नन्हीं कलियाँ नन्हे फूल (बाल कविता संग्रह) : त्रिलोक सिंह ठकुरेला
Nanhin kaliyan nanhe phool (Poems for Children) : Trilok Singh Thakurela

अपनी बात

बाल साहित्य बच्चों के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और भाषाई विकास के बहुत आवश्यक है। बाल साहित्य मनोरंजन के साथ-साथ कल्पनाशीलता, रचनात्मकता, जिज्ञासा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देता है, जिससे बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है। अच्छा बाल साहित्य बच्चों में आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए आत्मविश्वास विकसित करने में भी सहायता करता है। बाद साहित्य बच्चों का संस्कृति से परिचय कराते हुए उनके लिए ज्ञान के नये द्वार खोलता है। अच्छा साहित्य बच्चों में ईमानदारी, दया और वीरता जैसे संस्कार डालता है।

मैं मानता हूँ कि बाल साहित्य बच्चों के लिए रचित वह मनोरंजक और शिक्षाप्रद सामग्री है, जो उनकी उम्र और समझ के अनुकूल होती है। बाल साहित्य की भाषा सरल और सुबोध होनी चाहिए। बाल साहित्य बच्चों की कल्पनाशीलता को जगाने वाला, नैतिक मूल्यों से युक्त और सकारात्मक दृष्टिकोण वाला होना चाहिए। साहित्य में बच्चों की रुचि जगाने के लिए पुस्तक में आकर्षक चित्रों का होना भी आवश्यक होता है।

बच्चों के लिए लिखे गए साहित्य की भाषा शैली बहुत सरल, स्पष्ट और रोचक होती है तो बच्चे उसे आसानी से समझ सकते हैं। बाल साहित्य में चित्रों का उपयोग उसे जीवंत बनाता है। और ये चित्र बच्चों को आकर्षित करते हैं। साहित्य में समाहित चित्र और घटनाएँ बच्चों की कल्पना शक्ति को बढ़ाते हैं। बाल साहित्य का मुख्य उद्देश्य बच्चों को आनंद देना होता है, जिससे उनमें पढ़ने के प्रति रुचि विकसित हो।

मुझे बाल्यकाल से ही साहित्य ने अपनी ओर आकर्षित किया है। मेरे पिता अध्यापक थे और वे मेरे बाल्यकाल में लयबद्ध ढंग से बाल कविताएँ सुनाते थे। उनके द्वारा सुनाई गई बाल कहानियाँ बड़ी रोचक लगतीं थीं। मेरी साहित्य के प्रति रुचि जगाने में मेरे पिताजी का अमूल्य योगदान रहा है। मेरे अबोध मन में भाव जगते कि मैं भी कविताएँ और कहानियाँ लिखूँ। धीरे धीरे इस भाव- बीज से अंकुर फूटे। मेरा पहला बाल कविता संग्रह 'नया सवेरा' सन 2011 में राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ। बाद में इसे राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा शंभूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।

मेरे लिए सबसे अधिक प्रसन्नता की बात यह है कि 'नया सवेरा' से अनेक रचनाएँ विभिन्न कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों में सम्मिलित की गयी हैं।

एक लम्बे समय अंतराल के बाद सन 2023 में मेरा दूसरा बाल कविता संग्रह 'सात रंग के घोड़े' पंडित जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ। 'सात रंग के घोड़े' से भी अनेक रचनाएँ अनेक पाठ्यपुस्तकों में सम्मिलित की गई हैं।

अब अपना बाल संग्रह 'नन्हीं कलियाँ, नन्हे फूल' बच्चों को सौंपते हुए मैं आश्वस्त हूँ कि मेरा यह बाल कविता संग्रह भी मेरे पूर्व बाल कविता संग्रहों की भाँति बच्चों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा और इसे बच्चों और अन्य पाठकों का वैसा ही स्नेह मिलेगा, जैसा कि मेरे पूर्व दोनों बाल कविता संग्रहों को मिला है।

इसमें से अनेक कविताएँ ऐसी हैं, जिन्हें मैंने अपने पुत्र अभिराज सिंह ठकुरेला और पुत्री प्रतिभा सिंह के लिए लिखा था। मेरी जीवनसंगिनी साधना ठकुरेला मेरी इन रचनाओं की प्रथम समीक्षक रही हैं।

ये कविताएँ बच्चों का किंचित मात्र भी हित कर सकीं, तो मैं अपना श्रम सार्थक समझूँगा।

- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

मो.- 9460714267

ईमेल- trilokthakurela@gmail.com


1. हे अखिल विश्व के सृजनहार

हे अखिल विश्व के परम ईश, हे अखिल विश्व के सृजनहार। हर ओर तुम्हीं हो दृश्यमान, अपना सुन्दरतम रूप धार ।। दिन में सूरज बन चमक रहे, जग में उजियारा करने को । रातों की धवल चॉंदनी हो, जन जन में आशा भरने को ।। तुम ही बहते बन प्राण-वायु, तुम ही जल की अविरल धारा। हो तुम्हीं व्याप्त प्रभु कण कण में, तुमसे स्पंदित जग सारा।। हो तुम्हीं हेतु सचराचर के, शाश्वत करुणा के परम-पुंज। निष्काम प्रेम से भरे रहें, भगवान, हमारे हृदय-कुंज।। सब जीवों में तुम ही तुम हो, यह मान सभी से प्यार करें। वसुधा को स्वर्ग बनायें हम, शुभता से सारा विश्व भरें।।

2. ऐसा रस बरसाओ

भोर हुई, सूरज आ बोला - बच्चो अब जग जाओ । चिड़ियाँ कहने लगीं चहककर, मीठे सुर में गाओ ।। कलियों ने मुस्कान बिखेरी, बोलीं- तुम मुस्काओ । गंध लुटाकर सुमन कह उठे- तुम भी गंध लुटाओ ।। सुख से भरी हवा बह बोली - मिलकर सुख बरसाओ । जो भी मिले, खुशी से भर दो, सबको गले लगाओ ।। सबने कहा एक ही सुर में, सबको ही सरसाओ । सरस बने सबका ही जीवन ऐसा रस बरसाओ ।।

3. प्यारे और निराले फूल

सबके जीवन को महकाते प्यारे और निराले फूल । मोहक मोहक गंध लुटाते सुन्दर भोले-भाले फूल ।। तितली-दल को पास बुलाते मनहर जादू वाले फूल । भ्रमर झूमने लगते आकर हो जाते मतवाले फूल ।। उपवन को रमणीक बनाते विविध रूप रंग वाले फूल । खिलते-हिलते साथ निभाते अलग-अलग ढंग वाले फूल ।। मिलकर सबका मन बहलाते हैं हरषाने वाले फूल । सबके जीवन में सुख लाते सुख बरसाने वाले फूल ।। सबके मन को खूब रिझाते नेह दिखाने वाले फूल । हिलमिल कर रहना सिखलाते मेल सिखाने वाले फूल ।।

4. छुईमुई

छुईमुई, ओ छुईमुई । अरे, कहो क्या बात हुई ।। छूते ही शरमाती हो । बरबस सिकुड़ी जाती हो ।। कितनी भोली भाली हो । तुम तो बड़ी निराली हो ।। क्यों आती है लाज कहो । कुछ तो अपने राज कहो ।। माना, छूते ही डरती । कई रोग अच्छे करती ।। शर्मीली तुम प्यारी हो । सबकी बहुत दुलारी हो ।। हमसे कभी न डरना तुम । सबमें खुशियाँ भरना तुम ।।

5. नन्हीं कलियाँ, नन्हे फूल

गमलों में खिल खुशी लुटाते, नन्हीं कलियाँ, नन्हे फूल । जो देखे उसको ही भाते , नन्हीं कलियाँ, नन्हे फूल ।। लाल,गुलाबी, नीले, पीले, श्वेत, सलोने, हरे हरे । प्यारे,कोमल और सुगन्धित सब मधुरस से भरे भरे ।। थोड़ी बंद, खुली थोड़ी सी पंखुडियां लगतीं चितचोर। उन पर मोती जैसे जलकण मन को करते भावविभोर ।। सबके साथ सहज ही रहते, तितली, भंवरे हों या शूल । खिलते रहें खुशी से हर दिन नन्हीं कलियाँ, नन्हे फूल ।।

6. आगे बढ़ते जायेंगे

मिलकर कदम बढ़ायेंगे । आगे बढ़ते जायेंगे ।। हाँ, बाधाएं आयेंगी, माना, बहुत डरायेंगी, किन्तु न हम घबरायेंगे। आगे बढ़ते जायेंगे ।। रुकना अपना काम नहीं, जीत बिना आराम नहीं, सबको यह समझायेंगे । आगे बढ़ते जायेंगे ।। विघ्नों का मुख मोडेंगे, पथ को कभी न छोड़ेंगे, सौ सौ युक्ति लगायेंगे । आगे बढ़ते जायेंगे ।। नई सदी के बच्चे हैं, दृढ़ हैं, मन के सच्चे हैं, कुछ भी हो जय पायेंगे । आगे बढ़ते जायेंगे ।।

