बाल गीत : तारकेश्वरी 'सुधि'

Baal Geet : Tarkeshwari Sudhi


हैं सूरज की प्रथम किरण से

हैं सूरज की प्रथम किरण से पाक हँसी से हँसते बच्चे। नन्ही नन्ही आँखें इनकी, पलता जिनमें सुंदर सपना। ऊँचा उड़ने की आशा में, सारा अंबर लगता अपना। जग के आडंबर से छुपकर, खुद की दुनिया रचते बच्चे । अपने कदमों से ये नापें, गली मोहल्ले का हर कोना। सारे जग को मान स्वयं का चाहें सुंदर सपने बोना। पल में रूठे पल में हँसकर, पाश प्रेम का कसते बच्चे। मोती जैसे आँसू इनके, करते विचलित पाषाणो को। पावन मुस्कानों की सरगम, पुलकित करती वीरानो को। जीवन- बगिया की धड़कन में, साँस-साँस में बसते बच्चे।

रंग बिरंगे पुष्प चमन के

रंग बिरंगे पुष्प चमन के, हँसकर खुशियां फैलाते। छोटे छोटे प्यारे प्यारे, बच्चे हर मन को भाते। हँसी ठिठोली ऐसी इनकी, हर दिल जो रोशन करती। इनके सपने इनकी बातें, दिल में उम्मीदें भरती। इनकी खुशबू कोना-कोना, इस जग को महकाती है। उजड़े, रोते हर मुखड़े पर खुशियाँ पल में लाती है। आओ मिलकर इन्हें बनाएँ नींव एक मजबूत प्रबल तभी मिलेगा सुख हम सबको, मानव मानव को सम्बल।

बच्चों अपनी क्षमताओं को

बच्चों अपनी क्षमताओं को, दे दो तुम इतना विस्तार। महक उठेगा ह्रदय तुम्हारा, मिल जाएगा जीवन- सार। चट्टानों से अडिग बनो तुम, बुद्धि हो चाकू की धार। फूलों सी मुस्कान बिखेरो, जग में जीतो सबका प्यार। हर विपदा का करो सामना, धरकर तुम सागर सी धीर। आँसू में आशाएँ बोकर, हर लो तुम थोड़ी पर पीर। स्वप्नों को उड़ने दो ऐसे, जैसे ऊँचा उड़ता बाज। मेहनत से थोड़ी हिम्मत से, भर लो तुम ऊँची परवाज।

बच्चों तुम छू लो आकाश

नभ के तंबू में देखो तो, चाँद सितारे चमकीले। रोशन करते ऐसे लगते, जैसे हीरे रंगीले । तुम भी फैलाना इस जग में, ऐसे ही अपना प्रकाश। दूर गगन से चंदा मामा, हमसे ही बातें करता। अँधियारी रातों में आकर, हँसकर सारे तम हरता। तुम भी लोगों के जीवन में, ऐसे ही भर देना आश। किरणों की राहों में बाधा, खड़ी हुई है सुरसा बनकर। लेकिन वे भी उनके सम्मुख, देखो खड़ी हुई तनकर । तुम भी अपनी राह बनाओ, बाँध न पाए तुमको पाश।

जितना प्यारा बचपन इनका

जितना प्यारा बचपन इनका, बातें उतनी प्यारी हैं। पल में इनके आँसू गिरते, पल में आँखें मुस्काती। पल में लड़ते बड़ी लड़ाई, पल में यारी बढ़ जाती। इनकी एक हँसी के ऊपर, सारी दुनिया वारी है जितना..... इक दूजे के पीछे दौड़ें, हाथ पकड़ कर चिल्लाते। रह रहकर अपनी किलकारी, घर आँगन में गूंजाते। झोली भर खुशियाँ रवि लाता, रातें इनकी न्यारी हैं। जितना... इन हँसते मुखड़ों को ही कल, जीवन भार उठाना है। लेकिन क्यों कल की चिंता में, अपना आज गँवाना है। इनकी बेफिक्री के आगे, चिंता हरदम हारी है। जितना ....

