हिन्दी कविताएँ : पूजा अग्निहोत्री

Hindi Poetry : Pooja Agnihotri


1. फिलर्स

मैं शामिल तुम्हारी जिंदगी में फिलर्स की तरह हूँ समर्पित पूरी तरह तुम्हारे लिये, जिनसे हो तुम मुकम्मल भी, पर जिनके होने का कोई फर्क नही तुम्हारे अस्तित्व पर न ही तुम्हारे व्यक्तित्व पर मैं बस शामिल हूँ तुम्हारी जिंदगी में फिलर्स की तरह। जब ना तरन्नुम में हो गज़ल या बेसुरा सा कोई नवगीत हो या उलझा सा संगीत हो ये भी संभव है कभी-कभी बेबात कलेजा जाये मचल मोहब्बत के बाद फिर सिफर मैं बस शामिल हूँ तुम्हारी जिंदगी में फिलर्स की तरह।

2. आँसू

इंसान के सबसे सच्चे साथी, बड़े अजीब होते हैं ये आँसू, जिंदगी की हर शै में समाये हुये, कभी गम में भी अकेला नही छोड़ते, खुशी में भी चले आते हैं, दौड़ते। बचपन में जिद के होते थे मम्मी पापा इनको साथ देखकर जल्दी ही मान जाते थे, न माने तो दादी, उनके लिये तो ब्रह्मास्त्र थे मेरी नयनबिंदु, कई बार उड़ेला गया वात्सल्य सिंधु। ससुराल में, मेरे आँसू बने विजय मुस्कान का कारण, कभी सासू माँ की, कभी ननद जेठानी की। और कभी कभी प्राणेश्वर के अहं को करते तुष्ट। और मेरे अबला एकल होने के वहम को करते पुष्ट। पर एक सच्चे साथी रहे हमेशा, यदि स्त्री के पास आँसू न हों तो, तो वो हो भावशून्य, मणि हीन सर्प सा हो उसका अस्तित्व स्त्री संपूर्णता के कारक, आँसू और ममत्व।

3. कितने ईमानदार हो

मुझे नहीं पता तुम कितने ईमानदार हो मेरे निमित्त पर तब भी मन कहता है सच मान लूँ तुम्हारा कहा। कभी - कभी लगता है , तुम हो झूठे और छलिया खिलकर दिढ़ हो चुके जो फूल, वीरानी बगिया के देकर अलहदा अहसास,कहते हो 'कमसिन कली', वो भी खिल उठती है जैसे, शबनम से लिया नहा। मुझे नहीं पता तुम कितने ईमानदार हो मेरे निमित्त पर तब भी मन कहता है सच मान लूँ तुम्हारा कहा। जब वो होती है नदी, अल्हड़ सी , कलकल करती होती है बड़े वेग में आगे बढ़ती, तोड़कर तटबन्ध तब तुम बड़े स्नेह से बाँध लेते हो अपनी बातों में, वो शिद्दत से महसूस करती हर हर्फ़ जो तुमने कहा। मुझे नहीं पता तुम कितने ईमानदार हो मेरे निमित्त पर तब भी मन कहता है सच मान लूँ तुम्हारा कहा। सच जानते भी डूबती है तुम्हारे लफ्जों के दरिया में सच ही तो है, जो भी तुम लिखते हो अपनी कलम से हर औरत दुनियावी चाहती है, ये उसका प्रियतम कहे मानती है तुम्हें प्रियतम या इन्ही बातों को उनका कहा। मुझे नहीं पता तुम कितने ईमानदार हो मेरे निमित्त पर तब भी मन कहता है सच मान लूँ तुम्हारा कहा। मीठी-खट्टी सी, झूठी-सच्ची सी, कुछ बातें हैं तुम्हारी जिसमें खोजती है खुद को, खिलखिलाती नायिका सी, झूठ या सच तो दो ही जानते हैं, एक तुम दूजा खुदा पर पा जाती है तुम्हारे शब्दों में, अपना मनचाहा जहाँ मुझे नहीं पता तुम कितने ईमानदार हो मेरे निमित्त पर तब भी मन कहता है सच मान लूँ तुम्हारा कहा।