7. औरों के दु:ख हरना

हर दिन तपता,चलता सूरज, देता सुखद उजाला । रात रात भर चांद चमककर हरता है तम काला ।। तप्त आग में जल सोने का, मोहक रूप निखरता । मेघ स्वयं की देह मिटाकर, खुशियों के सर भरता ।। मीठे फल देकर औरों को वृक्ष झूमते रहते । औरों की ही प्यास बुझाने झर झर निर्झर बहते । जिसने परहित किया जगत में मान उसी ने पाया। वही श्रेष्ठ है जो औरों को सुख देकर मुसकाया ।। तुम भी औरों के जीवन में रंग और रस भरना । आशा के नव दीप जलाकर , औरों के दुःख हरना ।।

8. प्रकृति तुम्हारा अभिनन्दन है

सब पर प्यार लुटाने वाली प्रकृति तुम्हारा अभिनन्दन है । अनगिन हैं उपकार तुम्हारे तुमसे ही सबका जीवन है ।। सघन निशा का घोर तमस हर, हर दिन सूरज हमें जगाता । हर दिन नई उमंगें भरकर, हम सब को सुख से भर जाता ।। उमड़ घुमड़कर घिरते बादल, रिमझिम मीठा जल बरसाते । घर-आंगन, वन, बाग, खेत, सर, सब पर सुख-सौगात लुटाते ।। बहती हवा झूमकर हर दिन, सबके प्राणों को बल देती । जन, खग, मृग, वन, शाक, लताएँ, बनती सबकी सहज चहेती ।। आओ, हम भी सारे मिलकर, प्रकृति का आभार जतायें । सब मिल करें प्रकृति का रक्षण, जीवन को खुशहाल बनायें ।।

9. वृक्ष हमारे जीवनदाता

वृक्षों से जग में हरियाली, इनसे जीवन में खुशहाली, वृक्षों से प्राणों का नाता । वृक्ष हमारे जीवनदाता ।। फूलों से सारा जग भरते, हर दिन रात सुगंधित करते, इनका साथ सदा ही भाता । वृक्ष हमारे जीवनदाता ।। सहती ताप सुकोमल काया, फिर भी देते शीतल छाया, बैठ छांव में मन सुख पाता । वृक्ष हमारे जीवनदाता ।। फल,भोजन दे भरते थाली, बढ़ती मुखमण्डल पर लाली, ताकत से तन मन भर जाता । वृक्ष हमारे जीवनदाता ।। बनकर वैद्य रोग सब हरते, स्वास्थ्य लाभ से झोली भरते, पुलकित रोम रोम हर्षाता । वृक्ष हमारे जीवनदाता ।। हर प्रकार से ये हितकारी, करते विविध सहाय हमारी, इनसे कौन उऋण हो पाता । वृक्ष हमारे जीवनदाता ।।

10. अच्छे काम

जग में कुछ अभिराम करो। बच्चो, अच्छे काम करो।। सुख-निर्झर बनकर झरना, जब भी हो परहित करना, सुबह दोपहर शाम करो। बच्चो,अच्छे काम करो ।। कभी न विचलित होना है, हो निश्चिंत न सोना है, हॉं, थोड़ा आराम करो। बच्चो, अच्छे काम करो।। शुभ का फल शुभ मिलता है, जीवन उपवन खिलता है, जग को सुख का धाम करो। बच्चो, अच्छे काम करो।। जिसने कुछ उपयुक्त दिया, उसने अपना नाम किया, तुम भी अपना नाम करो । बच्चो, अच्छे काम करो।।

11. उन्हें नमन है

स्वार्थ-भाव से ऊपर उठकर , जो जगहित को ध्येय बनाते । उन्हें नमन है, जो निज श्रम से औरों का जीवन महकाते ।। आशाओं के दीप जलाकर, जो जग को जगमग कर देते । उन्हें नमन है, जो सुख देकर जन जन की कुंठा हर लेते ।। धूप-मेह-सर्दी सहकर भी, सकल लोक हित अन्न उगाते । उन्हें नमन है, जिनके श्रम से सभी उदर भर भोजन पाते ।। मानवता के लिए रात-दिन नये नये अन्वेषण करते । उन्हें नमन है, नयी खोज कर जो लोगों में खुशियां भरते । जिन्हें राष्ट्र सबसे प्यारा है, राष्ट्र हेतु जो सदा समर्पित । उन्हें नमन है, राष्ट्र-यज्ञ में जो सब कुछ कर देते अर्पित ।।