नटखट नन्ही एक गिलहरी

नटखट नन्ही एक गिलहरी, उछल रही है इधर -उधर । चढ़ जाती है दीवारों पर, नाच दिखाती आँगन में । इठलाती है पूँछ उठाकर, करती रौनक उपवन में । दाना लेकर हाथों में वह, खा जाती हैं कुतर -कुतर। पाकर सखियाँ खुश हों,उसको, अपने पीछे दौड़ाती । है छोटी सी मगर सभी के, मन को पल में हर्षाती । बच्चों को खुश करती जैसे, हो वह कोई जादूगर । वृक्षारोही वो शर्मीली, खेल दिखाती है न्यारे। पत्ते घास तना औ टहनी, होते आनंदित सारे। लगते हैं उल्लासित तरुवर, अपने पास उसे पाकर।

गर्मी भागी, सर्दी आई

गर्मी भागी, सर्दी आई, मुन्ना छुपा रजाई में। पढता है तब नींद सताती, होमवर्क का ढेर खड़ा। समझाओ तो असर नहीं है, जैसे चिकना एक घड़ा । घर जाकर रोजाना सोता, आलस की परछाई में। चंचल मन को खेल घेरते, हो जाता वह उनके संग। पढ़ने को जब भी माँ कहती, होता सुंदर सपना भंग। इस आलस ने डाल दिया है, होना पास खटाई में। बाकी कोई राह नहीं अब,झाड़ी धूल किताबों की । फेंक रजाई खोल किताबें, छोड़ी बातें ख्वाबों की। अब आलस से नाता तोड़ा,होकर व्यस्त पढ़ाई में।

छोटे बच्चों की कक्षा का

छोटे बच्चों की कक्षा का, बेहद हसीं नजारा है । पुस्तक एक खोल कर बैठा,दूजा पैन चुभोता है। कोई काम समझ कर करता, कोई रट्टू तोता है। कोई बैठा डरा डरा सा,कोई खुद में दारा है । चुप रहने की कह कर देखो, पल दो पल चुप रहते हैं। फिर चुपके से खुसर- फुसर कर,कानों में कुछ कहते हैं। होमवर्क के जिससे कह दो, वह ही बना बेचारा है । बिन शिक्षक के पल दो पल भी, ये तो कब रह पाते हैं। लेकिन उनके आते ही फिर,पानी पीने जाते हैं । बिन शैतानी, बिन बातों के, इनका कहाँ गुजारा है । भोज गाँव में जिसके घर हो, लगता उनके घर में है। एक नहीं फिर आधी कक्षा ,सामूहिक छुट्टी पर है। सारा गाँव जिमाना इनको,लगता काम हमारा है । क्लास टेस्ट की बात करो तो, सब ही खुश हो जाते हैं। फिर खाली पन्नों के संग में, घंटे पैन चबाते हैं। डाँट पड़ेगी , चपत लगेगी, फिर तो क्या ही चारा है । हँसी ठहाकों की यह बातें, वरना बच्चे अच्छे हैं । बचपन की यह नादानी है, मन के सब ही सच्चे हैं। इस मुस्कान, मधुर बातों ने ,जग संपूर्ण निखारा है।

असफलता से नहीं डरो तुम

असफलता से नहीं डरो तुम, बस मेहनत से काज करो तुम। रातों-रात नहीं बनती है, आलीशान इमारत कोई। दूर निरंतर चलना पड़ता, तब मंजिल मिलती है खोई। स्वप्न तुम्हारे होंगे पूरे, केवल श्रम का रंग भरो तुम। असफलता से नहीं डरो तुम.... बेशक लगती रहा कठिन है, लेकिन पथ में कदम बढ़ाओ। लाँघोगे पर्वत ऊँचा भी, संकल्पों से मन महकाओ। मित्र बनेंगे कंकड़,पत्थर, निज पीड़ा को स्वयं हरो तुम। असफलता से नहीं डरो तुम... आज करो जो काम आज का, डालो नहीं इसे तुम कल पर। धीरे-धीरे चलते जाना, पैर न रख देना दलदल पर। इठला पाओगे जीवन पर, बस थोड़ी सी धीर धरो तुम। असफलता से नहीं डरो तुम.....

