हिंदी ग़ज़लें : मोहनजीत कुकरेजा
Hindi Ghazals : Mohanjeet Kukreja
1. वाइज़ और मैं…
दिल की बात कह दूँ उन से, वो ताब अपने में ला ना सका,
कोशिश कर ली लाख मगर उनको कभी मैं भुला ना सका !
तजुर्बों की कोई कमी नहीं, क़िस्से-अफ़्साने भी काफी थे...
दुनिया तो सुनना चाहती थी बस मैं ही कभी सुना ना सका !
ख़्वाबों की अब क्या बात करें, चाहत का क्यों अब चर्चा हो,
सपनों के सच ना होने की ज़िद आँखों को समझा ना सका !
काम मुकम्मल किये बहुत, कुछ मुश्किल थे तो कुछ आसाँ...
होश ठिकाने, दिल क़ाबू में लेकिन कभी भी आ ना सका !
कुछ नयी कुछ पुरानी यादें, हर्फ़ बन बन कर बिखरी थीं...
बहा न सका, जला न सका, उन पन्नों को दफ़्ना ना सका !
वाइज़ बुलाये मस्जिद में मुझ को, मैं उस को मैख़ाने में...
दोनों ही धुन के पक्के थे, वो आ ना सका, मैं जा ना सका !
(ताब: सामर्थ्य; हर्फ़: अक्षर; वाइज़: धार्मिक उपदेशक)
2. लोग कहते हैं इश्क़ छोड़ !
लोग कहते हैं इश्क़ छोड़ वर्ना बदनाम हो जायेगा
कैसे समझायें यूँ ही सही अपना नाम हो जायेगा !
हर ख़ुशी से वाबस्ता हो, पहुंचो हर एक उरूज तक
अपना तो क्या, वही क़िस्सा है, तमाम हो जायेगा !
यह कश्मकश ज़िन्दगी की उसी के साथ ख़त्म होगी
थक चुके दिलो-दिमाग़ को ज़रा आराम हो जायेगा !
तअ'ल्लुक़ हमारे बीच गर ऐसे ही ना-ख़ुशगवार रहे
ज़िन्दगी तो मुश्किल थी ही मरना हराम हो जायेगा !
कभी दुआओं में ही सही तुम याद रख सके अगर
अपने लिए तो बस यह भी एक इनाम हो जायेगा !
हमारे रास्ते और ख़्यालात जो एक हो सके कभी
किसी रोज़ तुम्हारे साथ भी एक जाम हो जायेगा !
(वाबस्ता: जुड़ा हुआ; उरूज: उत्कर्ष; तअ'ल्लुक़: संबंध;
ना-ख़ुशगवार: अप्रिय)
3. ज़िन्दगी में हर एक को...
ज़िन्दगी में हर एक को साथ छोड़ जाते देखा
फ़क़त एक मय को यहाँ रिश्ता निभाते देखा
ख़ुद के गिरेबाँ तक नज़र पहुँचे या ना पहुँचे..