12. मेरी गुड़िया

मेरी गुड़िया बड़ी सयानी जगती सुबह- सबेरे । और सैर पर जाती हर दिन साथ घूमने मेरे ।। योग और व्यायाम नित्य कर अपना स्वास्थ्य बनाती । चुनती सदा उचित चीजें ही उचित समय पर खाती ।। सही समय विद्यालय जाती पढ़ती ध्यान लगाकर । विद्यालय में अव्वल आती अंक अधिकतम पाकर ।। खेलकूद में आगे रहती पदक जीतकर लाती । घर आंगन को रोशन करती मीठे बोल सुनाती ।। मां से घर के काम सीखती कभी न आलस करती । सबसे प्यारी मेरी गुड़िया मन में खुशियाँ भरती ।।

13. हाथी राजा

अपनी धुन में घूम रहा था, वन के अंदर हाथी । उसके साथ नहीं था उस दिन कोई संगी साथी ।। तभी अचानक एक ओर से शेर अकड़कर आया । निपट अकेला हाथी पाकर उसका जी ललचाया ।। बोला- अहा ! युवा हाथी का आज शिकार करुँगा । कई दिनों से भूखा हूँ मैं जमकर पेट भरुँगा ।। हाथी बोला - अबे, शेर यदि हिम्मत हो, तो आओ । मैं भी हाथी राजा हूँ, तुम मुझे न आंख दिखाओ ।। सूंड उठा, हाथी चिंघाड़ा दिया शेर को झटका । और यकायक उसे उठाकर झट धरती पर पटका ।। डरकर शेर वहाँ से भागा, भूला अकड़ दिखाना । हाथी बोला- शेर फिर कभी मुझसे मत टकराना ।।

14. उड़न तश्तरी

यदि मिल जाती उड़न तश्तरी हम भी उड़ते नीलगगन में । झटपट उस ग्रह को चल देते जिसकी इच्छा होती मन में ।। जितने ग्रह हैं आसमान में सभी ग्रहों तक आते जाते । पूनम की उजली रातों में कभी चांद पर रात बिताते ।। जहाँ कहीं भी लोक बसे हैं, सबसे रखते भाईचारा । बढ़े परस्पर प्रेम सभी में, रहता यही प्रयास हमारा ।। साझा करते ज्ञान सभी से सबसे नया सीखकर आते । सबकी सुख-सुविधाएं बढ़ती, जीवन चलता हंसते गाते ।। अंतरिक्ष का कोना कोना, सब ग्रह, उपग्रह, चांद, सितारे । मिल जाती यदि उड़न तश्तरी, सब ही लगते पास हमारे ।।

15. जुगनू

जुगनू कहो, तुम्हारे मन में कैसे सपने घिरते । मद्धिम-मद्धिम दीप्ति दिखाकर किसे ढूंढते फिरते ।। मन में क्या संकल्प लिए हो निकले सघन निशा में । क्या तम का अस्तित्व मिटाने फिरते दिशा दिशा में ।। अंधकार की व्यापक सत्ता दूर दूर तक छाई । तुम छोटे से, इतना साहस इतनी बड़ी लड़ाई ।। प्यारे जुगनू ! पहल तुम्हारी है प्रशंस्य जग भर में । यत्न तुम्हारे बल भर देते जन जन में, घर घर में ।।

16. वर्षा और छुट्टी

वर्षा आई झर झर झर । छुट्टी हुई चलो सब घर ।। रखो किताबें बस्ते में । रपट न जाना रस्ते में ।। जब यह वर्षा आती है । कितना सुख पहुंचाती है ।। घर पर मौज मनायेंगे । गरम गरम कुछ खायेंगे ।। नाव चलेगी पानी में । लेंगे मजा कहानी में ।। एक साथ कह उठे सभी । यूं वर्षा हो कभी कभी ।। जिससे छुट्टी हो जाये । और मजा सबको आये ।।

17. जोकर

एक हाथ में छड़ी घुमाता । जोकर आया हंसता गाता ।। रंग-बिरंगे कपड़े पहने। पहने था वह नकली गहने ।। लाल नाक पर बिन्दी पीली । बना रखी थीं भौंह कटीली ।। मुख सफेद, आंखें थी नीली । चुस्त कमीज़, पैन्ट कुछ ढ़ीली । शंक्वाकार टोप सिर पर धर । लगा हंसाने वह रह रहकर ।। दिखलाये उसने जब करतब । हुए हंसी से लोटपोट सब ।। जोकर बनना एक कला है । खुशी बांटना बड़ा भला है ।।

