जनकवि गोलेन्द्र पटेल (समीक्षा) : डॉ सुशीला ओझा

अनेक उपाधियों से विभूषित गोलेन्द्र पटेल का स्वागत है। गोलेन्द्र एक पूर्ण चेतनता का प्रतीक है। गोलेन्द्र एक दार्शनिक भाव है, विचार है, वाद है जो जीवन जीने की कला सिखाती है। यह एक प्रज्ञा का द्योतक है। गोलेन्द्र पटेल हिन्दी और भोजपुरी के सशक्त हस्ताक्षर हैं। साहित्य की सभी विधाओं यथा -कविता, नवगीत, कहानी, निबन्ध, नाटक, उपन्यास आदि से अपनी लेखनी को गतिशीलता से श्रीसमृद्ध किया है। इन्होंने अपनी कुशल प्रतिभा का परिचय दिया है। साहित्य साधना की निरन्तरता ने इन्हें इतने कम उम्र में अनेक उपाधियों से विभूषित किया है। अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रमुखता से प्रकाशित हैं। एक दर्जन से ऊपर सम्पादित पुस्तकों में इनकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय काव्य गोष्ठियों में इन्होंने कविता पाठ भी किया है। गोलेन्द्र पटेल ने अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित होकर हिन्दी साहित्य को शिखरत्व प्रदान किया है। अनेकानेक प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं से इन्हें प्रशस्ति पत्र प्राप्त हुए है।

डॉ सुशीला ओझा
डॉ सुशीला ओझा
गोलेन्द्र पटेल की एक लम्बी कविता है -'प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना'। इस कविता के माध्यम से कवि ने प्रेमचंद की लोकमंगलता, जीवन की यथार्थता, तत्कालीन समाज की सजीव चित्रमयता को अपनी अदम्य साधना से पुनर्जीवित करने का सार्थक प्रयास किया है। साहित्य के दर्पण में ऐसी तस्वीर खींचना अन्यत्र दुर्लभ है। कवि ने प्रेमचंद के तीर्थत्व की कृतज्ञता से साधना की गहराई में डुबकी लगाई है। धनपत राय से पत्र के माध्यम से संवाद की शैली में इनकी सम्प्रेषणीयता की उत्कृष्टता काबिले तारिफ है। ऐसी कलात्मकता की पारदर्शिता प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक उत्कट श्रद्धांजलि है। ऐसा लग रहा है कि कवि प्रेमचंद से संवाद कर रहा है। प्रेमचंद की कलम श्रद्धा-विश्वास रुपिणी है। शब्द और अर्थ भवानी-शंकर की तरह वंदनीय हैं। लेखनी की श्रमशीलता एवं निरन्तरता की सार्थकता से विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश होता है। कलम सशक्त है, स्वाधीन है तभी जीवित है। निर्भीक होकर लेखनी को थामे अंगुलियों में गजब की गतिशीलता और प्रवाहमयता है। युगद्रष्टा कवि ने जर्जर वस्त्रों और फटे जूतों में समर यात्रा करते पथिक के रूप में एक निर्भीक एवं निष्ठावान कलम के सिपाही को देखा है, जिन्होंने मानवीय मूल्यों के संवेदनाओं की माटी में सोंधी महक अनुभूत की है। इस माटी के कण-कण में सूरा-होरी-गोबर-धनिया-बुधिया के संघर्षरत जीवन के पसीने की गंध नथुनों में समाए हुए हैं। इनकी चीख से शरीर का रोम-रोम उद्वेलित हो उठता है। आज भी इनकी तबाही और चीखों की गवाही श्रवण रन्धों में अनुगूंजित होते रहते हैं जो कालातीत है, शब्दातीत है। उस माटी की करुण आत्मानुभूति इनकी रचना में हो रही है-

-"जब भी सुना मैंने
'सुरा' और 'होरी' की तबाही सुनी
'गोबर' और 'धनीया' की गवाही सुनी
'बुधिया' की चीख सुनी
मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुनी।"

