हिन्दी कविताएँ : आनंद दास

Hindi Poetry : Anand Das


एक दलित

एक दलित! जब पढ़ लिखकर क़ाबिल बना, हमारे गाँव ने ख़ुशियाँ मनाईं. एक दलित! जब अफ़सर और सिपाही बना, पूरे मुहल्ले ने जश्न मनाया. एक दलित! जब ज़िला कलेक्टर व मुख्य सचिव बना, पूरे इलाक़े में भव्य कार्यक्रम हुआ. एक दलित! जब चुनाव में प्रत्याशी बना, पूरे दलित समाज ने भीड़ बढ़ायी. एक दलित! जब चुनाव जीता, दलित युवकों ने जय भीम का नारा लगाया. एक दलित! कभी अभिनेता, कभी खिलाड़ी, कभी बिज़नेस मैन, कभी साइंटिस्ट, कभी बुद्धिजीवी बना. इस ख़ुशी में हमने सोशल मीडिया पर स्टेटस लगाया. एक दलित! जब ग़रीबी, प्रताड़ना और हिंसक घटना का शिकार बना. उसके दुःख को कोई नहीं समझा. वह पढ़ा लिखा दलित, सामने नहीं आया. जिसके लिए ख़ुशियाँ मनाई थीं. उस दलित अफ़सर और सिपाही ने, मुँह फेर लिया. जिसके लिए जश्न मनाया था. वह दलित ज़िला कलेक्टर और मुख्य सचिव ने, पहचानने से इंकार कर दिया. जिसके लिए कार्यक्रम में शरीक हुए थे. उस दलित नेता ने, उजड़े घर को बसाने से इनकार कर दिया. जिसके लिए भीड़ बढ़ाई थी और जय भीम के नारे लगाए थे. ख़ैर उन अभिनेता, खिलाड़ी, बिज़नेस मैन, साइंटिस्ट और बुद्धिजीवियों का क्या? वे तो वर्चुअल थे! असल ज़िन्दगी में उन दलितों ने, मुझ जैसे दलितों का सिर्फ़ फ़ायदा लिया. आवेग में आने के लिए. अब मैं ना कोई जश्न मनाता हूँ. ना कोई भीडतंत्र का पात्र बनता हूँ. और ना ही कोई उनके जलसे-जुलूस में शरीक होता हूँ. बस्स बहुत हो चुका! यह सब देखकर। अब औरों की तरह, चुपचाप आगे बढ़ जाता हूँ ...

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें

ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें- हमलोगों को रोज-रोज़ चमार तो कभी चमरोटा कह कर बुलाते हैं। ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें- नाली के कीड़े जैसी जात है तुम्हारी। चमरा, चमरोटा कहीं का! ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें- नाली कितना भी साफ़ कर लो साफ़ नहीं होती। वैसी है तुम्हारी जात! ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें- अभी मारूंगा तो, पूरे कपड़े में हगते-मूतते घर जाओगे अपने। ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें- तुमलोगों के ऊपर थूकना चाहिए , और तुम्हारे जात पर भी ! ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें- तुमलोग कभी नहीं सुधरोगे ना ही कभी सुधरेगी, तुम्हारी जात ! ऐसे-ऐसे कब तक बोलते रहेंगे? कब तक इंसानियत का जनाजा निकालते रहेंगे? अब ज़माना जात का नहीं, फ़ेसबुक, इंस्टा और व्हाट्सऐप का है!

शुक्रग़ुज़ार करो!

शुक्रग़ुज़ार करो! उन वंचित-शोषित-दलितों को, जिन्हें वसीयत में मिली, अपमान, तिरस्कार और दुत्कार को, ठुकरा रहे हैं। शुक्रग़ुज़ार करो! उन वंचित-शोषित-दलितों को, अपमान की परिभाषा, चूहड़ा-चमरा-भंगी कहने की, मानसिकता बदल रहे हैं। शुक्रग़ुज़ार करो! उन वंचित-शोषित-दलितों को, जिन्हें परंपरा में मिली गंदी गालियों को, सिर्फ़ बताया है। लौटाने की मानसिकता दर्शा नहीं रहे हैं। शुक्रग़ुज़ार करो! उन वंचित-शोषित-दलितों को, जिन्होंने अपने इतिहास में, बदला के बजाय, बदलाव और बराबरी को चुना है। शुक्रग़ुज़ार करो! उन वंचित-शोषित-दलितों को, जिन्होंने अपने समाज में, हिंसा के बदले, हिंसा नहीं। प्रेम, सद्भावना और भाईचारा को चुना है। शुक्रग़ुज़ार करो! उन वंचित-शोषित-दलितों को, जिन्होंने भूखे-प्यासे सवर्णों को, कभी जल तो कभी खाद्य मुहैया कराकर, इंसानियत का रास्ता बताया है।

