चुनिंदा ग़ज़लें : निदा फ़ाज़ली
Selected Ghazals : Nida Fazli
अच्छी नहीं ये ख़ामुशी शिकवा करो गिला करो
अच्छी नहीं ये ख़ामुशी शिकवा करो गिला करो
यूँ भी न कर सको तो फिर घर में ख़ुदा ख़ुदा करो
शोहरत भी उस के साथ है दौलत भी उस के हाथ है
ख़ुद से भी वो मिले कभी उस के लिए दुआ करो
देखो ये शहर है अजब दिल भी नहीं है कम ग़ज़ब
शाम को घर जो आऊँ मैं थोड़ा सा सज लिया करो
दिल में जिसे बसाओ तुम चाँद उसे बनाओ तुम
वो जो कहे पढ़ा करो जो न कहे सुना करो
मेरी नशिस्त पे भी कल आएगा कोई दूसरा
तुम भी बना के रास्ता मेरे लिए जगह करो
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये
जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाये
बाग में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये
ख़ुदकुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों तक
किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं
अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला
अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
हर बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला
उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
दूर के चांद को ढूंढ़ो न किसी आँचल में
ये उजाला नहीं आंगन में समाने वाला
इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला
आएगा कोई चल के ख़िज़ाँ से बहार में
आएगा कोई चल के ख़िज़ाँ से बहार में
सदियाँ गुज़र गई हैं इसी इंतिज़ार में
छिड़ते ही साज़-ए-बज़्म में कोई न था कहीं
वो कौन था जो बोल रहा था सितार में
ये और बात है कोई महके कोई चुभे
गुलशन तो जितना गुल में है उतना है ख़ार में
अपनी तरह से दुनिया बदलने के वास्ते
मेरा ही एक घर है मिरे इख़्तियार में
तिश्ना-लबी ने रेत को दरिया बना दिया
पानी कहाँ था वर्ना किसी रेग-ज़ार में
मसरूफ़ गोरकन को भी शायद पता नहीं
वो ख़ुद खड़ा हुआ है क़ज़ा की क़तार में
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया
खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया
बात बहुत मा'मूली सी थी उलझ गई तकरारों में
एक ज़रा सी ज़िद ने आख़िर दोनों को बरबाद किया
दानाओं की बात न मानी काम आई नादानी ही
सुना हवा को पढ़ा नदी को मौसम को उस्ताद किया
आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही
आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही
जब तलक है ख़ूबसूरत है चलो यूँ ही सही
हम कहाँ के देवता हैं बेवफ़ा वो हैं तो क्या
घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही
वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह
जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही
मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह
दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही
भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँडना
आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही
जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं
दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही
इंसान हैं हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
इंसान हैं हैवान यहाँ भी है वहाँ भी
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी
ख़ूँ-ख़्वार दरिंदों के फ़क़त नाम अलग हैं
हर शहर बयाबान यहाँ भी है वहाँ भी
हिन्दू भी सुकूँ से है मुसलमाँ भी सुकूँ से
इंसान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी
रहमान की रहमत हो कि भगवान की मूरत
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहाँ भी
उठता है दिल-ओ-जाँ से धुआँ दोनों तरफ़ ही
ये 'मीर' का दीवान यहाँ भी है वहाँ भी
उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ
उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ
रात के बा'द दिन आज के बा'द कल जो हुआ सो हुआ
