हिन्दी कविताएँ : राजेश जोशी
Hindi Poetry : Rajesh Joshi
1. आस की उड़ान
राही से शिकायत कौन करे, जब मंज़िल उसके पास नहीं पंखों की हिमायत कौन करे, जब उड़ने की ही चाह नहीं ना साथ किसी का देते है, पर रिश्तों की बुराई करते हैं ना क़ाबू मन पे होता है, और जीवन से शिकायत करते हैं जो बीते सारा पल ये सोच के, अपना पल भी आएगा और अपने जीवन मे खुशियां वो, अंबर से बरसाएगा तो पहले अपने सोच बदलना, फिर अंतरमन से बात करो अपने मन मे यथाशक्ति से, शुभ कर्मों का आचार भरो कर्म प्रधान है जीवन का, क्या इसको तुम झुठलाओगे इस तथ्य को जो समझोगे तुम, तो नया सवेरा पाओगे इक आशा ही वो दीपक है, जो कल की राह दिखाती है हर एक कदम पे मंजिल तेरे, पास मे आती जाती है
2. ध्यान मन का ज्ञान
जीवन के संघर्षों से जब, हो जाए ये मन दुर्बल ध्यान योग ही इस मन को, देगा पूर्ण मनोबल ध्यान लगाने सर्वप्रथम इक, शांत स्थल मे जाना पद्मासन मे बैठ के हाथों से, ज्ञान मुद्रा को बनाना बंद आँखें से इन साँसों की, गति पे ध्यान लगाना मन जो भटके बाहर तो उसे, वापिस ध्यान मे लाना लाखों रूप है ध्यान के जिसका, चयन ना मन कर पाता सबसे सरल है रूप ध्यान जो, मन मे स्थिरता लाता अपने प्रभु या गुरु के रूप का, मन मे चिंतन लाना मन जो भटके बाहर तो उसे, वापिस ध्यान मे लाना धीमे गहरी साँसे लेकर उनको अपने पेट मे भरना पलभर रोक के स्वांश छोड़ना, तन को ढीला करना इसी अवस्था बैठ के मन से कोई विचार ना बनाना मन जो भटके बाहर तो उसे, वापिस ध्यान मे लाना कुछ पल रिश्ते नातों को तुम, मन से पूर्ण हटाना बस अपने मे खो जाना और, मन को शून्य बनाना अपने काम की सूची को तुम, अपने मन से भगाना मन जो भटके बाहर तो उसे, वापिस ध्यान मे लाना मन तो चंचल होता है जो, देता यश और अपयश पर ध्यान लगाएं बार बार तो, होगा अपने ये वश
3. नारी के दिव्य रूप
जिए है लाखों पल जीवन के, रहे अधूरे ये अरमान । फिर बचपन मिल जाये मैया, हो तुझसे मेरी पहचान ॥ जन्म दिया है मैया तूने, रहा शीश पे तेरा हाथ हुआ कष्ट जब मेरे मन को, जागी है तू सारी रात गुरु भी तू है सख़ा भी तू, और तू ही है मेरा भगवान धन दौलत से बड़ी है मैया, तेरे होंठों की मुस्कान ॥ लड़ते थे हम देखो हरपल, फिर भी तेरा क्या कहना मन तू मेरा पड़ लेती थी, ओ मेरी प्यारी बहना राखी के एक तार से तूने, बांध लिया है मेरा मन । दूर देश में रहते हैं पर, प्यार कभी ना होगा कम ॥ पत्नी रूप में मिली जो शक्ति, पूर्ण हुआ मेरा संसार स्वार्थ रहित है क़र्म तुम्हारा, करता हूँ तेरा आभार जीवन के हर पल में तूने, साथ दिया है एक समान अपने कष्ट छुपाये तुमने, त्याग तुम्हारा बड़ा महान ॥ तेरी किलकारी से मेरे, घर को मिली नयी पहचान कर्म भाव में सेवा तेरी, पूर्ण हुए मेरे अरमान सामवेद संग यजुर्वेद भी, तू ही मेरा वेद अथर्व ऐसी मेरी बिटिया रानी, यही सोच के होता गर्व ॥
