गोया : जौन एलिया
Goya : Jaun Elia
हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गई
हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गई
शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी गई
तेरा फ़िराक़ जान-ए-जाँ ऐश था क्या मिरे लिए
या'नी तिरे फ़िराक़ में ख़ूब शराब पी गई
तेरे विसाल के लिए अपने कमाल के लिए
हालत-ए-दिल कि थी ख़राब और ख़राब की गई
उस की उमीद-ए-नाज़ का हम से ये मान था कि आप
उम्र गुज़ार दीजिए उम्र गुज़ार दी गई
एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई
बा'द भी तेरे जान-ए-जाँ दिल में रहा अजब समाँ
याद रही तिरी यहाँ फिर तिरी याद भी गई
उस के बदन को दी नुमूद हम ने सुख़न में और फिर
उस के बदन के वास्ते एक क़बा भी सी गई
मीना-ब-मीना मय-ब-मय जाम-ब-जाम जम-ब-जम
नाफ़-पियाले की तिरे याद अजब सही गई
कहनी है मुझ को एक बात आप से या'नी आप से
आप के शहर-ए-वस्ल में लज़्ज़त-ए-हिज्र भी गई
सेहन-ए-ख़याल-ए-यार में की न बसर शब-ए-फ़िराक़
जब से वो चाँदना गया जब से वो चाँदनी गई
इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं
कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं
क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता
जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं
अब है बस अपना सामना दर-पेश
हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं
वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े
सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं
अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का
कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं
कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया
जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं
तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से
बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं
कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है
कि अचानक सुधर गया हूँ मैं
सारे रिश्ते तबाह कर आया
सारे रिश्ते तबाह कर आया
दिल-ए-बर्बाद अपने घर आया
आख़िरश ख़ून थूकने से मियाँ
बात में तेरी क्या असर आया
था ख़बर में ज़ियाँ दिल ओ जाँ का
हर तरफ़ से मैं बे-ख़बर आया
अब यहाँ होश में कभी अपने
नहीं आऊँगा मैं अगर आया
मैं रहा उम्र भर जुदा ख़ुद से
याद मैं ख़ुद को उम्र भर आया
वो जो दिल नाम का था एक नफ़र
आज मैं इस से भी मुकर आया
मुद्दतों बा'द घर गया था मैं
जाते ही मैं वहाँ से डर आया
बात कोई उमीद की मुझ से नहीं कही गई
बात कोई उमीद की मुझ से नहीं कही गई
सो मिरे ख़्वाब भी गए सो मेरी नींद भी गई
दिल का था एक मुद्दआ' जिस ने तबाह कर दिया
दिल में थी एक ही तो बात वो जो फ़क़त सही गई
जानिए क्या तलाश थी 'जौन' मिरे वजूद में
जिस को मैं ढूँढता गया जो मुझे ढूँढती गई
एक ख़ुशी का हाल है ख़ुश-सुख़नाँ के दरमियाँ
इज़्ज़त-ए-शाएक़ीन-ए-ग़म थी जो रही-सही गई
बूद-ओ-नबूद की तमीज़ एक अज़ाब थी कि थी
या'नी तमाम ज़िंदगी धुँद में डूबती गई
उस के जमाल का था दिन मेरा वजूद और फिर
सुब्ह से धूप भी गई रात से चाँदनी गई
जब मैं था शहर ज़ात का था मिरा हर-नफ़स अज़ाब
फिर मैं वहाँ का था जहाँ हालत-ए-ज़ात भी गई
गर्द-फ़शाँ हूँ दश्त में सीना-ज़नाँ हूँ शहर में
थी जो सबा-ए-सम्त-ए-दिल जाने कहाँ चली गई
तुम ने बहुत शराब पी उस का सभी को दुख है 'जौन'