हर शख़्स को दूसरों को मगर आज़माते देखा
छोटा हो बड़ा हो, शाह हो या हो कोई फ़क़ीर
हर किसी को आख़िर चार कांधों पे जाते देखा
उसकी रहमत सिर्फ़ इबादत की नहीं मोहताज
ख़ुदा-परस्त को तरसते, काफ़िर को पाते देखा
जिन से जुदाई का तसव्वुर भी ना था मुमकिन
उन अज़ीज़ों को बिछड़ने पे हाथ हिलाते देखा
किसी के हिज्र का सबब बहुतेरे बना करते हैं
चंद मसीहों को मगर बिछड़ों को मिलाते देखा
दूसरों को मुस्तक़िल ज़ख्म देने वालों को कभी
जहां में अपना भी चाके-जिगर सिलवाते देखा
अंजाम से वाक़िफ़, बेख़ौफ़ परवानों को हमने
जुनूने-इश्क़ में अक्सर शमा पर मँडराते देखा
मौत के परियों की मानिंद दिल-फ़रेब अफ़्साने
बाज़ दफ़ा ख़ुद को मैंने अपने को सुनाते देखा
रहे तो दुनिया में इक उम्र, मगर ख़ुद में महव
ना किसी ने जीते देखा, ना किसी ने जाते देखा
(फ़क़त: सिर्फ़; रहमत: कृपा; ख़ुदा-परस्त: ख़ुदा को
पूजने वाला; तसव्वुर: कल्पना; अज़ीज़: प्रिय; हिज्र:
जुदाई; सबब: वजह; मुस्तक़िल: हमेशा; चाक-ए-जिगर:
दिल का ज़ख्म; मानिंद: जैसे; बाज़ दफ़ा: कई बार;
महव: डूबे)
4. मुंतज़िर
मेरी तवज्जो का मरकज़ सिर्फ़ तू ही नहीं था
ग़म की और भी वजहें थीं महज़ तू ही नहीं था
अदावत में अगर नहीं तो मुरव्वत से ही सही
ज़ख्म औरों ने भी दिए फ़क़त तू ही नहीं था
हम-सफर रहा कोई तो बस यादों का क़ाफ़िला
मैं भी यहाँ अकेला था तन्हा वहाँ तू ही नहीं था
किस-किस की बात से दिल ना परेशाँ हुआ…
संगदिल सनम थे और भी एक तू ही नहीं था
दिलों में फासला कम करना मुश्किल ना था
मैं हमेशा मुंतज़िर था पर कभी तू ही नहीं था
(तवज्जो: ध्यान; मरकज़: केंद्र; महज़: सिर्फ़;
अदावत: दुश्मनी; मुरव्वत: प्यार-मोहब्बत;
फ़क़त: केवल; संगदिल: पत्थरदिल; मुंतज़िर:
उत्सुक, इन्तज़ार करता)
5. अंजाम..
बुझा-बुझा सा दिल, और धुआँ-धुआँ सी शाम है
हाथों में फिर एक बार... नया सा कोई जाम है !
बुरा जो जाने कोई इसे, नुक़्स महज़ नज़र का है
बादा-कशों में ही सही... कहीं तो अपना नाम है !
दैर-ओ-हरम में क्यों जाएँ, फिरें ढूँढ़ते उसको...
अपनी तो यारो जुस्तजू का मैकदे में मक़ाम है !
अब तक जी कर हमने, जाना फ़क़त इतना ही
हर शै का, हर शख़्स का आख़िर तो अंजाम है !
मुब्तला-ए-दर्द हैं पर, कहते किसी से कुछ नहीं
फ़रेब है तबस्सुम... नुमायशी यह इब्तिसाम है !
(महज़/फ़क़त: सिर्फ़; बादा-कश: शराबी;
दैर-ओ-हरम: मंदिर-मस्जिद; जुस्तजू:
तलाश; मैकदा: मधुशाला; मक़ाम: ठिकाना;
मुब्तला-ए-दर्द: पीड़ा में फंसे; तबस्सुम:
मुस्कान; नुमायशी: झूटी, दिखावी;
इब्तिसाम: ख़ुशी)
6. वारदात...
कल बरसों बाद ख़ुद से मुलाक़ात हो गई
बातों-बातों में शाम ढली और रात हो गई
शब् भर पढ़ते-पढ़ाते रहे, सुनते रहे सुनाते रहे
दिल ना हुआ कोई किताब-ए-जज़्बात हो गई
कुछ एक ने हंसाया और कुछ ने रुलाया भी…
चंद क़िस्सों पर तो आँखों से बरसात हो गई
दिल के किसी मसले पर छिड़ गई एक बहस
बातों-बातों में फिर ना जाने क्या बात हो गई
बाद का कुछ याद नहीं... फिर मगर अकेला हूँ
सुना है सुबह एक क़त्ल की वारदात हो गई !!
