हिन्दी कविताएँ : डा. हरीश यादव
Hindi Poetry : Dr. Harish Yadav
हाशिये पर पड़ा आदमी
रोज सवेरा होता है और चल पड़ते हैं अपने काम पर कागजों व फाइलों के लोक में जहां कागज के पेट कागजों से भरे जाते हैं। ये कागज कभी बारुद बन जाता है कभी ग्वाह कभी रहस्य उजागर करता है इंसान बदल जाते हैं पर कागज झूठ नहीं बोलता। शब्दों के बीच पड़ा आदमी जिस तरह कोरे कागज पर जब हाशिया खींचा जाता है तो कई मुल्क बन जाते हैं कई लोक बन जाते हैं तुलना शुरु हो जाती है कभी इस पार कभी उस पार कभी उत्थान कभी पतन यह हाशिया किसी को अमीर किसी को गरीब बनाता है यह हाशिया कागज को केंद्र बिंदु देता है पर वो तस्वीर में नहीं होता हाशिये पर पड़ा आदमी
मुखौटे
उधार के चेहरे क्या असर छोड़ पाएंगे किराए के मुखौटे हैं न असलियत कह पाएंगे सैकड़ों मुखौटे लगाए इंसान परत दर परत दसानन है कभी लाचार कभी मसीहा लगता है ये मुखैटे खूंटी पर टंगे हैं कोई देवता सा परोपकारी कोई ईमानदार सदाचारी कोई धर्मज्ञ कोई सर्वज्ञ कोई सहयोगी कोई अवतारी अलग-अलग रूप के मुखौटे हैं भरपूर चलते हैं भले ही खोटे हैं। मुखौटों के बिना जिंदगी वीरान लगती है उजड़े हुए इंसान की पहचान लगती है मुखौटे बदल-बदलकर अपनी पहचान भूल गए असली चेहरे से खुद अनजान हो गए। यह क्या है? आइना! कौन है इसमें? मैं जानता नहीं कहां है मेरे मुखौटे? ले आओ जिनके बिना मैं सूरत पहचानता नहीं।
बसंत आ रहा है
बसंत आ रहा है। जहां वन-उपवन, पुष्प नहीं वहां भी पहुंच रहा है सकरी गलियों धामविहीन कूपों में सुरभित बसंती हवा अपने गुलाबी करों से करना चाहती है स्पर्श सूर्य मधुकर से खिला रहे हैं सृष्टि को स्वर्णिम खग से विचरते हुए बिखेर रहे हैं सौंदर्य, चेतना और सुगंध को। देह का एक-एक रक्त कण संवार रहा है स्वयं को क्या जड़, क्या चेतन सबमें परिवर्तन फूट रहा है बसंत चारों ओर जल, थल, नभ, पवन तन, मन, जीवन है सराबोर सिक्त हो रहे हैं मधुमास में कब से अव्यक्त अब स्वयं रिस रहा है ज्यों शिलाओं से जल स्रोत जो जहां है चाहे स्वर्ग या पाताल आलोक या अन्धकार उन्मुक्त या कैद राजा या अकिंचन सबको छु रहा है ,बसंत कभी भीतर का मधुमास भी देखो बूढ़े कमजोर विचारों को फेंको नवीन भावों को सजाओ नई घास के मैदान में नहीं लोटे तो मन के विस्तृत भू भाग में लोटो उज्ज्वल भावों के नभ में फैलो बहो, नवीन प्रेम की रसधार बनकर खिल जाओ सुगंधित सुमन होकर मन मधुपास के महासागर में डूब जाओ भीतर तक और फूटने तो अपने भीतर का बसंत नव कोंपलों सी नवीनता लिए पुष्पवृंदों की महकता लिए फूटने तो भीतर का बसंत आनंद करो इस मधुमास को अपने भीतर के बसंत को न डाल पर फूटेगा न कली में महकेगा असली बसंत तो सिर्फ अपने भीतर से उपजेगा।
पत्थर बोलता है
जिसे देखकर आंखें पथरा जाती हैं अनायास ही मन की तरलता जम जाती है हर आंख जिस पर बेतुकी हो जाती है उठाकर फेंकने की प्रबल इच्छा हो जाती है। टूट जाते हैं दर्पण सिर्फ अपनी कमजोरी से लोक पत्थर को ही कोसते हैं फूलों की कुटिलता जमाने को रास आती है सरलता पत्थर की भी बुरी हो जाती है। अरे पाषाण! तुझमें न प्रेम है, दया है न मोह है तू न गलता है, न पिघलता है आंसूओं में तू भावनाओं की नदी में नहीं बहता सिर्फ टूटता है जल धाराओं में पत्थर जो देता है पीड़ा जिसका कोई मोल नहीं बिखरा हुआ खामोश जिसमें कोई बोल नहीं अरे पाषाण, तू भावों को क्या जानें बदसूरत, बदरंग रूप से अनजाने तू