और जो दुख है वो ये है तुम को शराब पी गई
काम मुझ से कोई हुआ ही नहीं
काम मुझ से कोई हुआ ही नहीं
बात ये है कि मैं तो था ही नहीं
मुझ से बिछड़ी जो मौज-ए-निकहत-ए-यार
फिर मैं उस शहर में रहा ही नहीं
किस तरह तर्क-ए-मुद्दआ कीजे
जब कोई अपना मुद्दआ' ही नहीं
कौन हूँ मैं जो राएगाँ ही गया
कौन था जो कभी मिला ही नहीं
हूँ अजब ऐश-ग़म की हालत में
अब किसी से कोई गिला ही नहीं
बात है रास्ते पे जाने की
और जाने का रास्ता ही नहीं
है ख़ुदा ही पे मुनहसिर हर बात
और आफ़त ये है ख़ुदा ही नहीं
दिल की दुनिया कुछ और ही होती
क्या कहें अपना बस चला ही नहीं
अब तो मुश्किल है ज़िंदगी दिल की
या'नी अब कोई माजरा ही नहीं
हर तरफ़ एक हश्र बरपा है
'जौन' ख़ुद से निकल के जा ही नहीं
मौज आती थी ठहरने की जहाँ
अब वहाँ खेमा-ए-सबा ही नहीं
गुफ़्तुगू जब मुहाल की होगी
गुफ़्तुगू जब मुहाल की होगी
बात उस की मिसाल की होगी
ज़िंदगी है ख़याल की इक बात
जो किसी बे-ख़याल की होगी
थी जो ख़ुश्बू सबा की चादर में
वो तुम्हारी ही शाल की होगी
न समझ पाएँगे वो अहल-ए-फ़िराक़
जो अज़िय्यत विसाल की होगी
दिल पे तारी है इक कमाल-ए-ख़ुशी
शायद अपने ज़वाल की होगी
जो अता हो विसाल-ए-जानाँ की
वो उदासी कमाल की होगी
आज कहना है दिल को हाल अपना
आज तो सब के हाल की होगी
हो चुका मैं सो फ़िक्र यारों को
अब मिरी देख-भाल की होगी
अब ख़लिश क्या फ़िराक़ की उस के
इक ख़लिश माह-ओ-साल की होगी
कुफ़्र-ओ-ईमाँ कहा गया जिस को
बात वो ख़द्द-ओ-ख़ाल की होगी
'जौन' दिल के ख़ुतन में आया है
हर ग़ज़ल इक ग़ज़ाल की होगी
कब भला आएगी जवाब को रास
जो भी हालत सवाल की होगी
धूप उठाता हूँ कि अब सर पे कोई बार नहीं
धूप उठाता हूँ कि अब सर पे कोई बार नहीं
बीच दीवार है और साया-ए-दीवार नहीं
शहर की गश्त में हैं सुब्ह से सारे मंसूर
अब तो मंसूर वही है जो सर-ए-दार नहीं
मत सुनो मुझ से जो आज़ार उठाने होंगे
अब के आज़ार ये फैला है कि आज़ार नहीं
सोचता हूँ कि भला उम्र का हासिल क्या था
उम्र-भर साँस लिए और कोई अम्बार नहीं
जिन दुकानों ने लगाए थे निगह में बाज़ार
उन दुकानों का ये रोना है कि बाज़ार नहीं
अब वो हालत है कि थक कर मैं ख़ुदा हो जाऊँ
कोई दिलदार नहीं कोई दिल-आज़ार नहीं
मुझ से तुम काम न लो काम में लाओ मुझ को
कोई तो शहर में ऐसा है कि बे-कार नहीं
याद-ए-आशोब का आलम तो वो आलम है कि अब
याद मस्तों को तिरी याद भी दरकार नहीं
वक़्त को सूद पे दे और न रख कोई हिसाब
अब भला कैसा ज़ियाँ कोई ख़रीदार नहीं
जो गुज़र दुश्मन है उस का रहगुज़र रक्खा है नाम
जो गुज़र दुश्मन है उस का रहगुज़र रक्खा है नाम
ज़ात से अपनी न हिलने का सफ़र रक्खा है नाम
पड़ गया है इक भँवर उस को समझ बैठे हैं घर
लहर उठी है लहर का दीवार-ओ-दर रक्खा है नाम
नाम जिस का भी निकल जाए उसी पर है मदार
उस का होना या न होना क्या, मगर रक्खा है नाम
हम यहाँ ख़ुद आए हैं लाया नहीं कोई हमें
और ख़ुदा का हम ने अपने नाम पर रक्खा है नाम
चाक-ए-चाकी देख कर पैराहन-ए-पहनाई की
मैं ने अपने हर नफ़्स का बख़िया-गर रक्खा है नाम
मेरा सीना कोई छलनी भी अगर कर दे तो क्या
मैं ने तो अब अपने सीने का सिपर रक्खा है नाम
दिन हुए पर तू कहीं होना किसी भी शक्ल में
जाग कर ख़्वाबों ने तेरा रात भर रक्खा है नाम
शाख़-ए-उम्मीद जल गई होगी
शाख़-ए-उम्मीद जल गई होगी
दिल की हालत सँभल गई होगी
'जौन' उस आन तक ब-ख़ैर हूँ मैं
ज़िंदगी दाव चल गई होगी
इक जहन्नुम है मेरा सीना भी