'सोजे वतन' में प्रेमचंद के बलिदान का स्वर प्रखरता से उभर रहा था और स्वाभिमान का प्रखर सूरज तमतमा रहा था। इनकी कहानियों में भारत की आत्मा की सिसकती आवाज है। इनमें संसार की स्याह संस्कृति का स्पष्ट स्वर है, जीवन के यथार्थ का आईना है। कफन, सद्गति, सेवासदन, निर्मला, प्रेरणा, काया कल्प, सवा सेर गेहूँ, प्रेम-पचीसी, ईदगाह, पंच परमेश्वर, परीक्षा, बालक, नमक का दारोगा, प्रेमाश्रम, बड़े घर की बेटी, दो बैलों की कथा, रंगभूमि, गोदान, गबन, कर्बला, आत्माराम इत्यादि कहानियों में भारतीय आत्मा और जीवन के यथार्थ का कितना सजीव, सटीक, मार्मिक विश्लेषण हुआ है! 'सोफिया' से लेकर 'मालती' तक, 'विनय' से लेकर 'मेहता' तक - सभी के बीच प्रेम का अद्भुत प्रसंग है, सबकी अपनी स्वतंत्रता है। स्वच्छंद, निस्पृह एवं विचारशील व्यक्ति की दृष्टि, सृष्टि की सेवा में तत्पर रहती है, जहाँ विचारोत्कर्ष है, सौन्दर्य का अनुपम शृंगार है। उन भावनाओं में विचरते मानसरोवर के हंस, मोती का चयन करते हैं। कवि की भावनाओं में विचारों का कितना प्रकर्ष, उत्कर्ष है। इनमें उदात्त सौन्दर्य का महिमामंडन है। सृष्टि में दृष्टि की व्यापकता की पारंगत उपभोक्ता दृष्टि कवि की अपूर्व क्षमता है। कवि की संवेदनाएँ पूर्णत: समर्थ है -

"स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि
सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है
और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है
जहाँ विचारोत्कर्ष है सौन्दर्य का वास्तविक शृंगार।"

कवि ने तुलसीदास और प्रेमचंद, दोनों को लोकमंगल का कवि माना है। इन दोनों कवियों का दृष्टिकोण समन्वयवादी और व्यापक है। इन महान् साहित्यकारों के प्रति कवि के हृदय में अगाध श्रद्धा है। अनेक संबोधनों से संबोधित करने में कवि की जिह्वा की गतिशीलता अवरुद्ध नहीं होती है। ऐसे महान नायक संबोधनों से परे हैं। फिर भी कवि अपनी भावांजलि श्रद्धा से इन साहित्यसेवियों के चरणों में अर्पित करता है। विचारों के उदात्त सौन्दर्य में 'प्रेमचन्द' कैलास पर प्रतिष्ठित हैं। वे मानसरोवर के हंस हैं -

"हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!
थे तुम 'बलिदान पथ' के चिरंजीवी चिंतक!"

प्रेमचंद की सृजनशीलता में व्यापकता अथाह है। इसमें 'गोर्की' और 'लूशुन' के भी विचार सम्मिलित हैं। विश्व में जहाँ विचारों का उत्कर्ष हैं, वहाँ गद्य के तुलसी ने बड़ी बारीकी से चयन किया है। दलितों और उपेक्षितों के जीवन को जिए बिना कोई दलित का दीपक नहीं हो सकता। गाँव की सोंधी महक को अपने हृदय में धारण कर उनके दुख, दर्द, पीड़ा को आत्मसात कर प्रेमचंद ने मनुष्यता का बारीकी से अध्ययन किया। इस पीड़ा को आत्मसात कर और स्वयं उस माटी में जीकर इन्होंने जर्जर महाजनी सभ्यता के बुरे दौर में क्रांति की आवाज उठाने के लिए और शोषण से मुक्ति के लिए प्रोत्साहित किया। प्रेमचंद ने चैतन्य और वैराट्य को अपने आप में समेटे उदारता के मानदंड स्थापित किया। उन्हें संबोधित करते हुए कवि कहता है -

"हे चेतना के चिराग!
तुमने लगाई शोषकों के महल में आग
तुमने गाया सदा रोशनी का राग।"