18. शेर हमारे राजा हैं

किसी एक दिन जंगल में । सोमवार या मंगल में ।। सारे पक्षी बैठे थे । कुछ सीधे, कुछ ऐंठे थे । उल्लू भी कुछ ऐंठा था । चौड़ा होकर बैठा था । एक मोर चलकर आया । उसने सबको समझाया । शेर हमारे राजा हैं । खुशियों का दरवाजा हैं ।। उल्लू बोला- नहीं, नहीं । बात तुम्हारी सही नहीं ।। हम आजाद परिंदा हैं । अपने बल पर जिंदा हैं ।। हमें शेर से क्या लेना । क्यों सम्मान उसे देना ।। कहा मोर ने- अरे सुनो । सोचो, समझो और गुनो ।। शेर न हो यदि जंगल में । हम सब फंसें अमंगल में ।। कई शिकारी आयेंगे । मारेंगे, ले जायेंगे ।। शेर के होते आये कौन । हमें हानि पहुंचाये कौन ।। सबने सच्चाई जानी । सबने बात सही मानी ।। शेर आ गया उसी घड़ी । नमस्कार की लगी झड़ी ।। कहा शेर ने - नहीं डरो । मिलकर सब आनन्द करो ।।

19. नेताजी का नाम अमर

नेताजी का नाम अमर । नेताजी का काम अमर ।। उन्हें देश प्राणों से प्यारा, दिया देश हित जीवन सारा, पूरा जीवन बना समर । नेताजी का नाम अमर ।। बोले हम मजबूर नहीं, दिल्ली हमसे दूर नहीं, आओ, कस लें सभी कमर । नेताजी का नाम अमर ।। बोले सौ दुख सह लेंगे, भूखे, प्यासे रह लेंगे, बंधन मुक्त धरा हो गर । नेताजी का नाम अमर ।। देश-प्रेम-पथ दिखा गये, जीना-मरना सिखा गये, बलिहारी उस जीवन पर । नेताजी का नाम अमर ।।

20. चलो, कबड्डी खेलें

सोहन, मोहन, धीरज, नीरज, चलो कबड्डी खेलें । अजय, विजय,राकेश, रामधन, सबको ही संग ले लें ।। आओ, मस्ती में भर खेलें हम दो टीम बनाकर । प्रतिस्पर्धी को छूकर के पाला छूलें आकर । तन मन स्वस्थ-सबल हो जाते, हो जातीं दृढ़ हड्डी । बिना खर्च आनन्दित करता, अद्भुत खेल कबड्डी ।। हर कोई उत्साहित होता कोई जीते, हारे । बढ़ता जाता भाईचारा मिलकर रहते सारे ।।

21. हमारा परिवार

छोटा सा परिवार हमारा, जिसमें दादा-दादी । हमें बोध की कथा सुनाते हर दिन सीधी-सादी ।। पिता कमाई करते हर दिन, घर की चीज़ें लाते । फल, नमकीन, मिठाई लाकर जब तब हमें खिलाते ।। घर के काम संवारे मम्मी, देतीं रुचिकर खाना । कुछ कुछ नया सिखातीं हर दिन खोलें ज्ञान-खजाना ।। मैं, भैया विद्यालय जाते, पढ़कर नाम करेंगे । जिससे हो कुछ भला देश का ऐसे काम करेंगे ।।

22. बहन

रिश्तों के उपवन में शोभित बहन एक अनमोल सुमन है । जिसमें बसी प्रेम की खुशबू, भाई के प्रति अपनापन है ।। भाई के सुख में खुश होती सुख से फूली नहीं समाती । दुख में देख दुखी हो जाती, आंखों में मोती भर लाती ।। ईश्वर का उपहार अनूठा बहन रूप में पाता भाई । शायद किसी सुकृत का फल ही बनता बहन रूप सुखदाई । हम भी उसको खुशियाँ बांटे, समझें उसे नयन के तारे । उसके जीवन में सुख बरसे ऐसे रहें प्रयास हमारे ।।

23. सुबह की सैर

अच्छी होती सैर सुबह की सब विद्वान बताते । जो भी करते सैर सुबह की वे सुख से भर जाते ।। सुबह सुबह विहगों का कलरव, फूलों का मुस्काना । सुबह सुबह यह धरा लुटाती ज्यों अनमोल खजाना ।। बहती शीतल हवा भोर में तन मन पुलकित करती । उषाकाल की प्राण वायु नित नई ऊर्जा भरती ।। मन में खुशियाँ, तन मे फुर्ती, ओज बदन पर आये । औषधि जैसी सैर सुबह की जो निरोगता लाये ।। मेधा बढ़ा, चिरायु बनाती, अनुशासन सिखलाती । अति हितकारी सैर सुबह की अनगिन लाभ कराती ।। तड़के उठकर शौच निवृत हो नित्य सैर पर जाओ । सुबह प्रकृति से बातें करके खुशियों से भर जाओ ।।