7. अंदाज़-ए-ज़िन्दगी
जो मिला हमसे अपना बना लिया
रफ़्ता-रफ़्ता एक कारवाँ बना लिया !
लोगों ने जो फेंके थे संग मुझ पर
आशियाना मैंने उन्हीं से बना लिया !
सफ़र हयात का कहीं तन्हा न कटे
सागरो मीना को हमराह बना लिया !
ख़ुद बेशक न बन पाये हों हम कभी
किसी को लुत्फ़-ए-ज़ीस्त बना लिया !
छोटी- बड़ी हर एक बात को हम ने
बस दिल-लगी का सबब बना लिया !
8. ऐ ख़ुदा तेरा शुक्रिया !
ऐ ख़ुदा तेरा शुक्रिया, बहुत दिया, जो भी दिया
कमज़र्फ़ थे कभी ख़ुशी में तुझे ना याद किया !
ज़िन्दगी तो बस सबकी यूँ ही गुज़रा करती है
कुछ इसको दे दिया और कुछ उससे ले लिया !
चंद बातें कीं, कुछ क़िस्से भी सबसे कह डाले
लबों को अपने कुछ मुद्दों पे लेकिन सी लिया !
जब मिली ख़ुशी, बटोर ली अपने दामन में…
ऐसे ही हमने ग़म का हंसते-हंसते जाम पिया !
क़िस्मत ने कभी रौशनी को बख़्शा आफ़्ताब
और कभी हमें नसीब नहीं हुआ एक दिया…!
दुनिया ने तो रंजिश ही निभाई मोहब्बत से
हाँ, हमने मगर प्यार से सब को प्यार किया !
मासूम थे पीठ में हम खंजर ताउम्र खाते रहे
मजाल है कभी पलट दोस्त पर वार किया !
9. वक़्त से...
सबके भरने का दम भरता है मेरे भी तो कभी भर
कुछ ज़ख़्म तक़लीफ़ देते हैं अभी, उनका कुछ कर !
तेरे गुज़रने पर सुना है सब कुछ भूल जाया करता है
वो यादें, वो सदमे भी जो दिल में कर चुके हों घर !
बुरा बन कर तो बहुत राब्ता रख लिया, ऐ दोस्त...
किसी रोज़ अच्छा बन कर भी तो निकल आ इधर !
यह भी क्या ज़िद है कि चला गया तो आता नहीं…
कोई प्यार से गर बुलाये तो कभी पलट आया कर !
हर एक ग़लत बात पर लोग तेरा ही नाम लेते हैं…
बता क्यों लिये फिरता है इतने इल्ज़ाम अपने सर ?!
10. तो बात बने…
गर सलीब अपनी उठाओ तो बात बने
मसीहा बन के दिखाओ.. तो बात बने !
हंसते हुए भीग गयी होंगीं पलकें बेशक
रोते हुए जो मुस्कुराओ.. तो बात बने !
छोड़ देना कुछ कहीं, क्या मुश्किल है
मक़ाम तलक पहुँचाओ.. तो बात बने !
ख़ुशगवार राहों का सफ़र आसाँ होगा
पत्थरों पर चल पाओ.. तो बात बने !
दुनिया को परखने से है क्या हासिल
ख़ुद को भी आज़माओ.. तो बात बने !
फ़क़त रंजिशें निभाने में रखा क्या है
यदि रिश्ते निभा पाओ.. तो बात बने !
ज़िन्दगी छोटी सही, नायाब तोहफा है
बस सलीक़े से जी पाओ तो बात बने !
11. हिम्मत-अफ़्ज़ाई !
इन से कब कुछ हुआ है… आँसुओं को तो थाम लो
नाकामियों की छोड़ फ़िक़्र, सिर्फ़ हौसले से काम लो !
तक़दीर कोई दुश्मन नहीं कि हमेशा रहेगी ख़िलाफ़
ख़फ़ा सही, माशूक़ ही है, वही दर्जा, वही मक़ाम दो !