4. अरमानों की बारिश
अरमानों की बारिश है, तू बुझा ले उम्मीदों की प्यास अपने दिल की कोने मे ना, बचा के रखना कोई आस ज्यादा उम्मीदों का अपने, दिल मे बोझ ना तु रखना अरमानों की बारिश का ना, सदा भरोसा तुम करना सुख लाता है खुशहाली तो, दुख भी कुछ बतलाता है जीवन के संघर्ष मे कैसे, लड़ना है सिखलाता है ध्यान योग अपनाके तुम, मन को नियंत्रण मे रखना अरमानों की बारिश का ना, सदा भरोसा तुम करना कर्म प्रधान है जीवन मे, जो फल हमको दिलवाता है मन वश मे करता बुध्दि जो, सारे कर्म करवाता है शुद्ध भावना रखना मन मे, पाप कर्म से तुम डरना अरमानों की बारिश का ना, सदा भरोसा तुम करना याद रहे जो पाया है वो, खोने से भी है ज्यादा सकारात्मक सोचे मन मे, खुद से करना ये वादा अपने आप से बातें करके, मन मे शक्ति को भरना अरमानों की बारिश का ना, सदा भरोसा तुम करना
5. पल पल कौन सा पल
पल पल मन ये सोच रहा था, इक पल ऐसा आयेगा उस पल में इस पल की इच्छा, वो पल दे कर जाएगा जाने क्यों इन इच्छाओ की, मन में इच्छा थी जागी भ्रम के इस जीवन में क्यों, इच्छाओं की धुन लागी धैर्य बसा हो जिस मन मे, वो मोड दे तूफ़ानों का रुख झांक के देखो मन के तले मे, नहीं मिलेगा कोई दुख फिर क्यों प्राणी तेरे मन मे, व्यर्थ की घबराहट जागी भ्रम के इस जीवन में क्यों, इच्छाओं की धुन लागी चिंताओं के बादल जब इस, मन के ऊपर छाते हैं मन के भीतर के विश्वाश से, जल्दी वे छट जाते हैं मन की ताकत से हैं खुशियाँ, तन है मन का सहभागी भ्रम के इस जीवन में क्यों, इच्छाओं की धुन लागी
6. आध्यात्मिक शक्ति
जो दर्द का हो अहसास तो वो, हर आँखों में पानी लाता तो क्यों होता है रिश्तों से ही, सुख दुख का अपना नाता चिंता में डूबे हर जन को, मन से हिम्मत दिलवाऊँ इस क़ाबिल कर देना भगवन, दूज़ों के दुख हर पाऊँ ॥ सुख से पूरा भरा हुआ है, जीवन का ये हर इक पल वर्तमान ही जीवन है जहाँ, इंसा ढूँढे अपना कल दिल की इन बातों को मै, अपने दिल को समझाऊँ इस क़ाबिल कर देना भगवन, दूज़ों के दुख हर पाऊँ ॥ तेरी भक्ति से हम सबका, ये रोम रोम है ॐ हुआ अपने मन में दूज़ों की ख़ातिर, हरदम ही उठे दुआ सेवा करके दूजों की आँखों में, खुशियाँ झलकाऊँ इस क़ाबिल कर देना भगवन, दूज़ों के दुख हर पाऊँ ॥
7. पंचम सुख
जब पाँच सुखों से हो जाए, परिचय ये पूर्ण हमारा पहला सुख है निरोगी तन, जो संयम से है मिलता संतुष्टठी मे दूजा सुख है, ये दान धर्म से खिलता तीसरा सुख है निर्मल मन, जो पाप कर्म को हटाता ध्यान योग है चौथा सुख, जो मन की व्यथा मिटाता पंचम सुख ईश्वर भक्ति है, जो चारों सुख दिलवाता ये दुनिया तो इक भ्रम है, हमको इसका बोध करवाता दुख का कोई अस्तित्व नहीं, ये सोच से पैदा होता उस ईश्वर के हम अंश हैं तो, फिर क्यों धैर्य तू खोता निर्भय होकर कर्म को करना, ना फल का करना ध्यान फिर इच्छा से भी अधिक मिलेगा, है गीत का ये ज्ञान