सत्य का अन्वेषी, निर्भीक साधक या तपस्वी ही अपनी लेखनी में स्नेह, समता और न्याय से प्रतिबद्ध स्याही भरकर यथार्थ को पन्नों पर उकेरने का साहस करता है। सूर्य की प्रखर किरणों की तरह प्रेमचंद में दृष्टि की व्यापकता है। ये आजीवन शोषण, अन्याय और अत्याचार को अपनी प्रखर किरणों से जलाते रहे। इनकी कथाओं की धमनियों में धरती की धुन है, प्रकृति का सौन्दर्य है और खेतों में पसरे फसलों की श्रीसमृद्धि है। इनमें विविध फूलों की महक है, नदी की प्रवाहमयता है, भोर के क्षितिज पर झुकी हुई ऊषा सुन्दरी का अनुपम सौन्दर्य है, संवेदना का राग है तो शहर की दूषित राजनीति की आग भी है। कवि, प्रेमचन्द के बहुआयामी व्यक्तित्व को लेखनी में बाँधते नहीं अघा रहे। कवि के निश्छल मन-मस्तिष्क की पावन भूमि पर कितनी श्रद्धा है, कितने उत्कृष्ट विचार हैं! सुषुप्त राष्ट्र को जागृत करने वाले ऐसे मशाल और विशाल हृदय का गीत, गगन भी उमंग से गा रहा है। लमही की उस माटी को कोटि कोटि प्रणाम है। प्रेमचंद ने अफसरशाही के विरोध में प्रेम प्रतिज्ञा का शंखनाद किया। साहित्य के इस उपासक, साधक, ऋषि ने आदमी में आदमीयत का मंत्र दिया। कवि ने कितने सुन्दर शब्द पुष्पों ऐसे साहित्य के पुजारी का माल्यार्पण किया है! पुष्प अर्पित करते-करते कवि थक नहीं रहा। तरह-तरह के शब्द, मन-उपवन में खिल उठते हैं और साहित्य मनीषी का शृंगार करते हैं। प्रेम सरोवर में प्रस्फुटित कमल का सौन्दर्य अद्भुत है! प्रेमचन्द द्रष्टा और स्रष्टा दोनों हैं। नवजीवन के तत्त्व इनकी रचनाओं में समाहित हैं। कवि के मन में इस साहित्य के साधक के प्रति वन्दन, अभिनन्दन का उज्ज्वल, विमल और धवल भाव है। समाज की प्रतिकूल परिस्थितियों में इन्होंने शोषित, उपेक्षित, तिरस्कृत लोगों के प्रति मानस का दीप जलाया और उसे स्नेहरस से सिंचित कर, लेखनी की वर्तिका जलाकर जीवन के प्रकाश का अनुपम वरदान दिया। इन्होंने नई दिशा से उपकृत कर मानवीय मूल्यों को प्रकाशित किया। कवि बड़ी सहृदयता से कविता की क्यारी में एक किसान की तरह महान साधक के विचारों को यत्नपूर्वक बो रहा है। कवि सृजन का अग्रदूत होता है। यह साधक की तरह लेखनी उठाता है और सरस्वती का उपासक हो जाता है। प्रेमचंद जैसे उदात्त हृदय के महान साधक की अभ्यर्थना में विविध शब्द पुष्पों से शृंगार करने में वह स्वयं ऊर्जस्वित होते जा रहा है। ऐसे युगद्रष्टा, सृष्टि के उपासक, सरस्वती के साधक मानस के हंस होते हैं। प्रेमचंद के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने ने कवि ने स्वयं विशालता का परिचय दिया है। एक कवि द्वारा महान् लेखक को शब्द पुष्पों का माल्यार्पण कर उनकी साधना और तपस्या की पुनर्स्थापना उनके प्रति बहुत बड़ी श्रद्धांजलि है। हमारी भारतीय संस्कृति में साधक, चिन्तक, मनीषी, स्रष्टा, द्रष्टा को स्मृति सिन्धु में अवगाहन कराने की सुदीर्घ परंपरा रही है।

