बाल कविताएँ - अनुपमा श्रीवास्तव 'अनुश्री'

Baal Kavitayen - Anupama Shrivastava Anushri


1. पढ़ना है-बढ़ना है

सफलताओं की सीढ़ियाँ चढ़ना है मेरे नन्हे- नन्हे पग आगे बढ़ेंगे माँ -पापा, दादा -दादी गुरुजनों, सभी बड़ों के स्नेह -आशीर्वाद की छाँव में रहेंगे। हाँ ,जब खूब बड़ा हो जाऊँगा नयी सीढ़ियों पर आगे बढ़ जाऊँगा अपने सपनों की मंजिल पाऊँगा। दादा ने कहा अपनी जड़ों की ओर जरूर देखूँगा बस ऊँचाई को ही न तकूँगा अच्छे इंसान का उदाहरण बन सबके काम आऊँगा।

2. बाल सखा हम

छोड़ो- तोड़ो बंधनों को, आज जीने दो हम दोनों को। बालसखा हम मिलकर, छप्पन छाई मचाएँगे। पानी का गीत गाएँगे, बूँदों को भी साथ नचाएँगे। ये हमारे मस्ती भरे रास्ते, किसी की परवाह हम कहाँ करते। बूँदों में भीगने का आनंद, घर जा कर बताएँगे । उन्हें भी साथ लेकर , छप्पन छाई करवाएँगे।

3. मोबाइल का हॉलीडे

विद्यालय की छुट्टी राहुल का हॉलीडे शीना की मौज मस्ती और मेरी मुक्ति! हमेशा हाथों में सबके! इस विंडो से उस फाइल तक कूद-फाँद कर थक जाता हूँ! आज पार्क में धूनी रमाता हूँ। फूलों से होगी बात हरा- भरा हृदय होगा वाइड ओपन होंगी आँखें दिमाग भी खुलेगा। टीना ,मोनू संग खेलूँगा ताजी हवा का मजा लूँगा हॉलीडे है मेरा किसी हाथ में न टिकूँगा।

4. मैं हूँ सिया

मैं हूँ पापा की परी सिया अपनी कहूँ! मुझे तो त्योहारों में आता है सबसे अधिक मजा छुट्टियाँ हो जाती है स्कूल की और पढ़ना नहीं पड़ता। माँ अच्छे कपड़े पहनाती है चोटी गूँथ वेणी लगाती है काजल डाल आँखों में काला टीका भी लगाती है कितना प्यार करती है माँ बद नजर से बचाती है। पकवानों के रेले लगते हैं मेहमानों के मेले लगते हैं रंगोली बनाना सिखाती है भक्ति भाव से पूजा करती है माँ देवी सी लगती है।

5. मेरी साइकिल

प्यारी सी सुंदर मेरी साइकिल लगाती मेरे अरमानों को पर इसे साफ- सुथरा कर खुद भी कूल वस्त्र पहन निकल पड़ता हूँ सैर पर। ऊँची- नीची पगडंडियों हरे-भरे जंगलों से गुजर समुंदर के साहिलों पर चढ़ाव और उतारों पर चल पड़ती है घूम- घुमा कर मेरे हौसलों को बढ़ाकर। सिखाती है, दिखाती है जीवन के कई रंग खुश होने के ढंग दो पहियों पर चलती हुई मेरी सेहत को बनाती है प्रकृति की सेहत बचाती है।

6. बरसा पानी

गड़- गड़ मेघ धुनी पड़ी सुनाई जैसे अब्र ने अब धूनी यही रमाई छप्पन- छप्पाई उधम -मस्ती की घड़ी थी आई। आँगन में तिमिर -झिमिर देख बूँदों की लड़ी भूले मुन्ना भाई अपनी बारहखड़ी। तरबतर होने की थी जल्दी माँ भी जल्दी से रेनकोट पहना कर चल दी कहीं लाडले को लग न जाए सर्दी। अलकों- पलकों पर लुढ़क रहे मोती आमोदित आँखों में जुगनू सी ज्योति रुत हो गई सुहानी बरसा दम भर पानी।

7. जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी

यह सिर्फ एक पंक्ति नहीं इस धरती का वंदन है। मातृभूमि का अभिनंदन है जिसकी आजादी के लिए, न जाने कितने शीश ढहे कितने शहीद हुए कितनों ने प्राण उत्सर्ग किये! लाल, बाल ,पाल, भगत, गाँधी रानी लक्ष्मी बाई ,तात्या टोपे अनगिनत देश भक्तों ने त्याग ,समर्पण, बलिदान की नई गौरव गाथा रची। इतने संघर्षों से मिली हमें यह आजादी क्या हमने इसकी कीमत समझी! खुली हवा में साँस लेकर धन्य हुए तो देश के साधन ,संसाधन संरक्षण पर्यावरण, स्वच्छता , अनुशासन, हमारी गौरवशाली संस्कृति, कला, साहित्य,परंपरा, पर्व, परिवार और सामाजिक सरोकार में हमने अपनी कोई सुंदर भूमिका निभाई! या हमें प्लेट में सजी हुई मिल गई आजादी तो हमने हर गंभीर बात हवा में उड़ाई! आज यही विषय मिला था जिस पर सभी बच्चों को आलेख था लिखना चित्रों के माध्यम से अपना प्रस्तुतीकरण था करना ।