8. परमपिता की शक्ति
जो लागे सब्र का इम्तहान तो, आज अभी भी है जारी पर समय जल्द ही यही कहेगा, अब आई तेरी बारी बस मन के इरादों को मजबूती, से तुम थामे रखना उस परमपिता की इच्छा पे, तुम पूर्ण भरोसा रखना कर्म योग की शक्ति से, हर समय दोष मिट जाते हैं ध्यान योग इस मन के भीतर, शुद्ध चेतना लाते हैं सुख दुख जीवन के पहलू हैं, इनसे कभी ना डरना उस परमपिता की इच्छा पे, तुम पूर्ण भरोसा रखना मन जो चाहे वैसा हमको, सदा नहीं है मिलता लेकिन अपने संघर्षों का, पूर्ण हिसाब वो लिखता हर रात के बाद सवेरा आता, मन मे धैर्य को रखना उस परमपिता की इच्छा पे, तुम पूर्ण भरोसा रखना
9. भगवद गीता का प्रभाव
भगवद गीता के प्रभाव को, लिया जगत ने मान जीवन को सुख देने वाले, 700 इसमे ज्ञान ‘अर्जुन विषाद’ योग से होती, गीता की शुरुवाद जहाँ पार्थ के मन मे जागा, शंस्य और विवाद ‘सांख्य’ योग है कहता, मन की बातों मे ना आना ‘कर्म’ योग है सिखलाता, कर्मों से लक्ष्य को पाना ‘ज्ञान’ योग मानव की, बुद्धि मे विस्तार है लाए ‘कर्म सन्यास’ योग ही मन से, चिंता दूर भगाए ‘ध्यान’ योग इंद्रियों का, मन से वशीकरण सिखलाता ‘ज्ञान विज्ञान’ योग इस जग का, साक्षात्कार कराता ‘अक्षर ब्रह्म’ योग से हमको, प्रभु का बोध है करना ‘राज’ योग है सिखलाता, शुभ नीति कैसे रचना ‘विभूति’ योग से हर मानव है, दिव्य योग को पाता ‘विश्वरूप’ योग ब्रमाण्ड की, ऊर्जा मानव को दिलाता ‘भक्ति’ योग मानव के चित्त मे, प्रभु से प्रेम जगाए ‘प्रकृति विवेक’ योग उस प्रेम मे, पूर्ण चेतना बनाए ‘गुण विभाग’ योग बतलाता, सत रज तम की बातें योग ‘पुरुषोत्तम’ हर मानव मे, गुण विस्तार हैं लाते ‘दैवासुर’ योग ही मन की, सारी दुविधा को हरता ‘श्रद्धा’ योग जगाए आस्था, मन मे शक्ति भरता ‘मोक्ष’ योग मे कृष्ण ने जीवन, का अस्तित्व बताया बोले मोक्ष मिलेगा उसको, जो छोड़े संसार की माया
10. नारी शक्ति
इस जगत को अद्भुत शक्ति है, नारी ने दिखलायी तो बेटी से माता का सफर ये, कविता ले कर आयी ये कविता उसकी शक्ति का ही, करती है गुणगान जो नारी शक्ति पहचाने वो, होता है पुरुष महान प्रथम रूप बिटिया का लेके, नारी जगत मे आती मात पिता के सपनों को, फिर पूरा करके दिखाती दूजे रूप मे बन जाती है, घर मे किसी की बहना फिर भाई बहन के अरमानों का, कहलाती वो गहना रूप तीसरा मित्र का लेती, और उनका साथ निभाती मित्रों के हर संकट मे अपना, पूर्ण सहयोग बनाती चतुर्थ रूप पत्नी का लेकर, बनती पति की शक्ति सुख शांति भर देती है, जिस घर मे कदम वो रखती पंचम रूप है परम मनोहर, जब बनती ये माता सारे कष्टों से खुद लड़ती, बच्चों की भाग्य विधाता सहनशीलता धैर्य प्रेम संग, क्षमा हृदय मे रखती बाल ना बांका होने देती, जब धारण करती शक्ति कष्टों को सहकर भी ये, संकट से लड़ती नारी पंच रूप की इस देवी का, जगत रहेगा आभारी