समानता

मैं बिस्तर पर लेटे था। किसी ने यह पूछा दिया- क्या भाई तुम्हारे यहां असमानता है क्या? तड़के ही उत्तर दिया, नहीं भाई, नहीं तो ! हमारे पास संविधान है। तो कैसे होंगे असमान? घोड़ा और घास साथ-साथ, पास-पास रहता है , शिकार तो घास को ही होना पड़ता है। फ़िर भी दोनों समान है! दलित भीड़ बढ़ाए नेता के लिए वोट मांग लाए , चुनाव के समय भाई-बंधु-हितैषी बन जाए । कहां कोई असमान है? विधायक, सांसद, नेता, मंत्री बनते ही फ़िर वापस लौट आते हैं हम अपने पद पर, गरीब, शोषित, अछूत, भंगी और दलित ! कहीं कुछ असमान दिखा? समानता ! बनी हुई है, सदियों से, कई अरसों से, चुनाव ही तो जीता है, कोई आसमान का तारा नहीं। अच्छे से देखें हम अब भी समान हैं! समानता ! चुनाव के पहले वाली भी वही है और चुनाव के बाद वाली भी वही है! देखें ध्यान से, सब कुछ समान है? समानता ! ग़रीबी की गरीबों से हैं! मंत्रालय की मंत्रियों से हैं! चमार की चमारों से हैं! ब्राह्मण की ब्राह्मणों से हैं! अब आप ही बताइए और आप ही तय कीजिए कहीं असमानता दिखीं ? पूरे समाज में फैली है समानता! समानता ! बस्स समानता!

चाची की चिंता

चाची को, शादी की चिंता सता रही थी, कितने लोग आयेंगे ? कितने पकवान बनेंगे ? अपनी बिटिया के लिए कहीं खेत बेचना ना पड़ जाए ? पूरी जेब खाली न करना पड़ जाए? चिन्तित रहते हुए, मैने चाची को देखा! मन में यह बार-बार सोचती कौन-कौन रिश्तेदार को बुलाए? किसकी मेहमान नवाजी कैसे करवाए ? मन में यह गणित के धुन को गुनगुनाते हुए, मैने चाची को देखा! सामूहिक शादी का मौका मिले, फिर क्या होगा? समाज कल्याण विभाग से हो जाए, फिर क्या होगा? सोचते हुए, मैने चाची को देखा! एक-एक हिसाब जोड़ते हुए , मैने चाची को देखा! एक एक थाली का हिसाब तौलते हुए , मैने चाची को देखा! मैने रिश्तेदारों की हालातों को गिनते देखा, चूल्हे चक्की का एक-एक हिसाब रखते हुए मैने चाची को देखा ! दान-दक्षिणा रश्मों और रिवाजों के चक्कर पंडित जी के डिमांड को गिनते हुए मैने चाची को देखा ! ए बाबू! ए भैया ! तनी पैसा जुगाड़ करवा दो, ताकि यह सब पूरा हो सके, एक-एक लोग से पैसे मांगते हुए मैंने चाची को देखा! सभी के भूख को भगाने सबको संतुष्ट करने की मजबूरी, गाँव में अपने सम्मान को बचाते हुए मैने चाची के उस चुप्पी को देखा! ऐसी रश्मों और ऐसी सामाजिक कश्मों की क्या जरूरत? जो हमें दलित की बजाय, दरिद्र की श्रेणी में ला खड़ा कर दे!

  • मुख्य पृष्ठ : आनंद दास - हिंदी काव्य रचनाएँ
  • मुख्य पृष्ठ : हिन्दी कविता वेबसाइट (hindi-kavita.com)