गोलेन्द्र जी की एक रचना है -'मेरा दु:ख मेरा दीपक है'। इस कविता में एक माँ के श्रम और संघर्ष की व्यथा का अत्यंत मार्मिक एवं सजीव चित्रण हुआ है। माँ के ऊपर गुरुदायित्व होता है। गृहस्थी के केन्द्र में एक स्त्री होती है जो एक बहू है, पत्नी है, माँ भी है। गर्भावस्था में वह पिसती जाती है। पुरुष के निठ्ठला, कामचोर और पियक्कड़ होने का दंश एक स्त्री को ही भोगना पड़ता है। नारी सशक्तिकरण की प्रतीक स्त्री गर्भावस्था में भी मजदूरी करने को विवश हो जाती है। कितना परिश्रम करती है वह महिला! पीठ पर अपने बच्चे को बाँधकर ईंट ढोती रहती है। उसके श्रम की यह निरन्तरता गर्भ से लेकर जन्म तक चलती रहती है। माँ वर्णमाला का अंतिम अक्षर होती है। वह महाकाव्य की नायिका है। ऐसा लगता है वह इस्पात की बनी हुई है और श्रम संस्कृति के दोहे और छंदों का जन्म उसकी श्रमशीलता से हुआ है। उसके पसीने, आँसू और भूख के संगम पर सृष्टि पनपी है। कवि ने कितनी मार्मिकता से माई की सर्जना की है -

"मेरी माँ, माईपन का महाकाव्य है
यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उसका बेटा हूँ
मेरी माँ लोहे की बनी है
मेरी माँ की देह से श्रम संस्कृति के दोहे फूटे हैं।"

एक मजदूर माँ, सामाजिक और आर्थिक समानता पर केन्द्रित महिला सशक्तिकरण की प्रेरणास्रोत है। उसके पैरों में फटी बिवाइयाँ और उसमें झलकते लहू-पीब उसके संगीत हैं। श्रम के अवदान को अपने हथेलियों पर उत्कीर्ण कर वह अनूठी कलात्मकता का दर्शन कराती है। माँ बच्चे के जीवन की उम्मीद है। धूल, धुआँ, कुआँ और पसीने की बूँदों से नहाती माँ की पहचान अद्भुत है। माँ भूख की काव्यात्मक भाषा है। वह शिल्पमयी है, सर्जनशील मनुष्यता की परिभाषा है। माँ मशीन की तरह दिन-रात काम करती है। मशीन में भी समय-समय पर तेल-ईंधन भरा जाता है। परन्तु जेठ की दुपहरी हो या माघ की शीतलहरी या सावन-भादों का बरसता पानी -माँ अनवरत कीचड़-माटी में श्रम करती रहती है। घर की रसोई से लेकर चौका-बर्तन, गाय-बैल का नाद भरना, कुट्टी काटना, खेतों में निराई-गुड़ाई-रोपनी करना - सब माँ के जिम्मे है। माँ के पैरों में मधुमक्खी के छत्ते की तरह बिवाइयाँ पड़ जाती हैं। रात में वह उसे हल्दी-तेल लगाकर सेंकती है और फिर चल पड़ती है अपने काम पर। फिर शुरू हो जाता है घर में बच्चों की चिल्ल-पों, बूढ़ी दादी का गाली-गलौज, दारु पीकर आए पति से पैसे का हिसाब। मर-मरकर कमाती है माँ और दारु के पैसे के लिए क्रूर निठ्ठला पति उसे मारता है। ईंट और खेत के मालिकों को लेकर उसे गालियाँ देता है। मार-पीट से हाथ की टूटी-फूटी चूड़ियाँ कलाई में गड़कर लहूलुहान कर देती है। कितनी सहिष्णु होती है एक मजदूर माँ! दोपहर की चिलचिलाती धूप में सब लोग घर में पंखे के नीचे आराम कर रहे हैं और माँ चाम जलाने वाली धूप में ईंटें ढो रही है। कवि ने कितनी मार्मिकता से अपने शब्दों को आँसुओं की लेखनी को डुबाकर लिखा है -

"चढ़ते हुए घाम में चाम जल रहा है उसका
वह ईंट ढो रही है
उसके विरुद्ध झुलसाती हुई लू ही नहीं
अग्नि की आँधी चल रही है।"

