दिनमान : राजगोपाल

Dinman : Rajagopal


1 स्वप्न बटोर रही शेष रात बिसुरा गयी कल की बात अश्रु सी टपकती ओस पात-पात खो गया तिमिर मे प्रणय का साथ श्यामा अंबुवा पर बोलने लगी उषा अंबर के पट खोलने लगी जगती पीठ पर दिवस ढ़ोने लगी नीम तले मधु कण घोलने लगी तन अस्फुट आभा से प्रसन्न मन अंतिम आशा से आछन्न जूझता धूप मे पतंगों सा उत्पन्न दिन उठा रौंद का रात मरणासन्न 2 उनींदी आँखों मे स्वप्न भरे पलकें जग मे खुलने से डरे रात सुमन प्रणय से बिखरे आंसुओं मे जले शलभ से मरे कल सोया था विश्व आलिंगन मे रात सारी सिमटी थी उस क्षण मे लेकिन कहीं सिसक भरी थी मन मे आप ही हँसता रहा वह चिरक्रंदन मे चढ़ता सूरज मुझसे बातें करता है कहता स्वप्न मिट्टी सा ढहा करता है प्राण दिनमान मौन सहा करता है प्रणय नयनों से नित्य बहा करता है 3 खिड़की भेद कर जगाती उषा छीन ले जाती आँखों से निशा किन्तु न जाती प्रणय की तृषा पतंग सा उड़ता है मन दिशा-दिशा भंग कर निशा की नीरवता मन स्वप्नों से लड़ता- खीजता निरर्थक प्रश्नों से अनायास जूझता भोर विकल उसका मुख निहारता हाय! वह उठ कर चली गयी हर प्रात की एक कथा नयी जगती मे प्रणय के रूप कई सुख खोया, हुआ विरह ही विजयी 4 चढ़ता सूरज प्रायः मुझसे कहता क्यों अपने दुख मे है चिल्लाता कौन विकल यहाँ, किसे है बहलाता मूक सम्बन्धों को क्यों है समझाता बांध ले सारे स्वप्न सुंदर लादे उन्हे निकल पथ पर पथिक अकेला है इस धरा पर खुल गयी गांठें अब कैसा है डर काल प्रबल है सृष्टि के अंदर प्रणय लूटा, हुआ जीवन जर्जर नहीं दौड़ेंगे चार तेरी आह सुन कर चला-चल यूं ही धूप मे जल कर 5 छू गयी प्रात ठंडी हवा निष्ठुर नयनों मे उलझे थे स्वप्न प्रचुर उसे आभास करने भोर से आतुर अनछुए ही लज्जित होता रहा उर पास ही निद्रित थी कल्पना उछलती रही छल की जल्पना निहारते प्रणय-प्रेयसी की अल्पना मन मे हुयी उसकी मधुर संकल्पना दिवस चढ़ा, श्रम-संताप टूटा प्रणय का हाय! मोह न छूटा स्नेह-सगाई ने मिल कर लूटा सच सामने खड़ा फिर भी झूठा 6 दिवस ने जीवन को घेरा दिखता दूर मादक मकरंद मेरा नीड़-नयन मे सजता उसका डेरा छूटता नहीं यह गृह-सुख का फेरा लगता है थक कर कहीं मर जाएँ या प्रणय छिपा कर अपने घर जाएँ देख उसे तन-मन के घाव भर जाएँ आँखों से शेष अश्रु कण भी झर जाएँ अभी तक रात की भूख नही मरी जगती की उछ्रंखलता से नहीं भरी दिन मे भी दिखती है वही विभावरी थके हुये उर मे मधुबाला सी सँवरी 7 सूरज देता दिवस को निमंत्रण लादे आज चल पड़े दो चरण ढूंढते कर्म-धर्म, गिरे जग के शरण हुआ मन वचन प्राण पर नियंत्रण पथ पर मिला प्रणय असंभव जग मे पल-पल काम-कलरव नहीं देखा है