हिन्दी कविताएँ : जयचन्द प्रजापति 'जय'

Hindi Poetry : Jaychand Prajapati Jay


एक नाबालिक लड़की

एक नाबालिक लड़की अपनी मां से निवेदन करती है, मां, मेरा ब्याह कर दो अब बड़ी हो गयी हूं खाना बना लूंगी सास ससुर की खूब देखभाल करूंगी कोई शिकायत नहीं आयेगी। अब तुम्हारा दुख देखा नहीं जाता अब तुम्हे अपनी चिंता से मुक्त करना चाहती हूं तुम फटी साड़ी में जब बाहर जाती हो तुम्हारे चेहरे की झांइयां आंखों का पीलापन बिल्कुल दुबली सी दिखती हो जब कोई काम नहीं मिलता सड़कों पर हाथ फैलाते देखती हूं तुम्हारे होंठों की पपड़ी मेरे लिये दो रोटी की जुगाड़ करती हो मेरे लिए तुम डांट सहती हो कोई गड़बड़ी होती है जब मालिक तुम्हारे उपर गंदी नजर फेरता है जल्दी से ब्याह कर दो कोई गहने नहीं मांगूगी चिंता मत करना मां पापा होते तो ब्याह के लिये नहीं कहती तुमसे पढने के लिये दूर शहर जाने को कहती अभी दो साल और रुक जा तभी ब्याहना जब अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं पर मां तुमको हंसते हुये देखना चाहती हूं इसलिए ब्याह करना चाहती हूं।

हम फुटपाथ के आदमी हैं

हमारी जिंदगी फुटपाथों से होकर गलियों मे ठोकरें खाते हुए आज यहां, कल वहां रोकर गुजर जाती है अगले दिन चालू होता है फिर ये लिपटी सी जिंदगी फटी चादर में लाचारी का चादर ओढ़े कई दिन बीत जाते हैं बिन नहाए धोए ये लम्बे लम्बे बाल कई साल गुजर जाते हैं नाई के पास गए पढ़ना चाहता था पर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा हूं बेच रहा हूं ये मासूम जिंदगी टुकड़ों-टुकड़ों में न मिलती रोटी ठीक से आधे पेट में आधी रात तक जागता हूं रोटी की तलाश में इसी तरह से गुजर जाती है हम जैसे लोगों की हम फुटपाथ के आदमी हैं हम लोगों की जिंदगी लतियाई हुई है

बचपन

बचपन कितना मजेदार था एक नई दुनिया थी एक नया रंग था घूमती एक दुनिया थी हंसता बचपन था इस मिट्टी में रोशनी थी फुदक फुदककर कुदते थे इस गली में, उस गली में तितलियों की उड़ान की तरह इन हथेलियों में घी चुपड़ी रोटी होती थी दरवाजे पर बैठ कर पिल्ले को पुचकारते थे उन बकरी के बच्चे साथ कूदते थे बछड़े कूदती थी गौरैया आंगन मे दादी के साथ पकौड़ी खाते थे वे दिन याद हैं जब खेतों से मटर की फलियां तोड़ लाते थे बेर के पेड़ो पर डंडियो से तोड़ते थे मजे थे बचपन मे नही चिंता थी दो जून की रोटी की खिलौने के साथ दिन गुजर जाता था

एक उदास जज

एक उदास जज को मैं देखा सब सुविधाएं हैं अच्छी सी तनख्वाह है। नौकर चाकर एक खूबसूरत पत्नी एक शानदार बंगला है। मैंने पूछा, आप फिर भी चिंतित हैं चेहरे की लालिमा फीकी है इस तरह व्यथा से युक्त जीवन देखकर मैं हैरान हो गया। जज बोला, जिस न्याय करने का इतना तनख्वाह लेता हूं। इस अन्याय के बाजार में मेरा न्याय दब गया है। मेरा न्याय अपंग सा हो गया है यही सोंचकर मैं उदास हूं।