यह दृश्य विपरीत परिस्थितियों में भी महिला के स्वाभिमान और निरन्तर परिश्रम को उजागर करता है। आज भी निराला की 'तोड़ती पत्थर' प्रासंगिक है। मजदूर माँ का बेटा भी मजदूरी करता है। वह हर तरह के काम करता है। ईंट भठ्ठे और मंडियों से लेकर पहाड़ों के पत्थरों पर गुरु हथौड़ा चलाता है। कभी करनी, बसुली, साहुल, सुता, रूसा, पाटा लेकर गगनचुम्बी अट्टलिकाएँ खड़ा कर देता है। कवि ने सत्य कहा है दु:ख ही जीवन का दीपक है। मजदूर का बच्चा बचपन में ही परिपक्व हो जाता है। बालकों जैसी कोमलता उसमें पनपती कहाँ है! अपने पेट के साथ-साथ परिवार का पेट पालने की मजबूरी है। बालश्रम कानून बना जरूर है परन्तु श्रम न करें तो इनका पेट भरे कैसे! पेट भरने का भी कोई कानून है क्या! मजदूर माँ असीम वेदना सहकर बच्चे को जन्म देती है। वे माएँ कागज पर लिखे अक्षरों को भैंस बराबर समझती हैं। 'कामायनी' के पन्ने फाड़कर वे बच्चों का मल फेंकती हैं और ऐसे ही परिवेश में वे अपने विचारों के प्रतिपक्ष की कविता गढ़ती हैं। माँ की इस दयनीय स्थिति में गर्भ में पल रही उनकी संतानें अनगिनत कविताएँ रचती रहती हैं। वे क्रान्ति की कविता होती हैं, सर्वहारा वर्ग की आवाज होती हैं। इनसे प्रगतिशील और क्रान्तिकारी भावों का जन्म होता है।प्रगतिवाद की झलक इन रचनाओं में देखने को मिलता है। यह सामंती व्यवस्था के खिलाफ मजदूर वर्ग के संघर्ष का प्रतीक है। खासकर महिला मजदूरों की व्यथा कथा है। कामचोर, निष्क्रिय,निठ्ठले आदमी किस तरह स्त्री का ऐसे शोषण करते हैं! जब एक स्त्री गर्भावस्था में भी मजदूरी करती है, बच्चे के जन्म के बाद उसे पीठ पर बाँधकर बोझ ढोती है। वे बच्चे गर्भ में उसका लहू चूसकर पनपते हैं और जन्म के बाद उसका दूध चूसते हैं। वही बच्चे जब बड़े होते हैं तो रोटी के लिए माँ को ही दोषी समझते हैं। पिता सुबह से शाम तक शराब पीता है और मजदूरी के पैसे के लिए माँ से मार-पीट करता है। कवि की इस रचना में उस स्त्री के जीवन में कितनी यातना है, कितनी त्रासदी है!

कवि की एक अन्य रचना 'चोकर की लिट्टी' आह, कराह, उत्पीड़न, शोषण की आग में जलते हुए मन के उठते कड़वे धुएँ का एहसास है। जीवन की विषमताओं के बीच विद्रोह में उठाया गया क्रान्तिकारी कदम है। परिवेश के गर्भ में विचारों का जन्म होता है। शोषण, उत्पीड़न के विरोध में उठा स्वर प्रगतिवाद है। कवि के शब्दों में दक्खिन टोले के आदमी का अभिप्राय मन के भीतर सुलगता हुआ मानवीय संवेदनशून्यता की दुर्गन्ध है। कितना सताया गया है दलित, उपेक्षित, गरीब, दरिद्र किसान को! इस दुर्व्यवस्था का यथार्थ चित्रण प्रेमचंद की रचनाओं में दृष्टिगत होता है जो आज भी प्रासंगिक है। मजदूरों को उसकी उचित मजदूरी नहीं मिलना और बीड़ी पीने की आग के लिए चूल्हे की लकड़ी से जलने के लिए अभिशप्त होना उनकी नियति है। कोई दूसरा ठौर भी तो नहीं है। गिरमिटिया मजदूरों की तरह इनकी स्थिति अपने ही देश में बदतर है। मन में उठती चिनगारियों को दबाने का निरन्तर प्रयास किया गया। मजदूरी में सड़ा-गला अनाज, आटे में चोकर का अधिक अनुपात अग्निदेव का प्रसाद समझकर खा लेना उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा। पतली और साफ-सुथरी रोटी, दक्खिन टोले को कभी नसीब नहीं हुआ। मोटी चिपड़ी रोटी और उस पर प्याज, नमक, मिर्चा का सालन - यही उनके हिस्से में था। किसी तरह जठराग्नि को शान्त कर कोल्हू के बैल की तरह आँख, मुँह, पेट बाँधकर चलते रहना है। जुल्म के जुए में जुत जाना दक्खिन टोले के आदमी की नियति बन गई है। देवता भी इस सच को देखकर मुँह मोड़ लेते हैं। देखिए! कवि ने कितनी मार्मिकता से दक्खिन टोले के आदमी की पीड़ा और छटपटाहट को अभिव्यंजित करता है! बिना इस पीड़ा में जिए कलम की धार तीक्ष्ण नहीं हो सकती! यह स्वयं जीवन जीने का यथार्थ है -

