हिन्दी कविताएँ : सन्दीप तोमर

Hindi Poetry : Sandeep Tomar


1. उदास गलियाँ

मैं गाँव की उदास गलियों से निकलकर यहाँ महानगर में चला आया हूँ; नहीं, नहीं ये विस्थापन नहीं, विस्थापन तो एकदम नहीं है, रोजी-रोटी, गुजारे का सवाल मुझे ले आया है महानगर के वीराने में, ये वीराना मुझे गुजारे का सब सामान तो देता है लेकिन रोज लील लेता है मेरे अन्दर के भावों को और याद आने लगती है मुझे अपने गाँव की उदास गलियाँ।

2. पिता

मैं खिड़की से देखता हूँ अपने पिता को वह पिता, जिसने बहा अपना पसीना सींचा है मुझे और बनाया है एक कमजोर पौधे से मजबूत विशाल दरख़्त, वह पिता सुबह निकल पड़ता खेत में कभी रोपने धान, तो कभी उगाने गेहूँ की फसल रात को मैं खिड़की खोल, देखता-उस पिता को जो नींद से उठ चल पड़ता- खेत को सींचने, ताकि खेत की फसल से पल्लवित हो उसकी अपनी फसल, वह पिता हर रोज मरता, जब बेमौसम बरसात, या फिर सूखा बरसाता अपना कहर तब वो पिता डूबता चिंता में मुझे मैं बनाने की चिंता में घुल जाता वो पिता और मैं बस बंद कर खिड़की जुट जाता उसके सपने का सपना पूरा करने में।

3. प्रेमी

जिन्होंने स्त्रियों की फटी एड़ियों को दरकिनार कर उनकी जुल्फों के कसीदे पढ़े वे संभवतः प्रेमी न होकर ऐसे बहुरूपिया थे जो सच को छोड़ सौंदर्य की परिभाषा गढ़ने में माहिर होते हैं प्रेम सौंदर्य का गुणगान न होकर पीड़ा के क्रंदन को सुनने के बाद की करुणा है।

4. जिंदगी के गणित में

जिंदगी के गणित में तुमने रेखा गणित को चुना और मैं, मैं खुद बना रहा अलजेब्रा मान लेता अचर को कोई चर और सुलझा लेता उलझी हुई समीकरणों को, एक रोज जब मैंने चाहा जिंदगी का हल तब तुम बोली- रेखागणित सी इस दुनिया में मैं और ... और तुम दो समांतर रेखाएँ जैसे नदी के दो तीर, सिर्फ साथ चल सकते हैं, दूर से एक-दूसरे को देख सकते हैं, शायद महसूस भी कर सकते हैं लेकिन, अगर गलती से मिल गये तो अपना अस्तित्व समाप्त, मैंने कहना चाहा प्रतिउत्तर में- तिर्यक रेखाएँ भी उसी रेखागणित का हिस्सा है, साथ चलते हुए एक बार मिलती है और बस एक बार मिलकर फिर नहीं मिलती और यह मिलना कोई संयोग न होकर हो जाता है अक्सर ऐतिहासिक योग शकुंतला का जन्म भी सम्भवतः ऐसे ही तिर्यक रेखाओं का अद्भुत संयोग रहा होगा लेकिन-तुमने बाँध लिया खुद को समांतर रेखाओं के दायरे में, ये दायरे मुझे अलजेब्रा से निकाल समांतर रेखा की मर्यादा सिखाते लगते हैं और मैं ख़ो जाता हूँ वृत्त की एक निश्चित त्रिज्या के गिर्द घूमते पथ से निर्मित परिधि के आकर्षण में।

5. क्या कुछ बदला

क्या कुछ बदला मेरे होने या न होने से धरती आज भी उसी रफ्तार से घूम रही है चाँद भी उसी तरह अपनी चाँदनी बिखेर रहा है ध्वल रोशनी कम नहीं हुई तारे आज भी टिमटिमाते हैं तुमने कहा था कि "तुम बदल गए" माना कि हालात ने मुझे बदल दिया परंतु-- एक मेरे बदलने से कितना अंतर आया(?) प्रकृति के अपने नियम हैं नियति का अपना चक्र है ये किसी एक के बदलने या कि नहीं बदलने से रुकता नहीं इसी तरह व्यक्ति की भी एक नियति है, एक प्रकृति है उसके भी जीने का एक ढंग है किसी एक के होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है निवेदनार्थ- मत रुकने देना मेरे बाद अपनी चर्या को ही तुम उसी शिद्दत से मुझे याद करना जिस तरह मेरे होने पर उमड़ते थे जज़्बात मत रुकने देना उनका प्रवाह ही ये जींवनोउल्लास सम्भवतः जीवित रखेगा तुम्हारे अंदर एक जिजीविषा को।