जगती का उद्भव किन्तु सुना है दुख का आरव दिनमान सब सहना पड़ता है मन मूक उर-अंतर मे जड़ता है यहाँ शब्द-शब्द से लड़ता है साँझ मे दिन ऐसे ही उजड़ता है 8 तपती किरणें नभ से उतरती पाँव मे छाले देती यह धरती हँसती दुपहरी गति मंद करती छांव तले दिवा-स्वप्न भरती तपन भरा अपार गगन मे था अंधेरा श्रमिक नयन मे प्रणय छिपा एकाकी घन मे ताकता अर्थहीन मधु-मन मे धूप मे रक्तिम पलकों के पीछे देखती निर्निमेष उसे आँखें मींचे छल ही सत्य है गगन के नीचे यूं ही आंसुओं से क्यों प्रणय सींचे 9 दिवस चला धरा पर उदासीन तन-मन का सारा सुख छीन जगती मे पग-पग दीन-हीन समझाता जीवन है कितना क्षीण आ तेरे आँचल मे छिप जाऊँ स्वप्न देखता कभी न जाग पाऊँ केवल प्रणय मे ही खो जाऊँ अंजलि भर न कभी आँसू लाऊं रख दो पलकों पर स्नेह चुंबन जी लूँगा इस दिवस का क्षण-क्षण जलती पाँव के छाले, फटा अन्तर्मन न करेगा मन फिर कभी शत-क्रंदन 10 दुपहरी कितना श्रम-संताप बहाती है जीवन पर कितना घात लगाती है सुख के रज-कण धूप मे चमकाती है साँझ दिखा कर सोने के पात लगाती है उड़ती दूर स्वर्ण रज सी सुंदर आशाएँ सजती मूक मन के अंदर प्रणय ढूंढती बसती नयनों के घर यूं ही थका देह लौटता देहरी पर सूरज क्षीण हुआ चलता जाता है दिन के सारे छूटे दांव लगाता है क्षितिज स्नेहिल निशा पुकारता है भाग दिवस से विश्व प्रणय लुटाता है 11 अब साँझ ढली गगन से पग-पग चलते गये लगन से कहता रह आप बीती पवन से धूल मे गिर पड़े आँसू नयन से उन दिनों के मधु कण क्यों भिगोते हैं आज नयन बरस जाती हैं वे नित-दिन बन अपेक्षाएँ देहरी पर सघन मन खोल समय भर लूँ अधूरा प्रणय पूर्ण कर लूँ कुछ देर जी लूँ या मर लूँ क्षण भर मृगतृष्णा सा विचर लूँ 12 क्षितिज पर छाई लालिमा गहरी मन मे निशा उतरती सुनहरी कोलाहल शांत, हुई धरा बहरी उठ रहा चंद्रमा बन प्रणय प्रहरी तुम आओ रिक्त है यह उर रहेगा सजल नयनों का सागर थाम लें एकाकी मन होता जर्जर सहलाना स्मृतियों से उसे क्षण भर तुम रहो सजल नयनों मे सावन सी उन्मादित घनो मे भिगो जाना सुख मलिन क्षणों मे पहचान लेना मुझे बिखरे तृणो मे 13 थकी किरणें सन्नाटे से डरती मुस्कुराती रजनी नभ से उतरती तिमिर ओढ़े मौन कमरे मे झाँकती प्रणय दिखती धरा पर दीप रखती दिन मे दिखता एक जग है रात घर-घर की अलग है मधु ढूंढते दुखती रग-रग है छाला उभरा यहाँ पग-पग है क्यों उठती है चाह मन मे माया तक गढ़ती है राह मन मे लगा कर तृष्णा की दाह तन मे रात सुनती है चीख विजन मे 14 उजाला था जब गगन मे अवसाद भरा था नयन मे उठा उल्लास कहीं भुवन मे कहीं बिखरे स्वप्न शयन मे लुका-छिपी है जीवन सारा दूर मयंक भी लगता है प्यारा