थक गए हो अगर चलके, दम लो, थोड़ा रुक जाओ
ख़ुद को एक जाम... और क़दमों को ज़रा आराम दो !
कोशिशें मुसलसल हैँ अगर, ख़्वाब अधूरे रहेंगे क्यों
मंज़िल चलके क़रीब आएगी, तुम अगरचे ठान लो !
हमराह अगर मिले कोई, दुःख-सुख बांटो, साथ चलो
वगरना अपने इस सफ़र को ख़ुद-ब-ख़ुद अंजाम दो !
12. उसका निज़ाम...
डर कैसा, मौत तो आखिरी मक़ाम ही है,
ज़िन्दगी को रोक सके, वो लगाम ही है !
कुचल सको अगर इनको तो अलग बात
सर को उठाना तमन्नाओं का काम ही है !
तिजारत ही है, सब कुछ यहाँ बिकता है
साँसों से चुकाना… जीने का दाम ही है !
रौशनी है जब तक, ग़म किस बात का
रात की फ़िक्र क्यों, अभी तो शाम ही है !
यह होता, वो होता, ऐसा करते, यूँ करते
होता है जब जो भी, उसका निज़ाम ही है !
(मक़ाम: ठिकाना; तिजारत: व्यापार;
निज़ाम: प्रबंध, व्यवस्था)
13. दौर-ए-आइंदा
पहले फ़क़त एक वजूद था मेरा, आज-कल ज़िंदा हूँ….
तौहीन-ए-उम्र-ए-गुज़िश्ता पर मैं वाक़ई अब शर्मिंदा हूँ !
ज़मीं से वाबस्ता था, महज़ ज़मीन पर रहा करता था…
आसमाँ की बुलंदियों को छूता अब मन-मौजी परिंदा हूँ !
चंद मेहरबाँ जो मेरे ख़िलाफ़ ता-उम्र साज़िश करते रहे...
जिगर मेरा देखो उन्हीं के शहर का अब भी बाशिंदा हूँ !
पुराने थे ग़ालिबन कभी ख़्यालात मेरे भी तुम्हारी तरह...
अंदाज़ अपना बदल दिया, अब तो मैं दौर-ए-आइंदा हूँ !
मंज़िलें बदलती रहीं, जुस्तजू कोई ना कोई रही मगर...
इन दिनों जल्वा-ए-ख़ुदाई का एक अदना सा जोइंदा हूँ !
(फ़क़त: सिर्फ़; वजूद: अस्तित्व; तौहीन-ए-उम्र-ए-गुज़िश्ता:
गुज़री ज़िन्दगी का अपमान; वाबस्ता: जुड़ा हुआ;
साज़िश: षड्यंत्र; जिगर: यहाँ पर, हिम्मत; बाशिंदा:
निवासी; ग़ालिबन: शायद; दौर-ए-आइंदा: आने
वाला समय; जुस्तजू: तलाश; जल्वा-ए-ख़ुदाई:
दिव्य प्रतिभा, शोभा; अदना: तुच्छ; जोइंदा:
खोजकर्ता)
14. अभी था...
जब तू नहीं था कुछ भी नहीं था,
तू जब मिला तो मैं ही नहीं था !
एक सदमे का बस इंतज़ार रहा,
मिल जायेगा तू सोचा नहीं था !
तू मिला पर एक छलावे जैसा,
अभी था... और अभी नहीं था !
और कब तक मैं इंतज़ार करता,
सब्र था... मगर इतना नहीं था !
तेरी आमद से पहले दम निकला,
साँसों को मैंने रोका नहीं था !!
15. फ़ितरत पे सवाल…
मुरव्वत से पेश आऊँगा ताकि कोई सवाल ना हो...
मिल रहें हैं जो इख़्लास से, दुश्मनों की चाल ना हो !