11. बिटिया का जन्मदिवस
आँखो से चुनकर ख़्वाब नए, सपनों के महल बनाते है ये बच्चे है जो बाबा के, घर आँगन को महकाते है किलकारी से शहनाई तक, मात पिता रखे अरमान जीवन में वो मंज़िल पा ले, हो उनसे अपनी पहचान संघर्ष हमारे जीवन के, जब तन मन को जुँझलाते है एक तेरी मुस्कान से मेरे, रोम रोम खिल जाते है बचपन के बादल में देखो, भरा है यादों का पानी जाने कैसे बीत गए पल, हुई बड़ी बिटिया रानी शांति समृद्धि और संस्कृति, मन में रहे ये सारे हर्ष जन्मदिवस के अवसर पर, देंगे हम आशीष हर वर्ष ॥
12. कमजोर मुश्किलें
मुश्किलों से भागना तो होता है आसान पर जीवन की मुश्किलें लेतीं हैं इम्तहान इन कमजोर मुश्किलों से ना हो परेशान ये तो हैं बस पल दो पल की मेहमान मुश्किलें किसके जीवन मे नहीं आती पतझड़ से पहले तो बहार भी नहीं आती आधियाँ चलती नहीं मुश्किलों को खोलने ये तो चलती है तेरी हिम्मत को तोलने गर है मन मे तेरे बस इक विश्वास तो आत्मशक्ति से होगी पूरी तेरी आस अपने इरादों को बनाओ अपनी शक्ति उसके सामने है क्या मुश्किलों की हस्ती चाहे पलटे किस्मत तू हिम्मत ना हार उम्मीद की पतवार से ले कश्ती को पार फिक्र करो ना कल की जिओ अपना आज कहते योगी इसको सिद्ध जीवन का राज ये मुश्किलें तो रहती हैं बस दिन दो चार तू हौषला ना छोड़ है समय की ये पुकार जो हिम्मत हारी तूने तो होगी तेरी हार मुश्किलों से लड़ने पे होंगें सपने साकार
13. सूर्य तिलक
आसमां के माथे पे जो, छाई चंदा की लाली धरती बोली अंबर से ये, पल जाए ना यूं खाली तेरे माथे पे करना है, सूरज का बस एक तिलक अंबर बोला राम के माथे, मे दिखती है वही झलक हाथ जोड़के धरती बोली, करते हैं उनका गुणगान जो खुद मेरे संचालक है, क्यों ना दें उनको सम्मान भारतवर्ष की इस पावन मिट्टी, पे विश्व भी इतराए इस धरती का मान बढ़ाने, श्री राम अयोध्या हैं आए
14. भक्ति की शक्ति
भक्ति भाव के घेरे में जब, वचन बध्ह हो जाता है। कलयुग का रावण भी देखो, नारायण बन जाता है ॥ भक्ति स्वाद जब भोजन में, अपना रंग दिखाता है । रूखा सूखा घर का खाना, प्रसाद रूप बन जाता है ॥ प्रेम रूप में भक्ति भाव जब, घर के भीतर आता है । साधारण सा घर भी देखो, एक मंदिर बन जाता है ॥ भक्ति तार जब वीणा से, मोहक धुन को सजाता है किसी ताल का हो संगीत, कीर्तन वो बन जाता है ॥ पूर्ण भक्ति से ब्रह्म हमारा, जब पानी को छू जाता है । किसी धरा का भी हो जल, अमृत वो बन जाता है ॥ स्वार्थ रहित जो कार्य हमारा, भक्ति भाव ले आता है । कर्म किया हो किसी धर्म से, सेवा वो कहलाता है ॥ छोड़ के झूठी माया को, जो मन में भक्ति जगाता है । मानव रूप में वो प्राणी, स्वयं देव कहलाता है॥ कष्ट किसी का हर लेना ही, मन भी भक्ति जगाना है। फिर राम हैं उनकी करते रक्षा, जो मूल मंत्र ये जाना है॥