"मुझे हमेशा कोल्हू का बैल समझा गया
मैं जाति की बंजर जमीन को जोतने के लिए
जुल्म के जुए में जोता गया हूँ
मेरी जिन्दगी देवताओं की दया का नाम है।"

इन पंक्तियों में कितनी पीड़ा है, कितना दर्द है! लोग कितने असंवेदनशील होते हैं! श्रमिकों के पसीने से भीगी हुई जमीन की रोटी खाते हैं जो चिलचिलाती धूप में अपने श्रम सीकर से उनके लिए अट्टालिकाओं को खड़ा करता है। सामंती प्रवृति के लोग आराम-चैन की करवटें बदलते हैं और जो उनके घर को बनाने-सजाने में अपना जीवन खपा देता है, उनके घरों पर एक टीन का छज्जा लगा होता है। किसी मंदिर पूजा से भी दक्खिन टोले का आदमी वंचित रह जाता है। कैसे किसी को घर में आमंत्रित करे! घर में प्रबंधन कुशलता का अभाव है। उनके घर अन्न-पानी, साग-सब्जी, ईंधन सबका अभाव है। मालिक काम तो करवा लेते हैं किन्तु मजदूरी का पैसा माँगने पर उनके मातहत लाठी से मारकर लहूलुहान कर देते हैं। उनके घरों में कई-कई दिनों तक चूल्हा नहीं जलता है। जंगल से कुछ शिकार मारकर लाते हैं और दरवाजे पर लगे घूरे में भुनकर कच्चा-पक्का खाने को विवश होते हैं। बेहया के पौधों की तरह उनमें जिजीविषा और जीवटता है। मार खाकर भी तलवे चाटने को मजबूर हैं। कवि की संवेदनशीलता इस शोषण, अन्याय, अत्याचार के विरोध में कलम उठाने को मजबूर कर देती है। मालिक दारु पीने के लिए दो-चार पैसे देकर उन्हें दिशाहीन और सर्वहारा बना देना चाहते हैं। देवी-देवता भी इन्हें वक्त का मारा कहकर उपहास उड़ाते हैं। दक्खिन टोले के आदमी की विवशता देखकर मन द्रवित हो जाता है। परन्तु महलों में रहने वाले संवेदनशून्य होकर आमानवीयता की सारी हदें पार कर चुके हैं -

"मैं कैसे किसी देवता को नेवता दूँ?
मेरे घर न दाना है न पानी
न साग है न सब्जी
न गोईंठी है न गैस।"

चारों ओर विपन्नता, दरिद्रता और विषमता का चरमोत्कर्ष है। कवि देवता को साक्षी बनाकर अपनी दयनीयता परोस रहा है। कवि की इस पीड़ा को देव क्या जानें! उन्हें तो छप्पन भोग मिलते हैं। दीनता, दरिद्रता, आह, कराह की प्रसव पीड़ा से कवि के भाव-अश्रु शब्दों को भिगा रहे हैं। कवि प्रतीक्षा में है कि एक न एक दिन इन शब्द पुष्पों से सजी आरती की थाली कभी प्रभु चरणों का नैवेद्य बन जाएगा -

"देखो न देव, देश के देव!
मैं अब भी चोकर का लिट्टा गढ़ रहा हूँ
चोकर का रोटा ठोक रहा हूँ
क्या तुम इसे मेरी तरह ठूँस सकते हो?"