बे-शक चल रही हो वहाँ मेरे ही क़त्ल की साज़िश,
कोई मोहब्बत से बुलाए, न जाने की मजाल ना हो !
एतबार अगर दुश्वारियों का बाइस बनता है तो बने..
वो ज़िन्दगी क्या जीना जिसमें कोई कमाल ना हो !
जान की परवाह किसे है, बस रिश्ते दिल के बने रहें,
किसी पर भी भरोसा न रहे इतना बुरा हाल ना हो !
बाक़ी सब कुछ हासिल है, एक तमन्ना अभी बची है,
मेरे बाद भी मेरी फ़ितरत पे कभी कोई सवाल ना हो !
(मुरव्वत: प्यार; इख़्लास: शिष्टाचार, प्रेम;
साज़िश: षड्यंत्र; मजाल: हिम्मत;
एतबार: भरोसा; दुश्वारी: मुश्किल;
बाइस: कारण; फ़ितरत: आदत,स्वभाव)
16. फ़रियाद नहीं थी...
शायद रिश्ते की बुनियाद नहीं थी
वर्ना ज़िन्दगी यूँ नामुराद नहीं थी..
कई उलझनों का सदक़ा जागा हूँ
वो फ़क़त एक तेरी याद नहीं थी..
दर्द से इश्क़, तन्हाई से मोहब्बत
तेरे पहले तो थी तेरे बाद नहीं थी
सिर्फ़ मुझ पे नहीं था रंग हिज्र का..
फ़ज़ा भी कुछ कम नाशाद नहीं थी
ज़िंदा तो रहूँ पर तुझको भूल कर
अब ऐसी भी कोई मुराद नहीं थी
दुनिया भर के दुखों ने बांट लिया
इंसान था कोई जायदाद नहीं थी
ज़ब्त इस से ज़्यादा भी क्या होता
एक आह थी वो फ़रियाद नहीं थी
17. खुला आसमान...
आज-कल कोई फ़िक्रमंद तो कोई परेशान मिले
कितना डरा हुआ दिखता है जो भी इंसान मिले
दौर-ए-हयात में अब यक़ीन बरक़रार कैसे रहे
डाँवा-डोल ही इन दिनों दुनिया का ईमान मिले
मुश्किल दौर है अल्लाह तौफ़ीक़ अता फ़रमाए
किसे पता इसके बाद कौन सा इम्तिहान मिले
अब भी वक़्त है, बख़्शवा लें अपने गुनाहों को
कहीं ऐसा ना हो कल हर जगह बयाबान मिले
पिंजरे का दर्द समझ चुके हैं ख़ास-ओ-आम...
शायद परिंदों की दुआ से खुला आसमान मिले
18. दिल से गुफ़्तुगू
दिल से गुफ़्तुगू उम्दा एहसास है
इन दिनों मगर लगता उदास है !
शायद आदत बना ली है इस ने
हर वक़्त रहता महव-ए-यास है !
महसूस ना क्यूँकर हो हर दर्द….
दिल तो था, ज़ेहन भी हस्सास है !
मायूस बेशक है, ना-उम्मीद नहीं
गोया दिल को अब भी आस है !
एक न एक दिन मौत यक़ीनी है
फिर बे-वजह यह क्या हिरास है !