आरज़ू कब की गल गई होगी
सोज़िश-ए-परतव-ए-निगाह न पूछ
मर्दुमक तो पिघल गई होगी
हम ने देखे थे ख़्वाब शो'लों के
नींद आँखों में जल गई होगी
उस ने मायूस कर दिया होगा
फाँस दिल से निकल गई होगी
अब तो दिल ही बदल गया अब तो
सारी दुनिया बदल गई होगी
दिल गली में रक़ीब दिल का जुलूस
वाँ तो तलवार चल गई होगी
घर से जिस रोज़ मैं चला हूँगा
दिल की दिल्ली मचल गई होगी
धूप या'नी कि ज़र्द ज़र्द इक धूप
लाल क़िलए' से ढल गई होगी
हिज्र-ए-हिद्दत में याद की ख़ुश्बू
एक पंखा सा झल गई होगी
आई थी मौज-ए-सब्ज़-ए-बाद-ए-शिमाल
याद की शाख़ फल गई होगी
वो दम-ए-सुब्ह ग़ुस्ल-ख़ाने में
मेरे पहलू से शल गई होगी
शाम-ए-सुब्ह-ए-फ़िराक़ दाइम है
अब तबीअ'त बहल गई होगी
शौक़ का बार उतार आया हूँ
शौक़ का बार उतार आया हूँ
आज मैं उस को हार आया हूँ
उफ़ मिरा आज मय-कदे आना
यूँ तो मैं कितनी बार आया हूँ
दोस्तो दोस्त को सँभाला दो
दूर से पा-फ़िगार आया हूँ
सफ़-ए-आख़िर से लड़ रहा था मैं
और यहाँ लाश-वार आया हूँ
वही दश्त-ए-अज़ाब-ए-मायूसी
वहीं अंजाम-कार आया हूँ
इंक़लाब एक ख़्वाब है सो है
इंक़लाब एक ख़्वाब है सो है
दिल की दुनिया ख़राब है सो है
रहियो तो यूँही महव-ए-आराइश
बाहर इक इज़्तिराब है सो है
तर है दश्त उस के अक्स-ए-मंज़र से
और ख़ुद वो सराब है सो है
जो भी दश्त-ए-तलब का है पस-ए-रू
वही ज़र्रीं-रिकाब है सो है
शैख़ साहब लिए फिरें तेग़ा
बरहमन फ़त्ह-याब है सौ है
दहर आशोब है सवालों का
और ख़ुदा ला-जवाब है सो है
इस शब-ए-तीरा-ए-हमेशा में
रौशनी एक ख़्वाब है सो है
नश्शा-ए-शौक़-ए-रंग में तुझ से जुदाई की गई
नश्शा-ए-शौक़-ए-रंग में तुझ से जुदाई की गई
एक लकीर ख़ून की बीच में खींच दी गई
थी जो कभी सर-ए-सुख़न मेरी वो ख़ामुशी गई
हाए कुहन-ए-सिनन की बात हाए वो बात ही गई
शौक़ की एक उम्र में कैसे बदल सकेगा दिल
नब्ज़-ए-जुनून ही तो थी शहर में डूबती गई
उस की गली से उठ के मैं आन पड़ा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गई
उस की उम्मीद नाज़ का मुझ से ये मान था कि आप
उम्र गुज़ार दीजिए उम्र गुज़ार दी गई
दौर-ब-दौर दिल-ब-दिल दर्द-ब-दर्द दम-ब-दम
तेरे यहाँ रिआ'यत-ए-हाल नहीं रखी गई
'जौन' जुनूब-ए-ज़र्द के ख़ाक-बसर ये दुख उठा
मौज-ए-शुमाल-ए-सब्ज़-जाँ आई थी और चली गई
क्या वो गुमाँ नहीं रहा हाँ वो गुमाँ नहीं रहा
क्या वो उमीद भी गई हाँ वो उमीद भी गई
न कोई हिज्र न कोई विसाल है शायद
न कोई हिज्र न कोई विसाल है शायद
बस एक हालत-ए-बे-माह-ओ-साल है शायद
हुआ है दैर-ओ-हरम में जो मोतकिफ़ वो यक़ीन
तकान-ए-कश्मकश-ए-एहतिमाल है शायद
ख़याल-ओ-वहम से बरतर है उस की ज़ात सो वो
निहायत-ए-हवस-ए-ख़द्द-ओ-ख़ाल है शायद
मैं सत्ह-ए-हर्फ़ पे तुझ को उतार लाया हूँ
तिरा ज़वाल ही मेरा कमाल है शायद
मैं एक लम्हा-ए-मौजूद से इधर न उधर
सो जो भी मेरे लिए है मुहाल है शायद
वो इंहिमाक हर इक काम में कि ख़त्म न हो
तो कोई बात हुई है मलाल है शायद
गुमाँ हुआ है ये अम्बोह से जवाबों के
सवाल ख़ुद ही जवाब-ए-सवाल है शायद
मस्कन-ए-माह-ओ-साल छोड़ गया
मस्कन-ए-माह-ओ-साल छोड़ गया
दिल को उस का ख़याल छोड़ गया
ताज़ा-दम जिस्म-ओ-जाँ थे फ़ुर्क़त में
वस्ल उस का निढाल छोड़ गया
अहद-ए-माज़ी जो था अजब पुर-हाल
एक वीरान हाल छोड़ गया
झाला-बारी के मरहलों का सफ़र
क़ाफ़िले पाएमाल छोड़ गया
दिल को अब ये भी याद हो कि न हो
कौन था क्या मलाल छोड़ गया
मैं भी अब ख़ुद से हूँ जवाब-तलब
वो मुझे बे-सवाल छोड़ गया