वे दौर थे पहली कक्षा का

वे दौर थे पहली कक्षा का तख्तियां लेकर सरकारी स्कूल में बोरी का झोला लिए जाते थे पढ़ने टाटपट्टी पर बैठते थे कालिख से पोतकर तख्तियां ले जाते थे पूरे चेहरे पर कालिख लग जाती थी मुंशी जी हम लोगो को पढा़ते थे रटवाया जाता था वर्णमाला गिनती, पहाड़ा तख्तियों पर दूधिया से नरकट की कलम से लिखते थे मुंशी जी बहुत मारते थे गलत लिखने पर रामू को मारे थे एक डंडा पेशाब कर दिया था बिना चप्पल के फटा शर्ट पहनकर फटी चड्डी में नाक बहती रहती थी हाथ से पोंछ लेते थे लंच के लिए अचार रोटी ले जाते थे टोंटी से हथेलियों से पी जाते थे आधा लीटर पानी जब किसी की चाक चुरा लेते थे किसी की कलम मारामारी हो जाती थी डर के मारे पेट में दर्द का बहाना बनाकर कई दिन स्कूल नहीं जाते थे वे दौर थे पहली कक्षा का

हँसने दो

माँ मैं माँ नहीं बनना चाहती अभी खेलना चाहती हूँ लुकाछिपी का खेल करना चाहती हूँ ठिठोली उड़ना चाहती हूँ सपनों का पंख लगाकर यह लिपस्टिक ये चूड़िया ये बालियाँ घूँघरू पायल क्यों खरीद रही हो? नहीं चाहिये नथुनी और झुमका क्या तुम मेरा हँसना नहीं देखना चाहती हो? नहीं कैद होना चाहती पति के जेल में माँ लौटा दे इन श्रृंगारों को अभी हँसना चाहती हूँ खूब उड़ना चाहती हूँ हँसने दो अभी माँ

पीढ़ियाँ

वे बच्चे इंतजार करते हैं जिनके पापा शहरों में रहते हैं बड़ी आशा लिये खड़े होकर टीले पर से ताकते रहते हैं पैसा आयेगा नया कपड़ा लूँगा मेला देखने जाऊँगा प्रबल भावनाएं लिये बड़ी तीव्रता से इंतजार में रहते हैं गाँव के कोने में डरे हुये किसी की जमीन पर टूटी झोपड़ी में रहते हैं उन्हें पापा का सहारा नजर आता है माँ बच्चों के सहारे जीती है पापा दोनों के लिये जीता है इसी तरह से वहाँ कई पीढ़ियाँ गुजर रहीं हैं

वह मजदूर

वह मजदूर कठिन परिश्रम से बना रहा है देश को नव पथ को नये रूप में ढाल रहा है फिर भी जीता है फटी जिन्दगी हर साल मनाया जाता है मजदूर दिवस नये नये वादे वोट के लिये गढ़ दिये जाते हैं लालच का पुलिंदा झुनझुने की तरह थमा दिये जाते हैं कब बदलेगी तस्वीर उनके जीवन की कब तक वोट के लिये घिनौना राजनीति होगी या उसकी विवशता पर चाबुक गिरता रहेगा

हम वेश्या हैं

हम वेश्या हैं हमें ले चलो जैसा चाहे वैसा नोचों लील लो चाहे मुझे बिकती हूँ रोज होती हूँ शिकार शोषण का जी रही हूँ जिल्लत भरी जिन्दगी हमारा कोई समाज नहीं कोई अस्तित्व नहीं कोई परिवार नहीं ढकेली जाती हूँ इस गंदे धंधे में पुरूष मानसिकता ने जन्म दिया इस धन्धे को बहुत ढूँढा नहीं मिला कहीं भी पुरूष वेश्यालय बार बार सोचती हूँ चिंतित हो जाती हूँ

छेड़छाड़ का दंश

जब घर से निकलती है एक औरत घूरना शुरू हो जाता है पुरूषों द्वारा नियत पुरूषों की ताकती है उसके गदराये बदन को नजरों से पी जाने की हौंसले उड़ान भरने लगती है बाजार पहुंचते ही कई पुरूषों द्वारा छू ली जाती हैं भीड़ में कोई कमर छू लेता है कोई सट कर खड़ा मिलता है बसों में जाती औरत भीड़ में कई मर्दो द्वारा कई बार छेड़ी जाती है मजबूर औरत सिर्फ सहकर रह जाती है कोई स्थान नहीं है औरत मर्दों की शिकार न हुई हो कमोबेश हर औरत इसी तरह शिकार होती है कभी- कभी मार्केट जाती माँ और बेटी एक साथ छेड़छाड़ हो जाता है घर में कई दिन माँ बेटी की नहीं मिल पाती है नजरें कभी-कभी छेड़छाड़ की शिकार लड़की आत्महत्या कर लेती है विरोध करने पर मौत के मुंह में डाल दी जाती हैं