(गुफ़्तुगू: बात-चीत; उम्दा: बढ़िया;
महव-ए-यास: शोक में डूबा;
हस्सास: संवेदनशील; हिरास: भय)
19. बरसात का मौसम
इन दोनों के दरमियाँ कुछ रिश्ता तो है ज़रूर
हरेक बारिश में यह दिल मचलता तो है ज़रूर
शर्माते हुए छिपने की कोशिश हज़ार करता है
भीगने के बाद हुस्न और निखरता तो है ज़रूर
तमन्ना कुछ तो पहले ही जवान हुआ करती है
बेताबियाँ बढ़ाने को चांद निकलता तो है ज़रूर
इश्क़ पे क्या ज़ोर है चाहत को किसने रोका है
अरमाँ की तपिश में जिस्म जलता तो है ज़रूर
गुफ़्तुगू है ग़ैर-ज़रूरी और ख़ामोशी बे-असर
सर-गोशियों से फ़ासला सिमटता तो है ज़रूर
बरसात का मौसम भी कितना ग़ज़ब ढाता है
सराबोर हो तन-मन पर सुलगता तो है ज़रूर
फ़ितरत इसकी कैसी भी हो, यह मगर तय है
संभलने से पहले ये दिल बहकता तो है ज़रूर
20. उम्र-क़ैद…
आवाज़ आज भी देता हूँ, तुम्हें सुनायी देती नहीं
मिलने की अब कोई उम्मीद दिखायी देती नहीं !
जीवन बिता डाला पूरा, जिसको हासिल करने में
मंज़िल तो अब दिखती है, राह सुझायी देती नहीं !
ज़ख़्मी जिस्म-ओ-ज़मीर की गुहार सुनाई देती है
रूह भी लहू-लुहान है पर कभी दुहायी देती नहीं !
गर फ़ितूर हो सहने का, दुःख अपनाना पड़ता है
इतना मज़ा कोई भी तकलीफ़ परायी देती नहीं !
उम्र की इस क़ैद में, ऐसे ही दर्द को जीना होगा
जब तक मौत ख़ुद आकर हमें रिहायी देती नहीं !
21. सफ़र का सामाँ तो है !
सरक रहा आहिस्ता-आहिस्ता आसमाँ तो है
निकल रहा दम के साथ-साथ अरमाँ तो है!
जल रहा है रोज़ आँखों के आगे धुआं-धुआं
हसरतों से बनाया था जो वही मकाँ तो है !
टूटे कई रिश्ते-नाते...बिछड़ गए कुछ अपने
अश्क न सही आँखों में, दिल परेशाँ तो है !
दिखते हैं जो ख़ाली-हाथ, नज़र का धोखा है
चंद शेर, कुछ नज़्में, सफ़र का सामाँ तो है !
सुधरने से पहले इनका बिगड़ना है लाज़िम
बदलेंगे हालात सबके ऐसा कोई इम्काँ तो है !
बिल्कुल ना होने से कुछ होना कहीं बेहतर
डगमगाया हुआ ही सही, अभी ईमाँ तो है !
उस रब पर भरोसा है... मोजज़ों पे यक़ीन
हुआ ना बेशक आज तलक एक गुमाँ तो है !
(लाज़िम: आवश्यक; इम्काँ: संभावना;
मोजज़ा: चमत्कार; गुमाँ: अंदेशा/उम्मीद)
22. गुज़रते हैं हम
ठोकरों से ही सीख कर निखरते हैं हम
नाकामी से क्यों इस क़दर डरते हैं हम!
उतार-चढ़ाव तो ज़िन्दगी का हिस्सा हैं
कभी डूबते हैं और कभी उभरते हैं हम!
एक अजब सा रिश्ता है दोनों के बीच
टूटता अगर दिल है तो बिखरते हैं हम!
मिट्टी है सब मिट्टी में सबको मिलना है
किस लिए फिर यूँ बनते संवरते हैं हम!
उम्र गुज़र गई यह समझने समझाने में
वक़्त तो ठहरा रहता है गुज़रते हैं हम!
23. सूरत-ए-अहवाल
इस दौर से पहले कब इतना रंजूर हुआ है
यह इंसान कब इस क़दर मजबूर हुआ है !
अपनी हस्ती पर नाज़ था, दौलत पे ग़ुरूर
जो भी तकब्बुर था सब चकनाचूर हुआ है !
अपनों से भी न मिलने के बहाने ढूंढता था
वक़्त की ऐसी मार कि सब से दूर हुआ है !
ख़ुदा का ख़याल था, न शुक्राने की परवाह
हर बंदा अब उसी रब का मश्कूर हुआ है !