कवि अपनी अंतिम पंक्तियाँ राष्ट्र के चरणों में अर्पित करता है। देश की आर्थिक विषमता का सजीव चित्रण एक आरती की थाली की तरह राष्ट्र को समर्पित है।

गोलेन्द्र पटेल की एक यथार्थवादी रचना है -'जंगल में जन्मदिन'। आधुनिकता के विकास के लिए, अर्थ व्यवस्था को शिखरत्व प्रदान करने के लिए जंगल कट रहे हैं। कृत्रिम फूल-पत्तियों से प्रकृति का शृंगार कर, कृत्रिम जानवरों की रचनात्मकता कर पर्यटन स्थल बनाए जा रहे हैं। हम नई सदी के खोखले लोग प्रकृति प्रेमी बनते जा रहे हैं। जमीन पर उत्सव नहीं मना सकते क्योंकि सब ओर प्रदूषण है, नदियों से लेकर आकाश तक प्रदूषित हैं। परन्तु नदी के किनारे जाकर प्रकृति की गोद में प्रकृति के पुजारी बनकर तस्वीरें जरूर लेनी है जिससे सबकी दृष्टि में प्रकृति प्रेमी की छवि अंकित हो। जिस चीजों को हम नहीं जीते पाते, उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते, उन्हें रचनाओं में गढ़ते हैं। असल जिन्दगी में प्रकृति के प्रति मनुष्य में कोई संवेदना नहीं है। किन्तु कविताओं के माध्यम से उदार एवं उदात्त की छवि का दर्शन करना जीवन का चरम बोध हो गया है। कवि ने उन रहनुमाओं का बड़ा ही सजीव चित्र उपस्थित किया है -

"भले ही, असल जिन्दगी में
रहें या न रहें
रचना में रहना है रहनुमा की तरह
उदार!"

जब हमें किसी को ठगना होता है तो हम अपनी वेश-भूषा को कुछ अलग रच लेते हैं।

इनकी एक और बेहतरीन कविता है -'थ्रेसर'। अपनी कठिन श्रम साधना से धूप-गर्मी- शीत- बरसात को पीठ पर लादकर पसीने में तर-बतर किसान अन्न उपजाते हैं। वे कर्ज लेकर किसानी करते हैं। कभी बाढ़ तो कभी सूखा की त्रासदी झेलते हैं। जठराग्नि को शान्त करने के लिए रात-दिन परिश्रम करते हैं; फिर भी कर्ज में डूबे रहते है। कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या करने को विवश हो जाते हैं। गेहूँ की दवनी के क्रम में कितने मजदूरों के हाथ कट जाते हैं। शोषण, उत्पीड़न और अत्याचार की गहनता में मजदूर का जीवन दाँव पर लगा रहता है। परन्तु सामंती प्रवृत्ति के मालिक का हृदय कितना संवेदनशून्य और अमानवीय होता है। कवि ने इन खोखले हृदय के लोगों के गाल पर बड़ा ही झन्नाटेदार तमाचा मारा है। चोट लगने से मजदूर के भीतर का लहू दर्द से काला पड़ गया है। ठिठके लहू के कारण उनके गालों पर रक्त के थक्के जम गए हैं। वे हृदयहीन खुश हो रहे हैं कि रक्त की प्रवाहमयता को भूसे ने अवशोषित कर लिया है। किन्तु गेहूँ में हड्डियों के बुरादे और मांस के लोथड़े स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। वहाँ न कोई तर्क है, न तथ्य, न भावना, न आदर्श। मात्र अमानवीयता का क्रूर नंगा नृत्य है। आर्थिक विपन्नता में किसान मजदूर जीने को विवश है। मानसून पर निर्भर किसान को लागत लग जाती है किन्तु मुनाफा दबे पाँव सिसकती रह जाती है। निर्बल और सबल की लड़ाई में सारे संवाद व्यर्थ हो जाते हैं। मालिक के झूठे सम्वाद, झूठे प्रलोभन और असत्य के सागर में नौका विहार सर्वथा काल्पनिक होता है। उसके झूठे आश्वासन के मकड़जाल में किसान मजदूर बुरी तरह फँस जाते हैं। न कोई दया, न कोई मुवावजा परन्तु मजदूर फिर से थ्रेसर पर चढ़ने को अभिशप्त है। कवि ने मजदूरों और कृषकों की दयनीय दशा का बड़ा ही सजीव एवं मार्मिक चित्रण किया है