ढँक उसे मेघ कर देता अँधियारा मूक घूरता गगन धरा पर प्रणय बेचारा पल मे चाँद नया निखरा मन खिल कर पुनः बिखरा उन स्मृतियों मे मन बिसरा इस चाँदनी मे मन फिर सिहरा 15 साँझ ढले बहती हवा निष्ठुर मौन सहता रहा एकाकी उर मन विहंगों सा नीड़ को आतुर दिनमान झुलसा तिमिर से कातुर धरा पर रात भी नहीं शीतल यथार्थ के आगे भागता है छल नहीं यहाँ कोई सुमन कोमल प्रणय जी रहा है मन निर्बल पास हो या दूर आकाश मे मन ठहरा है तुम्हारे प्रभास मे समीपता मे समाने के प्रयास मे घुल रहा है प्रणय श्वास-श्वास मे 16 धूप मे जलता हुआ पलाश प्रणय तपते चुंबन मे तराश करता नंगी डालियों पर मधु आभास बटोर कर समस्त आशाओं का आकाश पलाश सा प्राण मेरा भी जला है मन-कर्म सारा दिन वज्र सा ढला है सुख ढूँढता मोम सा प्रणय गला है यह जीवन ऐसा ही अकेला चला है सार दिन मन मे था उजियाला साँझ ढले ढूंढती आंखे मधुबाला छोटे से नीड़ मे स्वप्नों को पाला किन्तु टूट गया है मधु का प्याला 17 थकी पड़ी है काया बनकर शव करती जीवन जड़ता का अनुभव छोड़ प्रणय-परिणय का कलरव हो रहा अब तिमिर का उद्भव उजाले ने मुझे क्या दिखाया अंधेरे ने मन मूक रिझाया भर आँखों मे स्वप्न छलकाया किन्तु उस ने न कभी पास बुलाया मैं देखता रहा रात निखारती जगती जलती शलभ समीप लौ तपती मूक ही प्राण-प्रणय सब कुछ सहती उछ्रंखल निशा देखो काल लिये हँसती 18 अंधियारे तेरे उर मे छिप जाऊँ अपनी कथा खुल का बतलाऊँ आज उर के धीमे सुरों से मिलाऊँ आँखें बंद कर न कभी खोल पाऊँ रात रहते सारे घाव भर जायें मर कर भी साथ अपने घर जायें अंतिम जल कण यहीं झर जायें सो जायें, चीर-स्वप्नों मे संवर जायें पलकों पर ये स्नेह चुंबन मुट्ठी मे बंद कर लें अश्रु कण कस लें दोबारा अटूट बंधन बिखर न जायें जैसे रजकण 19 कह दें कथा इस जीवन की प्रणय के उत्थान-पतन की चीर कर शांति विजन की कर लें समीक्षा रात-दिन की अँधियारे जगती पाँव के नीचे स्वप्नों को उठा लें आँखें मीचे कब तक मृत तृणों को सींचे अब न पृथा पर कोई रेखा खींचे संवेदन भर शब्द नहीं आते सूखे अश्रु झर भी नहीं पाते निर्लज्ज मन को कितना सहलाते बीते अध्याय बंद नहीं कर पाते 20 प्रणय का सांध्य-तारा नवजात चमकता रहा रजनी के साथ अकस्मात दिखा एक उल्कापात यह जीवन था मौन के पश्चात टूटता तारा नहीं था दुर्बल उसमे भी था जीने का संबल मन-प्रणय दोनों अति चंचल न जाने कौन अबल कौन प्रबल प्यारा सांध्य-तारा क्षीण हो कर छोड़ गगन स्वयं मे अवलीन हो कर खो गया नभ के असीम पटल पर वह मेरा नक्षत्र था चमकता उर पर (दिनमान : सुबह से शाम तक की यात्रा)

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