मुसाफ़िर हैं सब और दुनिया महज़ सराय
कोई वहम-ओ-गुमाँ था तो काफ़ूर हुआ है !
क़ुदरत का क़हर, सबक़ है हरेक बशर को
सोचा होगा क्यों ये इतना मग़रूर हुआ है !
वो जो आसमानी-बाप है, रहम भी करेगा
किसको अपने बच्चों पे ज़ुल्म मंज़ूर हुआ है !
(सूरत-ए-अहवाल: हालात का नक़्शा; रंजूर:
ग़मगीन/ फ़िक्रमंद; तकब्बुर: ग़रूर; मश्कूर:
आभारी; वहम-ओ-गुमाँ: ग़लत-फ़हमी/
शक- शुबहा; काफ़ूर: ग़ायब; क़हर: प्रकोप;
बशर: इंसान; मग़रूर: अहंकारी; आसमानी-बाप:
ख़ुदा/ रब)
24. चलो सजदों में झुक जायें
सांस बोझल है इन दिनों, फ़ज़ा भी कुछ भारी है
दिलों में मायूसी है और आँखों में अश्क-बारी है!
चेहरे सब सहमे हुए, सारे जहाँ में ख़ौफ़ तारी है
दहशत का माहौल, कैसी मनहूस ये आज़ारी है!
किस क़दर इस दौर में, बेबसी आज हमारी है
फ़िक्रमंद निगाहें हैं, हरेक चेहरे पर लाचारी है!
अंजाम को क़रीब पाके, थर्रायी ख़ल्क़त सारी है
किसीके बस में कुछ नहीं, पूरी दुनिया हारी है!
आदम के इस बच्चे में लेकिन अब तलक मक्कारी है
दो गज़ ज़मीन और हवा की भी चोर-बाज़ारी है!
एक तरफ़ इस वबा का, क़हर ब-दस्तूर जारी है
उसपे ये आलम, अदवियात की भी मारा-मारी है!
अब तो गुनाहों को, बख़्शवाने में समझदारी है
सजदों में झुक जाने में, अब कैसी शर्मसारी है!
(अश्क-बारी: आँसू बरसाना; तारी: फैला हुआ;
आज़ारी: तकलीफ़/बीमारी; अंजाम: अंत; ख़ल्क़त: दुनिया/
सब लोग; वबा: महामारी; आलम: हालत; अदवियात:
दवा-दारु/ इलाज)
25. हाकिम-ए-आ'ला
जिसका ये सब करम, वो हाकिम-ए-आ'ला आसमानी है
यहाँ जो भी, जब भी होता है, सब उसकी हुक्म-रानी है!
हम अदना से इंसान, हम सबके बस में कुछ भी तो नहीं
ये दुनिया और ये नेमतें तमाम, सब रब की मेहरबानी है!
दुख-सुख साथ ही रहते हैं, मुनहसिर है कुछ हम पर भी
दिल दुखी तो फ़ज़ा उदास है, वर्ना हर-सू शादमानी है!
जो कल था वो आज नहीं है, जो आज है कल होगा नहीं
इक बार जीना है खुलके जी लो, छोटी सी ज़िंदगानी है!
मौजूदा दौर का हाल ये है, कब क्या हो जाए, पता नहीं
ये जो सब कुछ सालिम है, बस दुआओं की सायबानी है!
हिफ़ाज़त है उसका ज़िम्मा, तुम बस ख़ुदा को याद रखो
ख़ुद को उसके हवाले कर दो, ये बात अगर आज़मानी है!
(हाकिम-ए-आ'ला: सर्वोपरि शक्ति, ईश्वर; हुक्म-रानी: सलतनत;
मुनहसिर: निर्भर; हर-सू: सब तरफ़; शादमानी: ख़ुशी;
सालिम: संपूर्ण, यथावत्; सायबानी: पनाह, सहारा)