15. मेरे भवन में घनश्याम
आओ हमारे घनश्याम , भवन मोरे आस लगी है । आओ हमारे घनश्याम , भवन मोरे आस लगी है ॥ मीरा कहती गिरधर मेरे, मन में बसे हो साँझ सवेरे। राधा जी कहती मोरे श्याम, भवन मोरे आस लगी है ॥ आओ हमारे घनश्याम , भवन मोरे आस लगी है प्रेम की मुरली, ज्ञान की गीता, सत्य अहिंसा और परिणीता दे दो ये हमको वरदान, भवन मोरे आस लगी है ॥ आओ हमारे घनश्याम , भवन मोरे आस लगी है लेकर आओ संग में दाऊ, बैठ तिहारे माखन खाऊ । मैया ने खोले घर के द्वार, भवन मोरे आस लगी है ॥ आओ हमारे घनश्याम , भवन मोरे आस लगी है तुम हो सबके पालन हारे, राधे राधे राह दिखा दे । बिगड़ी बना दो मेरे काम, भवन मोरे आस लगी है ॥ आओ हमारे घनश्याम , भवन मोरे आस लगी है आस में तोहरि बीता जीवन, कब दोगे प्रभु मोहे दर्शन । सुन लो हमारी फ़रियाद, भवन मोरे आस लगी है ॥ आओ हमारे घनश्याम , भवन मोरे आस लगी है
16. राम नाम से बनते काम
राम नाम की महिमा प्राणी, देख गगन धरती जल मे। बाल ना बाँका तेरा होगा, जब तक राम बसे मन मे ॥ राम प्राण है राम चेतना, राम नाम से चलती साँस । सिद्द काम सब हो जाते है, राम से जब लगती है आस राम रमाइया कृष्णा कन्हैया, रहते है वो कण कण मे बाल ना बाँका तेरा होगा, जब तक राम बसे मन मे ॥ काम क्रोध और लोभ मोह ने, छीना आज हमारा है भावसागर से पार लगा दो, हमको तेरा सहारा है राम नाम से काम हैं बनते, कहते हैं हम जन जन से बाल ना बाँका तेरा होगा, जब तक राम बसे मन मे ॥ रामचरित को अपनाना ही, मन मे राम बसाना है जो मानव की पीड़ा हरता, उसने राम को जाना है शीश झुकाकर बोलो भगवन, शांति रहे सबके घर मे बाल ना बाँका तेरा होगा, जब तक राम बसे मन मे ॥
17. विचार और आचार
4 वर्ष की उम्र में मेरे, दिल ने लिया था मान इस दुनिया में बस मेरे, हैं पापा बड़े महान फिर जाना की प्यार था उनका, सच में बेमिसाल यही समझने देखो हमको, लागे थे 9 साल बारवें साल ने देखो कैसे, मन को मेरे मोड़ा वैसे तो अच्छे है लेकिन, ग़ुस्सा करते थोड़ा मेरी इच्छाओ का पापा, करते हैं सम्मान बस 16 की उम्र मे उनसे, पूर्ण हुई पहचान योगासन मे ध्यान लगाना, उनका था ये कहना 25 साल मे उनसे सीखा, कैसे है खुश रहना वक्त ने हमको दिखलाया, जब गए पापा से दूर जीवन के हर संघर्षों से, हो गए थक के चूर 35 साल मे मुश्किल था जब, बच्चों को समझना जाने कैसे कर जाए पापा, था हमको वो अपनाना हम 40 साल की उम्र मे लाए, बच्चों मे अनुशासन पर पापा रखते थे हम सबपर, प्यार से अपना शासन बस पूर्ण 50 किए हैं फिर भी, ऋण से है पहचान पर पापा के चेहरे पे रहती, कर्ज मुक्त मुस्कान हरदम पाने की चाहत मे, भूल गए हम जीना पर 70 की उम्र मे पापा, चलते तान के सीना मात पिता के उम्मीदों की, जो तोड़ोगे आस याद रहे फिर यही बात को, दोहराएगा इतिहास