मुझे अनाथालय नहीं जाना है

कई सालों से मेरा एक सपना था मैं एक अच्छा सा बाप बनूँगा जब सुना पूरी जिंदगी की कमाई बेटे को बनाने में लगा दिया वह मुरारीलाल बुढ़ापे में अनाथालय में है बाप बनने का सपना छोड़ दिया मुझे अनाथालय नहीं जाना है

नारी की वेदना

नारी की वेदना सहनशीलता से भरी होती है। वह सह लेती हर दु:ख की घड़ी। बड़ी साहसी होती है उदारता की मूर्ति होती है हौंसलों की उड़ान भुजाओं में समेटे हुए रात दिन दु:ख सहकर अपने बच्चों को रोने नहीं देती है। माँ की ममता लिए हर वेदना को वह जहर का घूंट समझ कर पी लेती है। वह हर धूप को छांव में बदल देती है।

क्या मेरी कीमत नही है?

रामू की पत्नी हर बार लेती है पैसा रामू से हर बार प्यार के लिए पत्नी को बेवफा कहता है रामू वेवजह उसे पत्नी ने दबी जुबां से बोली कोठे पर हर बार के लिए हर बार कीमत लगाते हो मैं मांगती हूँ पैसा तो बेवफा कहते हो क्या मेरी कीमत नहीं है इस घर में जो कीमत नहीं लगाते हो

मां

मां मेरी परेशानियों में हर वक्त सुरक्षा कवच की तरह है जीवन में एक मां कोमल भावनाओं से भरती है ममता की मूर्ति होती है मां अपने बच्चो को भूखों नहीं सोने देती है मां ममता की छाया है मां स्नेह, करुणा की सागर है मां है सारी खुशी है

नारी

आज नारी बन गई है सबकी दुलारी झंडा फहरा रही है नभ में नारी को कौन कहता है अबला नारी है नारी तूने साबित कर दिखाया है नारी विजय पताका है चांद मंगल पर पहुंचकर दिखाया है सबको लोहा मनवाया

गांव का भोला भाला

गांव का भोला भाला एक दिन शहर आया शहर की आबोहवा उसको भाया नरम रवैया देखकर कुछ दिन यूं ही सड़क पर रात बिताया कुछ ने हमदर्दी दिखाया कुछ ने आत्मीयता दिखाया कुछ ने एक नजर न देखा कुछ ने अकड़ दिखाया कुछ तो भड़क गये जब कुछ मदद मांगी कुछ तो गंवार कहकर अपमानित शब्दों की बौछार की कुछ ने मारापीटा इस शहर की खुन्नस भाव देखकर फिर गांव भागा गांव में इतना अपमान नहीं मिलता गांव की खुली हवा गांव की मस्ती, अल्हणपन हरी भरी धरती हंसता सारा खेत सिवान फूलों की खुशबू सा प्यारा गांव

दादा जी

दादा जी बहुत याद आते हो जब हमने आपकी दाढी पकड़ी थी झकझोरी थी जब आपके थोथले गालों को धीरे धीरे सहलाते थे जब आप कहानियां सुनाते थे आपके बगल में खटिया पर लेटे रहते थे तब आप हमको कितना चाहते थे बाजार से लाते थे टाफियां और जलेबियां खिलाते थे जब अपनी पीठ पर बैठाते थे तोतली आवाज में कितना प्यार लुटाते थे मम्मी जब मारती थी दौड़कर मुझे गोद में ले लेते थे पेड़ों की डालियों पर बैठाते थे झूला झूलाते थे आपका जाना मेरे ह्रदय में शूल की तरह चुभना है बहुत यादें हैं आपके साथ जो भूलता नहीं है