24. बिल्ली और चूहा

म्याऊं म्याऊं करती बिल्ली रोज घूमने आती । उसको जो भी चूहा मिलता उसे मार कर खाती ।। घटने लगे दिनों दिन चूहे सब चूहे घबराये । सभी सोचने लगे- करें क्या हमको कौन बचाये ।। तब चूहों को बूढ़े चूहे ने एक दिन समझाया । फिर मोटा चूहा कुत्ते को दोस्त बनाकर लाया ।। बिल्ली आयी, कुत्ता भौंका, बिल्ली डरकर भागी । रहने लगे खुशी से सब मिल सबकी किस्मत जागी ।।

25. वर्षा रानी

बादल आये भरकर पानी, रिमझिम बरसी वर्षा रानी । नन्हीं नन्हीं बूँदें आईं, बाहर आकर देखो नानी ।। बादल गरजे, बिजली चमकी, और चली ठंडी पुरवाई । परनालों ने शोर मचाया, गलियों ने जलधार बहाई ।। खुश हो मेंढक लगे उछलने, नाचे मोर मुग्ध हो वन में । खेतों में जल भरा लबालब, कृषकों ने सुख माना मन में ।। बच्चे नाव बनाकर लाये, जल में छोड़ी तो वह दौड़ी । मां बोली- लो, आओ बच्चो, खाओ पीओ चाय पकौड़ी ।।

26. बढ़े चलो कदम कदम

बढ़े चलो कदम कदम कि लक्ष्य प्राप्त कर सकें । सदैव जय का चाव हो, कभी न भय का भाव हो, जब कभी डिगें कदम, तो शौर्य नया भर सकें । बढ़े चलो कदम कदम कि लक्ष्य प्राप्त कर सकें ।। द्वेष-दंभ छोड़ छोड़, बंधनों को तोड़ तोड़, कंटकों के साथ में भी बन प्रसून झर सकें । बढ़े चलो कदम कदम कि लक्ष्य प्राप्त कर सकें ।। चन्द्र से निखर निखर, सुगंध से बिखर बिखर, सबको हर्ष से भरें गुणों से यूँ संवर सकें । बढ़े चलो कदम कदम कि लक्ष्य प्राप्त कर सकें ।। जिंदगी का सार हो, मनुष्यता से प्यार हो, छद्म छोड़ जो मिले, तो उसके विघ्न हर सकें। बढे चलो कदम कदम कि लक्ष्य प्राप्त कर सकें ।।

27. मोर

नभ में उठीं घटाएँ काली, बहने लगी मंद पुरवाई । झूम उठी मोरों की टोली, सुख देने वाली ऋतु आई ।। मोर लिए सिर ताज सजीला, लम्बी गर्दन का रंग नीला । इन्द्रधनुष से रंग परों में, पर स्वभाव कुछ कुछ शर्मीला ।। नाच रहे सब पर फैलाये, सब ही मस्ती में बौराये । झूम रहीं हैं साथ मोरनी, हिलमिल कर कितना सुख आये ।। मिलकर रहना, मिलकर खाना, आपस में मिल खुशी मनाना । उसका ही जीवन सुखपूरित, जिसने मंत्र मेल का जाना ।। बच्चो ! तुम भी झूमो-गाओ, सारे मिलकर खुशी मनाओ । मेलजोल का अपना ही रस, सब अपनेपन से भर जाओ ।।

28. नन्हा अंकुर पेड़ बन गया

शैल तोड़कर बाहर आया, नन्हा अंकुर प्यारा । कौतूहल से भरकर उसने चारों ओर निहारा ।। कुशल पूछने लगीं हवाएँ, अक्सर आते जाते । नभ में दौड़ लगाते बादल, उसका मन बहलाते ।। सूरज आता नर्म धूप से उसे नित्य नहलाने । और रात को चांद सितारे आते मन बहलाने ।। बढ़ने लगा रातदिन अंकुर प्यार सभी का पाकर । नन्हा अंकुर पेड़ बन गया खड़ा हुआ लहराकर ।। दूर दूर से पंक्षी आये रहने लगे चहक कर । नेह लुटाने लगा पेड़ भी खिलकर और महक कर ।। आकर पास खेलते बच्चे पथिक रुके पा छाया । मुग्ध पेड़ ने सबके ऊपर अपना प्यार लुटाया ।। मधुर फलों से टोकरियां भर जीवन में रस घोला । सुख देने से सुख मिलता है, पेड़ सभी से बोला ।।