8. विजयी भव

सीखो कुछ खुद पकाना अच्छा है घर का खाना खाना शुद्ध, सात्विक,पौष्टिक,स्वादिष्ट हरी सब्जियाँ, मीठे फल ड्राई फ्रूट्स और अन्न मिश्रित। पर जब से आया है नया जमाना सब कुछ फास्ट हो गया है न! फास्ट फूड से बीमारी भी फास्ट हाटडॉग, पिज़्ज़ा, फ्राइज़ फ्राइड, नूडल्स,बर्गर, बड़े-बड़े नाम से ही लगता है डर अति तेल ,चीनी, प्रिजर्वेटिव्स कैमिकल्स,नमक का सागर इनमें छुपे हुए कुछ तत्व जो इनको सुरक्षित करते हैं वह हमें कितना असुरक्षित करतें है कि हम डॉक्टर के पास भागते हैं हमें पता चलता है सच कि दिखते जो हैं लुभावने , सुहावने,यमी पदार्थ उनसे सेहत बनेगी ऐसा सोचना है व्यर्थ! बाहरी चमक से परखना हम बंद करें गहराई से सब चीजों को समझे- परखें। कहते हैं जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन संतुलित भोजन हो संयमी जीवन तो लाइफस्टाइल डिजीज का दूर होगा उपद्रव हर श्रेत्र में चमकेगी जिंदगी हमसे कहेगी "विजयी भव"।

9. पेड़ लगाएँ हम

सर्दियाँ हुई अधिक सर्द गर्मियाँ हुई गर्म मौसम के बदले तेवर मौसम हुआ विषम। शिवम को समझ न आया, कक्षा में पूछने के लिए हाथ उठाया। टीचर बोली सुहाना मौसम जाओ अब भूल, हम सब की हरकतों से मौसम हुआ प्रतिकूल। शिवम फिर भ्रम में उलझा कुछ न समझ पाया! मैडम ने प्यार से सभी को समझाया "क्या तुम पेड़ लगाते हो! इस सुंदर धरा को हरा -भरा बनाते हो! शिवम ने कहा मैं तो नहीं ! टीचर ने कहा बात तो है बस यही हम सबको अपनी छोटी छोटी भूमिका निभाना है पर्यावरण के संरक्षण में अपना योगदान दिखाना है। "तब कौन-कौन पेड़ लगाएगा!" बच्चों ने हाथ उठाकर संकल्प लिया हर जन्मदिन पर हम पेड़ लगाएँगे पेड़ का ही उपहार अपने साथी को देंगे। टीचर हुई हर्षित हो बोली अब पिता आकाश और माँ वसुंधरा का हम पर नेह-आशीर्वाद बरस जाएगा मौसम फिर से सम होकर सुंदर हो जाएगा।

10. माँ ! तू ही तो है

माँ! तू ही तो है तू ही मेरी पहचान तेरा प्यार - दुलार मेरा सारा जहान मेरा आधार और मान माँ !तू ही है महान तेरे आँचल की छाँव में मेरे सुंदर साँझ ओ विहान। पल-पल देती गुरु बन सुंदर ज्ञान कराती हमारी दुनिया से पहचान अच्छे -बुरे की सीख तुझ से ही तो मिलती अपनी देश की महान संस्कृति ,भाषा का ज्ञान त्याग तू है करती और बनते हम महान। तेरी ममता भरी मुस्कान आशीर्वाद भरे हाथ भरते मुझमें प्राण कठिन जटिल राह बन जाती आसान मुझे तू है सबसे प्यारी मेरी जिंदगी तूने सँवारी प्रेरणा की मूर्ति मुझे तो लगती सदा प्रभु सी न्यारी।

11. पतंग

सर्र- सर्र ,फर्र -फर्र उड़ चली पतंग छूने दूर गगन सहेली बनी है डोर उमंगो का नहीं ओर -छोर। पल-पल बढ़ती जाए मतवाली रंग -बिरंगी प्यारी-प्यारी ऊँचे-ऊँचे उड़ती जाती मुश्किलों से बचती जाती कहती सपने देखो ऊँचे उन्हें सच करना भी सिखलाती।

12. तुम हो विशेष

तुम ही राम तुम ही कृष्ण अपने स्व की शक्ति को पहचान कर देख लो हर इंपॉसिबल में पॉसिबल है छुपा न हो यकीं तो ठान के देख लो। संकल्प के सितारे आँखों में भर लो हौसलों की उड़ान सपनें सच कर जाए ऐसे अटल इरादे कर लो। भागने से भला किसका भला होता है संघर्ष की आँच में तप कर ही कोयला हीरा बनता है तुम हो विशेष खुद से वादा कर लो।