दादी जी

दादी जी तुम कितनी प्यारी थी जब तुम अपने हिस्से के दूध से हमें दे देती थी अपने हाथों से दूध भात खिलाती थी मैं पानी से भिगो लेता था स्वयं को तब मेरे कपड़े बदलती थी कपड़े में लगे मिट्टी झाड़ती थी शाम होने पर हाथ मुंह धुलाती थी पानी पोंछकर अपने पल्लू से रात में लोरियां सुनाती थी पड़ोस से मिली मिठाई खुद न खाकर मेरे लिये रख देती थी दादी तुम अच्छी थी आज भी उतनी अच्छी लगती हो मेरे सपने में आती हो सचमुच दादी तुम

आदिवासी बच्चियां

ठंड में भी कम वस्त्र में आदिवासी बच्चियां टहनियां बीन लाती हैं बगीचे से खाना पकाने के लिये वह ईंधन की व्यवस्था करती हैं सहती हैं हर मार प्रकृति की फिर भी नहीं टूटती हैं बच्चियां मुश्कराते हुये सुअर चरानें जाती हैं भयंकर ठंड में भी हंसती मिलती हैं ये बच्चियां फटे पतले कपडों में बाग से फल लाती हैं खेतों में गिरे दाने भी वह बीनते नजर आती हैं कभी-कभी किसी के घर मिल जाती हैं काम करते कुछ पोटली में लिये हुये मुश्कराते हुये मां के साथ बाल मनुहार करने लगती हैं ये बच्चियां किसी से विवाद नहीं करती हैं किसी की तीखी बातों का हंस के सुन लेती हैं ये प्यारी आदिवासी बच्चियां

मैं भागकर शादी कर ली

मैं भागकर शादी कर ली कोई गुनाह नहीं की माँ बाप कमा पाते थे रात को इतना खाना मिलता था बिना पेट भरे पानी पीकर भर जाती थी पेट देखा नहीं जा रहा था माँ बाप की परेशानियां शादी कर ली भागकर माँ बाप का बोझ कम कर दी उस लड़के ने कहा शादी कर लो माँ बाप का बोझ मैं उठा लूंगा गरीबी में तुमने अन्त:वस्त्र कभी न खरीद सकी फटे वस्त्रों में तुम्हारा रुप धूमिल सा हो गया है मैंने भागकर इसलिए शादी कर ली कोई गुनाह नहीं की दो वक्त की रोटी नसीब कर ली माँ बाप का बोझ कम कर दी समाज की गंदी निगाहें अब घूरेगी नहीं

चंदामामा जी

चंदामामा जी रातों को जब आते हो हमको चाँदनी रात दिलाते हो आपका खूबसूरत मुखड़ा सच्ची राह दिखाते हो रात के राजा सबकेआँखों के तारा किससे मिलने आते हो? इतने सजधज के धवल कीर्ति लिये आँखों को मचलाते हो तुम ना बतलाओ लेकिन तुम चंदामामी से रात-रात फुसुर-फुसुर बतियाते हो

फूल

तुम कितने अच्छे हो भोली भाली सूरत लिये किसका हार बनोंगे? रात में जब खिलते हो होठों सी मुश्कान लिये खुशबू बिखेरते हो कोमल हो कितनी एक दिन मेरे घर आना मेरी प्रेयसी का गजरा बन जाना

सुनो हवा

सुनो हवा, कितने दिनों से झेल रहा हूँ विरह-वेदना को जलता बदन सूखी जिह्वा सूख गये होंठ तन-मन बना बावरा उस प्रियतमा की याद में सहें हैं भूख प्यास तू देख रही है मेरी दशा सुनो हवा! जाना तुम उसके पास खेल रही होगी कहीं बागों में आमों की डाली पर होगी बैठी इतरा रही होगी मदमस्त बेला में कोयल की आवाज से मिलाती सुर होगी हाथों में मेंहदी लगाये होंठों में लिये लालिमा चन्दा सा मुखमंडल लिये खुश होगी सुधि नहीं होगी या पीली चूनर ओढ़े झूल रही होगी सावन के झूले जाकर कहना उससे मेरी कथा बताना पड़ा है व्यथा में सूख गये हैं ये अश्रु जहां-तहां डूबा है तेरे प्रेम में ले-ले सुधि उसकी भी कहना मेरा हाल समझाना जी भर के मेरी तड़प बताना नींद उड़ी है जबसे मिलना बंद की हो कट नहीं रही तन्हाई बन जोगी राह निहारे मेरी कसम है भूल न जाना ये हवा, मेरा संदेश देना तुम तुमको खुशबू से भर दूँगा तेरी रंगत में सारा जहाँ कर दूँगा