4. किताब की मानिंद

मैं खुल जाना चाहती हूँ तुम्हारे सामने एक किताब के मानिंद, पर डरती हूँ कि तुम, पढ़कर मेरे हर हर्फ़ को, दुनिया के सामने इजहार न कर दो। कराना चाहती हूँ रूबरू, जख्म-ए-नशेमन से, जो मिले हैं, अपने ही हमदर्दों से। पर डरती हूँ, तुम छू कर मेरे मर्म को, दामन मिरा दागदार न कर दो। ये भी सच है, मुझे प्यार नहीं तुमसे, पर समाना चाहती हूँ, तुम्हें अपने वजूद में। डरती हूँ, होके बावस्ता मेरे जिस्म से, रूह को तुम बेकरार न कर दो। दे न पाऊँगी एक बूंद इश्क भी, हसरत है मगर, झीनी चूनर में चाहत के सितारे सजाने की, डरती हूँ, जानकर मेरी कमजर्फ ख्वाहिशें, कहीं तुम मुझे दरकिनार न कर दो।

5. स्त्री होने का गर्व

गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! चुप क्यों रहती हो तुम घाव क्यों सहती हो तुम क्या दर्द नहीं होता तुम्हे क्या कोई तकलीफ नहीं होती आखिर किस मिट्टी की बनी हो तुम या सिर्फ मिट्टी की ही बनी हो तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! या इस देह के भीतर कोई आत्मा भी है क्या वो तुम्हें धिक्कारती नहीं क्या सम्वेदनाएँ तुम्हारी कभी तुम्हें खुद के लिये पुकारती नहीं जानती हो कि जुल्म करने वाले से बड़ा गुनाहगार जुल्म सहने वाला होता है फिर क्यों जुल्म किसी के सहती हो तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! कुछ तो बोलो लब तो खोलो बोलो कि तुम मात्र एक देह नहीं हो दिल है तुम्हारे सीने में जो धड़कता है एक आत्मा बसती तुममें भी बोलो कि दर्द तुम्हें भी होता है जब बिन बात सताई जाती हो बेवजह कोख में मिटाई जाती हो जब दहेज के हवन कुंड में समिधा बना,जलाई जाती हो तुम। गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! हवस भरी गिद्ध नजरे जब तुम्हारे जिस्म को भेदती है वासना के पंजो तले जब देह से लेकर आत्मा तक रौंदी जाती है और उँगलियाँ जमाने की गुनहगारों की बजाय तुम्हारे ही चरित्र पर उठाई जाती है तब कैसी-कैसी तकलीफें झेलती हो तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! ये सब क्यों नहीं कहती हो तुम अरे क्यों चुप रहती हो तुम अरे! हाँ बोलोगी भी कैसे लब खोलोगी कैसे बचपन से तो तुमने ये ही सीखा है शर्म स्त्री का गहना है कोई कुछ भी कहे कुछ भी करे अपनी मर्यादा, लक्ष्मण रेखा में रहना तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! संस्कारों की बेडियाँ डाले घुट घुट के मर जाना पर आवाज मत उठाना वरना लोग क्या कहेंगे क्या सोचेंगे क्या समझेंगे अरे कोई कुछ नही सोचता तुम्हारे बारे में न ही कोई तुम्हें कुछ समझता है क्योंकि खुद को कुछ नहीं समझती हो तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! कभी देवी बनाकर मंदिरों में बिठाई गयी कभी पातुरि बना कोठे पर नचाई गयी कभी डायन कहकर सरेआम निर्वस्त्र घुमाई गयी जब चाहा इन ज़मीं के देवताओ ने व्यक्तित्व से तुम्हारे खिलवाड़ किया स्वार्थ के लिये मनचाहा रूप तुम्हारा गढ़ दिया और उसे ही अपना नसीबा मान बैठी हो तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! माँ हो, बेटी हो बहन हो, बीवी हो हर रिश्ते तुम्हें याद रहते हैं पर तुम्हारा खुद से भी, है इक रिश्ता इन सबसे परे खुद का भी इक अस्तित्व है तुम्हारा कि इन सबसे जुदा इक व्यक्तित्व है तुम्हारा भला ये क्यों भूल जाती तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! आखिर किस बात की कमी है क्यों खुद को औरो से हीन समझती हो तुम महसूस तो करो जरा कि देखो दुनिया के इस उजड़े चमन में अपने हुनर की खुशबू लिये किस कदर खिलती कली हो तुम गर्व करो खुद पर, कि स्त्री हो तुम! पहले ढूंढो तो खुद को फिर देखो धरती से लेकर अंतरिक्ष तक कामयाबी की इबारत लिखी है तुमने रचा है ईश्वर ने तुमको अपने ही हाथो से, उस ईश्वर की सबसे अनोखे हस्ताक्षर हो तुम गर्व करो खुद पर कि स्त्री हो तुम!