चिंकी मिंकी जल्दी आओ

चिंकी मिंकी जल्दी आओ, तुम्हें सुनाऊँ एक कहानी। यह जो अपनी छुटकी है ना, जो पढ़ने से डरती थी। लिखने की जब उससे कहते, उसकी आँखें भरती थी। जब भी बात किताबों की हो, बनती थी हरदम अनजानी। चिंकी मिंकी जल्दी आओ.... इसके- उसके पास घूमती, वह कानों की कच्ची थी। अब पूछो तो हँस कर कहती, तब मैं छोटी बच्ची थी। बातें करके याद पुरानी, हो जाती अब पानी पानी। चिंकी मिंकी जल्दी आओ .... दिनभर जो बातें करती थी, अब वह खुद सँग रहती है। रोज किताबें पढ़ती रहती, औरों को भी कहती है। बनी चहेती जब से उसने, अध्यापक की बातें मानी। चिंकी मिंकी जल्दी आओ...

आओ! हम-तुम दोनों मिलकर

आओ! हम-तुम दोनों मिलकर, आसमान के तारे तोड़ें। अपनी श्रम-श्रद्धा के दम पर, एक नया सोपान बनाएँ। सोच-समझ कर, देखभाल कर, फिर धीमे से कदम बढाएँ। आने वाली हर बाधा का, अपनी मेहनत से रुख मोड़ें। आओ हम- तुम....... मन में जोश नया भरकर हम, सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ जाएँ। उम्मीदों का दीप जलाकर, राहों का अँधियार मिटाएँ। वक़्त सुलाकर भूला जिनको, उन सपनों को आज झिंझोड़े। आओ!हम-तुम ........ ज्यों नदियाँ ख़ुद पथ तय करती, हम भी अपनी राह बनाएँ। ऊँचे नभ में पंख पसारे, पंछी ज्यों उड़कर हर्षाएँ। अपनी किस्मत की शाखों पर, मेहनत के कुछ पत्ते जोड़ें। आओ! हम-तुम.........

सोनेट (उषा काल)

आती रवि का हाथ थाम। लगती उषा बड़ी सुखमय। उद्धत मनुज करता काम। लगन लगाकर हो तन्मय। बाल जगें नींद को त्याग । मुख पर रख मधुर मुस्कान। गाते खग सुरीला राग। हर मन रचें निज का गान। बच्चे अपना पाठ पढ़ें। कर देती उषा तल्लीन। सफल राह पर कदम बढें। दुख से खुशी लाते छीन। जीवन-उषा काल विशेष। स्वर्णिम स्वप्नों का प्रवेश।

तुम आने वाला कल बच्चों

तुम आने वाला कल बच्चों, जन जन के कष्टों को हरना। सबके अपने अपने सपने, आसमान भी सबका अपना। रखना मन में सदा सँजोए, अम्बर को छूने का सपना। आलस में तुम बैठ न जाना, रह जाओगे पीछे वरना। सूरज जग को रोशन करता, लेकिन वह भी छिप जाता है। घुप्प अँधेरा चहुँ ओर हो, तब जुगनू पथ चमकाता है। मन का दीपक बुझ न जाए, तेज हवाओं से मत डरना। नहीं होड़ में समय गँवाना, स्वप्न स्वयं के जल्दी बुनना। दौड़ रहा है तीव्र समय भी सोच समझ कर मंजिल चुनना। शूल राह में घायल कर दे, घाव स्वयं के जल्दी भरना।

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