प्रेमिका की मौत

मेरे और उसके बीच प्रेम गहराइयों तक भरा था रात दिन समाया था एक दूसरे में हर दिन किसी सावन से कम नहीं झूमता मन मुश्काराता जिस्म इन पहाड़ों की ओट में बादलों के झुण्ड में बागों के बीच में खुश था महकता खुशबू था जीते थे एक दूसरे के नैनों के सहारे बाहों में बाह हाथों में हाथ लिये कई सालों तक हम दोनों ने गुजारे थे मस्तियों की लौ जलती रही तेरी जुल्फों का लहराना चेहरे की सादगी तेरी गंभीरता ने दिवाना बनाया था बिक चुका था इन्हीं अदाओं पर नहीं भूले हैं उन झरनों के पास बीते क्षण भुलाये नहीं जाते आखिर तुम्हारी मौत नें मुझे मार डाला जीते जी तुम्हारा जाना मेरे हृदय का जाना है है कोई मेरी तड़प देखने वाला जो दे तुम्हारे जैसा प्रेम दे तुम्हारे जैसा रौनक मेरी जैसे भुजायें काट दी गई हो मेरी जिह्वा अलग कर दी गई हो मेरी रूह तड़प रही है तुम्हारे याद में

श्रृंगार रस की कविता की ताकत

मेरी श्रृंगार रस की कविता सुनकर एक युवती पिघल गई घर बार छोड़कर मेरे घर आ गई आपकी कविता मुझको भा गई मन समर्पित,तन समर्पित आप सादर स्वीकार करें मैं कई कवियों को ठुकरा के आई हूँ मेरे नयन मेरे होठों की नरमी से आपकी श्रृंगार रस की कविता परिपक्व होगी कहाँ से आई मुसीबत मैं तो काका की कविता चुरा के सुनाई थी बड़ी ढीठ थी वह मेरे करीब बैठ गई थी नयनों से घूर रही थी श्रृंगार रस मुझे पिला रही थी अब समझा श्रृंगार रस की कविता की ताकत मेरा घर बार उजाड़ रही थी

बन गया कवि

घर बार बेंचकर पत्नी मायके भेजकर बन गया कवि विरह वेदना में लगा जलनें वियोग का बना कवि किसी कविता पर एक फूटी कौड़ी न मिली जूता फटा है मोजा फटा है तीन दिन से भूखा सो रहा हूँ सारा नशा गया उतर कवि नहीं बनूँगा यह धंधा बहुत खोटा है कवि खुद मरा है दूसरों को क्या उबारेगा

उठो

उठो समय आया है नव नभ में उड़ने की नयी बेला में नव उपवन में लिखो नया सबेरा नई किरण नई आशा का नव संचार करो कहते जाओ बहते जाओ धीर धरो लग जाओ मंजिल पाने में मेहनत करते जाओ रूकना नहीं थकना नहीं टूटना नहीं संबल बनना तुम पा लेना चरम सौन्दर्य को यही अभिलाषा हो

लिखो खत

लिखो खत देश को करो सलाम कहो मैं आता हूँ तेरी सेवा करने जब तक साँस रहे जी भर दम भर लड़ूँगा लिखना सवा सौ करोड़ देशवासियों को करो प्रणाम सबको गिरने न दूँगा झूकने न दूँगा आन बान को नया शान दूँगा लिखना खत माँ को कहना जा रहा हूँ होने बलिदान देश के लिये

मेरी माँ

मेरी माँ उठ सुबह लग जाती कामों में जी भर करती सुबह से शाम तक लगी रहती है चूल्हा चौका में गायों के सानी पानी में साफ सफाई में कपड़े लत्ते में कम सोती है नींद नहीं आती है खेतो खलिहानों में भूसा दाना में पल्लू खोंसे पसीनें में सूखे होंठ लिये करती जाती कहती जाती कहना है उसका कल नया सबेरा आयेगा