13. दीपशिखा

तुम पापा की परी तो हो लेकिन हो पहले मेरी दीपशिखा तुम में छुपा है अंश दिव्यता का। स्वर्ण रश्मियाँ तुम्हें छूकर पावन करती हैं चंद्र किरणें तुम्हें मनभावन करती है पुरवाई देती है संगीत अग्नि तुम्हारा हौसला बनती है। हर साँस मंत्रोंच्चार है कटि पर करधनी नहीं कटार है पैरहन नहीं अंगार है श्रृँगार ही नहीं प्रहार है दुश्मनों पर वार है। सभ्यता ,संस्कृति संस्कार की प्रतिमूर्ति तुम्हें मर्यादित आचरण ही बस स्वीकार है ।

14. मम्मी-पापा सुनो

मम्मी-पापा सुनो ! हम बच्चे हैं हमें रोबोट तो न समझो! भगवान ने कितना सुंदर हमें गढ़ा है आपने प्यार से मेहनत से हमें पाला है हमें जीवन को समझने दो अपनी समझ विकसित करने दो। हमारी छोटी-छोटी खुशियाँ छोटे-छोटे सपने हैं हम मासूम धीरे-धीरे ही खुलते हैं शनै: शनै: ही दुनिया समझते हैं हमारा नाता तनाव से न जोड़ो फूलों की जगह काँटों में न छोड़ो। हम पहले खुद को थोड़ा समझ लें हम क्या कर सकते हैं हमें क्या पसंद है और हमारी क्षमताएँ! आपकी अति महत्वाकांक्षाएँ हमारे जीवन पर संकट है। हम आगे बढ़ेंगे देश परिवार के लिए कुछ अच्छा करेंगे हमें थोड़ा सा साथ-विश्वास दीजिए हम सही राह चुनेंगे हम निखरेंगे,सँवरेंगे बस थोड़ा धीर धरिए।

15. हम हैं नई पीढ़ी

देश हमारा बढ़ रहा है सफलता का नया इतिहास रच रहा है तकनीक का लेना है सहारा पर संवेदनाओं को अलविदा मत कहना यारा हाँ कितना उचित -यथोचित अपने विवेक का भी उपयोग करेंगें हर चीज का सदुपयोग करेंगे। अपना समय ,ऊर्जा सत्कार्यों में देंगे हर इम्तिहान में खरे उतरेंगे चुनौतियों से नहीं डरेंगे है उर में आग स्वाभिमान की जल रही मशाल उसूलों की हम भारत माता के लाल हमें नहीं है कोई मलाल नव भारत ,विकसित भारत की नई कहानी लिखेंगे। कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ेंगे गिनती होगी हमारी वीरों में कि ये धरा है शूरवीरों की।

16. संतुलित जीवन सच्चा जीवन

"अति सर्वत्र वर्जयेत " मानव जीवन हो या खिलवाड़ उस प्रकृति से जो करती धरती पर जीवन का संचालन। जब भी मानव हरे -भरे वन -उपवन नष्ट कर ऊँचे बाँध, कंक्रीट के जंगल बना करता है स्वार्थ पूर्ति सूखा, सुनामी ,बाढ़, अति वृष्टि से , नटी प्रकृति सबक सिखा , दंड का विधान है करती। संतुलन सीखें हम, सही चुनें , करें सही मित्रों की संगति। सुबह सूर्य नमस्कार करते हुए, सूर्योदय देखें नयनाभिराम। रात्रि को जल्दी करें विश्राम, सेहत के लिए नहीं अच्छा अनावश्यक रतजगा। नींद होगी पूरी और सुबह होगा, प्रकृति का साथ ताजगी भरा । मिलेगा खुशी वाला हार्मोन एंडोर्फिन! हँसते- मुस्कुराते गुजरेगा दिन। श्रेष्ठ शामिल करते हुए, संतुलित हो हमारी दिनचर्या। प्राणायाम , व्यायाम, योग की हो प्रक्रिया। स्वाध्याय, कसरत , संयमी जीवन, सद्साहित्य पठन-पाठन, अनुशासन। संतुलित आहार, सम्यक आचरण, कुछ देर गैजेट्स, मनोरंजन । सोशल मीडिया, व्यर्थचैट के गेट कभी करें बंद , खुद से और अपनों से हो आफलाइन चैट संबंध। जरूरी है मैदान में थोड़ा खेलें, खुलकर हँसे और खिलें। बड़ों की सुनें अच्छी सीख, सही जीवन जीने की सीखें रीत।

17. हमारी हिन्दी

देवभाषा संस्कृत से जन्मित हमारी हिंदी जैसे भारत भाल पर सुशोभित सुंदर बिंदी। माँ की मीठी लोरी जैसी इसका है रूप अनूप जैसे सर्दी की धूप इसे न करें विकृत संरक्षित करें शुद्ध स्वरूप। शुद्ध लिखें हम ,शुद्ध बोलें व्याकरण ,लिपि और वर्तनी सुधारें स्वयं सीखें ,औरों को सिखाएँ मातृभाषा का मान बढ़ाएँ। सबको एक सूत्र में बाँधे हिंदी भारत की है वह शक्ति हर नए रंग ,नए रूप में समयानुसार है ढलती। कंप्यूटर की सखी सी लगती सिया देवनागरी में लिखती इंटरनेट पर छाई हिंदी सबके मन भायी हिंदी।