18. मानव यात्रा
दिव्य लोक में बैठे भगवन सोचें बारम्बार ऐसी रचना करूँ जगत में, प्रेम का हो विस्तार निर्मल मन हो शीतल काया, दया का हो अवतार अपने अंश की एक छवि से, रचता हूँ संसार फिर आयी एक ऐसी आँधी, बदला ये स्वरूप मोह माया के बादल में, खो गया मानव रूप पंचमुखी इस दानव का, देखा रंग कुरूप काम, क्रोध मद लोभ मोह की, छायी काली धूप भूल गए हम हरी भजन को, धन का पेड़ लगाया राग द्वेष का पानी देकर उसको रोज़ बड़ाया अपनो से फिर तोड़ा नाता, आसतत्ति को जगाया मानव रूप दिखाकर मन को दानवता को बसाया हुई आँख नम नारायण की, मानव को समझाया कुछ संकेत दिए भगवन ने, सही मार्ग दिखलाया मन अज्ञानी समझ ना पाया, दृष्टि से धुँधलाया भक्ति मार्ग को छोड़के उसने स्वार्थ मार्ग अपनाया राग द्वेष जो फैला जग में, बन गयी वो बीमारी मानव से मानव में आई फैली एक महामारी हाथ मिलाकर मानव पहले होते थे आभारी अब सामाजिक दूरी में रहते, कैसी विपदा भारी इस महामारी ने मानव के , मिलने पे रोक लगायी नाता छूटा जिनसे अपना, उनकी याद सताई बीज द्वेष का पाला मन में, बात समझ में आयी फिर से प्रेम उजागर हो तो, इसने सबकी भलाई हाथ जोड़कर मानव ने तब हरी का ध्यान लगाया मन से सारे पापों को फिर आंसू से नहलाया अपने बच्चों को भगवान ने, अपने गले लगाया इच्छा तेरी पूरी होगी, ये विश्वाश दिलाया बीत गया अब समय कष्ट का, लाया हूँ नया साल राग द्वेष को छोड़ो मानव तोड़ो माया जाल बाल ना बाँका तेरा होगा दूँगा ऐसी ढाल नष्ट करूँगा ये महामारी, तुम बने रहो मेरे लाल बीत गयी फिर काली रैना, हर मानव मुसकाया साथ सदा मै सबका दूँगा ये आदर्श बनाया नारायण ने मानव हित का ब्रह्म बान चलाया नाश हुआ फिर महामारी का, फैली सुख की छाया
19. योगा अब तो होगा
उस मानव को हम सारे हैं, कहते सुख का योगी जिस मानव का तन है रहता, सारी उम्र निरोगी तन हरदम ही स्वस्थ रहे, वो शक्ति रखता योगा इसको करने से जीवन मे, सुख का अनुभव होगा शीर्षासन करता है उल्टा, रक्त का जब संचार सर तक सारी कोशिकाओं का, दूर करे ये विकार गरुड़ासन तन मन दोनों मे, एक संतुलन लाता जोड़ों का ये दर्द मिटाए, गठिया को दूर भगाता पेट के सारे रोगों का, मयूरासन है समाधान रोग मिटाए मधुमेह का, ऊर्जा की है खान गोमुखआसन पीठ का और, कंधों का दर्द हटाता ह्रदय समेत ये गुर्दों के, रोगों को जड़ से मिटाता हाथों के जोड़ों मे शक्ति, जल्द बकासन लाता चिंता और अवसाद मिटाके, मन एकाग्रता पाता चक्रासन से रीड की हड्डी, हो जाती है लचीली कमर पेट से चर्बी घटती, होती गर्दन पतली हाथों और कंधों की जकड़न, भुजंगासन से जाती राहत कमर दर्द से होती, गर्दन सुडौल हो जाती सर्वांगासन पूरे शरीर मे, है रक्त संचार बढ़ाता अनिंद्रा का रोग मिटाके, शक्ति मन मे लाता गुर्दों के रोगों को जड़ से, मतस्येन्द्रासन हटाता इसको करके मधुमेह का, रोग खत्म हो जाता योगासन की शक्ति को, अब हमने है पहचाना सारे रोग हटाके देता, तन को स्वस्थ खजाना
