अली अकबर नातिक़
Ali Akbar Natiq
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अली अकबर नातिक

अली अकबर नातिक़ (15 अगस्त 1976-) पश्चिमी पंजाब के उर्दू शायर, कहानीकार और उपन्यासकार हैं। उनका जन्म ज़िला ओकाड़ा के गाँव 32 -2L में हुआ। वह पाकिस्तानी उर्दू साहित्य की नयी पीढ़ी के प्रसिद्ध लेखक हैं। उन की रचनायों के अंग्रेज़ी, जर्मन और हिंदी अनुवाद की किताबें भी छप चुकीं हैं। पंद्रह साल की उम्र में वह राज-मिस्त्री का काम करने लगे और उन्होंने जिंदगी में खूब मुश्किलें उठाई और उनके लेखन में वे अनुभव आए हैं। आज कल वह लाहौर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ैसर के तौर पर सेवा निभा रहे हैं। उन की रचनायों में 'बेयकीनी बस्तियों में' (काव्य संग्रह), 'याकूत के वर्क' (काव्य संग्रह), 'कायम दीन' (कहानी-संग्रह), 'शाह मुहंमद का ताँगा' (कहानी-संग्रह), और नौलक्खी कोठी (उपन्यास) शामिल हैं।


ग़ज़लें अली अकबर नातिक़

अज़ल के क़िस्सा-गो ने दिल की जो उतारी दास्ताँ
अम्न-क़रियों की शफ़क़-फ़ाम सुनहरी चिड़ियाँ
कँवल हों आब में ख़ुश गुल सबा में शाद रहें
कसे कजावे महमिलों के और जागा रात का तारा भी
क़ैद-ख़ाने की हवा में शोर है आलाम का
ग़ुंचा ग़ुंचा हँस रहा था, पती पत्ती रो गया
घंटियाँ बजने से पहले शाम होने के क़रीब
चाँदी वाले, शीशे वाले, आँखों वाले शहर में
ज़र्द फूलों में बसा ख़्वाब में रहने वाला
दिन का समय है, चौक कुएँ का और बाँकों के जाल
दिल के दाग़ में सीसा है और ज़ख़्म-ए-जिगर में ताँबा है
बाद-ए-सहरा को रह-ए-शहर पे डाला किस ने
रो चले चश्म से गिर्या की रियाज़त कर के
हरीम-ए-दिल, कि सर-ब-सर जो रौशनी से भर गया
हवा के तख़्त पर अगर तमाम उम्र तू रहा

नज़्में अली अकबर नातिक़

उठेंगे मौत से पहले
चरवाहे का जवाब
नाम ओ नसब
नीला पीपल मेरा गीत
नौहा
प्यासा ऊँट
बांसों का जंगल
बे-यक़ीन बस्तियाँ
मिरे चराग़ बुझ गए
मुसीबत की ख़बरें
रहज़नी ख़ूब नहीं ख़्वाजा-सराओं के लिए
रेशम बुनना खेल नहीं
लुहार जानता नहीं
सफ़ीर-ए-लैला-1
सफ़ीर-ए-लैला-2
सफ़ीर-ए-लैला-3
सफ़ीर-ए-लैला-4
सुर्मा हो या तारा
हिजरत
हुजूम-ए-गिर्या
 
 
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