धड़कनों को कहां सुन पाता है निर्ममता है वृत्ति, नियति ठोकर खाना है। पत्थर तो सिर्फ पत्थर है। पर पत्थर सिर्फ पत्थर नहीं है पत्थर के सीने में भी एक हृदय है एक स्पंदन है, धड़कन है, कंपन है सुन सकते हो तो सुनो। पत्थर बोलता है जो आरोप उस पर लगे हैं उसकी सच्चाई खोलता है। तुम्हारे आलीशान घरों की नींव में जो लगा है- वो पत्थर है ऊंचाई तक लेने जाने वाली इन सीढ़ियों में- वो पत्थर है रत्न, माणिक्य के रूप में बदलता है मनुष्य का भाग्य राजमुकुटों में अलंकृत है जो हीरा- वो पत्थर है अरे तुम इस अनमोल का मोल क्या जानो हीरे की कीमत जौहरी से पूछो। और सुनो इस पत्थर से बड़ा कोई दयावान नहीं है जो रोज सुनता है तुम्हें मंदिर में दुखड़ा रोते पत्थर होना बुरा नहीं होता (2) हां! बुरा होता है सिर्फ पत्थर दिल होना (2)
ये शहर! आज गांव बन गये
पहली बार वाहनों, कारखानों का दानवी शोर नहीं सुनाई पड़ रही है, चिड़ियों की चहचहाट ऊपर जहरील धुंआ, बदरंग गगन न था खुला था साफ नीला आसमान हवा में जहर न था, धूल न थी ताजगी थी। अनछुयी हुई सी वन-उपवन खुश थे अपने एकांत में जीव सुकून में थे कुछ अपने पहल में यह सोचते कि मानव कहां गया? कहां गया धधकता शोर, दमघोटू धुआं कहां गये हवाई यान, गाड़ियों की थरहारट नदियों का जल निखर रहा था मछलियां बेफिक्र हो कूद रही थी
टुकड़ा बहार का
मैंने कब पूरी कायनात मांगी है तुमसे मुझको तो एक टुकड़ा बहार का दे दो जानता हूँ तेरी महफ़िल में परवाने है बहूत सारे मुझको तो एक लम्हा अपने प्यार का दे दो नहीं है उम्मीद वफ़ा-ए-मुहब्बत की तुमसे मुझको तो एक घडी अपने दीदार का दे दो तुम बहारों को खिजा कहकर मासूम न हो मेरी बातों को सुनकर खामोश न हो जन्नत की नहीं आरजू न रज़ा कोहिनूर की मुजको तो वो मज़ा फकीरी का दे दो…..
निशान
जिन रास्तों से गुजर कर तुम मिलाने आती थी अब वो रास्ते भी बहुत हसीन लगते हैं वो दुपहरी का सुनसान आलम और वो पेड़ उस छावों में गुजारा हर वक़्त अच्छा लगता है वो फूलों की सेज और खुला आसमान उन घासों का तिनका-तिनका भी अच्छा लगता है वो तुम्हारा नज़रें बचा कर मुझसे मिलने आना शरमाकर फूल की शाख सा झुकना अच्छा लगता है और अब तुम नहीं तो बाकी तो सब कुछ है ये पेड़ और ; रास्ता और मैदान भी अच्छा लगता है यहाँ की हरेक शह पूछती है मुझसे उसके बिना क्यूं और भी अच्छा लगता है मैं क्या कहूं, यूं मुह नहीं फेर सकता मुझको तो प्यार का हर निशान अच्छा लगता है
नदी
बूंद का असीम स्वरूप है नदी जीवन की तरलता है नदी। बूंद की नम्रता है छलक जाना जीवन की सफलता है नदी हो जाना। नदी, एक यात्रा है सभ्यता की परंपरा की रचनात्मकता की नदी एक अध्याय है संघर्ष का एक उदारता है विराट की। जीवन और नदी का एक ही राग है सुख-दुख में सिर्फ बढ़ते जाना। रूकना, प्रकृति को पसंद नहीं होता ठहरा पानी और इंसान स्वच्छ नहीं होता। ऊंचे पर्वतों घाटियों को काटकर शिलाओं को तोड़ते हुये अगम से राह बनाती है नदी झरने, घाट वन-उपत्यकाओं में सिर्फ आगे बढ़ती जाती है नदी। खेतों खलिहानों में अपनी उर्वरता देकर धन्य करती है सभ्याताओं को नदी रक्तवाहिनी है, जीवनदायिनी है सभ्यता की जननी है नदी। जीवन की निरंतरता है नदी विविध स्वर हैं इसके स्थिर हृदय से सुनो। उदार आत्मा के साथ उद्वेग के बिना कामना के बिना अस्तित्व के सतत होने का स्वर सबकुछ छोड़ते हुये सागर में मिलना जीवन की भांति परमतत्व में विलीन होना।