29. तुम्हें बहुत आगे जाना है

उठो, उठो, अब आलस छोड़ो, ये सोने के पिंजर तोड़ो, तुम्हें बहुत आगे जाना है । छोड़ निराशाओं की धरती, संकल्पो के पर दृढ़ करके, तुम्हें आस का नभ छूना है, अडिग,अकूत शौर्य से भर के, जो अभीष्ट है, वह पाना है। तुम्हें बहुत आगे जाना है।। पग पग पर हैं कई चुनौती, जीवन के इस दुर्गम पथ पर, वीर, न रुकना, बढ़ते जाना, तुम चढ़कर साहस के रथ पर, कभी न किंचित घबराना है । तुम्हें बहुत आगे जाना है ।। अपनी भाग्य-लकीरें गढ़ना अपनी कर्मठता के बल पर, विज्ञ समय का मूल्य समझते, टाल न देना तुम कुछ कल पर, आज, अभी नवयुग लाना है । तुम्हें बहुत आगे जाना है।। जो चलता है, वही पहुँचता, ध्येय-शिखर को वह छू लेता, वही नया इतिहास बनाता, बन पाता है वही विजेता, विजय-वरण कर मुस्काना है । तुम्हें बहुत आगे जाना है ।।

30. कर्मवीर

तिनका तिनका चुनकर पक्षी अपना नीड़ बनाते । इच्छाओं के पंख लगाकर नभ तक आते जाते ।। उच्च शिखर पा लेती चींटी धीरे-धीरे चढ़कर । कछुआ दौड़ जीत लेता है पग पग आगे बढ़कर ।। तिमिर चीरकर बढ़ता जुगनू स्वयं प्रकाशित होकर । सभी सिद्धि के वृक्ष उगाते, युक्ति-बीज बो बोकर ।। बच्चो, सुदृढ़ इरादे लेकर तुम भी बढ़ते जाना । दुष्कर पथ के विघ्न देखकर तनिक न तुम घबराना ।। जो अविराम अथक चलते हैं, लक्ष्य उन्हीं को मिलते । कर्मवीर के जीवन में ही, पुष्प लब्धि के खिलते ।।

31. छोटा बड़ा

छोटा-बड़ा, असुन्दर-सुन्दर सबका होता सत्व सदा । जो औरों को सुख से भरता पाता वही महत्व सदा ।। क्षुद्र बीज अंगड़ाई लेकर बन जाता है वृक्ष विशाल । तुच्छ सीप को कम न समझना भर देता मोती से थाल ।। छोटी छोटी कई चींटियां ले जातीं मिल भार बड़ा । नन्हीं नन्हीं जल-बूँदों से बनता पारावार बड़ा ।। छोटे छोटे तिनके मिलकर दृढ़ रस्सी बन जाते हैं । भीमकाय हाथी भी उनका बंधन तोड़ न पाते हैं ।। काला और कुरूप कोयला बहु-उपयोगी होता है । छोटे बड़े सभी की महिमा, हर कोई सुख बोता है ।।

32. नव प्रकाश फैलाओ

टिम टिम तारे यह समझाते फैलाओ उजियारा । ऐसा हो आचरण तुम्हारा रीझे यह जग सारा ।। बिखरा देता धवल चांदनी चांद तमस को हर कर । नये स्वप्न; नव आस जगाता मन को सुख से भर कर ।। सबको दिशा बताता रहता मनमोहक ध्रुव तारा । सही दिशा की ओर ले चलो अपनी जीवन-धारा ।। नभ के मंजुल मंजुल तारे सबका मन बहलाते । किन्तु भोर तक चुपके चुपके सब अदृश्य हो जाते ।। तब किरणों का मुकुट पहनकर सजधज सूरज आता । जग में नये रंग बिखराकर सबमें ओज जगाता ।। इंगित करते नभ के तारे सबको यह समझाते । जग में नवप्रकाश बिखराओ, मानवता के नाते ।।

33. बसंत ऋतु

पीत रंग की चूनर ओढ़े सरसों है इतराई, तितली-दल को लगी लुभाने, पुष्पों की तरुणाई, बही हवा सुखदाई । लो, बसंत ऋतु आई ।। भीनी भीनी गंध लुटाकर आम लगे बौराने, आम्र-मंजरी में आ बैठी, कोयल गीत सुनाने , मादकता छितराई । लो, बसंत ऋतु आई ।। लता पल्लवों से सजधज कर हरित पेड़ पर झूली, भ्रमरों का गुंजन सुन सुनकर पुष्पवाटिका फूली, अद्भुत सुषमा छाई । लो, बसंत ऋतु आई ।। चहके चहके फिरें सभी खग पशु झूमें मस्ती में, चारों ओर उमंगें बिखरीं वन,उपवन, बस्ती में, सबने रस-निधि पाई । लो, बसंत ऋतु आई ।।