-"दो के संवादों के बीच का सेतु
सत्य के सागर में
नौका विहार करना कठिन है
किन्तु हम कर रहे हैं
थ्रेसर पर पुन: चढ़ कर।"

बुजुर्ग कहते हैं कि अमीर और गरीब, दोनों ईश्वर ने बनाया है। अमीर मालिक हैं और मजदूरों का शोषण उनकी नियति है। वे कहते हैं मजदूरों से प्रेम से बात करने पर उनका मन आसमान पर चढ़ जाएगा और शोषण करने से वे विनम्र रहेंगे। मजदूर अमीर हो जाएँगे, उद्दंड हो जाएँगे, तो मालिक का खेत कौन जोतेगा! बुजुर्ग ये भी कहते हैं कि 'दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम'। फिर अमीरी-गरीबी की चक्की में पिसे लोग रोटी से क्यों खेलते हैं! रोटी पर केवल अमीरों के नाम लिखे हैं और क्या गरीब भूखे मरेंगे! हलक में उतरने के पहले ही वे रोटी छीन लेते हैं। ऐसी स्थिति में किसान आंदोलन करेंगे और अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे। लोकतंत्र में किसान मजदूर केवल वोट वैंक नहीं हैं। अब वे अत्याचारों के विरुद्ध क्रान्तिकारी कदम उठाएँगे। संविधान केवल कागज पर लिखे गए हैं। उस संविधान की आत्मा किसान हैं, श्रमवीर हैं। किसान अन्नदाता हैं और मजदूर विकास का सशक्त माध्यम। कवि ने उस अन्नदाता का बड़ा सटीक चित्रण किया है -

"बताओ न दिल्ली के दादा
गेहूँ की कटाई कब दोगे?"
एक तो मालिक उचित मजदूरी नहीं देते हैं और जो देते हैं वह भी समय पर नहीं देते हैं।

गोलेन्द्र पटेल जी ने जीवन के यथार्थ का चित्रण बड़ी सूक्ष्मता के साथ किया है। अपनी माटी की सुगन्ध से अपने व्यक्तित्व को सुरभित करना रचनाधर्मिता की श्रेष्ठता है। कवि ने प्रेमचन्द की स्मृति को तीर्थत्व प्रदान किया है। अपनी सभ्यता, संस्कृति और अपने महापुरुषों के प्रति इनमें अगाध श्रद्धा के भाव हैं। कवि मन में संवेदनाओं का सागर ज्वार भरता है और अपनी माटी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। माँ और माटी दोनों स्वर्ग से भी गरिमावान हैं। कवि ने माँ की श्रमशीलता में स्वयं जीकर ऐसी संवेदनशील रचना का सर्जन किया है। कवि द्रष्टा और स्रष्टा होने के साथ-साथ समाज का सर्जक भी है। अपनी उदात्त भावनाओं से साहित्य और समाज को नई दिशा, नए विचार, नई शब्दावली देकर समाज को एक नया आईना दिखाता है। गोलेन्द्र पटेल जी प्रगतिवादी कवि हैं। इन्होंने सामाजिक विषमताओं पर तीखा प्रहार किया है। ये सामाजिक रुग्णता की चिकित्सा मधुवेष्टित गोलियाँ से नहीं, बल्कि तिक्त गोलियाँ देकर सही उपचार करना चाहते हैं। साहित्य जीवन की परमौषधि है। आपकी लेखनी गतिशील हो, ऊर्जस्वित हो, सकारात्मक हो! आपकी लेखनी की पारदर्शिता बनी रहे!

समीक्षक: प्रतिष्ठित कवयित्री डॉ. सुशीला ओझा (पूर्व विभागाध्यक्ष, माहेश्वरनाथ महामाया महिला महाविद्यालय बेतिया, प० चम्पारण, बिहार।)

  • मुख्य पृष्ठ : गोलेन्द्र पटेल
  • मुख्य पृष्ठ : हिन्दी कविता वेबसाइट (hindi-kavita.com)