों को क्रूर देखो-देखो खुला कर दिया है हम ने अपना उर शरीरों का इन करो अब तुम सुखेनैव संहार मृत्यो! करो सुखेनैव संहार! गरजो जय-जयकार गरजो जय-जयकार क्रान्ति का गरजो जय-जयकार मूल मराठी से अनुवाद : सीताराम चंदावरकर

निजधर्म

गुण दिन का होता प्रकाश है रात्री का गुण श्यामलता नभका गुण हैं निराकारता मेघों का गुण व्याकुलता श्रेयस्कर वह हो या ना हो निजधर्म बिना है नही गति कैद चराचर अपने गुण में वहीं मुक्तता वहीं रति क्या कह सकते कभी धरासे नदिया के सम बही चलो? चकाचौंध बिजली को, फूलोंपर शबनम सी खिली रहो? ऐसा ही मेरा होना भी इसके जैसा एक यही कालचक्र की अनंततामें एक समान दूजा नाही अछेद्य मुझसे अभेद्य मुझसे बुरा-भलापन मेरा छूट गया गर शून्य के सिवा बाकी रहा क्या मेरा? मूल मराठी से अनुवाद : लीना मेहेंदळे

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