सुंदर मन

सुंदर मन बनाना आसान नहीं कड़ी तपस्या मेहनत से एक पवित्र मन बड़े मुश्किल से आता है सुंदर मन के लिये दया,परोपकार से हृदय भरना होगा करूणा का गीत लिखना होगा नये भावों से रंगना होगा चंचल मन को बाँधना होगा तभी पूर्ण होगा सुंदर मन बनाने का कार्य

मजदूर

मजदूर जब मेहनत करता है लिखता है नया इतिहास हाड़ तोड़ मेहनत से लिखता है नई कहानी सुबह से काम करे शाम तक मेहनत ही मेहनत करता जाये यही उसका जीवन बनाता महल अटारी रंगहीन जीवन जीता प्रसन्न मन से करता कर्म सादा जीवन जीता नहीं भरा है मन धोखा किसी के लिये सत्य जीवन अपनाता हर पल

अध्यापक

अध्यापक अपने छात्र को बढ़ते हुये देखना चाहता है नये भावों को भरना चाहता है देखना चाहता है एक लम्बी उड़ान हर पल उसके विकास को देखता है यही उसके जीवन का सच्चा मूल्यांकन है यही जीवन की पूँजी है उसके कार्य की गणना उस दिन महान होती है जब उसका शिष्य किसी महान भूमिका में सफल होता है एक सच्चा अध्यापक सतत विकास पथ पर लिखता है नया कीर्तिमान तब मुस्कराता है अध्यापक

रिक्शा चालक

रिक्शा चालक पसीने से तर बतर बिन खाये पतली छाती है लिये बड़ी तेजी से रिक्शा चलाते मंजिल तक पहुँचाता है कठिन मेहनत करता है सहता है घुड़कियाँ भी पूरी मेहनत का नहीं पाता है पैसा लोग छिनते हैं उसका निवाला कैसे कैसे लोग पड़े हैं लेकिन निष्कपट रिक्शाचालक सहृदय भाव लिये अपने कर्म पथ पर चलता है धैर्य लिये मुस्कान के साथ परिश्रम को अपना पूँजी मानता है यही उसके जीवन की अंतिम इच्छा है

माँ की कीमत

माँ होती है कोमल भाव लिये लड़ती है जीवन भर अपने बच्चे को बनाने में भूख प्यास सब सहती है मजबूती से खड़ी होती है माँ ही नई आशा व उर्जा लिये माँ की कीमत कितनी होती है हर माँ वाला बच्चा जानता है लेकिन असली कीमत माँ की क्या है उनसे पूछिये जिनकी माँ नहीं होती हैं

पर्वत,जो मूक खड़े हैं

पर्वत एक विशाल तन लिये एक अचल मन लिये एक विश्वास के साथ देता है हौंसला हमको मुसीबतों में खिलखिलाकर हंसने की एक चेतना देता है कई थपेड़े सहकर मूक खड़े हैं पर्वत जो अविचलित है जीवन की हर मार सहकर

सर्दी में एक स्त्री

रात के खुले में सड़क की पटरी पर ठंड में एक स्त्री कुछ कपड़ो में ठिठुर रही थी कांपती हुयी उसकी अंगुलियां लड़खड़ाती आवाज में रोकर कहती छोड़ आई घर अपना जहां थी टूटी छतवाला मकान पति की मुफलिसी को ताना मार कर भाग आई उससे भी तंगी में रात के ठंड पहर में बिना निवाले के अब कई रात गुजर रही है अब एहसास है अपना टूटा घर पति की सूखी रोटी उसके हाथों के स्पर्श से जीवन की सच्चाई जो कुछ मिलता था एक संतोष था इज्जत थी किसी की दया की वहां कोई आवश्यकता नहीं थी अब उससे बदतर जी रहीं हूं ठंड से कांपते हुये सूखी रोटी भी नसीब नहीं