जब तलक साँस है भूक है प्यास है ये ही इतिहास है
रख के काँधे पे हल खेत की ओर चल जो हुआ सो हुआ
ख़ून से तर-ब-तर कर के हर रहगुज़र थक चुके जानवर
लकड़ियों की तरह फिर से चूल्हे में जल जो हुआ सो हुआ
जो मरा क्यूँ मरा जो लुटा क्यूँ लुटा जो जला क्यूँ जला
मुद्दतों से हैं ग़म इन सवालों के हल जो हुआ सो हुआ
मंदिरों में भजन मस्जिदों में अज़ाँ आदमी है कहाँ
आदमी के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल जो हुआ सो हुआ
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा
प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली
जिस को पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा
मिरे बारे में कोई राय तो होगी उस की
उस ने मुझ को भी कभी तोड़ के देखा होगा
एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक
जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा
उस को खो देने का एहसास तो कम बाक़ी है
उस को खो देने का एहसास तो कम बाक़ी है
जो हुआ वो न हुआ होता ये ग़म बाक़ी है
अब न वो छत है न वो ज़ीना न अंगूर की बेल
सिर्फ़ इक उस को भुलाने की क़सम बाक़ी है
मैं ने पूछा था सबब पेड़ के गिर जाने का
उठ के माली ने कहा उस की क़लम बाक़ी है
जंग के फ़ैसले मैदाँ में कहाँ होते हैं
जब तलक हाफ़िज़े बाक़ी हैं अलम बाक़ी है
थक के गिरता है हिरन सिर्फ़ शिकारी के लिए
जिस्म घायल है मगर आँखों में रम बाक़ी है
एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा
एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा
दुख सुख का ये जंतर-मंतर जितना तेरा उतना मेरा
गेहूँ चावल बाँटने वाले झूटा तौलें तो क्या बोलें
यूँ तो सब कुछ अंदर बाहर जितना तेरा उतना मेरा
हर जीवन की वही विरासत आँसू सपना चाहत मेहनत
साँसों का हर बोझ बराबर जितना तेरा उतना मेरा
साँसें जितनी मौजें उतनी सब की अपनी अपनी गिनती
सदियों का इतिहास समुंदर जितना तेरा उतना मेरा
ख़ुशियों के बटवारे तक ही ऊँचे नीचे आगे पीछे
दुनिया के मिट जाने का डर जितना तेरा उतना मेरा
कच्चे बख़िये की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं
कच्चे बख़िये की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं
लोग मिलते हैं मगर मिल के बिछड़ जाते हैं
यूँ हुआ दूरियाँ कम करने लगे थे दोनों
रोज़ चलने से तो रस्ते भी उखड़ जाते हैं
छाँव में रख के ही पूजा करो ये मोम के बुत
धूप में अच्छे भले नक़्श बिगड़ जाते हैं
भीड़ से कट के न बैठा करो तन्हाई में
बे-ख़याली में कई शहर उजड़ जाते हैं
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत
कठ-पुतली है या जीवन है जीते जाओ सोचो मत
सोच से ही सारी उलझन है जीते जाओ सोचो मत
लिखा हुआ किरदार कहानी में ही चलता फिरता है
कभी है दूरी कभी मिलन है जीते जाओ सोचो मत
नाच सको तो नाचो जब थक जाओ तो आराम करो
टेढ़ा क्यूँ घर का आँगन है जीते जाओ सोचो मत
हर मज़हब का एक ही कहना जैसा मालिक रक्खे रहना
जब तक साँसों का बंधन है जीते जाओ सोचो मत
घूम रहे हैं बाज़ारों में सरमायों के आतिश-दान
किस भट्टी में कौन ईंधन है जीते जाओ सोचो मत
कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है
उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँ
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है
उस बस्ती से छुट कर यूँ तो हर चेहरे को याद किया
जिस से थोड़ी सी अन-बन थी वो अक्सर याद आया है
कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें कीं
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता
तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता
कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता
ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता
चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता
कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगे
कभी बादल, कभी कश्ती, कभी गर्दाब लगे
वो बदन जब भी सजे कोई नया ख्वाब लगे
एक चुप चाप सी लड़की, न कहानी न ग़ज़ल
याद जो आये कभी रेशम-ओ-किम्ख्वाब लगे
अभी बे-साया है दीवार कहीं लोच न ख़म
कोई खिड़की कहीं निकले कहीं मेहराब लगे
घर के आँगन मैं भटकती हुई दिन भर की थकन
रात ढलते ही पके खेत सी शादाब लगे
कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहीं
कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहीं
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे
मगर जो दिया वो दिया देर से
हुआ न कोई काम मामूल से
गुज़ारे शब-ओ-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से
कभी रुक गये राह में बेसबब
कभी वक़्त से पहले घिर आई शब
हुये बंद दरवाज़े खुल खुल के सब
जहाँ भी गया मैं गया देर से
ये सब इत्तिफ़ाक़ात का खेल है
यही है जुदाई यही मेल है
मैं मुड़ मुड़ के देखा किया दूर तक
बनी वो ख़ामोशी सदा देर से
सजा दिन भी रौशन हुई रात भी
भरे जाम लहराई बरसात भी
रहे साथ कुछ ऐसे हालात भी
जो होना था जल्दी हुआ देर से
भटकती रही यूँ ही हर बंदगी
मिली न कहीं से कोई रौशनी
छुपा था कहीं भीड़ में आदमी
हुआ मुझ में रौशन ख़ुदा देर से
काला अम्बर पीली धरती या अल्लाह
काला अम्बर पीली धरती या अल्लाह
हा-हा हे-हे ही-ही-ही-ही या अल्लाह
कर्गिल और कश्मीर ही तेरे नाम हों क्यूँ
भाई बहन महबूबा बेटी या अल्लाह
पीर पयम्बर को अब और न ज़हमत दे
चूल्हा चक्की रोटी सब्ज़ी या अल्लाह
घी मिस्री भी भेज कभी अख़बारों में
कई दिनों से चाय है कड़वी या अल्लाह
तू ही फूल सितारा सावन हरियाली
और कभी तू नागा-साकी या अल्लाह
किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो
किसी भी शहर में जाओ कहीं क़याम करो
कोई फ़ज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो
दुआ सलाम ज़रूरी है शहर वालों से
मगर अकेले में अपना भी एहतिराम करो
हमेशा अम्न नहीं होता फ़ाख़्ताओं में
कभी-कभार उक़ाबों से भी कलाम करो
हर एक बस्ती बदलती है रंग-रूप कई
जहाँ भी सुब्ह गुज़ारो उधर ही शाम करो
ख़ुदा के हुक्म से शैतान भी है आदम भी
वो अपना काम करेगा तुम अपना काम करो
किसी से ख़ुश है किसी से ख़फ़ा ख़फ़ा सा है
किसी से ख़ुश है किसी से ख़फ़ा ख़फ़ा सा है
वो शहर में अभी शायद नया नया सा है
न जाने कितने बदन वो पहन के लेटा है
बहुत क़रीब है फिर भी छुपा छुपा सा है
सुलगता शहर नदी ख़ून कब की बातें हैं
कहीं कहीं से ये क़िस्सा सुना सुना सा है
सरों के सींग तो जंगल की देन होते हैं
वो आदमी तो है लेकिन डरा डरा सा है
कुछ और धूप तो हो ओस सूख जाने तक
वो पेड़ अब के बरस भी हरा हरा सा है
कुछ तबीअ'त ही मिली थी ऐसी
कुछ तबीअ'त ही मिली थी ऐसी चैन से जीने की सूरत न हुई
जिस को चाहा उसे अपना न सके जो मिला उस से मोहब्बत न हुई
जिस से जब तक मिले दिल ही से मिले दिल जो बदला तो फ़साना बदला
रस्म-ए-दुनिया को निभाने के लिए हम से रिश्तों की तिजारत न हुई
दूर से था वो कई चेहरों में पास से कोई भी वैसा न लगा
बेवफ़ाई भी उसी का था चलन फिर किसी से ये शिकायत न हुई
छोड़ कर घर को कहीं जाने से घर में रहने की इबादत थी बड़ी
झूट मशहूर हुआ राजा का सच की संसार में शोहरत न हुई
वक़्त रूठा रहा बच्चे की तरह राह में कोई खिलौना न मिला
दोस्ती की तो निभाई न गई दुश्मनी में भी अदावत न हुई
कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया
कुछ दिनों तो शहर सारा अजनबी सा हो गया
फिर हुआ यूँ वो किसी की मैं किसी का हो गया
इश्क़ कर के देखिए अपना तो ये है तजरबा
घर मोहल्ला शहर सब पहले से अच्छा हो गया
क़ब्र में हक़-गोई बाहर मंक़बत क़व्वालियाँ
आदमी का आदमी होना तमाशा हो गया
वो ही मूरत वो ही सूरत वो ही क़ुदरत की तरह
उस को जिस ने जैसा सोचा वो भी वैसा हो गया
कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई
फिर यूँ हुआ कि वक़्त का पाँसा पलट गया
उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई
सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई
वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस
उस से भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई
रस्ते में वो मिला था मैं बच कर गुज़र गया
उस की फटी क़मीस मिरे साथ हो गई
नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूँढिए
इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई
कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़
कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़
कहाँ है शहर में अब कोई ज़िंदगी की तरफ़
सभी की नज़रों में ग़ाएब था जो वो हाज़िर था
किसी ने रुक के नहीं देखा आदमी की तरफ़
तमाम शहर की शमएँ उसी से रौशन थीं
कभी उजाला बहुत था किसी गली की तरफ़
कहीं की भूक हो हर खेत उस का अपना है
कहीं की प्यास हो जाएगी वो नदी की तरफ़
न निकले ख़ैर से अल्लामा क़ौल से बाहर
'यगाना' टूट गए जब चले ख़ुदी की तरफ़
कोई किसी से ख़ुश हो और वो भी बारहा हो
कोई किसी से ख़ुश हो और वो भी बारहा हो ये बात तो ग़लत है
रिश्ता लिबास बन कर मैला नहीं हुआ हो ये बात तो ग़लत है
वो चाँद रहगुज़र का साथी जो था सफ़र था मो'जिज़ा नज़र का
हर बार की नज़र से रौशन वो मो'जिज़ा हो ये बात तो ग़लत है
है बात उस की अच्छी लगती है दिल को सच्ची फिर भी है थोड़ी कच्ची
जो उस का हादिसा है मेरा भी तजरबा हो ये बात तो ग़लत है
दरिया है बहता पानी हर मौज है रवानी रुकती नहीं कहानी
जितना लिखा गया है इतना ही वाक़िआ हो ये बात तो ग़लत है
ये युग है कारोबारी हर शय है इश्तिहारी राजा हो या भिकारी
शोहरत है जिस की जितनी इतना ही मर्तबा हो ये बात तो ग़लत है
कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है
कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है
आते जाते रात और दिन में कुछ तो जी बहलाने को है
चलो यहाँ से अपनी अपनी शाख़ों पे लौट आए परिंदे
भूली-बिसरी यादों को फिर तन्हाई दोहराने को है
दो दरवाज़े एक हवेली आमद रुख़्सत एक पहेली
कोई जा कर आने को है कोई आ कर जाने को है
दिन भर का हंगामा सारा शाम ढले फिर बिस्तर प्यारा
मेरा रस्ता हो या तेरा हर रस्ता घर जाने को है
आबादी का शोर-शराबा छोड़ के ढूँडो कोई ख़राबा
तन्हाई फिर शम्अ जला कर कोई हर्फ़ सुनाने को है
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है
इतनी ख़ूँ-ख़ार न थीं पहले इबादत-गाहें
ये अक़ीदे हैं कि इंसान की तन्हाई है
तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में
उन के ही वास्ते हर भूक है महँगाई है
देखे कब तलक बाक़ी रहे सज-धज उस की
आज जिस चेहरा से तस्वीर उतरवाई है
अब नज़र आता नहीं कुछ भी दुकानों के सिवा
अब न बादल हैं न चिड़ियाँ हैं न पुर्वाई है
कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया
कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया
हर काम में हमेशा कोई काम रह गया
छोटी थी उम्र और फ़साना तवील था
आग़ाज़ ही लिखा गया अंजाम रह गया
उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए
दहशत-गरों के हाथ में इस्लाम रह गया
उस का क़ुसूर ये था बहुत सोचता था वो
वो कामयाब हो के भी नाकाम रह गया
अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स
गिनती के चार हर्फ़ों का जो नाम रह गया
गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़-धानी दे मौला
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला
फिर रौशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें
झूटों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला
फिर मूरत से बाहर आ कर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई 'मीरा' दीवानी दे मौला
तेरे होते कोई किस की जान का दुश्मन क्यूँ हो
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया
इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था
उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया
पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की
बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया
जब तक था आसमान में सूरज सभी का था
फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया
हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ
आलम तमाम चंद मचानों में बट गया
ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं
ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे
हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे
इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना
घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे
शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्ते
बहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे
हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं
छत से दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे
पहले हर चीज़ नज़र आएगी बे-मा'नी सी
और फिर अपनी ही नज़रों से उतर जाओगे
चाँद से फूल से या मेरी ज़बाँ से सुनिए
चाँद से फूल से या मेरी ज़बाँ से सुनिए
हर जगह आप का क़िस्सा है जहाँ से सुनिए
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए
सब को आता नहीं दुनिया को सजा कर जीना
ज़िंदगी किया है मोहब्बत की ज़बाँ से सुनिए
कौन पढ़ सकता है पानी पे लिखी तहरीरें
किस ने क्या लिक्खा है ये आब-ए-रवाँ से सुनिए
चाँद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्जिद की अज़ाँ से सुनिए
चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं
चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं
घोंसले बन के टूट जाते हैं दाग़ शाख़ों पे चहचहाते हैं
आने वाले बयाज़ में अपनी जाने वालों के नाम लिखते हैं
सब ही औरों के ख़ाली कमरों को अपनी अपनी तरह सजाते हैं
मौत इक वाहिमा है नज़रों का साथ छुटता कहाँ है अपनों का
जो ज़मीं पर नज़र नहीं आते चाँद तारों में जगमगाते हैं
ये मुसव्विर अजीब होते हैं आप अपने हबीब होते हैं
दूसरों की शबाहतें ले कर अपनी तस्वीर ही बनाते हैं
यूँ ही चलता है कारोबार-ए-जहाँ है ज़रूरी हर एक चीज़ यहाँ
जिन दरख़्तों में फल नहीं आते वो जलाने के काम आते हैं
जब किसी से कोई गिला रखना
जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इस में रोने की जगह रखना
मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना
मिलना जुलना जहाँ ज़रूरी हो
मिलने-जुलने का हौसला रखना
जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी
जब भी किसी ने ख़ुद को सदा दी
सन्नाटों में आग लगा दी
मिट्टी उस की पानी उस का
जैसी चाही शक्ल बना दी
छोटा लगता था अफ़्साना
मैं ने तेरी बात बढ़ा दी
जब भी सोचा उस का चेहरा
अपनी ही तस्वीर बना दी
तुझ को तुझ में ढूँढ के हम ने
दुनिया तेरी शान बढ़ा दी
जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम
जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम
ख़ुद अपने आइने को लगे अजनबी से हम
कुछ दूर चल के रास्ते सब एक से लगे
मिलने गए किसी से मिल आए किसी से हम
अच्छे बुरे के फ़र्क़ ने बस्ती उजाड़ दी
मजबूर हो के मिलने लगे हर किसी से हम
शाइस्ता महफ़िलों की फ़ज़ाओं में ज़हर था
ज़िंदा बचे हैं ज़ेहन की आवारगी से हम
अच्छी भली थी दुनिया गुज़ारे के वास्ते
उलझे हुए हैं अपनी ही ख़ुद-आगही से हम
जंगल में दूर तक कोई दुश्मन न कोई दोस्त
मानूस हो चले हैं मगर बम्बई से हम
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं
मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं
मेरे बदन में खुले जंगलों की मिट्टी है
मुझे सम्भाल के रखना बिखर न जाऊँ मैं
मेरे मिज़ाज में बे-मानी उलझनें हैं बहुत
मुझे उधर से बुलाना जिधर न जाऊँ मैं
कहीं पुकार न ले गहरी वादियों का सबूत