20. सबका शुक्रिया
मुश्किलों के समा भी, बदल जाएँगे, हर तरफ़ रास्ते ही, नज़र आएँगे माँ का साया पिता की, दुआ जो मिले , ग़म के मौसम भी पल में बदल जाएँगे साँस लेता हूँ भगवान, है तेरा करम, ज्योति आँखों में है, ये भी तेरा रहम तूने सबको दिया, है तेरा शुक्रिया, सबके दिल में पले, ज्ञान का ये धरम ये चाहूँगा मै, तुम गवारा करो, चलो संग मेरे, इरादा करो देखे है बहुत दौर, शामों शहर, तुम रहो साथ में, बस ये वादा करो मंज़िलो की तरफ़ जो, बड़े है कदम, है छोटे मगर, होषलो में है दम इनकी आँखों में पलते है, सपने बड़े, मुस्कुराहट से इनकी, मिटे अपने ग़म
21. दिल से दिवाली
इन बुझे दियों का आज, हम करते है सम्मान इनकी रोशनी से कल, जगमगाया था आसमान देख के लगता है इन्हें, की करते हैं ये बात सिर्फ दिवाली ही नहीं, हम रोशनी दें हर रात ये दीप की कतार है, जो मंजिलों को चूमती ये रोशनी भी खास है, जो सबके मन मे झूमती ये पर्व सत्य का है और और धर्म का प्रतीक है शुभ दीपावली के आगमन की ऐसी रीत है शुद्ध भावनाओं से प्रभु को हम मनाएंगें अपने मन के अंधकार को हमी मिटाएंगें राम के चरित को अपने कर्मों से मिलाएंगे दूसरों की राह मे दिये हमी जलाएंगे बस दिए जलाना ही न लक्ष्य हो दिवाली का राग द्वेष को मिटाना होगी अपनी सिद्धहत्ता मन विजय करे हमारे मन के ही विचार पे सच मे होगी वो दिवाली मन कहे पुकार के जगमगाए रोशनी वो घर मे लाये संपदा शांति और संस्कृति हो संग आपके सदा इस दिवाली अपने मन से दीप को जलाएंगे फिर जला के उसको अपने दिल से ना बुझाएंगे
22. ठोस मनोबल
सपनों के फूलों से सजायें, अरमानों का हर कोना उम्मीदों की बारिश मे, अब इन सपनों को है बोना अब हार नहीं मानेंगे हम, आंधी चाहे कितनी आये चट्टानों सा ठोस मनोबल, अपने मन मे हम लाये दूर है मंजिल फिर भी तू, अपनी मंजिल को पाएगा रस्ता खुद को दिखाना तो ये रस्ता भी कट जाएगा काँटों से क्या डरना है, जो माली खुद तू कहलाये चट्टानों सा ठोस मनोबल, अपने मन मे हम लाये उम्मीदों की राहों पर, घनघोर मुश्किलें आती है जो सच की राह पे चलता है, दुनिया उसको झुठलाती है तू चलता चल और तेरे मन मे, ना कोई दुविधा आये चट्टानों सा ठोस मनोबल, अपने मन मे हम लाये जीवन मे हर मानव करता, कितनी सारी है इच्छा पर वो सब मिलने से पहले, होती है ठोस परीक्षा मन से मन को जगाया तो, मन मे शक्ति है आये चट्टानों सा ठोस मनोबल, अपने मन मे हम लाये