एक थे अटल

एक जीवन थे गंभीर व्यक्तित्व सादगी थी पवित्रता का भाव था देशी रंग में भारतीयता से सजा-धजा था एक विचारधारा थे एक खोज थे युगनिर्माता थे भावों से भरे थे सादगी कदम चूमती थी एक लय नवगीत से परिपूर्ण संपूर्णता लिये एक सत्य जीवन जीते थे अटल एक सिपाही थे राजनीति के मैदान में भीष्म पितामह थे जिनके शब्दबाण से नतमस्तक हो जाते थे तमाम विरोधी निपुण सारथी की तरह हमेशा तैयार रहते दुश्मनों को मुंहतोड़ जबाब देने में

एक पूर्ण स्त्री

तुम तो प्रेम में एक कहानी बनाई थी सुंदर सपने थे तुम्हारे साथ रह लूंगी कोई शिकायत नहीं होगी तुम्हे खुश रखूंगी एक फुलवारी की तरह महकाऊंगी तुम्हारा घर मेरा साथ रहेगा उन सब हालातों में मैं समर्पित होकर तुम्हारे साथ रहूंगी आज तुम क्यों टूट रही हो खिल्लियां उड़ा रही हो बिगड़े हालातों पर तुम ताने दे रही हो उसको इस बार तुम्हे साड़ियां नहीं दी कुछ कमियां रह गयी जरूर समय की हालातों में प्रेमवर्षा में कमी रह गयी हो किसी और के घर चली जाना तुम एक पूर्ण स्त्री नहीं बन पाई।

मेरी कवितायें

मेरी कवितायें आह से निकलती हैं खोखलापन नहीं कोई राग द्वेष नहीं सीधे सरल लिबास में मधुर भावना लिये कोमल कहानी जैसे एक सोंधी महक सी चांदनी रात सी एक धवल वसन की तरह कोई आवरण नहीं खुले दरवाजे की तरह होती हैं मेरी कवितायें बिल्कुल निडर योध्दा की तरह

मेरी दृष्टि

मेरी दृष्टि वहां तक जाती है उन बस्तियों तक जिन बस्तियों में झेलता गरीब का तन विवशता से लड़ता लाचारी का दूध पी रहा है पूरा कुनबा सिर्फ वहां रहती है एक रोटी की तलाश क्षुधा शान्त करने की सुबह से शाम तक तरकीब निकाली जाती है अगले दिन का जिनके पास कोई भविष्य नहीं होता है एक जहां अनवरत संघर्ष का दौर होता है

मत सताना

जो मानव हो निर्बल देख उसकी हालत पर मत सताना उनको उनकी आह लगेगी तुम्हे हो सके तो करना उनके लिए कुछ उनका बनना सहारा यही सच्चा जीवन है नहीं सक्षम हो मदद करने में मत देना उसको पीड़ा जो निर्बल हो तन-मन से

देश के नेताओं

कुछ ऐसी चाल चलो खिल जाये चमन बहे मस्त पुरवाई होंठो पर खुशी छलके लाना ऐसी योजना महक-चहक पड़े सूनी गलियां भी चौराहे पर खड़ा आदमी जय-जयकार करे ऐसे नेताओं की जिसमें नहीं है मानव कल्याण क्या करेगा देशसेवा झूठे वादों पर नहीं टिकती राजनीति ऐसी राजनीति अलाव की तरह है जहां सिर्फ राख बचती है सुनों, देश के नेताओं मेरी बात सुनों!

दिव्य पुरुष

जो प्रेम और सत्य लेकर चलते हैं सदा रखते निर्मल मन जात-पात का भेद नहीं रखते मन का गौरव तेज स्नेह तत्वों को गले लगाते मानवता का भाव लिये जन-जन के मन में रहते हैं वे होते हैं दिव्य पुरुष अलौकिक तेज होता है उनमें जो भक्ति का भाव लिए होते हैं वे सदैव अमर होते हैं

वे लोग

वे लोग क्यों गुस्सा करते हैं? एक कड़क आवाज से डराते हैं उन बेजुबानो ंको अकारण उनसे उलझते है वेहयाई करते हैं उनके साथ जो बिना किसी को सताये साधारण जीवन जीते हैं किसी का नुकसान नहीं करते हैं केवल इंसान बनकर रहना चाहते हैं आखिर वे लोग कैसा इतिहास लिखना चाहते हैं? जो मासूमों के साथ जुर्म करते हैं आखिर क्या फतेह करना चाहते हैं?

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