किसी मक़ाम पे आकर ठहर न जाऊँ मैं
न जाने कौन से लम्हे की बद-दुआ है ये
क़रीब घर के रहूँ और घर न जाऊँ मैं
जाने वालों से राब्ता रखना
जाने वालों से राब्ता रखना
दोस्तो रस्म-ए-फ़ातिहा रखना
घर की ता'मीर चाहे जैसी हो
उस में रोने की कुछ जगह रखना
मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना
जिस्म में फैलने लगा है शहर
अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना
उम्र करने को है पचास को पार
कौन है किस जगह पता रखना
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया
बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया
चार घरों के एक मोहल्ले के बाहर भी है आबादी
जैसी तुम्हें दिखाई दी है सब की वही नहीं है दुनिया
घर में ही मत उसे सजाओ इधर उधर भी ले के जाओ
यूँ लगता है जैसे तुम से अब तक खुली नहीं है दुनिया
भाग रही है गेंद के पीछे जाग रही है चाँद के नीचे
शोर भरे काले नारों से अब तक डरी नहीं है दुनिया
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे
उसे उम्र सारी हमारी लगे
उजाला सा है उस के चारों तरफ़
वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे
वो ससुराल से आई है माइके
उसे जितना देखो वो प्यारी लगे
हसीन सूरतें और भी हैं मगर
वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे
चलो इस तरह से सजाएँ उसे
ये दुनिया हमारी तुम्हारी लगे
उसे देखना शेर-गोई का फ़न
उसे सोचना दीन-दारी लगे
जो भला है उसे बुरा मत कर
जो भला है उसे बुरा मत कर
ख़ुद से भी बारहा मिला मत कर
ये है बस्ती उदास लोगों की
क़हक़हा मार कर हिंसा मत कर
बाग़ है दिल फ़रेब दोनों से
फूल को ख़ार से जुदा मत कर
रोज़ की ला'न-ता'न ठीक नहीं
घर में आईने को रखा मत कर
चेहरा मोहरा बदलता रहता है
इतनी जल्दी भी फ़ैसला मत कर
जो हो इक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता
जो हो इक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता
हर इक कश्ती का अपना तजरबा होता है दरिया में
सफ़र में रोज़ ही मंजधार हो ऐसा नहीं होता
कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे
हक़ीक़त भी कहानी-कार हो ऐसा नहीं होता
कहीं तो कोई होगा जिस को अपनी भी ज़रूरत हो
हर इक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता
सिखा देती हैं चलना ठोकरें भी राहगीरों को
कोई रस्ता सदा दुश्वार हो ऐसा नहीं होता
ज़मीं दी है तो थोड़ा सा आसमाँ भी दे
ज़मीं दी है तो थोड़ा सा आसमाँ भी दे
मिरे ख़ुदा मिरे होने का कुछ गुमाँ भी दे
बना के बुत मुझे बीनाई का अज़ाब न दे
ये ही अज़ाब है क़िस्मत तो फिर ज़बाँ भी दे
ये काएनात का फैलाव तो बहुत कम है
जहाँ समा सके तन्हाई वो मकाँ भी दे
मैं अपने आप से कब तक किया करूँ बातें
मिरी ज़बाँ को भी कोई तर्जुमाँ भी दे
फ़लक को चांद-सितारे नवाज़ने वाले
मुझे चराग़ जलाने को साएबाँ भी दे
ज़िहानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिला
ज़िहानतों को कहाँ कर्ब से फ़रार मिला
जिसे निगाह मिली उस को इंतिज़ार मिला
वो कोई राह का पत्थर हो या हसीं मंज़र
जहाँ भी रास्ता ठहरा वहीं मज़ार मिला
कोई पुकार रहा था खुली फ़ज़ाओं से
नज़र उठाई तो चारों तरफ़ हिसार मिला
हर एक साँस न जाने थी जुस्तुजू किस की
हर इक दयार मुसाफ़िर को बे-दयार मिला
ये शहर है कि नुमाइश लगी हुई है कोई
जो आदमी भी मिला बन के इश्तिहार मिला
ठहरे जो कहीं आँख तमाशा नज़र आए
ठहरे जो कहीं आँख तमाशा नज़र आए
सूरज में धुआँ चाँद में सहरा नज़र आए
रफ़्तार से ताबिंदा उमीदों के झरोके
ठहरूँ तो हर इक सम्त अँधेरा नज़र आए
साँचों में ढले क़हक़हे सोची हुई बातें
हर शख़्स के काँधों पे जनाज़ा नज़र आए
हर राहगुज़र रास्ता भूला हुआ बालक
हर हाथ में मिट्टी का खिलौना नज़र आए
खोई हैं अभी मैं के धुँदलकों में निगाहें
हट जाए ये दीवार तो दुनिया नज़र आए
जिस से भी मिलें झुक के मिलें हँस के हों रुख़्सत
अख़्लाक़ भी इस शहर में पेशा नज़र आए