34. समर्थ बनो

बनो समर्थ ताकि जिंदगी संवर सके । बनो समर्थ ताकि सुख का स्रोत झर सके ।। निर्बलों की जिंदगी का अर्थ क्या भला, निर्बलों को इस जगत ने हर कहीं छला, जो अभाव में हैं उनको कौन भाव दे, टूट नहीं पाती उनकी दर्द-श्रंखला, बनो समर्थ ताकि दुःख का घाव भर सके । बनो समर्थ ताकि सुख का स्रोत झर सके ।। जो समर्थ हैं, सदा उन्हीं का मान है, शक्ति, सम्पदा, पदों का गर्व-गान है, निर्बलों का मान और पूछ है कहाँ, बस, सशक्त की ही आन बान शान है, बनो समर्थ ताकि विश्व मान कर सके । बनो समर्थ ताकि सुख का स्रोत झर सके ।। यूँ न बैठो मुख चुनौतियों से मोड़कर, उठ, बढ़ो समस्त बेड़ियों को तोड़कर, जो चलें हैं, मंजिलें उन्हें ही मिल सकीं, जीत लो शिखर को संकटों से होड़ कर, बनो समर्थ ताकि श्रेय स्वयं वर सके । बनो समर्थ ताकि सुख का स्रोत झर सके ।।

35. मेरे सपने

मेरे मन की उर्वर भू पर हर दिन सपने उग आते हैं । आशाओं के पंख लगाकर नये क्षितिज तक ले जाते हैं ।। नभ-पिण्डों से बातें करके छा जाती है मन मस्ती । होगा एक दिवस ऐसा भी वहाँ बसेगी अपनी बस्ती ।। इस धरती से अन्य ग्रहों तक अक्सर होगा आना जाना । तन मन में रोमांच भरेगा वहाँ पहुंचकर वापस आना ।। एक एक कर नभ-पिण्डों से हमें और भी प्यार बढेगा । धरती से उठ दूर गगन तक हम सब का संसार बढ़ेगा ।। दूर नक्षत्रों की धरती पर हम खोजेंगे नये खजाने । मानवता के हित में होंगे अपने सारे ताने बाने ।।

36. हम हैं नन्हे नन्हे तारे

हम हैं नन्हे नन्हे तारे । उगे जगत को जगमग करने, सबके मन की पीड़ा हरने, सब में नव आशाएँ भरने, रूप मनोहर धारे । हम हैं नन्हे नन्हे तारे ।। हम नव स्वप्न जगाने वाले, मन का तिमिर भगाने वाले, हम नव खुशियाँ लाने वाले, बॉंट रहे उजियारे । हम हैं नन्हे नन्हे तारे ।। हमने कभी न सीखा रोना, कभी न सीखा कुंठित होना, चमकाते जग का हर कोना, उच्च विचार हमारे । हम हैं नन्हे नन्हे तारे ।। कभी किसी से भेद न करते, किसी बात का खेद न करते, हॉं, हम व्यर्थ कुरेद न करते, हमें प्रिय जन सारे । हम हैं नन्हे नन्हे तारे ।। तुम भी प्यार लुटाना सीखो, सबको ही अपनाना सीखो, मिलकर हॅंसना, गाना सीखो, हर कठिनाई हारे । हम हैं नन्हे नन्हे तारे ।।

37. नहीं रुकेंगे

हम सब नवयुग के बच्चे हैं, सारे जग की नव आशाएँ । सब के मन में प्रबल चाह है, इस धरती को स्वर्ग बनाएँ ।। निकल पड़े हैं हम सब पथ पर, माना, अपना कठिन सफर है । बढ़ते जाते सीना ताने, हमें न जरा किसी का डर है ।। हम अपनी धुन के पक्के हैं, बाधाओं से क्या घबराना । आग, पहाड़ कि पानी आये, हम सीखे बढ़ते ही जाना ।। हम अविचल संकल्प लिए हैं, साहस से हर रोम भरा है । अपने कदमों से नापेंगे, आखिर कितनी बड़ी धरा है ।। हे आकाश ! तुम्हें झुकना है, हम दीवाने नहीं झुकेंगे । जब तक लक्ष्य नहीं पा लेते, नहीं रुकेंगे, नहीं रुकेंगे ।।

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